Month: October 2017

BRAHMA KUMARIS MURLI 29 OCTOBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 October 2017

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29/10/17
मधुबन
“अव्यक्त-बापदाद”‘
ओम् शान्ति
21-02-83

शान्ति की शक्ति

आज बापदादा अमृतवेले चारों ओर बच्चों के पास चक्कर लगाने गये। चक्कर लगाते हुए बापदादा आज अपनी शक्ति सेना वा पाण्डव सेना सभी की तैयारी देख रहे थे कि कहाँ तक सेना शक्तिशाली शस्त्रधारी एवररेडी हुई है। समय का इंतजार है वा स्वयं सदा ही सम्पन्न रहने का इंतजाम करने वाली है। तो आज बापदादा सेनापति के रूप में सेना को देखने गये। विशेष बात, साइन्स की शक्ति पर साइलेन्स के शक्ति की विजय है। तो साइलेन्स की शक्ति संगठित रूप में और व्यक्तिगत रूप में कहाँ तक प्राप्त कर ली है? वह देख रहे थे। साइलेन्स की शक्ति द्वारा प्रत्यक्ष फल रूप में स्व परिवर्तन वायुमण्डल परिवर्तन, वृत्ति परिवर्तन, संस्कार परिवर्तन कहाँ तक कर सकते हैं वा किया है? तो आज सेना के हरेक सैनिक की साइलेन्स के शक्ति की प्रयोगशाला चेक की, कि कहाँ तक प्रयोग कर सकते हैं?

स्मृति में रहना, वर्णन करना वह भी आवश्यक है लेकिन वर्तमान समय के प्रमाण सर्व आत्मायें प्रत्यक्षफल देखना चाहती हैं। प्रत्यक्षफल अर्थात् प्रैक्टिकल प्रूफ देखने चाहती हैं। तो तन के ऊपर साइलेन्स की शक्ति का प्रयोग करते हैं। ऐसे ही मन के ऊपर, कर्म के ऊपर, सम्बन्ध सम्पर्क में आने से सम्बन्ध सम्पर्क में क्या प्रयोग होता है, कितनी परसेन्टज में होता है – यह विश्व की आत्मायें भी देखने चाहती हैं। हरेक ब्राहमण आत्मा भी स्व में प्रत्यक्ष प्रूफ के रूप में सदा विशेष से विशेष अनुभव करने चाहती है। रिजल्ट में साइलेन्स की शक्ति का जितना महत्व है, उतना उसे विधि पूर्वक प्रयोग में लाने में अभी कम है। चाहना बहुत है, नॉलेज भी है लेकिन प्रयोग करते हुए आगे बढ़ते चलो। साइलेन्स शक्ति के प्राप्ति की महीनता अनुभव करते स्व प्रति वा अन्य प्रति कार्य में लगाना, उसमें अभी और विशेष अटेन्शन चाहिए। विश्व की आत्माओं वा सम्बन्ध, सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को महसूसता हो कि शान्ति की किरणें इन विशेष आत्मा वा विशेष आत्माओं द्वारा मिल रही हैं। हरेक से चलता फिरता ”शान्ति यज्ञ कुण्ड” का अनुभव हो। जैसे आपकी रचना में छोटा सा फायरफ्लाई दूर से ही अपनी रोशनी का अनुभव कराता है। दूर से ही देखते सब कहेंगे यह फायरफ्लाई आ रहा है, जा रहा है। ऐसे इस बुद्धि द्वारा अनुभव करें कि यह शान्ति का अवतार शान्ति देने आ गया है। चारों ओर की अशान्त आत्मायें शान्ति की किरणों के आधार पर शान्ति कुण्ड की तरफ खिंची हुई आवें। जैसे प्यासा पानी की तरफ स्वत: ही खिंचता हुआ जाता है। ऐसे आप शान्ति के अवतार आत्माओं की तरफ खिंचे हुए आवें। इसी शान्ति की शक्ति का अभी और अधिक प्रयोग करो। शान्ति की शक्ति वायरलेस से भी तेज आपका संकल्प किसी भी आत्मा प्रति पहुंचा सकती है। जैसे साइन्स की शक्ति परिवर्तन भी कर लेती, वृद्धि भी कर लेती है, विनाश भी कर लेती, रचना भी कर लेती, हाहाकार भी मचा देती और आराम भी दे देती। लेकिन साइलेन्स की शक्ति का विशेष यंत्र है – ‘शुभ संकल्प’ इस संकल्प के यंत्र द्वारा जो चाहो वह सिद्धि स्वरूप में देख सकते हो। पहले स्व के प्रति प्रयोग करके देखो। तन की व्याधि के ऊपर प्रयोग करके देखो, तो शान्ति की शक्ति द्वारा कर्मबन्धन का रूप, मीठे सम्बन्ध के रूप में बदल जायेगा। बन्धन सदा कडुवा लगता है, सम्बन्ध मीठा लगता है। यह कर्मभोग – कर्म का कड़ा बन्धन साइलेन्स की शक्ति से पानी की लकीर मिसल अनुभव होगा। भोगने वाला नहीं, भोगना भोग रही हूँ यह नहीं, लेकिन साक्षी दृष्टा हो इस हिसाब किताब का दृश्य भी देखते रहेंगे इसलिए तन के साथ-साथ मन की कमजोरी, डबल बीमारी होने के कारण जो कड़े भोग के रूप में दिखाई देता है, वह अति न्यारा और बाप का प्यारा होने के कारण डबल शक्ति अनुभव होने से कर्मभोग के हिसाब की शक्ति के ऊपर वह डबल शक्ति विजय प्राप्त कर लेगी। बीमारी चाहे कितनी भी बड़ी हो लेकिन दु:ख वा दर्द का अनुभव नहीं करेंगे। जिसको दूसरी भाषा में आप कहते हो कि सूली से कांटे के समान अनुभव होगा। ऐसे टाइम में प्रयोग करके देखो। कई बच्चे करते भी हैं। इसी प्रकार से तन पर, मन पर, संस्कार पर अनुभव करते जाओ और आगे बढ़ते जाओ। यह रीसर्च करो, इसमें एक दो को नहीं देखो। यह क्या करते, इसने कहाँ किया है। पुराने करते वा नहीं करते, बड़े नहीं करते छोटे करते, यह नहीं देखो। पहले मैं इस अनुभव में आगे आ जाऊं क्योंकि यह अपने आन्तरिक पुरूषार्थ की बात है। जब ऐसे व्यक्तिगत रूप में इसी प्रयोग में लग जायेंगे, वृद्धि को पाते रहेंगे तक एक एक के शान्ति की शक्ति का संगठित रूप में विश्व के सामने प्रभाव पड़ेगा। अभी फर्स्ट स्टैप विश्व शान्ति की कानफ्रेंस कर निमंत्रण दिया लेकिन शान्ति की शक्ति का पुंज जब सर्व के संगठित रूप में प्रख्यात होगा तो आपको निमंत्रण आयेंगे कि हे शक्ति, शान्ति के अवतार इस अशान्ति के स्थान पर आकर शान्ति दो। जैसे सेवा में अभी भी जहाँ अशान्ति का मौका (मृत्यु) होता है तो आप लोगों को बुलाते हैं कि आओ आकर शान्ति दो। और यह धीरे-धीरे प्रसिद्ध भी होता जा रहा है कि ब्रहमाकुमारियाँ ही शान्ति दे सकती हैं। ऐसे हर अशान्ति के कार्य में आप लोगों को निमंत्रण आयेंगे। जैसे बीमारी के समय सिवाए डाक्टर के कोई याद नहीं आता, ऐसे अशान्ति के कोई भी बातों में सिवाए आप शान्ति अवतारों के और कोई दिखाई नहीं देगा। तो अभी शक्ति सेना, पाण्डव सेना, विशेष शान्ति की शक्ति का प्रयोग करो। प्रयोग करके दिखाओ। शान्ति की शक्ति का केन्द्र प्रत्यक्ष करो। समझा क्या करना है।

