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BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 28 SEPTEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 September 2020

Murli Pdf for Print : – 

28-09-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
”मीठे बच्चे – तुम सारी दुनिया के सच्चे-सच्चे मित्र हो, तुम्हारी किसी से भी शत्रुता नहीं होनी चाहिए”
प्रश्नः-तुम रूहानी मिलेट्री हो, तुम्हें बाप का कौन-सा डायरेक्शन मिला हुआ है, जिसे अमल में लाना है?
उत्तर:-तुम्हें डायरेक्शन है कि बैज सदा लगाकर रखो। कोई भी पूछे यह क्या है? तुम कौन हो? तो बोलो, हम हैं सारी दुनिया से काम की अग्नि को बुझाने वाले फायर ब्रिगेड। इस समय सारी दुनिया में काम अग्नि लगी हुई है, हम सबको सन्देश देते हैं अब पवित्र बनो, दैवीगुण धारण करो तो बेड़ा पार हो जायेगा।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चे सहज याद में बैठे हैं। कोई-कोई को डिफीकल्ट लगता है। बहुत मूंझते हैं – हम टाइट अथवा स्ट्रिक होकर बैठें। बाप कहते हैं ऐसी कोई बात नहीं है, कैसे भी बैठो। बाप को सिर्फ याद करना है। इसमें मुश्किलात की कोई बात नहीं। वह हठयोगी ऐसे टाइट होकर बैठते हैं। टांग, टांग पर चढ़ाते हैं। यहाँ तो बाप कहते हैं आराम से बैठो। बाप को और 84 के चक्र को याद करो। यह है ही सहज याद। उठते-बैठते बुद्धि में रहे। जैसे देखो यह छोटा बच्चा बाप के बाजू में बैठा है, इनको बुद्धि में माँ-बाप ही याद होंगे। तुम भी बच्चे हो ना। बाप को याद करना तो बहुत सहज है। हम बाबा के बच्चे हैं। बाबा से ही वर्सा लेना है। शरीर निर्वाह अर्थ गृहस्थ व्यवहार में भल रहो। सिर्फ औरों की याद बुद्धि से निकाल दो। कोई हनूमान को, कोई किसको, साधू आदि को याद करते थे, वह याद छोड़ देनी है। याद तो करते हैं ना, पूजा के लिए पुजारी को मंदिर में जाना पड़ता है, इसमें कहाँ जाने की भी दरकार नहीं है। कोई भी मिले बोलो, शिवबाबा का कहना है मुझ एक बाप को याद करो। शिवबाबा तो है निराकार। जरूर वह साकार में ही आकर कहते हैं मामेकम् याद करो। मैं पतित-पावन हूँ। यह तो राइट अक्षर है ना। बाबा कहते हैं मुझे याद करो। तुम सब पतित हो। यह पतित तमोप्रधान दुनिया है ना इसलिए बाबा कहते हैं कोई भी देहधारी को याद नहीं करो। यह तो अच्छी बात है ना। कोई गुरू आदि की महिमा नहीं करते हैं। बाप सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कट जायेंगे। यह है योगबल अथवा योग अग्नि। बेहद का बाप तो सच कहते हैं ना – गीता का भगवान निराकार ही है। कृष्ण की बात नहीं। भगवान कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो और कोई उपाय नहीं। पावन होकर जाने से ऊंच पद पायेंगे। नहीं तो कम पद हो जायेगा। हम तुमको बाप का सन्देश देते हैं। मैं सन्देशी हूँ। इस समझाने में कोई तकलीफ नहीं है। मातायें, अहिल्यायें, कुब्जायें भी ऊंच पद पा सकती हैं। चाहे यहाँ रहने वाले हों, चाहे घर गृहस्थ में रहने वाले हों, ऐसे नहीं कि यहाँ रहने वाले जास्ती याद कर सकते हैं। बाबा कहते हैं बाहर में रहने वाले भी बहुत याद में रह सकते हैं। बहुत सर्विस कर सकते हैं। यहाँ भी बाप से रिफ्रेश होकर फिर जाते हैं तो अन्दर में कितनी खुशी रहनी चाहिए। इस छी-छी दुनिया में तो बाकी थोड़े रोज़ हैं। फिर चलेंगे कृष्ण पुरी में। कृष्ण के मन्दिर को भी सुखधाम कहते हैं। तो बच्चों को अपार खुशी होनी चाहिए। जबकि तुम बेहद के बाप के बने हो। तुमको ही स्वर्ग का मालिक बनाया था। तुम भी कहते हो बाबा 5 हज़ार वर्ष पहले भी हम आपसे मिले थे और फिर मिलेंगे। अब बाप को याद करने से माया पर जीत पानी है। अब इस दु:खधाम में तो रहना नहीं है। तुम पढ़ते ही हो सुखधाम में जाने के लिए। सबको हिसाब किताब चुक्तु कर वापिस जाना है। मैं आया ही हूँ नई दुनिया स्थापन करने। बाकी सब आत्मायें चली जायेंगी मुक्तिधाम। बाप कहते हैं – मैं कालों का काल हूँ। सबको शरीर से छुड़ाए और आत्माओं को ले जाऊंगा। सब कहते भी हैं हम जल्दी जायें। यहाँ तो रहने का नहीं है। यह तो पुरानी दुनिया, पुराना शरीर है। अब बाप कहते हैं मैं सबको ले जाऊंगा। छोडूँगा किसको भी नहीं। तुम सबने बुलाया ही है-हे पतित-पावन आओ। भल याद करते रहते हैं परन्तु अर्थ कुछ भी नहीं समझते हैं। पतित-पावन की कितनी धुन लगाते हैं। फिर कहते हैं रघुपति राघव राजा राम। अब शिवबाबा तो राजा बनते नहीं, राजाई करते नहीं। उनको राजा राम कहना रांग हो गया। माला जब सिमरते हैं तो राम-राम कहते हैं। उसमें भगवान की याद आती है। भगवान तो है ही शिव। मनुष्यों के नाम बहुत रख दिये हैं। कृष्ण को भी श्याम सुन्दर, वैकुण्ठ नाथ, मक्खन चोर आदि-आदि बहुत नाम देते हैं। तुम अभी कृष्ण को मक्खनचोर कहेंगे? बिल्कुल नहीं। तुम अभी समझते हो भगवान तो एक निराकार है, कोई भी देहधारी को भगवान कह नहीं सकते। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी नहीं कह सकते तो फिर मनुष्य अपने को भगवान कैसे कह सकते। वैजयन्ती माला सिर्फ 108 की गाई जाती है। शिवबाबा ने स्वर्ग स्थापन किया, उनके यह मालिक हैं। जरूर उससे पहले उन्होंने यह पुरूषार्थ किया होगा। उसको कहा जाता है कलियुग अन्त सतयुग आदि का संगमयुग। यह है कल्प का संगमयुग। मनुष्यों ने फिर युगे-युगे कह दिया है, अवतार नाम भी भूल फिर उनको ठिक्कर-भित्तर में, कण-कण में कह दिया है। यह भी है ड्रामा। जो बात पास्ट हो जाती है उसको कहा जाता है ड्रामा। कोई से झगड़ा आदि हुआ, पास हुआ, उनका चिंतन नहीं करना है। अच्छा कोई ने कम जास्ती बोला, तुम उनको भूल जाओ। कल्प पहले भी ऐसे बोला था। याद रहने से फिर बिगड़ते रहेंगे। वह बात फिर कभी बोलो, भी नहीं। तुम बच्चों को सर्विस तो करनी है ना। सर्विस में कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिए। सर्विस में कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए। शिवबाबा की सर्विस है ना। उनमें कभी ज़रा भी ना नहीं करना चाहिए। नहीं