Hindi Murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 21 FEBRUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 21 February 2020

21-02-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हें बाप द्वारा जो अद्वैत मत मिल रही है, उस मत पर चलकर कलियुगी मनुष्यों को सतयुगी देवता बनाने का श्रेष्ठ कर्तव्य करना है”
प्रश्नः-सभी मनुष्य-मात्र दु:खी क्यों बने हैं, उसका मूल कारण क्या है?
उत्तर:-रावण ने सभी को श्रापित कर दिया है, इसलिए सभी दु:खी बने हैं। बाप वर्सा देता, रावण श्राप देता-यह भी दुनिया नहीं जानती। बाप ने वर्सा दिया तब तो भारतवासी इतने सुखी स्वर्ग के मालिक बनें, पूज्य बनें। श्रापित होने से पुजारी बन जाते हैं।

ओम् शान्ति। बच्चे यहाँ मधुबन में आते हैं बापदादा के पास। हाल में जब आते हो, देखते हो पहले बहन-भाई बैठते हैं फिर पीछे देखते हो बापदादा आया हुआ है तो बाप की याद आती है। तुम हो प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे, ब्राह्मण और ब्राह्मणियाँ। वह ब्राह्मण तो ब्रह्मा बाप को जानते ही नहीं हैं। तुम बच्चे जानते हो – बाप जब आते हैं तो ब्रह्मा-विष्णु-शंकर भी जरूर चाहिए। कहते ही हैं त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। अब तीनों द्वारा तो नहीं बोलेंगे ना। यह बातें अच्छी रीति बुद्धि में धारण करनी है। बेहद के बाप से जरूर स्वर्ग का वर्सा मिलता है, इसलिए सभी भक्त भगवान से क्या चाहते हैं? जीवनमुक्ति। अभी है जीवनबन्ध। सभी बाप को याद करते हैं कि आकर इस बंधन से मुक्त करो। अभी तुम बच्चे ही जानते हो कि बाबा आया हुआ है। कल्प-कल्प बाप आते हैं। पुकारते भी हैं-तुम मात पिता…… परन्तु इसका अर्थ तो कोई भी नहीं समझते। निराकार बाप के लिए समझ लेते हैं। गाते हैं परन्तु मिलता कुछ भी नहीं है। अभी तुम बच्चों को उनसे वर्सा मिलता है फिर कल्प बाद मिलेगा। बच्चे जानते हैं बाप आधाकल्प के लिए आकर वर्सा देते हैं और रावण फिर श्राप देते हैं। यह भी दुनिया नहीं जानती कि हम सभी श्रापित हैं। रावण का श्राप लगा हुआ है इसलिए सभी दु:खी हैं। भारतवासी सुखी थे। कल इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य भारत में था। देवताओं के आगे माथा टेकते हैं, पूजा करते हैं परन्तु सतयुग कब था, यह किसको पता नहीं। अब देखो लाखों वर्ष की आयु सिर्फ सतयुग की दिखा दी है, फिर त्रेता की, द्वापर-कलियुग की, उस हिसाब से मनुष्य कितने ढेर हो जाएं। सिर्फ सतयुग में ही ढेर मनुष्य हो जाएं। कोई भी मनुष्य की बुद्धि में नहीं बैठता है। बाप बैठ समझाते हैं कि देखो गाया भी जाता है 33 करोड़ देवतायें होते हैं। ऐसे थोड़ेही वह कोई लाखों वर्ष में हो सकते हैं। तो यह भी मनुष्यों को समझाना पड़े।