आजकल तो डबल विदेशी बच्चों के निमित्त सभी बच्चों को भी खजाना मिलता रहता है। जहाँ से भी जो सभी बच्चे आये हैं। बापदादा सभी तरफ के बच्चों की लगन को देख खुश होते हैं। पाँचों ही खण्डों के भिन्न-भिन्न देश से आये हुए बच्चों को बापदादा देख रहे हैं। सभी ने कमाल की है। जो सभी ने लक्ष्य रखा था उसी प्रमाण प्रैक्टिकल पुरुषार्थ का रूप भी लाया है। विदेश से टोटल कितने वी. आई. पी. आये हैं? (75) और भारत के कितने वी. आई. पी. आये? (700) भारत की विशेषता अखबार वालों की अच्छी रही। और विदेश से 75 भी आये यह कोई कम नहीं। बहुत आये। दूसरे वर्ष फिर बहुत आयेंगे। अभी गेट तो खुल गया ना आने का। पहले तो विदेश की टीचर्स कहती थीं वी. आई. पी. को लाना बड़ा मुश्किल है। ऐसा तो कोई दिखाई नहीं देता। अब तो दिखाई दिया ना। भले विघ्न पड़े यह तो ब्राह्मणों के कार्य में विघ्न न पड़े तो लगन भी लग न सके। अलबेले हो जायें इसलिए ड्रामा अनुसार लगन बढ़ाने के लिए विघ्न पड़ते हैं। अभी एक एक द्वारा आवाज़ सुनकर फिर अनेकों में उमंग आयेगा।

बच्चों ने अच्छी कमाल की है। सर्विस में सबूत अच्छा दिखाया है। सेवा का चांस दिलाने के निमित्त तो बन गये ना। एक द्वारा सहज ही अनेंको तक आवाज तो फैला ना। अमेरिका वालों ने अच्छी मेहनत की। हिम्मत अच्छी की, जयादा से ज्यादा आवाज़ फैलाने वाली निमित्त आत्मा को ड्रामा अनुसार विदेश वालों ने ही लाया ना। भारतवासी बच्चों ने भी मेहनत बहुत अच्छी की। उस मेहनत का फल संख्या अच्छी आई। अभी भारत की विशेष आत्मायें भी आयेंगी। अच्छा।

ऐसे सर्व विदेश से आये हुए बच्चों को और भारत के चारों तरफ के बच्चों को जो सब एक ही विशेष शुद्ध संकल्प में हैं कि विश्व के कोने-कोने में बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहरायेंगे – ऐसे शुभ संकल्प लेने वाले, विश्व परिवर्तक विश्व कल्याणकारी, सर्वश्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1. वरदान भूमि पर आकर वरदान लिया? सबसे बड़े ते बड़ा वरदान है सदा अपने को बाप द्वारा बाप के साथ का अनुभव करना। सदा बाप की याद में अर्थात् सदा साथ में रहना। तो सदा ही खुश रहेंगे, कभी भी कोई भी बात संकल्प में आये तो बाप के साथ में सब समाप्त हो जायेगा और खुशी में झूमते रहेंगे। तो सदा खुश रहने का यह तरीका याद रखना और दूसरों को भी बताते रहना। दूसरों को भी खुशी में रहने का साधन देना। तो आपको सभी आत्मायें खुशी का देवता मानेंगी क्योंकि विश्व में आज सबसे ज्यादा खुशी की आवश्यकता है। वह आप देते जाना। अपना टाइटिल याद रखना कि मैं खुशी का देवता हूँ।

याद और सेवा इसी बैलन्स द्वारा बाप की ब्लैसिंग मिलती रहेगी। बैलेन्स सबसे बड़ी कला है। हर बात में बैलेन्स हो तो नम्बरवन सहज ही बन जायेंगे। बैलेन्स ही अनेक आत्माओं के आगे ब्लिसफुल जीवन का साक्षात्कार करायेगा। बैलेन्स को सदा स्मृति में रखते सर्व प्राप्तियों का अनुभव करते स्वयं भी आगे बढ़ो और औरों को भी बढ़ाओ।