तो अपना पद भ्रष्ट कर देंगे। बाप के मददगार बने हो तो पूरी मदद देनी है। बाप की सर्विस करने में ज़रा भी धोखा नहीं देना है। पैगाम सबको पहुँचाना ही है। बाप कहते रहते हैं म्युजियम का नाम ऐसा रखो जो मनुष्य देख अन्दर घुसें और आकर समझें क्योंकि यह नई चीज़ है ना। मनुष्य नई चीज़ देख अन्दर घुसते हैं। आजकल बाहर से आते हैं, भारत का प्राचीन योग सीखने। अब प्राचीन अर्थात् पुराने ते पुराना, वह तो भगवान का ही सिखाया हुआ है, जिसको 5 हज़ार वर्ष हुए। सतयुग-त्रेता में योग होता नहीं, जिसने सिखाया वह तो चला गया फिर जब 5 हज़ार वर्ष बाद आये तब ही आकर राजयोग सिखाये। प्राचीन अर्थात् 5 हज़ार वर्ष पहले भगवान ने सिखाया था। वही भगवान फिर संगम पर ही आकर राजयोग सिखलायेंगे, जिससे पावन बन सकते हैं। इस समय तो तत्व भी तमोप्रधान हैं। पानी भी कितना नुकसान कर देता है। उपद्रव होते रहते हैं, पुरानी दुनिया में। सतयुग में उपद्रव की बात ही नहीं। वहाँ तो प्रकृति दासी बन जाती है। यहाँ प्रकृति दुश्मन बनकर दु:ख देती है। इन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में दु:ख की बात नहीं थी। सतयुग था। अभी फिर वह स्थापन हो रहा है। बाप प्राचीन राजयोग सिखा रहे हैं। फिर 5 हज़ार वर्ष बाद सिखायेंगे, जिसका पार्ट है वही बजायेंगे। बेहद का बाप भी पार्ट बजा रहे हैं। बाप कहते हैं मैं इनमें प्रवेश कर, स्थापना कर चला जाता हूँ। हाहाकार के बाद फिर जय जयकार हो जाती है। पुरानी दुनिया खत्म हो जायेगी। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तो पुरानी दुनिया नहीं थी। 5 हज़ार वर्ष की बात है। लाखों वर्ष की बात हो नहीं सकती। तो बाप कहते हैं और सब बातों को छोड़ इस सर्विस में लग जाओ, अपना कल्याण करने। रूठ कर सर्विस में धोखा नहीं देना चाहिए। यह है ईश्वरीय सर्विस। माया के तूफान बहुत आयेंगे। परन्तु बाप की ईश्वरीय सर्विस में धोखा नहीं देना है। बाप सर्विस अर्थ डायरेक्शन तो देते रहते हैं। मित्र-सम्बन्धी आदि जो भी आयें, सबके सच्चे मित्र तो तुम हो। तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ तो सारी दुनिया के मित्र हो क्योंकि तुम बाप के मददगार हो। मित्रों में कोई शत्रुता नहीं होनी चाहिए। कोई भी बात निकले बोलो, शिवबाबा को याद करो। बाप की श्रीमत पर लग जाना है। नहीं तो अपना नुकसान कर देंगे। ट्रेन में तुम आते हो वहाँ तो सब फ्री हैं। सर्विस का बहुत अच्छा चांस है। बैज तो बहुत अच्छी चीज़ है। हर एक को लगाकर रखना है। कोई पूछे आप कौन हो तो बोलो, हम हैं फायर ब्रिगेड, जैसे वह फायर ब्रिगेड होते हैं, आग को बुझाने के लिए। तो इस समय सारी सृष्टि में काम अग्नि में सब जले हुए हैं। अब बाप कहते हैं काम महाशत्रु पर जीत पहनो। बाप को याद करो, पवित्र बनो, दैवी गुण धारण करो तो बेड़ा पार है। यह बैज श्रीमत से ही तो बने हैं। बहुत थोड़े बच्चे हैं जो बैज पर सर्विस करते हैं। बाबा मुरलियों में कितना समझाते रहते हैं। हर एक ब्राह्मण के पास यह बैज होना चाहिए, कोई भी मिले उनको इस पर समझाना है, यह है बाबा, इनको याद करना है। हम साकार की महिमा नहीं करते। सर्व का सद्गति दाता एक ही निराकार बाप है, उनको याद करना है। याद के बल से ही तुम्हारे पाप कट जायेंगे। फिर अन्त मती सो गति हो जायेगी। दु:खधाम से छूट जायेंगे। फिर तुम विष्णुपुरी में आ जायेंगे। कितनी बड़ी खुशखबरी है। लिटरेचर भी दे सकते हो। बोलो, तुम गरीब हो तो फ्री दे सकते हैं। साहूकारों को तो पैसा देना ही चाहिए क्योंकि यह तो बहुत छपाने होते हैं। यह चीज़ ऐसी है जिससे तुम फकीर से विश्व का मालिक बन जायेंगे। समझानी तो मिलती रहती है। कोई भी धर्म वाला हो, बोलो, वास्तव में तुम आत्मा हो, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। अब विनाश सामने खड़ा है, यह दुनिया बदलने वाली है। शिवबाबा को याद करेंगे तो विष्णुपुरी में आ जायेंगे। बोलो, यह आपको करोड़ों पदमों की चीज़ देते हैं। बाबा ने कितना समझाया है – बैज पर सर्विस करनी है परन्तु बैज लगाते नहीं। लज्जा आती है। ब्राह्मणियाँ जो पार्टी लेकर आती हैं अथवा कहाँ ऑफिस आदि में अकेली जाती हैं, तो यह बैज जरूर लगा रहना चाहिए, जिसको तुम इन पर समझायेंगे वह बहुत खुश होंगे। बोलो, हम एक बाप को ही मानते हैं, वही सबको सुख-शान्ति देने वाला है, उनको याद करो। पतित आत्मा तो जा न सके। अभी यह पुरानी दुनिया बदल रही है। ऐसे-ऐसे रास्ते में सर्विस करते आना चाहिए। तुम्हारा नाम बहुत होगा, बाबा समझते हैं शायद लज्जा आती है जो बैज पहन सर्विस नहीं करते हैं। एक तो बैज, सीढ़ी का चित्र अथवा त्रिमूर्ति, गोला और झाड़ का चित्र साथ में हो, आपस में बैठ एक-दो को समझाओ तो सब इकट्ठे हो जायेंगे। पूछेंगे यह क्या है? बोलो, शिवबाबा इनके द्वारा यह नई दुनिया स्थापन कर रहे हैं। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो, पवित्र बनो। अपवित्र तो वापस जा नहीं सकेंगे। ऐसी मीठी-मीठी बातें सुनानी चाहिए। तो खुशी से सब सुनेंगे। परन्तु कोई की बुद्धि में बैठता नहीं है। सेन्टर पर क्लास में जाते हो तो भी बैज लगा रहे। मिलेट्री वालों को यहाँ बिल्ला (बैज) लगा रहता है। उनको कभी लज्जा आती है क्या? तुम भी रूहानी मिलेट्री हो ना। बाप डायरेक्शन देते हैं फिर अमल में क्यों नहीं लाते। बैज लगा रहे तो शिवबाबा की याद भी रहेगी-हम शिवबाबा के बच्चे हैं। दिन-प्रतिदिन सेन्टर्स भी खुलते जायेंगे। कोई न कोई निकल आयेंगे। कहेंगे फलाने शहर में आपकी ब्रान्च नहीं है। बोलो, कोई प्रबन्ध करे मकान आदि का, निमंत्रण दे तो हम आकर सर्विस कर सकते हैं। हिम्मते बच्चे मददे बाप, बाप तो बच्चों को ही कहेंगे सेन्टर खोलो, सर्विस करो। यह सब शिवबाबा की दुकान है ना। बच्चों द्वारा चला रहे हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कभी आपस में रूठ कर सर्विस में धोखा नहीं देना है। विघ्न रूप नहीं बनना है। अपनी कमजोरी नहीं दिखानी है। बाप का पूरा-पूरा मददगार बनना है।