अभी तुम समझते हो कि बाबा हमको स्वच्छ बुद्धि बनाते हैं। रावण मलेच्छ बुद्धि बनाते हैं। मुख्य बात तो यह है। सतयुग में हैं पवित्र, यहाँ हैं अपवित्र। यह भी किसको पता नहीं है कि रामराज्य कब से कब तक? रावण राज्य कब से कब तक होता है? समझते हैं यहाँ ही राम राज्य भी है, रावण राज्य भी है। अनेक मत-मतान्तर हैं ना। जितने हैं मनुष्य, उतनी हैं मतें। अभी यहाँ तुम बच्चों को एक अद्वेत मत मिलती है जो बाप ही देते हैं। तुम अभी ब्रह्मा द्वारा देवता बन रहे हो। देवताओं की महिमा गाई जाती है – सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण…… हैं तो वह भी मनुष्य, मनुष्य की महिमा गाते हैं क्यों? जरूर फर्क होगा ना। अभी तुम बच्चे भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार मनुष्य को देवता बनाने का कर्तव्य सीखते हो। कलियुगी मनुष्य को तुम सतयुगी देवता बनाते हो अर्थात् शान्तिधाम, ब्रह्माण्ड का और विश्व का मालिक बनाते हो, यह तो शान्तिधाम नहीं है ना। यहाँ तो कर्म जरूर करना पड़े। वह है स्वीट साइलेन्स होम। अभी तुम समझते हो हम आत्मायें स्वीट होम, ब्रह्माण्ड के मालिक हैं। वहाँ दु:ख-सुख से न्यारे रहते हैं। फिर सतयुग में विश्व के मालिक बनते हैं। अभी तुम बच्चे लायक बन रहे हो। एम ऑब्जेक्ट एक्यूरेट सामने खड़ी है। तुम बच्चे हो योगबल वाले। वह हैं बाहुबल वाले। तुम भी हो युद्ध के मैदान पर, परन्तु तुम हो डबल अहिंसक। वह है हिंसक। हिंसा काम कटारी को कहा जाता है। सन्यासी भी समझते हैं यह हिंसा है इसलिए पवित्र बनते हैं। परन्तु तुम्हारे सिवाए बाप के साथ प्रीत कोई की है नहीं। आशिक माशूक की प्रीत होती है ना। वह आशिक माशूक तो एक जन्म के गाये जाते हैं। तुम सभी हो मुझ माशूक के आशिक। भक्तिमार्ग में मुझ एक माशूक को याद करते आये हो। अब मैं कहता हूँ यह अन्तिम जन्म सिर्फ पवित्र बनो और यथार्थ रीति याद करो तो फिर याद करने से ही तुम छूट जायेंगे। सतयुग में याद करने की दरकार ही नहीं रहेगी। दु:ख में सिमरण सब करते हैं। यह है नर्क। इनको स्वर्ग तो नहीं कहेंगे ना। बड़े आदमी जो धनवान हैं वह समझते हैं हमारे लिए तो यहाँ ही स्वर्ग है। विमान आदि सब कुछ वैभव हैं, कितना अन्धश्रद्धा में रहते हैं। गाते भी हैं तुम मात पिता….. परन्तु समझते कुछ नहीं। कौन से सुख घनेरे मिले-यह कोई भी नहीं जानते हैं। बोलती तो आत्मा है ना। तुम आत्मायें समझती हो हमको सुख घनेरे मिलने हैं। उसका नाम ही है-स्वर्ग, सुखधाम। स्वर्ग सभी को बहुत मीठा भी लगता है। तुम अभी जानते हो स्वर्ग में हीरे जवाहरों के कितने महल थे। भक्ति मार्ग में भी कितना अनगिनत धन था, जो सोमनाथ का मन्दिर बनाया है। एक-एक चित्र लाखों की कीमत वाले थे। वह सब कहाँ चले गये? कितना लूटकर ले गये! मुसलमानों ने जाए मस्जिद आदि में लगाया, इतना अथाह धन था। अभी तुम बच्चों की बुद्धि में है हम बाप द्वारा फिर से स्वर्ग के मालिक बनते हैं। हमारे महल सोने के होंगे। दरवाजों पर भी जड़ित लगी हुई होगी। जैनियों के मन्दिर भी ऐसे बने हुए होते हैं। अब हीरे आदि तो नहीं हैं ना, जो पहले थे। अभी तुम जानते हो हम बाप से स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। शिवबाबा आते भी भारत में ही हैं। भारत को ही शिव भगवान से स्वर्ग का वर्सा मिलता है। क्रिश्चियन भी कहते हैं क्राइस्ट से 3 हज़ार वर्ष पहले भारत हेवन था। राज्य कौन करते थे? यह किसको पता नहीं है। बाकी यह समझते हैं भारत बहुत पुराना है। तो यही स्वर्ग था ना। बाप को कहते भी हैं हेविनली गॉड फादर अर्थात् हेवन स्थापन करने वाला फादर। जरूर फादर आये होंगे, तब तुम स्वर्ग के मालिक बने होंगे। हर 5 हज़ार वर्ष बाद स्वर्ग के मालिक बनते हो फिर आधाकल्प बाद रावण राज्य शुरू होता है। चित्रों में ऐसा क्लीयर कर दिखाओ जो लाखों वर्ष की बात बुद्धि से ही निकल जाए। लक्ष्मी-नारायण कोई एक नहीं, इन्हों की डिनायस्टी होगी ना फिर उन्हों के बच्चे राजा बनते होंगे। राजायें तो बहुत बनते हैं ना। सारी माला बनी हुई है। माला को ही सिमरण करते हैं ना। जो बाप के मददगार बन बाप की सर्विस करते हैं उन्हों की ही माला बनती है। जो पूरा चक्र में आते, पूज्य पुजारी बनते हैं उन्हों का यह यादगार है। तुम पूज्य से पुजारी बनते हो तो फिर अपनी माला को बैठ पूजते हो। पहले माला पर हाथ लगाकर फिर माथा टेकेंगे। पीछे माला को फेरना शुरू करते हैं। तुम भी सारा चक्र लगाते हो फिर शिवबाबा से वर्सा पाते हो। यह राज़ तुम ही जानते हो। मनुष्य तो कोई किसके नाम पर, कोई किसके नाम पर माला फेरते हैं। जानते कुछ भी नहीं। अभी तुमको माला का सारा ज्ञान है, और कोई को यह ज्ञान नहीं। क्रिश्चियन थोड़ेही समझते हैं कि यह किसकी माला फेरते हैं। यह माला है ही उन्हों की जो बाप के मददगार बन सर्विस करते हैं। इस समय सब पतित हैं, जो पावन थे वह सब यहाँ आते-आते अब पतित बने हैं, फिर नम्बरवार सब जायेंगे। नम्बरवार आते हैं, नम्बरवार जाते हैं। कितनी समझने की बातें हैं। यह झाड़ है। कितने टाल-टालियां मठ पंथ हैं। अभी यह सारा झाड़ खलास होना है, फिर तुम्हारा फाउन्डेशन लगेगा। तुम हो इस झाड़ के फाउन्डेशन। उसमें सूर्यवंशी चन्द्रवंशी दोनों हैं। सतयुग-त्रेता में जो राज्य करने वाले थे, उन्हों का अभी धर्म ही नहीं हैं, सिर्फ चित्र हैं। जिनके चित्र हैं उन्हों की बायोग्राफी को तो जानना चाहिए ना। कह देते फलानी चीज़ लाखों वर्ष पुरानी है। अब वास्तव में पुराने ते पुराना है आदि सनातन देवी-देवता धर्म। उनके आगे तो कोई चीज़ हो नहीं सकती। बाकी सब 2500 वर्ष की पुरानी चीजें होंगी, नीचे से खोदकर निकालते हैं ना। भक्ति मार्ग में जो पूजा करते हैं वह पुराने चित्र निकालते हैं क्योंकि अर्थक्वेक में सब मन्दिर आदि गिर पड़ते हैं फिर नये बनते हैं। हीरे सोने आदि की खानियां जो अभी खाली हो गई हैं वह फिर वहाँ भरतू हो जायेंगी। यह सब बातें अभी तुम्हारी बुद्धि में हैं ना। बाप ने वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाई है। सतयुग में कितने थोड़े मनुष्य होते हैं फिर वृद्धि को पाते हैं। आत्मायें सब परमधाम से आती रहती हैं। आते-आते झाड़ बढ़ता है। फिर जब झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाता है तो कहा जाता है राम गयो रावण गयो, जिनका बहु परिवार है। अनेक धर्म हैं ना। हमारा परिवार कितना छोटा है। यह सिर्फ ब्राह्मणों का ही परिवार है। वह कितने अनेक धर्म हैं, जनसंख्या बतलाते हैं ना। वह सब हैं रावण सम्प्रदाय। यह सब जायेंगे। बाकी थोड़े ही रहेंगे। रावण सम्प्रदाय फिर स्वर्ग में नहीं आयेंगे, सब मुक्तिधाम में ही रहेंगे। बाकी तुम जो पढ़ते हो वह नम्बरवार आयेंगे स्वर्ग में।

अभी तुम बच्चों ने समझा है कैसे वह निराकारी झाड़ है, यह मनुष्य सृष्टि का झाड़ है। यह तुम्हारी बुद्धि में है। पढ़ाई पर ध्यान नहीं देंगे तो इम्तहान में नापास हो जायेंगे। पढ़ते और पढ़ाते रहेंगे तो खुशी भी रहेगी। अगर विकार में गिरा तो बाकी यह सब भूल जायेगा। आत्मा जब पवित्र सोना हो तब उसमें धारणा अच्छी हो। सोने का बर्तन होता है पवित्र गोल्डन। अगर कोई पतित बना तो ज्ञान सुना नहीं सकता। अभी तुम सामने बैठे हो, जानते हो गॉड फादर शिवबाबा हम आत्माओं को पढ़ा रहे हैं। हम आत्मायें इन आरगन्स द्वारा सुन रही हैं। पढ़ाने वाला बाप है, ऐसी पाठशाला सारी दुनिया में कहाँ होगी। वह गॉड फादर है, टीचर भी है, सतगुरू भी है, सबको वापिस ले जायेंगे। अभी तुम बाप के सम्मुख बैठे हो। सम्मुख मुरली सुनने में कितना फ़र्क है। जैसे यह टेप मशीन निकली है, सबके पास एक दिन आ जायेगी। बच्चों के सुख के लिए बाप ऐसी चीज़ें बनवाते हैं। कोई बड़ी बात नहीं है ना। यह सांवल शाह है ना। पहले गोरा था, अभी सांवरा बना है तब तो श्याम सुन्दर कहते हैं। तुम जानते हो हम सुन्दर थे, अब श्याम बने हैं फिर सुन्दर बनेंगे। सिर्फ एक क्यों बनेगा? एक को सर्प ने डसा क्या? सर्प तो माया को कहा जाता है ना। विकार में जाने से सांवरा बन जाते हैं। कितनी समझने की बातें हैं। बेहद का बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते यह अन्तिम जन्म फार माई सेक (मेरे सदके) पवित्र बनो। बच्चों से यह भीख मांगते हैं। कमल फूल समान पवित्र बनो और मुझे याद करो तो यह जन्म भी पवित्र बनेंगे और याद में रहने से पास्ट के विकर्म भी विनाश होंगे। यह है योग अग्नि, जिससे जन्म-जन्मान्तर के पाप दग्ध होते हैं। सतोप्रधान से सतो, रजो, तमो में आते हैं तो कला कम हो जाती है। खाद पड़ती जाती है। अब बाप कहते हैं सिर्फ मामेकम् याद करो। बाकी पानी की नदियों में स्नान करने से थोड़ेही पावन बनेंगे। पानी भी तत्व है ना। 5 तत्व कहे जाते हैं। यह नदियाँ कैसे पतित-पावनी हो सकती हैं। नदियाँ तो सागर से निकलती हैं। पहले तो सागर पतित-पावन होना चाहिए ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) विजय माला में आने के लिए बाप का मददगार बन सर्विस करनी है। एक माशूक के साथ सच्ची प्रीत रखनी है। एक को ही याद करना है।