सदा इसी स्मृति में रहो कि बाप को जानने वाली, बाप को पाने वाली कोटों में कोई जो गाई हुई आत्मायें हैं, वह हम हैं। इसी खुशी में रहो तो आपके यह चेहरे चलते फिरते सेवाकेन्द्र हो जायेंगे। जैसे सर्विस सेन्टर पर आकर बाप का परिचय लेते हैं, वैसे आपके हर्षित चेहरे से बाप का परिचय मिलता रहेगा। बापदादा हर बच्चे को ऐसा ही योग्य समझते हैं। इतने सब सेवाकेन्द्र बैठे हैं। तो सदा ऐसे समझो चलते फिरते खाते पीते हमको बाप की सेवा अपनी चलन से व चेहरे से करनी है तो सहज ही निरन्तर योगी बन जायेंगे। जो बच्चे आदि से सेवा में उमंग-उत्साह का सहयोग देते रहे हैं, ऐसी आत्माओं को बापदादा भी सहयोग देते हुए 21 जन्म आराम से रखेंगे। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। खाओ, पिओ और स्वर्ग का राज्य भाग्य भोगो। आधाकल्प मेहनत शब्द ही नहीं होगा। ऐसी तकदीर बनाने आये हो।

कुमारों प्रति:- कुमार जीवन में एनर्जी बहुत होती है। कुमार जो चाहे वह कर सकते हैं इसलिए बापदादा कुमारों को देख विशेष खुश होते हैं कि अपनी एनर्जी डिस्ट्रक्शन के बजाए कनस्ट्रक्शन के कार्य में लगाया। एक-एक कुमार विश्व को नया बनाने में अपनी एनर्जी को लगा रहे हैं। कितना श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं। एक कुमार 10 का कार्य कर सकते हैं इसलिए कुमारों पर बापदादा को नाज़ है। कुमार जीवन में अपनी जीवन सफल कर ली। ऐसी विशेष आत्मायें हो ना। बहुत अच्छा समय पर जीवन का फैंसला किया। फैंसला करने में कोई गलती तो नहीं की है ना। पक्का है ना। कोई गलत कहकर खींचे तो? चाहे दुनिया की अक्षौणी आत्मायें एक तरफ हो जाएं, आप अकेले हो फिर क्या होगा? बोलो, मैं अकेला नही हूँगा, बाप मेरे साथ है। बापदादा खुश होते हैं – स्वयं की भी जीवन बनाई और अनेकों की जीवन बनाने के निमित्त बने हो। अच्छा!

पत्रों के उत्तर देते हुए, बापदादा ने सभी बच्चों प्रति टेप में याद प्यार भरी

चारों ओर के सभी सिकीलधे स्नेही, सहयोगी, सर्विसएबुल बच्चों के पत्र तो क्या लेकिन दिल के मीठे-मीठे साजों भरे गीत बापदादा ने सुने। जितना बच्चे दिल से याद करते हैं उससे पदमगुणा ज्यादा बापदादा भी बच्चों को याद करते, प्यार करते और इमर्ज करके टोली खिलाते। अभी भी सामने टोली रखी है। सभी बच्चे बाप के सामने हैं। केक काट रहे हैं और सभी बच्चे खा रहे हैं। जो भी बच्चों ने समाचार लिखा है, अपनी अवस्था व सर्विस का, बापदादा ने सुने। सर्विस का उमंग-उत्साह बहुत अच्छा है। अभी थोड़ा बहुत जो माया के विघ्न देखते हो, वह भी नथिंग न्यू। माया सिर्फ पेपर लेने आती है। माया से घबराओ मत। खिलौना समझकर खेलो तो माया वार नहीं करेगी। लेकिन आराम से विदाई ले सो जायेगी इसलिए ज्यादा नहीं सोचो यह क्या हुआ, हो गया फुलस्टाप लगाओ और आगे जाकर पदमगुणा जो कुछ रह गया, वह भर लो। बढ़ते चलो और बढ़ाते चलो। बापदादा साथ है, माया की चाल चलने वाली नहीं है इसलिए घबराओ नहीं। खुशी में नाचो, गाओ। अब तो अपना राज्य आया कि आया। हे स्वराज्य अधिकारी, विश्व का राज्य भाग्य आपका इंतजार कर रहा है। अच्छा!

सर्व को बहुत-बहुत यादप्यार और ‘निर्विघ्न भव’ का वरदान बापदादा दे रहे हैं। जो बच्चे स्थूल धन की कमी के कारण पहुंच नहीं सकते, उन्हें भी बापदादा याद दे रहे हैं। भल धन कम है लेकिन हैं बादशाह क्योंकि आजकल के राजाओं के पास जो नहीं है, वह इन्हीं के पास अविनाशी और जन्म-जन्म के लिए जमा है। बापदादा ऐसे वर्तमान बेगमपुर के बादशाह और भविष्य विश्व के बादशाहों को बहुत-बहुत यादप्यार देते हैं। ऐसे बच्चे दिल से यहाँ हैं शरीर से वहाँ हैं इसलिए बापदादा सम्मुख बच्चों को देख सम्मुख यादप्यार देते हैं। अच्छा। ओम् शान्ति।

वरदान:-सम्पूर्णता की स्थिति द्वारा प्रकृति को आर्डर करने वाले विश्व परिवर्तक भव 
जब आप विश्व परिवर्तक आत्मायें संगठित रूप में सम्पन्न, सम्पूर्ण स्थिति से विश्व परिवर्तन का संकल्प करेंगी तब यह प्रकृति सम्पूर्ण हलचल की डांस शुरू करेगी। वायु, धरती, समुद्र, अग्नि… इनकी हलचल ही सफाई करेगी। परन्तु यह प्रकृति आपका आर्डर तब मानेगी जब पहले आपके स्वयं के सहयोगी कर्मेन्द्रियां, मन-बुद्धि-संस्कार आपका आर्डर मानेंगे। साथ-साथ इतनी पावरफुल तपस्या की ऊंची स्थिति हो जो सबका एक साथ संकल्प हो ”परिवर्तन” और प्रकृति हाजिर हो जाए।
स्लोगन:-अपने श्रेष्ठ भाग्य द्वारा सबका भाग्य बनाते सदा भगवान की स्मृति दिलाते रहो।

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BRAHMAKUMARIS DAILY MAHAVAKYA 28 OCTOBER 2017

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*Om Shanti*
*28.10.2017*

★【 *आज का पुरुषार्थ* 】★

बच्चे, ऐसे महसूस करो कि चारों तरफ light ही light है … बस light ही light है … मैं आत्मा अपने घर में हूँ … परमधाम, अपना घर केवल light ही light का है … हज़ारों सूर्य से भी तेजोमय light ही light है … यह light सुख … शान्ति … शक्ति … पवित्रता अर्थात् सभी गुणों से भरपूर है … यह light मन को शीतल और आनन्दमय करने वाली है … इस लाइट के आगमन से ही दुनिया का परिवर्तन होगा।