2) कभी कोई से झगड़ा आदि हुआ, पास हुआ, उनका चिंतन नहीं करना है। कोई ने कम जास्ती बोला, तुम उनको भूल जाओ। कल्प पहले भी ऐसे बोला था। वह बात फिर कभी बोलो भी नहीं।

वरदान:-बीती हुई बातों को रहमदिल बन समाने वाले शुभचिंतक भव
यदि किसी की बीती हुई कमजोरी की बातें कोई सुनाये तो शुभ भावना से किनारा कर लो। व्यर्थ चिंतन या कमजोरी की बातें आपस में नहीं चलनी चाहिए। बीती हुई बातों को रहमदिल बनकर समा लो। समाकर शुभ भावना से उस आत्मा के प्रति मन्सा सेवा करते रहो। भले संस्कारों के वश कोई उल्टा कहता, करता या सुनता है तो उसे परिवर्तन करो। एक से दो तक, दो से तीन तक ऐसे व्यर्थ बातों की माला न हो जाए। ऐसा अटेन्शन रखना अर्थात् शुभ चिंतक बनना।
स्लोगन:-सन्तुष्टमणि बनो तो प्रभु प्रिय, लोकप्रिय और स्वयंप्रिय बन जायेंगे।

TODAY MURLI 28 SEPTEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 28 September 2020

28/09/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence:Sweet children, you are true friends with the whole world; you should have no enmity with anyone.
Question:You are the spiritual military. What direction has the Father given you which you have to put into practice?
Answer:You have been given the direction: Always wear your badge. Whenever anyone asks you what it is or who you are, tell him: We are the fire brigade who puts out the fire of lust of the whole world. At this time, the whole world is ablaze with the fire of lust. We are giving everyone the message: Now become pure and imbibe divine virtues and your boat will go across.