2) अपनी एक्यूरेट एम ऑबजेक्ट को सामने रख पूरा पुरूषार्थ करना है। डबल अहिंसक बन मनुष्य को देवता बनाने का श्रेष्ठ कर्तव्य करते रहना है।

वरदान:-मैं पन के भान को मिटाने वाले ब्रह्मा बाप समान श्रेष्ठ त्यागी भव
सम्बन्ध का त्याग, वैभवों का त्याग कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन हर कार्य में, संकल्प में भी औरों को आगे रखने की भावना रखना अर्थात् अपने पन को मिटा देना, पहले आप करना…यह है श्रेष्ठ त्याग। इसे ही कहा जाता स्वयं के भान को मिटा देना। जैसे ब्रह्मा बाप ने सदा बच्चों को आगे रखा। “मैं आगे रहूं” इसमें भी सदा त्यागी रहे, इसी त्याग के कारण सबसे आगे अर्थात् नम्बरवन में जाने का फल मिला। तो फालो फादर।
स्लोगन:-फट से किसी का नुक्स निकाल देना-यह भी दु:ख देना है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 20 FEBRUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 20 February 2020

20-02-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम खुदाई खिदमतगार सच्चे सैलवेशन आर्मी हो, तुम्हें सबको शान्ति की सैलवेशन देनी है”
प्रश्नः-तुम बच्चों से जब कोई शान्ति की सैलवेशन मांगते हैं तो उन्हें क्या समझाना चाहिए?
उत्तर:-उन्हें बोलो – बाप कहते हैं क्या अभी यहाँ ही तुमको शान्ति चाहिए। यह कोई शान्तिधाम नहीं है। शान्ति तो शान्तिधाम में ही हो सकती है, जिसको मूलवतन कहा जाता है। आत्मा को जब शरीर नहीं है तब शान्ति है। सतयुग में पवित्रता-सुख-शान्ति सब है। बाप ही आकर यह वर्सा देते हैं। तुम बाप को याद करो।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। सब मनुष्य मात्र यह जानते हैं कि मेरे अन्दर आत्मा है। जीव आत्मा कहते हैं ना। पहले हम आत्मा हैं, पीछे शरीर मिलता है। कोई ने भी अपनी आत्मा को देखा नहीं है। सिर्फ इतना समझते हैं कि आत्मा है। जैसे आत्मा को जानते हैं, देखा नहीं है, वैसे परमपिता परमात्मा के लिए भी कहते हैं परम आत्मा माना परमात्मा, परन्तु उनको देखा नहीं है। न अपने को, न बाप को देखा है। कहते हैं कि आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। परन्तु यथार्थ रीति नहीं जानते। 84 लाख योनियां भी कह देते हैं, वास्तव में 84 जन्म हैं। परन्तु यह भी नहीं जानते कि कौन-सी आत्मायें कितने जन्म लेती हैं? आत्मा बाप को पुकारती है परन्तु न देखा है, न यथार्थ रीति जानती है। पहले तो आत्मा को यथार्थ रीति जानते तब बाप को जानते। अपने को ही नहीं जानते तो समझाये कौन? इसको कहा जाता है-सेल्फ रियलाइज करना। सो बाप बिगर तो कोई करा न सके। आत्मा क्या है, कैसी है, कहाँ से आत्मा आती है, कैसे जन्म लेती है, कैसे इतनी छोटी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है, यह कोई भी नहीं जानते। अपने को नहीं जानते तो बाप को भी नहीं जानते। यह लक्ष्मी-नारायण भी मनुष्य का मर्तबा है ना। इन्होंने यह मर्तबा कैसे पाया? यह कोई भी नहीं जानते। जानना तो मनुष्य को ही चाहिए ना। कहते हैं यह वैकुण्ठ के मालिक थे परन्तु उन्होंने यह मालिकपना लिया कैसे, फिर कहाँ गये? कुछ भी नहीं जानते। अब तुम तो सब कुछ जानते हो। आगे कुछ भी नहीं जानते थे। जैसे बच्चा पहले जानता है क्या कि बैरिस्टर क्या होता? पढ़ते-पढ़ते बैरिस्टर बन जाता है। तो यह लक्ष्मी-नारायण भी पढ़ाई से बने हैं। बैरिस्टरी, डॉक्टरी आदि सबके किताब होते हैं ना। इनका किताब फिर है गीता। वह भी किसने सुनाई? राजयोग किसने सिखाया? यह कोई नहीं जानते। उसमें नाम बदल लिया है। शिव जयन्ती भी मनाते हैं, वही आकर तुमको कृष्णपुरी का मालिक बनाते हैं। कृष्ण स्वर्ग का मालिक था ना परन्तु स्वर्ग को भी जानते नहीं। नहीं तो क्यों कहते कि कृष्ण ने द्वापर में गीता सुनाई। कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं, लक्ष्मी-नारायण को सतयुग में, राम को त्रेता में। उपद्रव लक्ष्मी-नारायण के राज्य में नहीं दिखाते। कृष्ण के राज्य में कंस, राम के राज्य में रावण आदि दिखाये हैं। यह किसको पता नहीं कि राधे-कृष्ण ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। बिल्कुल ही अज्ञान अन्धियारा है। अज्ञान को अन्धियारा कहा जाता है। ज्ञान को रोशनी कहा जाता है। अब सोझरा करने वाला कौन? वह है बाप। ज्ञान को दिन, भक्ति को रात कहा जाता है। अभी तुम समझते हो यह भक्ति मार्ग भी जन्म-जन्मान्तर चलता आया है। सीढ़ी उतरते आये हैं। कला कम होती जाती है। मकान नया बनता है फिर दिन-प्रतिदिन आयु कम होती जायेगी। 3/4 पुराना हुआ तो उनको पुराना ही कहेंगे। बच्चों को पहले तो यह निश्चय चाहिए कि यह सर्व का बाप है, जो ही सर्व की सद्गति करते हैं, सर्व के लिए पढ़ाई भी पढ़ाते हैं। सर्व को मुक्तिधाम ले जाते हैं। तुम्हारे पास एम ऑब्जेक्ट है। तुम यह पढ़ाई पढ़कर जाए अपनी गद्दी पर बैठेंगे। बाकी सबको मुक्तिधाम में ले जायेंगे। चक्र पर जब समझाते हो तो उसमें दिखाते हो कि सतयुग में यह अनेक धर्म हैं नहीं। उस समय वह आत्मायें निराकारी दुनिया में रहती हैं। यह तो तुम जानते हो कि यह आकाश पोलार है। वायु को वायु कहेंगे, आकाश को आकाश। ऐसे नहीं कि सब परमात्मा हैं। मनुष्य समझते हैं कि वायु में भी भगवान है, आकाश में भी भगवान है। अब बाप बैठ सब बातें समझाते हैं। बाप के पास जन्म तो लिया फिर पढ़ाते कौन हैं? बाप ही रूहानी टीचर बन पढ़ाते हैं। अच्छा पढ़कर पूरा करेंगे तो फिर साथ ले जायेंगे फिर तुम आयेंगे पार्ट बजाने। सतयुग में पहले-पहले तुम ही आये थे। अब फिर सब जन्मों के अन्त में आकर पहुँचे हो, फिर पहले आयेंगे। अब बाप कहते हैं दौड़ी लगाओ। अच्छी रीति बाप को याद करो, औरों को भी पढ़ाना है। नहीं तो इतने सबको पढ़ाये कौन? बाप का जरूर मददगार बनेंगे ना। खुदाई खिदमतगार भी नाम है ना। अंग्रेजी में कहते हैं सैलवेशन आर्मी। कौन-सी सैलवेशन चाहिए? सब कहते हैं शान्ति की सैलवेशन चाहिए। बाकी वह कोई शान्ति की सैलवेशन थोड़ेही देते हैं। जो शान्ति की सैलवेशन मांगते हैं उन्हें बोलो-बाप कहते हैं क्या अभी यहाँ ही तुमको शान्ति चाहिए? यह कोई शान्तिधाम थोड़ेही है। शान्ति तो शान्तिधाम में ही हो सकती है, जिसको मूलवतन कहा जाता है। आत्मा को शरीर नहीं है तो शान्ति में है। बाप ही आकर यह वर्सा देते हैं। तुम्हारे में भी समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। प्रदर्शनी में अगर हम खड़े होकर सबका सुनें तो बहुतों की भूलें निकालें क्योंकि समझाने वाले नम्बरवार तो हैं ना। सब एकरस होते तो ब्राह्मणी ऐसे क्यों लिखती कि फलाने आकर भाषण करें। अरे, तुम भी ब्राह्मण हो ना। बाबा फलाने हमारे से होशियार हैं। होशियारी से ही मनुष्य दर्जा पाते हैं ना। नम्बरवार तो हैं ना। जब इम्तहान की रिजल्ट निकलेगी तो फिर तुमको आपेही साक्षात्कार होगा फिर समझेंगे हम तो श्रीमत पर नहीं चलते। बाप कहते हैं कोई भी विकर्म मत करो। देहधारी से लागत नहीं रखो। यह तो 5 तत्वों का बना हुआ शरीर है ना। 5 तत्वों की थोड़ेही पूजा करनी है वा याद करना है। भल इन आंखों से देखो परन्तु याद बाप को करना है। आत्मा को अब नॉलेज मिली है। अब हमको घर जाना है फिर वैकुण्ठ में आयेंगे। आत्मा को समझ सकते हैं, देख नहीं सकते, वैसे यह भी समझ सकते हैं। हाँ दिव्य दृष्टि से अपना घर वा स्वर्ग देख सकते हैं। बाप कहते हैं-बच्चे, मनमनाभव, मध्याजी भव माना बाप को और विष्णुपुरी को याद करो। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही यह है। बच्चे जानते हैं हमको अभी स्वर्ग में जाना है, बाकी सबको मुक्ति में जाना है। सब तो सतयुग में आ नहीं सकते। तुम्हारा है डिटीज्म। यह हो गया मनुष्य का धर्म। मूलवतन में तो मनुष्य नहीं हैं ना। यहाँ है मनुष्य सृष्टि। मनुष्य ही तमोप्रधान और फिर सतोप्रधान बनते हैं। तुम पहले शूद्र वर्ण में थे, अभी ब्राह्मण वर्ण में हो। यह वर्ण सिर्फ भारतवासियों के हैं। और कोई भी धर्म को ऐसे नहीं कहेंगे-ब्राह्मण वंशी, सूर्यवंशी। इस समय सब शूद्र वर्ण के हैं। जड़जड़ीभूत अवस्था को पाये हुए हैं। तुम पुराने बने तो सारा झाड़ जड़जड़ीभूत तमोप्रधान बना है फिर सारा झाड़ थोड़ेही सतोप्रधान बन जायेगा। सतोप्रधान नये झाड़ में तो सिर्फ देवी-देवता धर्म वाले ही हैं फिर तुम सूर्यवंशी से चन्द्रवंशी बन जाते हो। पुनर्जन्म तो लेते हो ना। फिर वैश्य, शूद्र वंशी…… यह सब बातें हैं नई।