बस आपको स्वयं को भी light समझना है और अनुभव करना हैं कि मेरे चारों तरफ भी बस light ही light है … यह light इन स्थूल नैनों से नहीं देखी जा सकती … बस अनुभव की जा सकती है।

जिस तरह इस स्थूल दुनिया का सारा कारोबार चाहे direct … चाहे indirect, light के आधार से ही चलता है … light नहीं तो कुछ भी नहीं…।

इसी तरह इस अलौकिक जीवन में परमात्म light नहीं तो कुछ भी नहीं।

इसलिए अपने इस अनुभव को बढ़ाते जाना है। स्वयं को भी light ही light समझना है। जो light, ज्ञान … गुण और शक्तियों से भरपूर है। जितना आप स्वयं को light अनुभव करते जायेंगे … साथ ही साथ परमात्मा बाप जोकि एक powerful light हैं, उनके नीचे रह चारों तरफ light ही light फैलाने का अनुभव और अभ्यास बढ़ाते जायेंगे, उतनी जल्दी ही इस विश्व का परिवर्तन होगा।

बस बच्चे, अब इसी अनुभव के अभ्यास को बढ़ाओ जोकि बहुत सहज है और इससे प्राप्तियाँ भी अपरमअपार है।

अच्छा । ओम् शान्ति ।

【 *Peace Of Mind TV* 】
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TODAY MURLI 28 OCTOBER 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 28 OCTOBER 2017

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28/10/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence:Sweet children, wake up early in the morning and sit in remembrance. Even at meal times, remind one another of the Father. By continuing to have remembrance you will pass with honours.
Question:Of which one weakness does the Father receive reports about the children?
Answer:Even now, many children have not yet become embodiments of love. They continue to speak words that cause sorrow for others and this is why the Father receives report s about them. You children have to interact with a lot of love. If you yourselves have defects, that is, if you have evil spirits, how would you remove the evil spirits of others? Therefore, you have to become embodiments of love like the deities. Remove the evil spirits!
Song:At last the day for which we had been waiting has come.

Om shanti. You children know the Father, the Lord of the Poor, and you continue to sit in remembrance of the Father. Although you may be seeing someone with your physical eyes and you may be acting through your physical organs, it is remembered: Continue to work with your hands and let your heart be engaged with the Beloved. The decoration of the Brahmin clan know Him and it is to them that the Father says: For half the cycle, you have been remembering the Father. According to the drama, you have now been reminded by the Father of how the world cycle turns. The whole world has forgotten this. No one knows the Father’s creation or His task of purifying the impure and bestowing salvation on everyone. You know the Creator and the beginning, the middle and the end of creation. You have now remembered how the world cycle turns and how you go around the cycle of 84 births. Those who have played their part sfrom the golden age to the end of the iron age will play the same parts again. While taking rebirth from the golden age to the iron age, you have continued to come down. Now, at the end of the iron age, it is your stage of ascent. It is said: Because of the stage of ascent, there is benefit for everyone. You have now remembered everything. This is called being an embodiment of remembrance, a conqueror of attachment. From whom have you received this awareness? From the Father. You yourselves didn’t have this awareness. You souls know that you are children of the Supreme Father, the Supreme Soul. A physical father gave you that body. The Father from beyond now says: you have to remove any awareness of that old body, just as a snake sheds its old skin and takes a new one. That refers to the golden age. So, you will also begin to shed your skins from the golden age. It is now your final birth. The Father says: Very little time remains. You have been given patience. You are now happy that you are once again claiming your inheritance of happiness from the Father. You will take your inheritance of happiness from the Father, will you not? These things do not enter the intellects of human beings. When those people go to a Lakshmi and Narayan temple, who they were wouldn’t enter their intellects. It is on the path of devotion that they put their palms together and continue to sing: You are the Mother and Father. Shiv Baba is the greatest One of all. Shiv Baba is also the Master of the Garden because He is planting the sapling of the new deity garden. He Himself is the Gardener and He holds your hands and takes you back with Him. Only you children know how Baba is the Master of the Garden, the Gardener and the Boatman. These are all His names. He is also called the Liberator. It is Him you have to remember. Baba says: When you come here, remember Shiv Baba before you come: I have made Shiv Baba belong to me. Brahma has also made Him belong to him. So, why should we not remember Him? It is also shown in the pictures how everyone believes in Shiva. Baba is speaking to souls. You would not be called souls, but living souls, because when a soul is alone he cannot speak. A soul without a body cannot speak to another soul. Would God speak to souls in the supreme abode? Although they say that God sent Christ, God doesn’t speak there. There are no signals there either. According to the drama, souls automatically come down by themselves to play their part s. A part is recorded in each soul. Therefore, a soul comes down and takes a body and plays his part. The name of everyone’s body is different. The name of a soul is soul. We souls shed bodies, take others and play our part s. We have now become aware that we mustn’t remember anyone else because we will leave our old part s and our old bodies in the old world and go to the new world. There, we will receive new bodies. So this means that we now have to renounce the five vices. This is such a great difficulty. Look! Children write that storms of lust and anger come to them. Baba says: Children, make a donation and the bad omens will be removed. Souls experience the omens at this time. At first, you were 16 celestial degrees full and now there are no degrees. After the night of the full moon, the degrees gradually continue to decrease. At the end a slight line remains. Your stage is now the same. Baba says: Make a donation and the bad omens will be removed. If you donate the vices and then take them back, you won’t be able to claim a high status. This refers to the vices; it is not a question of money. There is the example of Harishchandra. After donating money, you mustn’t take it back. Actually, it refers to the vices. After donating the vices you mustn’t take them back. Continue to look into your heart: Is my heart attached to Baba, through whom my bad omens of many births are being removed? It takes time; the bad omens are not removed instantly. A sign that the suffering of karma remains is illness. Storms also come. The reason for this is that there isn’t full yoga. The Father says: Break away from everyone else and connect yourself to Me alone. In other spiritual gatherings, they don’t know the Beloved. They don’t even know that an imperishable part of 84 births is recorded in the soul. Previously, it wasn’t in our intellects, so how could it be in the intellects of others? Those of us who belonged to the deity clan didn’t know this. You have now remembered that you are Brahmins. Then, in the golden age, the reward will begin; they will again repeat the actions they performed in the golden age. Sanskars will continue to emerge. We sing the praise of Baba of how He is the Ocean of Knowledge and the Ocean of Love. We are also learning about love. Our mouths should not speak words that would cause sorrow for others. If you cause sorrow for another person, then, understand that there is an evil spirit in you and that you won’t be able to marry Lakshmi. Since you belong to the Father you have to become worthy of marrying Lakshmi. If any evil spirits remain within you, you will end up in the silver age. You children should not have anger. You should interact with a lot of love. Look! Baba has so many children. Nevertheless, Baba doesn’t get angry with them. Therefore, you too have to become embodiments of love. As yet, many children have not become embodiments of love. Sometimes, Baba receives reportsabout them and so He understands that there is an evil spirit in someone. How would those who have evil spirits in them remove the evil spirits of others? You have to become embodiments of love and you have to become that here. Deities are embodiments of love. Look how the picture of Lakshmi and Narayan attracts you so much! Therefore, you have to become like them. Even if your husband becomes angry with you, you still have to speak to him with love. It should not be that because he has an evil spirit in him, it should also enter you; no. If I have defects, then, no matter how, I definitely have to remove them. Become very, very sweet. Someone said that his father gets angry with him. I said: When he becomes angry, shower him with very good flowers. He will then be amazed and will cool down. You have to explain with great tact because this is Ravan’s kingdom. We are Rama’s community. If you yourself don’t become this, how would you make others this? This is why establishment is being delayed. Firstly, you have to interact with love and secondly, maintain your awareness. Become spinners of the discus of self-realisation. You have to carry on with your business. This is why the early morning time is very good. It is said: Early to bed, early to rise. Therefore, wake up early in the morning and come and sit here and you will be able to sit in remembrance for at least five minutes. Then, by your gradually developing that habit, remembrance will become firm. When you are eating your meals, check for how long you are able to eat in remembrance of Baba. If you remember Baba the whole time, that is very brave of you. At meal times you have to signal to one another to remember the Father. Remind one another with every mouthful. Ours is easy yoga. We now have the knowledge in our intellects that the Supreme Father, the Supreme Soul, is called the Almighty Authority. So, what power does He have? It isn’t that He has the power to create bombs. No; by remembering Him, your sins are absolved. This is His power. Look! He is so innocent and He has so much power! It requires effort to remember Him accurately. Therefore, you have to make effort. The morning time is good. People in devotion, wake up early. In knowledge as well, the early morning time is very good. The Father says: I only come once in a cycle to take you back with Me. Therefore, you have to go in complete happiness. You have to remove yourself from the land of sorrow. If you have this awareness, you won’t be afraid. No matter how many tests come, there should be this firm awareness. You have to create such a stage. The meaning of “Hum so, so hum” has been explained to you children. We souls are not the Supreme Soul, but we are the children of the Supreme Soul. This is a glimpse (darshan) of the cycle of “hum so”. Only by your having this remembrance will the alloy be removed. The time to have the alloy removed is at amrit vela. In order to pass with honours, remember the Father who makes you into the masters of the land of Krishna. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. While carrying on with your business etc., continue to spin the discus of self-realisation. Remind one another of the Father. No matter how many tests come, you must definitely maintain awareness.
  2. After donating the vices, never take them back. Never cause sorrow for anyone. Don’t become angry. Remove any evil spirits from within you.
Blessing:May you be a jewel of contentment with happiness in the heart who flies in the plane of blessings.
A jewel of contentment is one who is content with the self, content in service and content with everyone. To receive contentment as the fruit of tapasya is the success of tapasya. A jewel of contentment is one whose heart is constantly happy. Happiness means that your heart and head are constantly restful and you have a stage of happiness and comfort. Such jewels of contentment will experience themselves to be flying in the plane of everyone’s blessings.
Slogan:Only those with true hearts who please the Bestower, the Bestower of Fortune and the Bestower of Blessings can have spiritual pleasure.