Om shanti. Sweetest, spiritual children are sitting in easy remembrance. Some find it difficult. Many are confused because they think that they have to sit in a very tight or strict manner. The Father says: There is nothing like that here. You may sit how you like; you simply have to remember the Father. There is no question of difficulty in this. Hatha yogis sit in a very tight position, crossing one leg over the other. Here, the Father tells you to sit comfortably. Remember the Father and the cycle of 84 births. This is easy remembrance. While sitting and walking around, this should remain in your intellects. Just as this little boy is sitting next to his father and he is only aware of his parents, so you too are children, and it is therefore easy to remember the Father. We are Baba’s children. We have to claim our inheritance from Baba. You may live at home with your families and carry on working for your livelihoods, but simply remove the remembrance of others from your intellects. Some of you used to remember Hanuman, and others used to remember sages etc. That remembrance has to be forgotten. Everyone remembers someone. Worshippers go to temples in order to carry out their worship. Here, there is no need to go anywhere. Tell anyone you meet: Shiv Baba says: Remember Me, the one Father. Shiv Baba is incorporeal. He definitely has to come into the corporeal world to say: Constantly remember Me alone! I am the Purifier. This word is right. Baba says: Remember Me. All of you are impure. This is the impure and tamopradhan world. This is why Baba says: Don’t remember any bodily being. It is a good thing, is it not, that no guru etc. is praised here? The Father says: Simply remember Me and your sins will be cut away. This is the power of the fire of yoga. The unlimited Father is telling the truth, is He not, when He says that the God of the Gita is the incorporeal One? It is not a question of Krishna being this. God says: Simply remember Me alone! There is no other method. By returning home pure, you will claim a high status. Otherwise, your status will be reduced. I am giving you the Father’s message; I am a messenger. There is no difficulty in explaining this. Women, stone intellects, hunchbacks can also claim a high status, whether you live here or at home with your family. It isn’t that those who live here stay in remembrance more. Baba says: Those who live outside can also stay in remembrance a great deal and do a lot of service. Some come here and become refreshed by the Father and then return home. Therefore, they should have so much happiness inside. There are only a few more days in this dirty world and we will then go to the land of Krishna. Even Krishna’s temple is called the land of happiness (Sukhdham). Therefore, since you children now belong to the unlimited Father, you should experience limitless happiness. You were made into the masters of heaven. You also say: Baba, I met You 5000 years ago and I will meet You again. You have to be victorious over Maya by remembering the Father. You no longer want to stay in this land of sorrow. You are studying in order to go to the land of happiness. Everyone has to settle his or her accounts and return home. I have come to establish the new world. All the rest of the souls will go and stay in the land of liberation. The Father says: I am the Death of all Deaths. I free all souls from their bodies and take them all back home with Me. Everyone asks to go back soon because they don’t want to live here. This is an old world and an old body. The Father now says: I will take everyone back with Me. I will not leave anyone behind. All of you called out to Me: O Purifier, come! People don’t understand the meaning of that, although they continue to remember Me. They chant the name of the Purifier, referring to King Rama of the warrior clan of the silver age. Shiv Baba neither becomes a king nor rules a kingdom. It is wrong to call Him “King Rama”. When they turn the beads of a rosary, they say Rama’s name. This is how they remember God. God is Shiva. Human beings have given Him many names. They even call Krishna by many names: “Shyam Sundar”, “Vaikunthnath” (the Lord of Paradise), “Makhan Chor” (the one who stole butter) etc. Would you say Krishna was someone who stole butter? Not at all! You now understand that God is incorporeal. No bodily being can be God. If even Brahma, Vishnu and Shankar cannot be called God, how can human beings call themselves God? The rosary of victory of 108 of the Father is remembered. Shiv Baba established heaven. They (Lakshmi and Narayan) were the masters of that heaven. They must definitely have made effort prior to that. That is called the confluence age, between the end of the iron age and the beginning of the golden age. It is the confluence of the cycles. However, those people then spoke of a confluence of every age. They forgot that they called Him the Incarnation and said that He was in the pebbles and stones and in every speck of dust. That too is in the drama. Anything that becomes the past is called the drama. After there has been a quarrel with someone, that has become the past. Therefore, you mustn’t think about it. Achcha, if someone said something or other, just forget it. He said the same thing in the previous cycle too. If you remember it, you continue to become upset. Don’t even speak about it again. You children have to do service, do you not? There shouldn’t be any obstacles to service. You mustn’t show any weakness in service. It is Shiv Baba’s service, is it not? You must never refuse to do it. Otherwise, you will destroy your own status. You have become the Father’s helpers. Therefore, you have to give Him complete help. You mustn’t even slightly deceive the Father in doing His service. The message has to be given to everyone. The Father continues to say: Give the museum such a name that, when people see it, they will be pulled to enter it and can thereby come to understand. This is something new and when people see something new they immediately enter. Nowadays, people come from abroad to learn the ancient yoga of Bharat. “Ancient” means the oldest of all. That can only be the yoga taught by God which He taught 5000 years ago. There is no yoga in the golden and silver ages. The One who taught you went away. Only when He comes again after 5000 years does He teach Raj Yoga. “Ancient” means 5000 years ago, when God taught it. That same God will then come at the confluence age once again and teach you Raj Yoga through which you can become pure. At this time even the elements are tamopradhan. Even water causes so much damage. Calamities continue to happen in the old world. In the golden age, there is no question of calamities. There, nature becomes your servant. Here, nature becomes your enemy and causes sorrow. There was no question of sorrow in the kingdom of Lakshmi and Narayan. That was the golden age, the age of truth. It is now being established once again. The Father is teaching you ancient Raj Yoga and He will teach it again after 5000 years. Whatever part someone has, he will play that same part again. The unlimited Father is also playing His part. The Father says: I enter this one, carry out establishment and return home. After the cries of distress, there will be cries of victory. The old world will be destroyed. When it was the kingdom of Lakshmi and Narayan, the old world didn’t exist. It is a matter of 5000 years ago. It cannot be a matter of hundreds of thousands of years. The Father says: In order to benefit yourself, forget everything else and engage yourself in this service. Don’t sulk and then become deceitful in the service you do. This is God’s service. There will be many storms of Maya, but don’t deceive anyone in God, the Father’s, service. The Father continues to give you directions for the sake of service. You are true friends of anyone who comes, even your friends and relatives. You Brahma Kumars and Kumaris are friends with the whole world because you are the Father’s helpers. There should be no enmity among friends. If something happens, just say: Remember Shiv Baba. Engage yourself in following the Father’s shrimat. Otherwise, you will cause yourself a loss. When you come here by train, you are all free. You have a very good chance to do service. The badge is a very good thing. Each one of you definitely has to wear it. When someone asks who you are, tell him: We are the firebrigade. That fire brigade puts out fires. The whole world is now burning in the fire of lust. The Father now says: Conquer lust, the greatest enemy! Remember the Father and become pure. Imbibe divine virtues and your boat will go across. These badges have been created according to shrimat. Very few children do service using their badge. Baba explains to you so many times in the murlis. Every Brahmin should have a badge. Explain the badge to whomever you meet: This is Baba. You have to remember Him. We are not praising the corporeal one. The Bestower of Salvation for All is the one incorporeal Father and it is He who has to be remembered. Your sins will be cut away with the power of yoga and your final thoughts will then lead you to your destination. You will be liberated from the land of sorrow and you will then go to the land of Vishnu. This is such good news! You can also give them some literature. Tell them: Because you are poor we will give it to you free of charge. Wealthy ones should give some money because plenty have to be printed. This is such that you can change from a beggar and become a master of the world. You continue to receive these explanations. Tell anyone of any religion: In fact, you are a soul. Consider yourself to be a soul and remember the Father. Destruction is now just ahead. This world is going to change. If you remember Shiv Baba you will go to the land of Vishnu. Tell them: We are giving you something that is worth millions and billions. Baba has told you so many times that you have to serve using your badge, but some of you don’t even wear your badge because you are too embarrassed. When Brahmin teachers come here with a group or when they go to work on their own, they should definitely be wearing this badge. When you explain this badge to people, they will become very happy. Tell them: We only believe in the one Father. Only He can give everyone peace and happiness. Therefore, remember Him. Souls cannot return home impure. This old world is now going to change. While you are coming here you should do service in this manner along the way. Your name will be glorified a great deal. Baba understands that you are perhaps too embarrassed to wear your badge and that is why you don’t do any service. Firstly, you should have the badge. Then, together with this, you should have pictures of the Trimurti, the cycle and the tree. Sit amongst yourselves and explain to one another and many will gather round you. When they ask, “What is this?” tell them: Shiv Baba is establishing the new world through this one (Brahma). The Father says: Now remember Me and become pure! Impure souls cannot return home. Tell them such sweet things that everyone listens in great happiness. However, this doesn’t sit in anyone’s intellect. When you go to your centre for class, you should always wear your badgeMilitary people always wear their badge. Are they ever too embarrassed to wear it? You are the spiritual military. The Father is giving you directions. So, why don’t you put them into practice? When you wear your badge you will be able to remember Shiv Baba. I am a child of Shiv Baba. Day by day, centres will continue to open. Someone or other will emerge. They will say: You don’t have a branch in this town. Tell them: If someone makes arrangements and invites us to come and offers us accommodation, we can come and do service here. When children have courage, the Father helps. The Father only tells you children to open centres and do service. All of these are Shiv Baba’s shops. They are being run by the children. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Never sulk among yourselves and be deceitful in service. Don’t become an obstacle. Don’t show your weaknesses, but become the Father’s complete helpers.
  2. After there has been a quarrel with someone, that has become the past. Therefore, you mustn’t think about it. Someone may have said something or other, but you should forget it. He said the same thing in the previous cycle, so never mention it again.
Blessing:May you have pure and positive thoughts for others and by being merciful, merge the things of the past.
When someone comes to you to tell you about someone’s weaknesses of the past, then with good wishes, just step aside. Let there not be any wasteful thinking or any talk about weaknesses among yourselves. Be merciful and merge the things of the past. Merge those things and with good wishes, continue to serve that soul with your mind. Even if someone is saying, doing or listening to something wrong due to the influence of their sanskars, transform that one. Do not allow a rosary of such wasteful matters to be created of spreading from one to two to three in this way. To pay such attention means to have pure and positive thoughts.
Slogan:Be a jewel of contentment and you will be loved by God, by the people and by the self.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 27 SEPTEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 27 September 2020

27/09/20
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
27/03/86

Be constantly loving.

Today, the Father, the Ocean of Love, has come to meet His loving children. This spiritual love makes every child an easy yogi. This love is an easy way to forget the whole of the old world. This love is the only powerful means to make every soul belong to the Father. Love is the foundation of Brahmin life. Love is the basis of the sustenance needed to create a powerful life. All the elevated souls who have arrived personally in front of the Father have come here on the basis of their love. You come flying here with the wings of love and become residents of Madhuban. BapDada was seeing all you loving children, how all of you are loving, but what is the difference between you? Why do you become numberwise? What is the reason for this? All of you are loving, but some of you are constantly loving whereas others are just loving and the third category are those who fulfil the responsibility of love according to the time. BapDada saw these three types of loving children.

Because those who are constantly loving are merged in love, they are always beyond having to make any effort or experiencing difficulty. Neither do they have to make effort nor do they experience anything to be difficult. Because they are constantly loving, the elements of nature and Maya become their servants from now on, that is, the constantly loving souls become the masters. Therefore, the elements of nature and Maya automatically become their servants. The elements of nature and Maya do not have the courage to make constantly loving souls use their time and thoughts for them. Every moment and every thought of constantly loving souls is for remembrance of the Father and for doing service. This is why Maya and the elements of nature know that such constantly loving children can never be dependent on them, even in their thoughts. They are souls who have a right to all powers. The stage of constantly loving souls is praised as of those who belong to the one Father and none other. The Father is their world.