हमको पढ़ाने वाला ज्ञान का सागर है। वही पतित-पावन सर्व का सद्गति दाता है। बाप कहते हैं तुमको ज्ञान मैं देता हूँ। तुम देवी-देवता बन जाते हो फिर यह ज्ञान रहता नहीं। ज्ञान दिया जाता है अज्ञानियों को। सभी मनुष्य अज्ञान अन्धियारे में है, तुम हो सोझरे में। इनके 84 जन्मों की कहानी तुम जानते हो। तुम बच्चों को सारा ज्ञान है। मनुष्य तो कहते भगवान ने यह सृष्टि रची ही क्यों। क्या मोक्ष नहीं मिल सकता! अरे, यह तो बना-बनाया खेल है। अनादि ड्रामा है ना। तुम जानते हो आत्मा एक शरीर छोड़ जाकर दूसरा लेती है, इसमें चिंता करने की दरकार ही क्या? आत्मा ने जाकर अपना दूसरा पार्ट बजाया। रोयें तब जब वापिस चीज़ मिलनी हो। वापिस तो आती नहीं फिर रोने से क्या फायदा। अभी तुम सबको मोहजीत बनना है। कब्रिस्तान से मोह क्या रखना है! इसमें तो दु:ख ही दु:ख है। आज बच्चा है, कल बच्चा भी ऐसा बन जाता जो बाप की पाग उतारने में भी देरी न करे। बाप से भी लड़ पड़ते हैं। इसको कहा ही जाता है निधन की दुनिया। कोई धनी-धोणी है नहीं जो शिक्षा दे। बाप जब ऐसी हालत देखते हैं तो धणका बनाने आते हैं। बाप ही आकर सबको धणका बनाते हैं। धणी आकर सब झगड़े मिटा देते हैं। सतयुग में कोई झगड़ा होता नहीं। सारी दुनिया के झगड़े मिटा देते, फिर जयजयकार हो जाती है। यहाँ मैजारिटी माताओं की है। दासी भी इनको समझते हैं। हथियाला बांधते समय कहते हैं, तुम्हारा पति ही ईश्वर गुरू आदि सब कुछ है। पहले मिस्टर फिर मिसेज। अब बाप आकर माताओं को आगे रखते हैं। तुम्हारे ऊपर कोई जीत पा न सके। तुमको बाप सब कायदे सिखला रहे हैं। मोहजीत राजा की एक कथा है। वह सब बनाई हुई कहानियाँ हैं। सतयुग में तो अकाले मृत्यु होती ही नहीं। समय पर एक शरीर छोड़ दूसरा ले लेते हैं। साक्षात्कार होता है-अब यह शरीर बूढ़ा हुआ है फिर नया लेना है, छोटा बच्चा जाकर बनना है। खुशी से शरीर छोड़ देते हैं। यहाँ तो भल कितने भी बूढ़े होंगे, रोगी होंगे और समझेंगे भी कि कहाँ यह शरीर छूट जाए तो अच्छा है फिर भी मरने के समय रोयेंगे जरूर। बाप कहते हैं अभी तुम ऐसी जगह चलते हो जहाँ रोने का नाम नहीं। वहाँ तो खुशी ही खुशी रहती है। तुमको कितनी अपार बेहद की खुशी रहनी चाहिए। अरे, हम विश्व के मालिक बनते हैं! भारत सारे विश्व का मालिक था। अभी टुकड़ा-टुकड़ा हो गया है। तुम ही पूज्य देवता थे फिर पुजारी बनते हो। भगवान थोड़ेही आपेही पूज्य, आपेही पुजारी बनेंगे। अगर वह भी पुजारी बनें तो फिर पूज्य कौन बनाये? ड्रामा में बाप का पार्ट ही अलग है। ज्ञान का सागर एक है, उस एक की ही महिमा है जबकि ज्ञान का सागर है तो कब आकर ज्ञान देवे, जो सद्गति हो। जरूर यहाँ आना पड़े। पहले तो बुद्धि में यह बिठाओ कि हमको पढ़ाने वाला कौन है?