*** Om Shanti ***

Invaluable versions of Mateshwari

What is the basis of being unfortunate or fortunate?

Unfortunate and fortunate – what are these two words based on? We know that it is God who makes us fortunate and human beings themselves who become unfortunate. When people are completely happy, it is said that they have good fortune and when people consider themselves to be unhappy, they consider themselves to be unfortunate. We cannot say that we have received misfortune or fortune from God, no. It is foolishness to think in that way. God makes us fortunate but it depends on our own karma whether we make our fortune or spoil our fortune. All of this depends on the sanskars of human beings. Then, just as we create sanskars of sin and charity, similarly, fortune is created, but because people do not understand this secret, they blame God. Just look, in order to keep themselves happy, people have invented so many ways of Maya. Some consider themselves to be happy with Maya whereas others renounce that same Maya and consider themselves to be happy having left that Maya. They try so many different things, but even after trying so many different things, the end result still leads them to sorrow. When there is great sorrow on earth, it is then that God Himself comes and has the deity world established with His incognito Godly yoga power and makes human souls fortunate.

Soundless (Ajapa jaap) chant , that is, constant yoga, unbroken yoga.

When we say “om shanti”, it means “I, the soul, the saligram, am a child of that God who is a form of light.” Just as the Father is a point of light, so I too have the same form. We saligrams are the children and so we have to have yoga with God, the form of light. We have to have yoga with Him and claim our inheritance of light and might from Him. This is why the elevated versions of God in the Gita say: Stabilise yourself in My form of light. This is called the soundless chant. “Soundless” means without chanting any mantra, to stay naturally in remembrance of that Supreme Soul. This is said to be true yoga. Yoga means to stay in remembrance of the one Yogeshwar (God of yoga), the Supreme Soul. The souls who stay in remembrance of that Supreme Soul are said to be yogis or yoginis. Only when you stay in that yoga, that is, in remembrance, constantly, will the sinful actions and the burden of sin be destroyed and souls will become pure and then take the reward of their deity births in the future. This knowledge is needed, for only then can you have complete yoga. So, you have to consider yourself to be a soul and stay in remembrance of God. This is true knowledge. Achcha. Om shanti.