The second type, the loving souls, definitely remain loving but, because they are not constant, their thoughts and, through them, their love sometimes goes in other directions. In transforming themselves, every now and again, they experience having to make effort and sometimes they experience difficulty, but very little. Whenever there is a subtle attack from the elements of nature or Maya, then, because of love, they have remembrance very quickly, and they very quickly transform themselves with their power of remembrance. However, some of their time and their thoughts are used in overcoming the difficulty and in making that effort. Sometimes their love becomes ordinary, and at other times they remain absorbed in love. There continues to be a difference in their stage. Nevertheless, not too much of their time or their thoughts is wasted. This is why, although they are loving, they are not constantly loving and they therefore become the second number.

The third type are those who fulfil the responsibility of love according to the time. Such souls believe that true love cannot be received from anyone except the one Father, and that this spiritual love will make you elevated for all time. They have total knowledge, that is, understanding, and they still love just this life of love. However, because of not having controlling power, due to their attachment to their own bodies or sanskars, or attachment to a particular old sanskar, attachment to the sanskar of a person or possession, or to a sanskar of having waste thoughts, they carry a burden of waste thoughts. Or, because they lack the power of the gathering, they are unable to be successful in a gathering. A situation in the gathering finishes their love and pulls them towards itself. Some of them always become disheartened very quickly. One minute, they would be flying very high, but if you look at them the next minute, they would be disheartened even with themselves. This sanskar of becoming disheartened with themselves doesn’t allow them to be constantly loving. Some type of sanskar attracts them towards situations or nature. They get into an upheaval, but then, because they experience love and love the life of love, they are nevertheless able to remember the Father. They try to become merged in the Father’s love once again. So, because of coming into upheaval according to the time and the situation, they sometimes have remembrance and sometimes are battling. Because they spend a greater part of their lives battling, their lives of being absorbed in love are then less in comparison. This is why they take the third number. Nevertheless, to be in the third number, compared with all the souls of the world, would still be said to be extremely elevated, because they have recognised the Father, they belong to the Father and the Brahmin family. They are at least called the most elevated Brahmin souls, the Brahma Kumars and Kumaris. This is why, in comparison to the world, even they (the third type) are loving souls. However, in comparison to perfection, they are the third number. So, all are loving, but numberwise. The number one, constantly loving souls are constantly like lotus flowers, detached and extremely loving to the Father. Loving souls are detached and loving, but they are not powerfully victorious like the Father. They are not absorbed in love, but are loving. Their special slogan is: I belong to You and I will remain Yours. They constantly continue to sing this song. Nevertheless, they have love and they therefore remain 80% safe. However, there is still the word “sometimes” that comes in between. The word “constantly” is not used about them. The third number souls, because of repeatedly having to connect their love, also continue to make promises with love. “That’s it. From today, I will become like this. From now, I will do this.” Because they know the difference, they make promises and they make effort, but one particular sanskar or other doesn’t allow them to remain lost in love. An obstacle brings them down from their stage of being lost in love. Therefore, the word “constantly” cannot be used about them. Because they are sometimes like this and at other times like that, they still have one particular weakness or other. Such souls have very sweet heart-to-heart conversations with BapDada. They demonstrate having a lot of rights. They say: The direction is from You, but You can also do it for us, and I will attain the reward of that. They say with love and a right: Since You have made me belong to You, it is now up to You. The Father says: The Father knows, but the child should at least accept it. However, those children say with a right: Whether I accept it or not, You will have to accept me as I am. So, the Father still feels mercy for such children because they are Brahmin children after all. Therefore, He also gives special power through the instrument souls. However, some do take their power and transform themselves, whereas others, even though they receive power, they remain so lost in their own sanskars that they are unable to imbibe that power. If you give something nourishing to someone to eat and he doesn’t eat it, what would happen?

The Father gives special love and some do gradually become powerful, and change from the third type of souls to the second type. However, because some of them are very careless, they are unable to take as much as they should. All three types of children are loving children. They all have the title of being loving children, but they are numberwise.

Today, it is the turn of Germany. The whole group is number one. You are number one, close jewels, because those who are equal also remain close. No matter how far away you may be physically, you are so close to the heart that you reside in the heart. Because you reside on the Father’s heart-throne, there is automatically no one except the Father in your hearts, because in Brahmin life, the Father makes a deal with the heart. You won His heart and you gave your hearts. You made a deal with your heart, did you not? You stay with the Father in your hearts. Physically, some of you stay in one place and others in another place. If all of you were to stay here, what would you do sitting here? Even those who were living in Madhuban had to be sent out to do service. How else would the world be served? You have love for Father and for doing service. This is why, according to the drama, you have reached different places and become instruments for doing service there. So, this too is fixed as part of the drama. You have become instruments for serving your equals. Those from Germany are those who remain constantly happy. Since you are receiving the inheritance from the Father for all time so easily, why should you put aside that which you receive for all time and only take a little or for some time? The Bestower is giving, and so why should those who are taking take any less? Therefore, always continue to swing in the swing of happiness. Always be conquerors of Maya, conquerors of nature, be victorious and beat the drums of victory loudly in front of the world.

Souls nowadays are either totally intoxicated with temporary facilities or they are weary with sorrow and peacelessness and are sleeping in such a deep sleep that they don’t hear a little sound. Those who are lost in that type of intoxication have to be really shaken awake. You also really have to shake those who are fast asleep in a deep sleep to awaken them. So, what are those from Hamburg doing? It is a very good, powerful group. All of you have deep love for the Father and the study. Those who love this study remain constantly powerful. To have love for the Father, that is, for the Murlidhar (the One who speaks the murli), means to have love for the murli. If you don’t have love for the murli, there cannot be love for the Murlidhar. No matter how much they say that they love the Father, but they don’t have time for the study, the Father does not believe them. Where there is deep love, no obstacles can remain; they will automatically end. Those who have love for the study and the murli easily overcome all obstacles. With their flying stage, they go up above the obstacles which remain down below. For those who are in the flying stage, a mountain is like a stone. Those who have love for the study can have no excuses. Love enables anything difficult to become easy. Love for the murli, love for the study and love for the family become a fortress, and those who stay in this fortress remain safe. Both these specialities are making this group move forward. Because of love for the study and the family, you bring one another close with that impact. The instrument soul you have is also a loving soul (Pushpal Dadi). Love does not see the language. The language of love is more elevated than all other languages. Everyone remembers her. BapDada also remembers her. Baba is seeing very good practical proof. There is growth in service. The more expansion you continue to have, the more blessings you will continue to receive from everyone as the fruit of becoming great souls. Only charitable souls become the souls who are worthy of worship. If you do not become a charitable soul at this time, you cannot become a soul worthy of worship in the future. It is also necessary to be a charitable soul. Achcha.

Selected Questions and answers from Avyakt Murlis

Question: What is the special virtue, decoration and treasure of Brahmin life?

Answer: Contentment. When something is loved, you never leave that loved thing. Contentment is a speciality and it is a special mirror for transformation in Brahmin life. Where there is contentment, there is definitely happiness there. If there is no contentment in Brahmin life, then that is an ordinary life.

Question: What are the specialities of those who are jewels of contentment?