त्रिमूर्ति, गोला और झाड़ – यह हैं मुख्य चित्र। झाड़ को देखने से झट समझ जायेंगे हम तो फलाने धर्म के हैं। हम सतयुग में आ नहीं सकते। यह चक्र तो बहुत बड़ा होना चाहिए। लिखत भी पूरी हो। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा देवता धर्म यानी नई दुनिया की स्थापना कर रहे हैं, शंकर द्वारा पुरानी दुनिया का विनाश फिर विष्णु द्वारा नई दुनिया की पालना कराते हैं, यह सिद्ध हो जाए। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा, दोनों का कनेक्शन है ना। ब्रह्मा-सरस्वती सो फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। चढ़ती कला एक जन्म में होती है फिर उतरती कला में 84 जन्म लगते हैं। अब बाप कहते हैं वह शास्त्र आदि राइट हैं वा मैं राइट हूँ? सच्ची सत्य नारायण की कथा तो मैं सुनाता हूँ। अभी तुमको निश्चय है कि सत्य बाप द्वारा हम नर से नारायण बन रहे हैं। पहली मुख्य यह भी एक बात है कि मनुष्य को कभी बाप, टीचर, गुरू नहीं कहा जाता। गुरू को कभी बाबा वा टीचर कहेंगे क्या? यहाँ तो शिवबाबा के पास जन्म लेते हो फिर शिवबाबा तुमको पढ़ाते हैं फिर साथ भी ले जायेंगे। मनुष्य तो ऐसा कोई होता नहीं, जिसको बाप, टीचर, गुरू कहा जाए। यह तो एक ही बाप है, उनको कहा जाता है सुप्रीम फादर। लौकिक बाप को कभी सुप्रीम फादर नहीं कहेंगे। सब याद फिर भी उनको करते हैं। वह बाप तो है ही। दु:ख में सब उनको याद करते हैं, सुख में कोई नहीं करते। तो वह बाप ही आकर स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. 5 तत्वों के बने हुए इन शरीरों को देखते हुए याद बाप को करना है। कोई भी देहधारी से लागत (लगाव) नहीं रखना है। कोई विकर्म नहीं करना है।

2. इस बने-बनाये ड्रामा में हर आत्मा का अनादि पार्ट है, आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है, इसलिए शरीर छोड़ने पर चिंता नहीं करनी है, मोहजीत बनना है।

वरदान:-बाह्यमुखी चतुराई से मुक्त रहने वाले बाप पसन्द सच्चे सौदागर भव
बापदादा को दुनिया की बाह्यमुखी चतुराई पसन्द नहीं। कहा जाता है भोलों का भगवान। चतुर सुजान को भोले बच्चे ही पसन्द हैं। परमात्म डायरेक्टरी में भोले बच्चे ही विशेष वी.आई.पी.हैं। जिनमें दुनिया वालों की आंख नहीं जाती-वही बाप से सौदा करके परमात्म नयनों के सितारे बन गये। भोले बच्चे ही दिल से कहते “मेरा बाबा”, इसी एक सेकण्ड के एक बोल से अनगिनत खजाने का सौदा करने वाले सच्चे सौदागर बन गये।
स्लोगन:-सर्व का स्नेह प्राप्त करना है तो मुख से सदा मीठे बोल बोलो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 19 FEBRUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 19 February 2020

19-02-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हें चलते फिरते याद में रहने का अभ्यास करना है। ज्ञान और योग यही मुख्य दो चीजें हैं, योग माना याद”
प्रश्नः-अक्लमंद (होशियार) बच्चे कौन से बोल मुख से नहीं बोलेंगे?
उत्तर:-हमें योग सिखलाओ, यह बोल अक्लमंद बच्चे नहीं बोलेंगे। बाप को याद करना सीखना होता है क्या! यह पाठशाला है पढ़ने पढ़ाने के लिए। ऐसे नहीं, याद करने के लिए कोई खास बैठना है। तुम्हें कर्म करते बाप को याद करने का अभ्यास करना है।

ओम् शान्ति। अब रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। बच्चे जानते हैं रूहानी बाप इस रथ द्वारा हमको समझा रहे हैं। अब जबकि बच्चे हैं तो बाप को वा किसी बहन वा भाई को कहना कि मुझे बाबा को याद करना सिखलाओ, यह रांग हो जाता है। तुम कोई छोटी बच्चियां तो नहीं हो ना। यह तो जानते हो मुख्य है रूह। वह तो है अविनाशी। शरीर है विनाशी। बड़ा तो रूह हुआ ना। अज्ञानकाल में यह ज्ञान किसको नहीं रहता है कि हम आत्मा हैं, शरीर द्वारा बोलते हैं। देह-अभिमान में आकर ही बोलते हैं-मैं यह करता हूँ। अभी तुम देही-अभिमानी बने हो। जानते हो आत्मा कहती है मैं इस शरीर द्वारा बोलती हूँ, कर्म करती हूँ। आत्मा मेल है। बाप समझाते हैं-यह बोल बहुत करके सुने जाते हैं, कहते हैं हमको योग में बिठाओ। सामने एक बैठते हैं, इस ख्याल से कि हम भी बाबा की याद में बैठें, यह भी बैठें। अब पाठशाला कोई इसके लिए नहीं है। पाठशाला तो पढ़ाई के लिए है। बाकी ऐसे नहीं, यहाँ बैठकर सिर्फ तुम्हें याद करना है। बाप ने तो समझाया है चलते फिरते, उठते बैठते बाप को याद करो, इसके लिए खास बैठने की भी दरकार नहीं। जैसे कोई कहते हैं राम-राम कहो, क्या बिगर राम-राम कहे याद नहीं कर सकते हैं? याद तो चलते फिरते कर सकते हैं। तुमको तो कर्म करते बाप को याद करना है। आशिक माशूक कोई खास बैठकर एक-दो को याद नहीं करते हैं। काम काज धन्धा आदि सब करना है, सब कुछ करते अपने माशूक को याद करते रहो। ऐसे नहीं कि उनको याद करने के लिए खास कहाँ जाकर बैठना है।