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BRAHMAKUMARIS DAILY MAHAVAKYA 27 OCTOBER 2017

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Om Shanti*
*27.10.2017*

★【 *आज का पुरुषार्थ* 】★

बच्चे, आप निश्चिन्त रहो … शिवबाबा की श्रीमत पर चलने की कोशिश करते रहो … जब तक आपका पुराना हिसाब-किताब क्लीयर नहीं होता, तब तक स्थिति ऊपर-नीचे होगी, परन्तु आप बच्चों को स्वयं पर attention रखने का पुरूषार्थ करना ही है … इसमें ना ही थकना है … और ना ही हार खानी है … बस आपकी श्रीमत पर चलने की कोशिश ही आपको विजयी रत्न बनायेंगी।

देखो, जब रास्ता थोड़ा difficult अर्थात् ऊँचाई के साथ-साथ smooth भी नहीं होता तो speed automatically कम हो जाती है। परन्तु यदि यात्री फिर भी आगे बढ़ने का पुरूषार्थ करता रहे तो कुछ मुश्किल रास्ता तय कर आगे का रास्ता भी तय हो जाता है और उसका experience भी बढ़ जाता है।

और फिर यहाँ तो शिव बाप की आप बच्चों पर direct नज़र है, तो बाप तो आप बच्चों का पुरूषार्थ देख आपको जल्द ही आपकी मंज़िल तक पहुँचा ही देगा … बस धैर्यता पूर्वक पुरूषार्थ करते रहो।

साथ ही साथ स्वयं को ज्ञान स्वरूप … गुण स्वरूप … शक्ति स्वरूप बनाने पर भी attention रखना। बस स्वयं को बाबा की श्रीमत प्रमाण चलाने का attention ही आपको बाप-समान बना देगा।
और बाप ने तो पहले ही बता दिया है कि आप बच्चों में परिवर्तन भी अचानक और आश्चर्यजनक होगा, इसलिए आप दिलशिकस्त मत होना … बस धैर्यतापूर्वक पुरूषार्थ करते रहना।

बच्चे किसी भी हाल में अपनी खुशी मत छोड़ना, आपकी खुशी ही आपको उमंग-उत्साह दिला आपकी मंज़िल तक पहुँचायेंगी।

अच्छा । ओम् शान्ति ।

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BRAHMA KUMARIS MURLI 28 OCTOBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 October 2017

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28/10/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – सवेरे-सवेरे उठ याद में बैठने का अभ्यास डालो, भोजन पर भी एक दो को बाप की याद दिलाओ, याद करते-करते तुम पास विद ऑनर हो जायेंगे”
प्रश्नः-किस एक कमी के कारण बच्चों की रिपोर्ट बाप के पास आती है?
उत्तर:-कई बच्चे अभी तक प्रेम स्वरूप नहीं बने हैं। मुख से दु:ख देने वाले बोल बोलते रहते हैं इसलिए बाप के पास रिपोर्ट आती है। बच्चों को बहुत प्रेम से चलना है। अगर स्वयं में ही कोई अवगुण रूपी भूत होगा तो दूसरों का कैसे निकलेगा, इसलिए देवताओं जैसा प्रेम स्वरूप बनना है, भूत निकाल देना है।
गीत:-आखिर वह दिन आया आज…..

ओम् शान्ति। बच्चे गरीब-निवाज़ बाप को जान चुके हैं और बाप की याद में बैठे रहते हैं। भल ऑखों से किसको भी देखें, कर्मेन्द्रियों से कर्म भी करें परन्तु गाया जाता है हाथों से कर्म करते रहो, दिल माशूक तरफ लगाते रहो। ब्राह्मण कुल भूषण जानते हैं और उनसे ही बाप बात करते हैं कि आधाकल्प तुमने बाप को याद किया। ड्रामा अनुसार अब तुमको बाप की स्मृति आई है कि सृष्टि चक्र कैसे फिरता है। सारी दुनिया विस्मृति में है। बाप की रचना को और बाप के पतित से पावन बनाने वा सर्व की सद्गति करने के कर्तव्य को कोई भी नहीं जानते। तुम रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानते हो। तुमको स्मृति आई कि सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, हम 84 का चक्र कैसे लगाते हैं, जिन्होंने सतयुग से लेकर कलियुग के अन्त तक पार्ट बजाया है, वही अभी भी बजायेंगे। सतयुग से लेकर कलियुग तक जन्म लेते नीचे उतरते आये हैं। अब कलियुग अन्त में तुम्हारी चढ़ती कला है। कहते हैं चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला। तो तुमको सारी स्मृति आई है, इसको कहा जाता है स्मृतिर्लब्धा, नष्टोमोहा। किस द्वारा स्मृति आई है? बाप द्वारा। अपने आप स्मृति नहीं आई। तुम जानते हो हम आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान हैं। यह शरीर तो लौकिक बाप ने दिया। अब पारलौकिक बाप कहते हैं यह पुराने शरीर का भान छोड़ो, जैसे सर्प पुरानी खाल छोड़ता है और नई लेता है। यह बात सतयुग से लगती है। तो तुम भी सतयुग से लेकर खाल छोड़ना शुरू करेंगे। अब तुम्हारा अन्तिम जन्म है। बाप कहते हैं – बाकी थोड़ा समय है। तुमको धीरज मिला है, तुम खुशी में हो कि हम फिर से बाप द्वारा सुख का वर्सा पा रहे हैं। सुख का वर्सा तो बाप द्वारा मिलेगा ना। यह बात कोई मनुष्यों की बुद्धि में नहीं आती। वह लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जायेंगे तो उनकी बुद्धि में यह नहीं आयेगा कि यह कौन हैं! यह तो भक्ति मार्ग में हाथ जोड़कर कहते रहते हैं तुम मात-पिता….. शिवबाबा तो सबसे बड़ा ठहरा। शिवबाबा बागवान भी है क्योंकि नये दैवी बगीचे का कलम लगाते हैं। तो खुद माली भी है और हाथ पकड़ कर साथ ले जाते हैं। तो बाबा माली, बागवान और खिवैया कैसे है – यह सब तुम बच्चे ही जानते हो। यह सब अनेक नाम हैं, उनको लिबरेटर भी कहते हैं। याद भी उनको करना है। बाबा कहते हैं यहाँ आते हो तो शिवबाबा को याद करके आओ। हमने तो शिवबाबा को अपना बनाया है। ब्रह्मा ने भी उनको अपना बनाया है। तो हम उनको ही क्यों न याद करें। चित्र में भी दिखाया है – सभी शिव को मानते हैं। बाबा आत्माओं से बात करते हैं। आत्मा न कह जीवात्मा कहेंगे क्योंकि जब आत्मा अकेली है तो बोल नहीं सकती। शरीर बिगर आत्मा, आत्मा से बात नहीं करती। परमधाम में क्या परमात्मा आत्मा से बात करेंगे? भल कह देते क्राइस्ट को परमात्मा ने भेजा परन्तु वहाँ परमात्मा बोलता नहीं है, वहाँ इशारा भी नहीं होता। ड्रामा अनुसार आत्मा आपेही पार्ट बजाने नीचे आ जाती है। आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। तो आत्मा नीचे आकर शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। शरीर का नाम तो सबका अलग है। आत्मा का नाम तो आत्मा ही है। हम आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा ले पार्ट बजाते हैं। अब हमको स्मृति आई है और कोई की याद नहीं होनी चाहिए क्योंकि पुरानी दुनिया में पुराना पार्ट, पुराना शरीर छोड़ नई दुनिया में जाना है। वहाँ नया शरीर हमको मिलना है। तो इससे मतलब निकलता है कि अभी 5 विकारों को छोड़ना है, तो कितनी मुश्किलात होती है।