Answer: Those who are jewels of contentment never become discontented with themselves, with other souls, with their own sanskars or with the influence of the atmosphere. They never say: I am content, but others are making me discontent. No matter what happens, jewels can never let go of their speciality of contentment.

Question: What are the signs of those who are always content?

Answer:

1. Those who always remain content are automatically loved by everyone because contentment makes you loved by the Brahmin family.

2. Others try to bring contented souls close to them and also want them to co-operate in an elevated task.

3. The speciality of contentment itself makes you a golden chancellor for a task. Such souls do not need to say or think about anything.

4. Contentment itself enables there to be harmony with everyone’s nature and sanskars. Contented souls are never afraid of anyone’s nature or sanskars.

5. Everyone loves such souls with their heart. They are worthy of receiving everyone’s love. The introduction of such souls is their contentment, and each one’s heart’s desire would be to talk to such souls and to sit with them.

6. Contented souls are constantly conquerors of Maya because they are obedient and always stay within the line of the codes of conduct. They recognise Maya from a distance.

Question: Why are you not able to recognise Maya at the right time, and why are you repeatedly deceived by her?

Answer: The reason for not recognising Maya is that you do not always follow the Father’s elevated directions. Sometimes you follow them and sometimes you don’t. Sometimes you remember Him and sometimes you don’t. Sometimes you have zeal and enthusiasm and sometimes you don’t. You do not always stay within the line of the directions and so Maya deceives you at that time. Maya has a lot of power of discernment and she sees when you are weak and so through that weakness she makes you belong to her. The door for Maya to enter is weakness.

Question: What is the easy way to become a conqueror of Maya?

Answer: Constantly stay with the Father. To stay with Him means automatically to stay within the line of the codes of conduct. You will then be freed from having to make effort to become free from each vice individually. When you stay with Him, then, as is the Father, so are you. You will automatically be coloured by His company, and so do not let go of the Seed or try to cut the branches. Today, I have become a conqueror of lust; the next day, I have to become a conqueror of anger. No, constantly be victorious. Simply keep the Seed with you and the seed of Maya will be burnt in such a way that no trace of it will remain.

Blessing:May you be a merciful world benefactor who gives courage and enthusiasm to every soul.
Never say to a weak soulin the Brahmin family, “You are weak”. Constantly let good words for every soul emerge from the lips of you merciful world benefactor children, not words which would dishearten anyone. No matter how weak some may be, even if you have to give them a signal or teaching, first of all make them powerful and then give them the teaching. First of all, plough the field with courage and enthusiasm and then sow the seeds, and each seed will then easily bear fruit. By doing this, the service of world benefit will become fast.
Slogan:Take blessings from the Father, and experience being constantly full.

 

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 27 SEPTEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 27 September 2020

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27-09-20
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 27-03-86 मधुबन

सदा के स्नेही बनो

आज स्नेह का सागर बाप अपने स्नेही बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। यह रूहानी स्नेह हर बच्चे को सहजयोगी बना देता है। यह स्नेह सारे पुराने संसार को सहज भुलाने का साधन है। यह स्नेह हर आत्मा को बाप का बनाने में एकमात्र शक्तिशाली साधन है। स्नेह ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है। स्नेह शक्तिशाली जीवन बनाने का, पालना का आधार है। सभी जो भी श्रेष्ठ आत्मायें बाप के पास सम्मुख पहुँची हैं, उन सभी के पहुँचने का आधार भी स्नेह है। स्नेह के पंखों से उड़ते हुए आकर मधुबन निवासी बनते हैं। बापदादा सर्व स्नेही बच्चों को देख रहे थे कि स्नेही तो सब बच्चे हैं लेकिन अन्तर क्या है! नम्बरवार क्यों बनते हैं, कारण? स्नेही सभी हैं लेकिन कोई हैं सदा स्नेही और कोई है स्नेही। और तीसरे हैं समय प्रमाण स्नेह निभाने वाले। बापदादा ने तीन प्रकार के स्नेही देखे।

जो सदा स्नेही हैं वह लवलीन होने के कारण मेहनत और मुश्किल से सदा ऊंचे रहते हैं। न मेहनत करनी पड़ती, न मुश्किल का अनुभव होता क्योंकि सदा स्नेही होने के कारण उन्हों के आगे प्रकृति और माया दोनों अभी से दासी बन जाती अर्थात् सदा स्नेही आत्मा मालिक बन जाती तो प्रकृति, माया स्वत: ही दासी रूप में हो जाती। प्रकृति, माया की हिम्मत नहीं जो सदा स्नेही का समय वा संकल्प अपने तरफ लगावे। सदा स्नेही आत्माओं का हर समय, हर संकल्प है ही बाप की याद और सेवा के प्रति इसलिए प्रकृति और माया भी जानती हैं कि यह सदा स्नेही बच्चे संकल्प से भी कभी हमारे अधीन नहीं हो सकते। सर्व शक्तियों के अधिकारी आत्मायें हैं। सदा स्नेही आत्मा की स्थिति का ही गायन है। एक बाप दूसरा न कोई। बाप ही संसार है।

दूसरा नम्बर – स्नेही आत्मायें, स्नेह में रहती जरूर हैं लेकिन सदा न होने कारण कभी-कभी मन के संकल्प द्वारा भी कहाँ और तरफ स्नेह जाता। बहुत थोड़ा बीच-बीच में स्वयं को परिवर्तन करने के कारण कभी मेहनत का, कभी मुश्किल का अनुभव करते। लेकिन बहुत थोड़ा। जब भी कोई प्रकृति वा माया का सूक्ष्म वार हो जाता है तो उसी समय स्नेह के कारण याद जल्दी आ जाती है और याद की शक्ति से अपने को बहुत जल्दी परिवर्तन भी कर लेते हैं। लेकिन थोड़ा-सा समय और फिर भी संकल्प मुश्किल या मेहनत में लग जाता है। कभी-कभी स्नेह साधारण हो जाता। कभी-कभी स्नेह में लवलीन रहते। स्टेज में फ़र्क पड़ता रहता। लेकिन फिर भी ज्यादा समय या संकल्प व्यर्थ नहीं जाता इसलिए स्नेही हैं लेकिन सदा स्नेही न होने के कारण सेकण्ड नम्बर हो जाते।