तुम बच्चे गीत वा कवितायें आदि सुनाते हो, तो बाबा कह देते हैं यह भक्ति मार्ग के हैं। कहते भी हैं शान्ति देवा, सो तो परमात्मा को ही याद करते हैं, न कि कृष्ण को। ड्रामा अनुसार आत्मा अशान्त हो पड़ी है तो बाप को पुकारती है क्योंकि शान्ति, सुख, ज्ञान का सागर वह है। ज्ञान और योग मुख्य दो चीज़ें हैं, योग माना याद। उन्हों का हठयोग बिल्कुल ही अलग है। तुम्हारा है राजयोग। बाप को सिर्फ याद करना है। बाप द्वारा तुम बाप को जानने से सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जान गये हो। तुमको सबसे बड़ी खुशी तो यह है कि हमको भगवान पढ़ाते हैं। भगवान का भी पहले-पहले पूरा परिचय होना चाहिए। ऐसा तो कभी नहीं जाना कि जैसे आत्मा स्टॉर है, वैसे भगवान भी स्टॉर है। वह भी आत्मा है। परन्तु उनको परम आत्मा, सुप्रीम सोल कहा जाता है। वह कभी पुनर्जन्म तो लेते नहीं हैं। ऐसे नहीं कि वह जन्म मरण में आते हैं। नहीं, पुनर्जन्म नहीं लेते हैं। खुद आकर समझाते हैं मैं कैसे आता हूँ? त्रिमूर्ति का गायन भी भारत में है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा-विष्णु-शंकर का चित्र भी दिखाते हैं। शिव परमात्माए नम: कहते हैं ना। उस ऊंच ते ऊंच बाप को भूल गये हैं, सिर्फ त्रिमूर्ति का चित्र दे दिया है। ऊपर में शिव तो जरूर होना चाहिए, जिससे यह समझें कि इनका रचयिता शिव है। रचना से कभी वर्सा नहीं मिल सकता है। तुम जानते हो ब्रह्मा से कुछ भी वर्सा नहीं मिलता। विष्णु को तो हीरे जवाहरों का ताज है ना। शिवबाबा द्वारा फिर पेनी से पाउण्ड बने हैं। शिव का चित्र न होने से सारा खण्डन हो जाता है। ऊंच ते ऊंच है परमपिता परमात्मा, उनकी यह रचना है। अभी तुम बच्चों को बाप से स्वर्ग का वर्सा मिलता है, 21 जन्मों के लिए। भल वहाँ फिर भी समझते हैं लौकिक बाप से वर्सा मिला है। वहाँ यह पता नहीं कि यह बेहद के बाप से पाई हुई प्रालब्ध है। यह तुमको अभी पता है। अभी की कमाई वहाँ 21 जन्म चलती है। वहाँ यह मालूम नहीं रहता है, इस ज्ञान का बिल्कुल पता नहीं रहता। यह ज्ञान न देवताओं में है, न शूद्रों में रहता है। यह ज्ञान है ही तुम ब्राह्मणों में। यह है रूहानी ज्ञान, स्प्रीचुअल का अर्थ भी नहीं जानते हैं। डॉक्टर आफ फिलॉसाफी कहते हैं। डाक्टर आफ स्प्रीचुअल नॉलेज एक ही बाप है। बाप को सर्जन भी कहा जाता है ना। साधू सन्यासी आदि कोई सर्जन थोड़ेही हैं। वेद शास्त्र आदि पढ़ने वालों को डॉक्टर थोड़ेही कहेंगे। भल टाइटल भी दे देते हैं परन्तु वास्तव में रूहानी सर्जन है एक बाप, जो रूह को इन्जेक्शन लगाते हैं। वह है भक्ति। उनको कहना चाहिए डाक्टर आफ भक्ति अथवा शास्त्रों का ज्ञान देते हैं। उनसे फायदा कुछ भी नहीं होता, नीचे गिरते ही जाते हैं। तो उनको डॉक्टर कैसे कहेंगे? डॉक्टर तो फायदा पहुँचाते हैं ना। यह बाप तो है अविनाशी ज्ञान सर्जन। योगबल से तुम एवरहेल्दी बनते हो। यह तो तुम बच्चे ही जानते हो। बाहर वाले क्या जानें। उनको अविनाशी सर्जन कहा जाता है। आत्माओं में जो विकारों की खाद पड़ी है, उसे निकालना, पतित को पावन बनाकर सद्गति देना-यह बाप में शक्ति है। ऑलमाइटी पतित-पावन एक फादर है। ऑलमाइटी कोई मनुष्य को नहीं कह सकते हैं। तो बाप कौन-सी शक्ति दिखाते हैं? सर्व को अपनी शक्ति से सद्गति दे देते हैं। उनको कहेंगे डॉक्टर ऑफ स्प्रीचुअल नॉलेज। डॉक्टर आफ फिलॉसाफी-यह तो ढेर के ढेर मनुष्य हैं। स्प्रीचुअल डॉक्टर एक है। तो अब बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो और पवित्र बनो। मैं आया ही हूँ पवित्र दुनिया स्थापन करने, फिर तुम पतित क्यों बनते हो? पावन बनो, पतित मत बनो। सभी आत्माओं को बाप का डायरेक्शन है-गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र रहो। बाल ब्रह्मचारी बनो तो फिर पवित्र दुनिया के मालिक बन जायेंगे। इतने जन्म जो पाप किये हैं, अब मुझे याद करने से पाप भस्म हो जायेंगे। मूलवतन में पवित्र आत्मायें ही रहती हैं। पतित कोई जा नहीं सकते हैं। बुद्धि में यह तो याद रखना ही है-बाबा हमको पढ़ाते हैं। स्टूडेन्ट ऐसे कहेंगे क्या कि हमको टीचर की याद सिखलाओ। याद सिखलाने की क्या दरकार है। यहाँ (संदली पर) कोई न बैठे तो भी हर्जा नहीं है। अपने बाप को याद करना है। तुम सारा दिन धन्धे धोरी आदि में रहते हो तो भूल जाते हो, इसलिए यहाँ बिठाया जाता है। यह 10-15 मिनट भी याद करें। तुम बच्चों को तो काम काज़ करते याद में रहने की आदत डालनी है। आधाकल्प बाद माशूक मिलता है। अब कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारी आत्मा से खाद निकल जायेगी और तुम विश्व के मालिक बन जायेंगे। तो क्यों नहीं याद करना चाहिए। स्त्री का जब हथियाला बांधते हैं तो उनको कहते हैं पति तुम्हारा गुरू ईश्वर सब कुछ है। परन्तु वह तो फिर भी मित्र, सम्बन्धी, गुरू आदि बहुतों को याद करती है। वह तो देहधारी की याद हो गई। यह तो पतियों का पति है, उनको याद करना है। कोई कहते हैं हमको नेष्ठा में बिठाओ। परन्तु इससे क्या होगा। 10 मिनट यहाँ बैठते हैं तो भी ऐसे मत समझो कि कोई एकरस हो बैठते हैं। भक्ति मार्ग में किसकी पूजा करने बैठते हैं तो बुद्धि बहुत भटकती रहती है। नौधा भक्ति करने वालों को यही तात लगी रहती है कि हमको साक्षात्कार हो। वह आश लगाकर बैठे रहते हैं। एक की लगन में लवलीन हो जाते हैं, तब साक्षात्कार होता है। उनको कहा जाता है नौंधा भक्त। वह भक्ति ऐसी है जैसे आशिक-माशूक। खाते पीते बुद्धि में याद रहती है। उनमें विकार की बात नहीं होती, शरीर पर प्यार हो जाता है। एक-दो को देखने बिगर रह नहीं सकते।

अब तुम बच्चों को बाप ने समझाया है – मुझे याद करने से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। कैसे तुमने 84 जन्म लिए हैं। बीज को याद करने से सारा झाड़ याद आ जाता है। यह वैराइटी धर्मों का झाड़ है ना। यह सिर्फ तुम्हारी बुद्धि में ही है कि भारत गोल्डन एज में था, अब आइरन एज में है। यह अंग्रेजी अक्षर अच्छे हैं, इनका अर्थ अच्छा निकलता है। आत्मा सच्चा सोना होती है फिर उनमें खाद पड़ती है। अभी बिल्कुल झूठी हो गई है, इनको कहा जाता है आइरन एजेड। आत्मायें आइरन एजेड होने से जेवर भी ऐसा हो गया है। अभी बाप कहते हैं मैं पतित-पावन हूँ, मामेकम् याद करो। तुम मुझे बुलाते हो हे पतित-पावन आओ। मैं कल्प-कल्प आकर तुमको यह युक्ति बतलाता हूँ। मन्मनाभव, मध्याजी भव अर्थात् स्वर्ग के मालिक बनो। कोई कहते हैं हमको योग में बहुत मजा आता है, ज्ञान में इतना मजा नहीं। बस, योग करके यह भागेंगे। योग ही अच्छा लगता है, कहते हैं हमको तो शान्ति चाहिए। अच्छा, बाप को तो कहाँ भी बैठ याद करो। याद करते-करते तुम शान्तिधाम में चले जायेंगे। इसमें योग सिखलाने की बात ही नहीं है। बाप को याद करना है। ऐसे बहुत हैं जो सेन्टर्स पर जाकर आधा पौना घण्टा बैठते हैं, कहते हैं हमको नेष्ठा कराओ या तो कहेंगे बाबा ने प्रोग्राम दिया है नेष्ठा का। यहाँ बाबा कहते हैं चलते फिरते याद में रहो। ना से तो बैठना अच्छा है। बाबा मना नहीं करते हैं, भल सारी रात बैठो, परन्तु ऐसी आदत थोड़ेही डालनी है कि बस रात को ही याद करना है। आदत यह डालनी है कि काम काज़ करते याद करना है। इसमें बड़ी मेहनत है। बुद्धि घड़ी-घड़ी और तरफ भाग जाती है। भक्ति मार्ग में भी बुद्धि भाग जाती है फिर अपने को चुटकी काटते हैं। सच्चे भक्त जो होते हैं उनकी बात करते हैं। तो यहाँ भी अपने साथ ऐसी-ऐसी बातें करनी चाहिए। बाबा को क्यों नहीं याद किया? याद नहीं करेंगे तो विश्व के मालिक कैसे बनेंगे? आशिक-माशूक तो नाम-रूप में फंसे रहते हैं। यहाँ तो तुम अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते हो। हम आत्मा इस शरीर से अलग हैं। शरीर में आने से कर्म करना होता है। बहुत ऐसे भी हैं जो कहते हैं हम दीदार करें। अब दीदार क्या करेंगे। वह तो बिन्दी है ना। अच्छा, कोई कहते हैं कृष्ण का दीदार करें। कृष्ण का तो चित्र भी है ना। जो जड़ है सो फिर चैतन्य में देखेंगे इससे फायदा क्या हुआ? साक्षात्कार से थोड़ेही फायदा होगा। तुम बाप को याद करो तो आत्मा पवित्र हो। नारायण का साक्षात्कार होने से नारायण थोड़ेही बन जायेंगे।