देखो, बच्चे लिखते हैं – काम, क्रोध का तूफान आता है। तो बाबा कहते हैं बच्चे दे दान तो छूटे ग्रहण। इस समय आत्मा पर ग्रहण लगा हुआ है। पहले तुम 16 कला सम्पूर्ण थे, अब नो कला है। जैसे चन्द्रमा की भी पूर्णमासी के बाद धीरे-धीरे कला कम होती जाती है। अन्त में जरा सी लकीर रह जाती है। तुम्हारी भी अभी वही अवस्था है। बाबा कहते हैं दे दान तो छूटे ग्रहण। अगर विकारों का दान देकर फिर वापिस लिया तो ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। यहाँ विकारों की ही बात है। पैसे की बात नहीं। हरिश्चन्द्र का मिसाल……धन दान में देकर वापिस नहीं लेना चाहिए। वास्तव में है विकारों की बात। विकार दान में देकर वापिस नहीं लेने चाहिए। दिल अन्दर देखते रहो कि हमारी दिल बाबा से लगी हुई है, जिससे हमारा जन्म-जन्मान्तर का ग्रहण छूटा है। समय तो लगता है, एकदम तो नहीं छूटता। जो कर्मभोग रहा हुआ है उसकी निशानी है बीमारी। तूफान आते हैं, इसका कारण पूरा योग नहीं है। बाप कहते हैं और संग तोड़ मुझ एक संग जोड़ो। और सतसंगों में माशुक को जानते नहीं। यह भी नहीं जानते कि आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट नूंधा हुआ है। पहले हमारी बुद्धि में भी नहीं था तो औरों की बुद्धि में कैसे होगा! जो हम देवता घराने के थे, वह भी नहीं जानते थे। अब तुमको स्मृति आई है कि हम ब्राह्मण हैं फिर सतयुग में प्रालब्ध शुरू हो जायेगी फिर जो कर्म हर एक ने सतयुग में किये थे वही रिपीट करेंगे। संस्कार इमर्ज होते जायेंगे। यह जब बाबा की महिमा करते हैं – ज्ञान का सागर, प्रेम का सागर…. तो हम भी प्रेम सीख रहे हैं। हमारे मुख से ऐसे शब्द नहीं निकलने चाहिए जो किसको दु:ख मिले। अगर किसी को दु:ख दिया तो समझना चाहिए – हमारे अन्दर भूत है फिर लक्ष्मी को वर नहीं सकेंगे। बाप के बने हैं तो लक्ष्मी को वरने लायक बनना चाहिए। अगर कोई भूत रह गया तो त्रेता में चले जायेंगे। बच्चों में क्रोध नहीं होना चाहिए। बड़े प्रेम से चलना चाहिए। देखो, बाबा के कितने बच्चे हैं तो भी बाबा क्रोध थोड़ेही करते हैं। तो तुमको भी बड़ा प्रेम स्वरूप बनना है। अभी कई बच्चे प्रेम स्वरूप नहीं बने हैं। कभी-कभी रिपोर्ट आती है तो वह भी समझ जाते हैं कि इनमें भूत है, जिसमें खुद भूत है वह औरों का क्या निकालेंगे। बड़ा प्रेम स्वरूप बनना है और यहाँ ही बनना है। देवता प्रेम स्वरूप हैं ना। देखो, लक्ष्मी-नारायण का चित्र कितना खींचता है तो हमको भी ऐसा बनना है। तुमको पति क्रोध करता है तो भी प्रेम से बात करनी है, यह नहीं उनमें भूत हैं तो मुझ में भी आ जाए। नहीं, मेरे में जो अवगुण हैं कैसे भी करके अवगुणों को निकालना है। बहुत-बहुत मीठा बनना है। किसी ने कहा लौकिक बाप गुस्सा करता है, तो मैंने कहा कि जब वह क्रोध करता है तो तुम अच्छे-अच्छे फूल चढ़ाओ। तो वह वन्डर खाये, फिर वह ठण्डा हो जायेगा। बड़ा युक्ति से समझाना है क्योंकि रावणराज्य है ना। हम हैं राम की सम्प्रदाय। खुद न बनें तो दूसरों को क्या बनायेंगे इसलिए स्थापना में देरी पड़ती है। एक तो प्रेम से चलना है, दूसरा स्मृति में रहना है, स्वदर्शन चक्रधारी बनना है। धन्धा तो करना ही है इसलिए सुबह का समय बहुत अच्छा है। कहते हैं ना सवेरे सोना… सवेरे उठना… इसलिए सवेरे-सवेरे उठ यहाँ आकर बैठो तो 5 मिनट भी याद ठहरेगी। फिर धीरे-धीरे आदत पड़ने से याद पक्की हो जायेगी। अच्छा खाना खाते हो तो देखो कि कितना समय बाबा की याद में खाया! अगर सारा समय याद किया तो वह भी बड़ी बहादुरी है। भोजन पर एक दो को इशारा देना है कि बाप को याद करो। एक-एक गिट्टी पर याद दिलाओ। हमारा है ही सहजयोग। अभी बुद्धि में ज्ञान आया है परमपिता परमात्मा को सर्व शक्तिमान् कहते हैं तो उनमें भला क्या शक्ति है। यह नहीं कि बाम्ब्स बनाने की शक्ति है। नहीं, उनको याद करने से विकर्म विनाश हो जाते हैं। यह शक्ति है ना। देखो है कितना भोला और शक्ति कितनी है। यथार्थ रीति याद करने में मेहनत है ना। तो मेहनत करनी चाहिए। सुबह का समय अच्छा होता है। भक्ति में भी सवेरे-सवेरे उठते हैं, ज्ञान में भी सवेरे का समय बहुत अच्छा है। बाप कहते हैं मैं कल्प में एक ही बार आता हूँ, तुमको साथ ले जाने के लिए तो बिल्कुल खुशी खुशी से जाना है। दु:खधाम से निकलना है। ऐसी स्मृति होगी तो डरेंगे नहीं। कितनी भी परीक्षायें आये तो भी स्मृति पक्की रहनी चाहिए। ऐसी अवस्था जमानी है। अब तुम बच्चों को हम सो, सो हम का अर्थ भी समझाया है। हम सो परमात्मा नहीं, लेकिन परमात्मा का बच्चा हूँ। यह हो गया हम सो के चक्र का दर्शन। इस याद से ही खाद निकलेगी। खाद निकालने का समय ही है अमृतवेला। तो पास विद आनर बनने के लिए कृष्णपुरी का मालिक बनाने वाले बाप को याद करना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) धन्धा आदि करते भी स्वदर्शन चक्रधारी बनकर रहना है। एक दो को बाप की याद दिलानी है। कितनी भी परीक्षायें आ जायें तो भी स्मृति में जरूर रहना है।