तीसरे हैं – समय प्रमाण स्नेह निभाने वाले। ऐसी आत्मायें समझती हैं कि सच्चा स्नेह सिवाए बाप के और कोई से मिल नहीं सकता और यही रूहानी स्नेह सदा के लिए श्रेष्ठ बनाने वाला है। ज्ञान अर्थात् समझ पूरी है और यही स्नेही जीवन प्रिय भी लगती है। लेकिन कोई अपनी देह के लगाव के संस्कार या कोई भी विशेष पुराना संस्कार वा किसी व्यक्ति वा वस्तु के संस्कार वा व्यर्थ संकल्पों के संस्कार वश कन्ट्रोलिंग पावर न होने के कारण व्यर्थ संकल्पों का बोझ है। वा संगठन की शक्ति की कमी होने के कारण संगठन में सफल नहीं हो सकते। संगठन की परिस्थिति स्नेह को समाप्त कर अपने तरफ खींच लेती है। और कोई सदा ही दिल-शिकस्त जल्दी होते हैं। अभी-अभी बहुत अच्छे उड़ते रहेंगे और अभी-अभी देखो तो अपने आप से ही दिलशिकस्त। यह स्वयं से दिलशिकस्त होने का संस्कार भी सदा स्नेही बनने नहीं देता। किसी न किसी प्रकार का संस्कार परिस्थिति की तरफ, प्रकृति की तरफ आकर्षित कर देता है। और जब हलचल में आ जाते हैं तो स्नेह का अनुभव होने के कारण, स्नेही जीवन प्रिय लगने के कारण फिर बाप की याद आती है। प्रयत्न करते हैं कि अभी फिर से बाप के स्नेह में समा जावें। तो समय प्रमाण, परिस्थिति प्रमाण हलचल में आने के कारण कभी याद करते हैं, कभी युद्ध करते हैं। युद्ध की जीवन ज्यादा होती और स्नेह में समाने की जीवन उसके अन्तर में कम होती है इसलिए तीसरा नम्बर बन जाते हैं। फिर भी विश्व की सर्व आत्माओं से तीसरा नम्बर भी अति श्रेष्ठ ही कहेंगे क्योंकि बाप को पहचाना, बाप के बने, ब्राह्मण परिवार के बने। ऊंचे ते ऊंची ब्राह्मण आत्मायें ब्रह्माकुमार, ब्रह्माकुमारी कहलाते इसलिए दुनिया के अन्तर में वह भी श्रेष्ठ आत्मायें हैं। लेकिन सम्पूर्णता के अन्तर में तीसरा नम्बर हैं। तो स्नेही सभी हैं लेकिन नम्बरवार हैं। नम्बरवन सदा स्नेही आत्मायें सदा कमल पुष्प समान न्यारी और बाप की अति प्यारी हैं। स्नेही आत्मायें न्यारी हैं प्यारी भी हैं लेकिन बाप समान शक्तिशाली विजयी नहीं हैं। लवलीन नहीं है लेकिन स्नेही हैं। उन्हों का विशेष यही स्लोगन है – तुम्हारे हैं, तुम्हारे रहेंगे। सदा यह गीत गाते रहते। फिर भी स्नेह है इसलिए 80 परसेन्ट सेफ रहते हैं। लेकिन फिर भी कभी-कभी शब्द आ जाता। सदा शब्द नहीं आता। और तीसरे नम्बर आत्मायें बार-बार स्नेह के कारण प्रतिज्ञायें भी स्नेह से करते रहते। बस अभी से ऐसे बनना है। अभी से यह करेंगे क्योंकि अन्तर तो जानते हैं ना। प्रतिज्ञा भी करते, पुरूषार्थ भी करते लेकिन कोई न कोई विशेष पुराना संस्कार लगन में मगन रहने नहीं देता। विघ्न मगन अवस्था से नीचे ले आते इसलिए सदा शब्द नहीं आ सकता। लेकिन कभी कैसे, कभी कैसे होने के कारण कोई न कोई विशेष कमजोरी रह जाती है। ऐसी आत्मायें बापदादा के आगे रूहरिहान भी बहुत मीठी करते हैं। हुज्जत बहुत दिखाते। कहते हैं डायरेक्शन तो आपके हैं लेकिन हमारी तरफ से करो भी आप और पावें हम। हुज्जत से स्नेह से कहते जब आपने अपना बनाया है तो आप ही जानो। बाप कहते हैं बाप तो जानें लेकिन बच्चे मानें तो सही। लेकिन बच्चे हुज्जत से यही कहते कि हम माने न माने आपको मानना ही पड़ेगा। तो बाप को फिर भी बच्चों पर रहम आता है कि हैं तो ब्राह्मण बच्चे इसलिए स्वयं भी निमित्त बनी हुई आत्माओं द्वारा विशेष शक्ति देते हैं। लेकिन कोई शक्ति लेकर बदल भी जाते और कोई शक्ति मिलते भी अपने संस्कारों में मस्त होने कारण शक्ति को धारण नहीं कर सकते। जैसे कोई ताकत की चीज़ खिलाओ और वह खावे ही नहीं, तो क्या करेंगे!

बाप विशेष शक्ति देते भी हैं और कोई-कोई धीरे-धीरे शक्तिशाली बनते-बनते तीसरे नम्बर से दूसरे नम्बर में आ भी जाते हैं। लेकिन कोई-कोई बहुत अलबेले होने के कारण जितना लेना चाहिए उतना नहीं ले सकते। तीनों प्रकार के स्नेही बच्चे हैं। टाइटिल सभी का स्नेही बच्चे है लेकिन नम्बरवार हैं।

आज जर्मनी वालों का टर्न है। सारा ही ग्रुप नम्बरवन है ना। नम्बरवन समीप रत्न हैं क्योंकि जो समान होते हैं वो ही समीप रहते हैं। शरीर से भले कितना भी दूर हो लेकिन दिल से इतने नजदीक हैं जो रहते ही दिल में हैं। स्वयं बाप के दिलतख्त पर रहते हैं उन्हों के दिल में स्वत: ही बाप के सिवाए और कोई नहीं क्योंकि ब्राह्मण जीवन में बाप ने दिल का ही सौदा किया है। दिल ली और दिल दी। दिल का सौदा किया है ना। दिल से बाप के साथ रहते हो। शरीर से तो कोई कहाँ, कोई कहाँ रहते। सभी को यहाँ रखें तो क्या बैठ करेंगे! सेवा के लिए तो मधुबन में साथ रहने वालों को भी बाहर भेजना पड़ा। नहीं तो विश्व की सेवा कैसे होती। बाप से भी प्यार है तो सेवा से भी प्यार है इसलिए ड्रामा अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों पर पहुँच गये हो और वहाँ की सेवा के निमित्त बन गये हो। तो यह भी ड्रामा में पार्ट नूँधा हुआ है। अपने हमजिन्स की सेवा के निमित्त बन गये। जर्मनी वाले सदा खुश रहने वाले हैं ना। जब बाप से सदा का वर्सा इतना सहज मिल रहा है तो सदा को छोड़ थोड़ा सा वा कभी-कभी का क्यों लेवें! दाता दे रहा है तो लेने वाले कम क्यों लेवें इसलिए सदा खुशी के झूले में झूलते रहो। सदा माया-जीत, प्रकृति जीत विजयी बन विजय का नगारा विश्व के आगे जोर-शोर से बजाओ।