तुम जानते हो हमारी एम ऑब्जेक्ट है ही लक्ष्मी-नारायण बनने की परन्तु पढ़ने बिगर थोड़ेही बनेंगे। पढ़कर होशियार बनो, प्रजा भी बनाओ तब लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। मेहनत है। पास विद् ऑनर होना चाहिए जो धर्मराज की सजा न मिले। यह मुरब्बी बच्चा भी साथ है, यह भी कहते हैं तुम तीखे जा सकते हो। बाबा के ऊपर तो कितना बोझा है। सारा दिन कितने ख्यालात करने पड़ते हैं। हम इतना याद नहीं कर सकते हैं। भोजन पर थोड़ी याद रहती फिर भूल जाते हैं। समझता हूँ बाबा और हम दोनों सैर करते हैं। सैर करते-करते बाबा को भूल जाता हूँ। खिसकनी वस्तु है ना। घड़ी-घड़ी याद खिसक जाती है। इसमें बहुत मेहनत है। याद से ही आत्मा पवित्र होनी है। बहुतों को पढ़ायेंगे तो ऊंच पद पायेंगे। जो अच्छा समझते हैं वह अच्छा पद पायेंगे। प्रदर्शनी में कितनी प्रजा बनती है। तुम एक-एक लाखों की सेवा करेंगे और फिर अपनी भी अवस्था ऐसी चाहिए। कर्मातीत अवस्था हो जायेगी फिर शरीर नहीं रहेगा। आगे चल तुम समझेंगे अब लड़ाई जोर हो जायेगी फिर ढेर तुम्हारे पास आते रहेंगे। महिमा बढ़ती जायेगी। अन्त में सन्यासी भी आयेंगे, बाप को याद करने लग पड़ेंगे। उनका पार्ट ही मुक्तिधाम में जाने का है। नॉलेज तो लेंगे नहीं। तुम्हारा मैसेज सभी आत्माओं तक पहुँचना है, अखबारों द्वारा बहुत सुनेंगे। कितने गांव हैं, सबको पैगाम देना है। मैसेन्जर पैगम्बर तुम ही हो। पतित से पावन बनाने वाला और कोई है नहीं, सिवाए बाप के। ऐसे नहीं कि धर्म स्थापक किसको पावन बनाते हैं। उनका धर्म तो वृद्धि को पाना है, वह वापिस जाने का रास्ता कैसे बतायेंगे? सर्व का सद्गति दाता एक है। तुम बच्चों को अब पवित्र जरूर बनना है। बहुत हैं जो पवित्र नहीं रहते हैं। काम महाशत्रु है ना। अच्छे-अच्छे बच्चे गिर पड़ते हैं, कुदृष्टि भी काम का ही अंश है। यह बड़ा शैतान है। बाप कहते हैं इस पर जीत पहनो तो जगतजीत बन जायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) काम-काज करते याद में रहने की आदत डालनी है। बाप के साथ जाने वा पावन नई दुनिया का मालिक बनने के लिए पवित्र जरूर बनना है।

2) ऊंच पद पाने के लिए बहुतों की सेवा करनी हैं। बहुतों को पढ़ाना है। मैसेन्जर बन यह मैसेज सभी तक पहुँचाना है।

वरदान:-मेरेपन के सूक्ष्म स्वरूप का भी त्याग करने वाले सदा निर्भय, बेफिकर बादशाह भव
आज की दुनिया में धन भी है और भय भी है। जितना धन उतना ही भय में ही खाते, भय में ही सोते हैं। जहाँ मेरापन है वहाँ भय जरूर होगा। कोई सोना हिरण भी अगर मेरा है तो भय है। लेकिन यदि मेरा एक शिवबाबा है तो निर्भय बन जायेंगे। तो सूक्ष्म रूप से भी मेरे-मेरे को चेक करके उसका त्याग करो तो निर्भय, बेफिकर बादशाह रहने का वरदान मिल जायेगा।
स्लोगन:-दूसरों के विचारों को सम्मान दो-तो आपको सम्मान स्वत:प्राप्त होगा।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 18 FEBRUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 February 2020

18-02-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – पुरानी दुनिया के कांटों को नई दुनिया के फूल बनाना – यह तुम होशियार मालियों का काम हैं”
प्रश्नः-संगमयुग पर तुम बच्चे कौन-सी श्रेष्ठ तकदीर बनाते हो?
उत्तर:-कांटे से खुशबूदार फूल बनना – यह है सबसे श्रेष्ठ तकदीर। अगर एक भी कोई विकार है तो कांटा है। जब कांटे से फूल बनो तब सतोप्रधान देवी-देवता बनो। तुम बच्चे अभी 21 पीढ़ी के लिए अपनी सूर्यवंशी तकदीर बनाने आये हो।
गीत:-तकदीर जगाकर आई हूँ……….. 