2) विकारों का दान देकर फिर कभी वापस नहीं लेना। किसी को भी दु:ख नहीं देना है। क्रोध नहीं करना है। अन्दर जो भूत हैं उन्हें निकाल देना है।

वरदान:-चित की प्रसन्नता द्वारा दुआओं के विमान में उड़ने वाले सन्तुष्टमणी भव 
सन्तुष्टमणि उन्हें कहा जाता जो स्वयं से, सेवा से और सर्व से सन्तुष्ट हो। तपस्या द्वारा सन्तुष्टता रूपी फल प्राप्त कर लेना – यही तपस्या की सिद्धि है। सन्तुष्टमणि वह है जिसका चित सदा प्रसन्न हो। प्रसन्नता अर्थात् दिल-दिमाग सदा आराम में हो, सुख चैन की स्थिति में हो। ऐसी सन्तुष्टमणियां स्वयं को सर्व की दुआओं के विमान में उड़ता हुआ अनुभव करेंगी।
स्लोगन:-सच्चे दिल से दाता, विधाता, वरदाता को राज़ी करने वाले ही रुहानी मौज में रहते हैं।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

1) ‘बदनसीब और खुशनसीब बनने का फाउण्डेशन क्या है?’

बदनसीबी और खुशनसीबी, अब यह दो शब्दों का मदार किस पर चलता है? यह तो हम जानते हैं कि खुशनसीब बनाने वाला परमात्मा और बदनसीब बनाने वाला खुद ही मनुष्य है। जब मनुष्य सर्वदा सुखी है तो उन्हों की अच्छी किस्मत कहते हैं और जब मनुष्य अपने को दु:खी समझते हैं तो वो अपने को बदनसीब समझते हैं। हम ऐसे नहीं कहेंगे कि बदनसीबी वा खुशनसीबी कोई परमात्मा द्वारा मिलती है, नहीं। यह समझना बड़ी मूर्खता है। परमात्मा तो हमें खुशनसीब बनाता है परन्तु तकदीर को बिगाड़ना वा बनाना यह सब कर्मों के ऊपर ही मदार है। यह सब मनुष्यों के संस्कारों के ऊपर ही है। फिर जैसे पाप और पुण्य का संस्कार भरता है वैसे तकदीर बनती है परन्तु मनुष्य इस राज़ न जानने के कारण परमात्मा के ऊपर दोष रखते हैं। अब देखो मनुष्य अपने को सुखी रखने के लिये कितनी माया के तरीके निकालते हैं फिर उस ही माया से कोई अपने को सुखी समझते हैं और कोई फिर उस ही माया का सन्यास कर माया को छोड़ने से अपने को सुखी समझते हैं, मतलब तो कई प्रकार के प्रयत्न करते हैं परन्तु इतने तरीके करते भी रिजल्ट दु:ख के तरफ जा रही है। जब सृष्टि पर भारी दु:ख होता है तब उसी समय स्वयं परमात्मा आए गुप्त रूप में अपने ईश्वरीय योग पॉवर से दैवी सृष्टि की स्थापना कराए सभी मनुष्य आत्माओं को खुशकिस्मत बनाते हैं।

2) ‘अजपाजाप अर्थात् निरंतर योग अटूट योग’

जिस समय ओम् शान्ति कहते हैं तो उसका यथार्थ अर्थ है मैं आत्मा सालिग्राम उस ज्योति स्वरूप परमात्मा की संतान है हम भी वही पिता ज्योतिर्बिन्दू परमात्मा के मुआफिक आकार वाली हैं। बाकी हम सालिग्राम बच्चे हैं तो इन्हों को अपने ज्योति स्वरूप परमात्मा के साथ योग रखना है जिससे ही अपने को योग रखना और लाइट माइट का वर्सा लेना है। तभी तो गीता में स्वयं भगवान के महावाक्य है मुझ ज्योति स्वरूप आकारी रूप में स्थित हो जाओ, इसको ही अजपाजाप कहा जाता है। अजपाजाप माना कोई भी मंत्र जपने के सिवाए नेचुरल उस परमात्मा की याद में रहना, इसको ही पूर्ण योग कहते हैं, योग का मतलब है एक ही योगेश्वर परमात्मा की याद में रहना। तो जो आत्मायें उस परमात्मा की याद में रहती हैं, उन्हों को योगी अथवा योगिनियां कहा जाता है। जब उस योग अर्थात् याद में निरंतर रहें तब ही विकर्मों और पापों का बोझ नष्ट होता है और आत्मायें पवित्र बन जिससे फिर भविष्य जन्म देवताई प्रालब्ध पाते हैं। अब यह चाहिए नॉलेज तब ही योग पूरा लग सकता है तो अपने को आत्मा समझ परमात्मा की याद में रहना, यह है सच्चा ज्ञान। अच्छा। ओम् शान्ति।

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