आजकल की आत्मायें विनाशी साधनों में या तो बहुत मस्त नशे में चूर हैं और या तो दु:ख अशान्ति से थके हुए ऐसी गहरी नींद में सोये हुए हैं जो छोटा आवाज सुनने वाले नहीं हैं। नशे में जो चूर होता है उनको हिलाना पड़ता है। गहरी नींद वाले को भी हिलाकर उठाना पड़ता है। तो हैमबर्ग वाले क्या कर रहे हैं? अच्छा ही शक्तिशाली ग्रुप है। सभी की बाप और पढ़ाई से प्रीत अच्छी है। जिन्हों की पढ़ाई से प्रीत है वह सदा शक्तिशाली रहते। बाप अर्थात् मुरलीधर से प्रीत माना मुरली से प्रीत। मुरली से प्रीत नहीं तो मुरलीधर से भी प्रीत नहीं। कितना भी कोई कहे कि मुझे बाप से प्यार है लेकिन पढ़ाई के लिए टाइम नहीं। बाप नहीं मानते। जहाँ लगन होती है वहाँ कोई विघ्न ठहर नहीं सकते। स्वत: ही समाप्त हो जायेंगे। पढ़ाई की प्रीत, मुरली से प्रीत वाले, विघ्नों को सहज पार कर लेते हैं। उड़ती कला द्वारा स्वयं ऊंचे हो जाते। विघ्न नीचे रह जाते। उड़ती कला वाले के लिए पहाड़ भी एक पत्थर समान है। पढ़ाई से प्रीत रखने वालों के लिए बहाना कोई नहीं होता। प्रीत, मुश्किल को सहज कर देती है। एक मुरली से प्यार, पढ़ाई से प्यार और परिवार का प्यार किला बन जाता है। किले में रहने वाले सेफ हो जाते हैं। इस ग्रुप को यह दोनों विशेषतायें आगे बढ़ा रही हैं। पढ़ाई और परिवार के प्यार कारण एक दो को प्यार के प्रभाव से समीप बना देते हैं। और फिर निमित्त आत्मा (पुष्पाल) भी प्यार वाली मिली है। स्नेह, भाषा को भी नहीं देखता। स्नेह की भाषा सभी भाषाओं से श्रेष्ठ है। सभी उनको याद कर रहे हैं। बापदादा को भी याद है। अच्छा ही प्रत्यक्ष प्रमाण देख रहे हैं। सेवा की वृद्धि हो रही है। जितना वृद्धि करते रहेंगे उतना महान पुण्य आत्मा बनने का फल सर्व की आशीर्वाद प्राप्त होती रहेगी। पुण्य आत्मा ही पूज्य आत्मा बनती है। अभी पुण्य आत्मा नहीं तो भविष्य में पूज्य आत्मा नहीं बन सकते। पुण्य आत्मा बनना भी जरूरी है। अच्छा!

अव्यक्त मुरलियों से चुने हुए प्रश्न-उत्तर

प्रश्न:- ब्राह्मण जीवन का विशेष गुण, श्रंगार वा खजाना कौन सा है?

उत्तर:-’‘सन्तुष्टता”। जैसे कोई प्रिय वस्तु होती है तो प्रिय वस्तु को कभी छोड़ते नहीं हैं, सन्तुष्टता विशेषता है, ब्राह्मण जीवन के परिवर्तन का विशेष दर्पण है। जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ खुशी जरूर है। यदि ब्राह्मण जीवन में सन्तुष्टता नहीं तो वह साधारण जीवन है।

प्रश्न:-सन्तुष्टमणियों की विशेषतायें क्या होंगी?

उत्तर:-सन्तुष्टमणियां कभी किसी भी कारण से स्वयं से, अन्य आत्माओं से, अपने संस्कारों से, वायुमण्डल के प्रभाव से असन्तुष्ट नहीं हो सकती। वे ऐसे कभी नहीं कहेंगी कि हम तो सन्तुष्ट हैं लेकिन दूसरे असन्तुष्ट करते हैं। कुछ भी हो जाए सन्तुष्ट मणियां अपने सन्तुष्टता की विशेषता को छोड़ नहीं सकती।

प्रश्न:-जो सदा सन्तुष्ट रहते हैं उनकी निशानियां क्या होंगी?

उत्तर:-1-जो सदा सन्तुष्ट रहता है उसके प्रति स्वत:सभी का स्नेह रहता है क्योंकि सन्तुष्टता ब्राह्मण परिवार का स्नेही बना देती है।

2- सन्तुष्ट आत्मा को सभी स्वयं ही समीप लाने वा हर श्रेष्ठ कार्य में सहयोगी बनाने का प्रयत्न करेंगे।

3- सन्तुष्टता की विशेषता स्वयं ही हर कार्य में गोल्डन चांसलर बना देती है। उन्हें कहना या सोचना भी नहीं पड़ता है।

4- सन्तुष्टता सदा सर्व के स्वभाव संस्कार को मिलाने वाली होती है। वह कभी किसी के स्वभाव-संस्कार से घबराने वाले नहीं होते।

5- उनसे सभी का स्वत: दिल का प्यार होता है। वह प्यार लेने के पात्र होते हैं। सन्तुष्टता ही उस आत्मा की पहचान दिलाती है। हर एक की दिल होगी इनसे बात करें, इनसे बैठें।

6- सन्तुष्ट आत्मायें सदा मायाजीत हैं ही क्योंकि आज्ञाकारी हैं, सदा मर्यादा की लकीर के अन्दर रहते हैं। माया को दूर से ही पहचान लेते हैं।

प्रश्न:- यदि समय पर माया को पहचान नहीं पाते, बार-बार धोखा खा लेते तो उसका कारण क्या?

उत्तर:-पहचान कम होने का कारण है-सदा बाप की श्रेष्ठ मत पर नहीं चलते हैं। कोई समय चलते हैं, कोई समय नहीं। कोई समय याद करते हैं, कोई समय नहीं। कोई समय उमंग-उत्साह में रहेंगे कोई समय नहीं। सदा आज्ञा की लकीर के अन्दर नहीं रहते इसलिए माया समय पर धोखा दे देती है। माया में परखने की शक्ति बहुत है, माया देखती है कि इस समय यह कमजोर है, तो उस कमजोरी द्वारा अपना बना देती है। माया के आने का रास्ता है ही कमजोरी।

प्रश्न:- मायाजीत बनने का सहज साधन कौन सा है?

उत्तर:- सदा बाप के साथ रहो, साथ रहना अर्थात् स्वत:मर्यादाओं की लकीर के अन्दर रहना। फिर एक-एक विकार के पीछे विजयी बनने की मेहनत करने से छूट जायेंगे। साथ रहो तो जैसा बाप वैसे आप। संग का रंग स्वत: ही लग जायेगा इसलिए बीज को छोड़ सिर्फ शाखाओं को काटने की मेहनत नहीं करो। आज कामजीत बन गये, कल क्रोध जीत बन गये। नहीं। सदा विजयी। सिर्फ बीजरूप को साथ रखो तो माया का बीज ऐसे भस्म हो जायेगा जो फिर कभी भी उस बीज से अंश भी नहीं निकल सकता।

वरदान:-हर आत्मा को हिम्मत, उल्लास दिलाने वाले, रहमदिल, विश्व कल्याणकारी भव
कभी भी ब्राह्मण परिवार में किसी कमजोर आत्मा को, तुम कमजोर हो-ऐसे नहीं कहना। आप रहमदिल विश्व कल्याणकारी बच्चों के मुख से सदैव हर आत्मा के प्रति शुभ बोल निकलने चाहिए, दिलशिकस्त बनाने वाले नहीं। चाहे कोई कितना भी कमजोर हो, उसे इशारा या शिक्षा भी देनी हो तो पहले समर्थ बनाकर फिर शिक्षा दो। पहले धरनी पर हिम्मत और उत्साह का हल चलाओ फिर बीज डालो तो सहज हर बीज का फल निकलेगा, इससे विश्व कल्याण की सेवा तीव्र हो जायेगी।
स्लोगन:-बाप की दुआयें लेते हुए सदा भरपूरता का अनुभव करो।

Aaj ki murli October 2020 – Om shanti murli today

ब्रह्माकुमारी मुरली : आज की मुरली (हिंदी मुरली)

Brahma kumaris Om Shanti Murli : Aaj ki Murli October 2020

Om Shanti Murli : गूगल ड्राइव से आज की मुरली डाउनलोड कर सकते।

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