ओम् शान्ति। गीत बच्चों ने सुना। यह तो कॉमन गीत है क्योंकि तुम हो माली, बाप है बागवान। अब मालियों को कांटों से फूल बनाना है। यह अक्षर बहुत क्लीयर है। भक्त आये हैं भगवान के पास। यह सब भक्तियाँ हैं ना। अब ज्ञान की पढ़ाई पढ़ने बाप के पास आये हैं। इस राजयोग की पढ़ाई से ही नई दुनिया के मालिक बनते हो। तो भक्तियां कहती हैं-हम तकदीर बनाकर आये हैं, नई दुनिया दिल में सजाकर आये हैं। बाबा भी रोज़ कहते हैं कि स्वीट होम और स्वीट राजाई को याद करो। आत्मा को याद करना है। हर एक सेन्टर पर कांटों से फूल बन रहे हैं। फूलों में भी नम्बरवार होते हैं ना। शिव के ऊपर फूल चढ़ाते, कोई कैसा फूल चढ़ाते, कोई कैसा। गुलाब के फूल और अक के फूल में रात-दिन का फर्क है। यह भी बगीचा है। कोई मोतिये के फूल हैं, कोई चम्पा के, कोई रतन ज्योत हैं। कोई अक के भी हैं। बच्चे जानते हैं इस समय सब हैं कांटे। यह दुनिया ही कांटों का जंगल है, इनको बनाना है नई दुनिया के फूल। इस पुरानी दुनिया में हैं कांटें, तो गीत में भी कहते हैं हम बाप के पास आये हैं पुरानी दुनिया के कांटे से नई दुनिया का फूल बनने। जो बाप नई दुनिया स्थापन कर रहे हैं। कांटे से फूल अर्थात् देवी-देवता बनना है। गीत का अर्थ कितना सहज है। हम आये हैं-तकदीर जगाने नई दुनिया के लिए। नई दुनिया है सतयुग। कोई की सतोप्रधान तकदीर है, कोई की रजो, तमो है। कोई सूर्यवंशी राजा बनते हैं, कोई प्रजा बनते हैं, कोई प्रजा के भी नौकर चाकर बनते हैं। यह नई दुनिया की राजाई स्थापन हो रही है। स्कूल में तकदीर जगाने जाते हैं ना। यहाँ तो है नई दुनिया की बात। इस पुरानी दुनिया में क्या तकदीर बनायेंगे! तुम भविष्य नई दुनिया में देवता बनने की तकदीर बना रहे हो, जिन देवताओं को सभी नमन करते आये हैं। हम ही सो देवता पूज्य थे फिर हम ही पुजारी बने हैं। 21 जन्मों का वर्सा बाप से मिलता है, जिसे 21 पीढ़ी कहा जाता है। पीढ़ी वृद्ध अवस्था तक को कहा जाता है। बाप 21 पीढ़ी का वर्सा देते हैं क्योंकि युवा अवस्था में वा बचपन में, बीच में अकाले मृत्यु कभी होता नहीं इसलिए उनको कहा जाता है अमरलोक। यह है मृत्युलोक, रावण राज्य। यहाँ हर एक में विकारों की प्रवेशता है, जिसमें कोई एक भी विकार है तो कांटे हुए ना। बाप समझेंगे माली रॉयल खुशबूदार फूल बनाना नहीं जानते हैं। माली अच्छा होगा तो अच्छे-अच्छे फूल तैयार करेंगे। विजय माला में पिरोने लायक फूल चाहिए। देवताओं के पास अच्छे-अच्छे फूल ले जाते हैं ना। समझो क्वीन एलिजाबेथ आती है तो एकदम फर्स्टक्लास फूलों की माला बनाकर ले जायेंगे। यहाँ के मनुष्य तो हैं तमोप्रधान। शिव के मन्दिर में भी जाते हैं, समझते हैं ये भगवान है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को तो देवता कहते हैं। शिव को भगवान कहेंगे। तो वह ऊंच ते ऊंचा हुआ ना। अब शिव के लिए कहते धतूरा खाता था, भांग पीता था। कितनी ग्लानि करते हैं। फूल भी अक के ले जाते हैं। अब ऐसा परमपिता परमात्मा उनके पास ले क्या जाते हैं! तमोप्रधान कांटों के पास तो फर्स्टक्लास फूल ले जाते हैं और शिव के मन्दिर में क्या ले जाते! दूध भी कैसा चढ़ाते हैं? 5 परसेन्ट दूध बाकी 95 परसेन्ट पानी। भगवान के पास दूध कैसा चढ़ाना चाहिए-जानते तो कुछ भी नहीं। अब तुम अच्छी रीति जानते हो। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं, जो अच्छा जानते हैं उनको सेन्टर का हेड बनाया जाता है। सब तो एक जैसे नहीं होते। भल पढ़ाई एक ही है, मनुष्य से देवता बनने की ही एम ऑब्जेक्ट है परन्तु टीचर तो नम्बरवार हैं ना। विजय माला में आने का मुख्य आधार है पढ़ाई। पढ़ाई तो एक ही होती है, उसमें पास तो नम्बरवार होते हैं ना। सारा मदार पढ़ाई पर है। कोई तो विजय माला के 8 दानों में आते हैं, कोई 108 में, कोई 16108 में। सिजरा बनाते हैं ना। जैसे झाड़ का भी सिजरा निकलता है, पहले-पहले एक पत्ता, दो पत्ते फिर बढ़ते जाते हैं। यह भी झाड़ है। बिरादरी होती है, जैसे कृपलानी बिरादरी आदि-आदि, वह सब हैं हद की बिरादरियां। यह है बेहद की बिरादरी। इनका पहले-पहले कौन है? प्रजापिता ब्रह्मा। उनको कहेंगे ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। परन्तु यह किसको पता नहीं है। मनुष्य-मात्र ज़रा भी नहीं जानते कि सृष्टि का रचयिता कौन है? बिल्कुल अहिल्या जैसे पत्थरबुद्धि हैं। ऐसे जब बन जाते हैं तब ही बाप आते हैं।

तुम यहाँ आये हो अहिल्या बुद्धि से पारसबुद्धि बनने। तो नॉलेज भी धारण करनी चाहिए ना। बाप को पहचानना चाहिए और पढ़ाई का ख्याल करना चाहिए। समझो आज आये हैं, कल अचानक शरीर छूट जाता है फिर क्या पद पा सकेंगे। नॉलेज तो कुछ भी उठाई नहीं, कुछ भी सीखे नहीं तो क्या पद पायेंगे! दिन-प्रतिदिन जो देरी से शरीर छोड़ते हैं, उनको टाइम तो थोड़ा मिलता है क्योंकि टाइम तो कम होता जाता है, उसमें जन्म ले क्या कर सकेंगे। हाँ, तुम्हारे से जो जायेंगे तो कोई अच्छे घर में जन्म लेंगे। संस्कार ले जाते हैं तो वह आत्मा झट जाग जायेगी, शिवबाबा को याद करने लगेगी। संस्कार ही नहीं पड़े हुए होंगे तो कुछ भी नहीं होगा। इसको बहुत महीनता से समझना होता है। माली अच्छे-अच्छे फूलों को ले आते हैं तो उनकी महिमा भी गाई जाती है, फूल बनाना तो माली का काम है ना। ऐसे बहुत बच्चे हैं, जिनको बाप को याद करना आता ही नहीं है। तकदीर के ऊपर है ना। तकदीर में नहीं है तो कुछ भी समझते नहीं। तकदीरवान बच्चे तो बाप को यथार्थ रीति पहचान कर उन्हें पूरी रीति याद करेंगे। बाप के साथ-साथ नई दुनिया को भी याद करते रहेंगे। गीत में भी कहते हैं ना-हम नई दुनिया के लिए नई तकदीर बनाने के लिए आये हैं। 21 जन्म लिए बाप से राज्य-भाग्य लेना है। इस नशे और खुशी में रहे तो ऐसे-ऐसे गीत का अर्थ इशारे से समझ जायें। स्कूल में भी कोई की तकदीर में नहीं होता है तो फेल हो पड़ते हैं। यह तो बहुत बड़ा इम्तहान है। भगवान खुद बैठ पढ़ाते हैं। यह नॉलेज सभी धर्म वालों के लिए है। बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। तुम जानते हो किसी भी देहधारी मनुष्य को भगवान कह नहीं सकते। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को भी भगवान नहीं कहेंगे। वह भी सूक्ष्मवतनवासी देवतायें हैं। यहाँ हैं मनुष्य। यहाँ देवतायें नहीं हैं। यह है मनुष्य लोक। यह लक्ष्मी-नारायण आदि दैवीगुण वाले मनुष्य हैं, जिसको डिटीज्म कहा जाता है। सतयुग में सभी देवी-देवता हैं, सूक्ष्मवतन में हैं ही ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। गाते भी हैं ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम:….. फिर कहेंगे शिव परमात्माए नम:। शिव को देवता नहीं कहेंगे। और मनुष्य को फिर भगवान नहीं कह सकते। तीन फ्लोर हैं ना। हम हैं थर्ड फ्लोर पर। सतयुग के जो दैवीगुण वाले मनुष्य हैं वही फिर आसुरी गुण वाले बन जाते हैं। माया का ग्रहण लगने से काले हो जाते हैं। जैसे चन्द्रमा को भी ग्रहण लगता है ना। वह हैं हद की बातें, यह है बेहद की बात। बेहद का दिन और बेहद की रात है। गाते भी हैं ब्रह्मा का दिन और रात। तुमको अभी एक बाप से ही पढ़ना है बाकी सब कुछ भूल जाना है। बाप द्वारा पढ़ने से तुम नई दुनिया के मालिक बनते हो। यह सच्ची-सच्ची गीता पाठशाला है। पाठशाला में हमेशा नहीं रहते। मनुष्य समझते हैं भक्ति मार्ग भगवान से मिलने का मार्ग है, जितना बहुत भक्ति करेंगे तो भगवान राज़ी होगा और आकर फल देगा। यह सब बातें तुम ही अब समझते हो। भगवान एक है जो फल अभी दे रहे हैं। जो पहले-पहले सूर्यवंशी पूज्य थे, उन्हों ने ही सबसे जास्ती भक्ति की है, वही यहाँ आयेंगे। तुमने ही पहले-पहले शिवबाबा की अव्यभिचारी भक्ति की है तो जरूर तुम ही पहले-पहले भक्त ठहरे। फिर गिरते-गिरते तमोप्रधान बन जाते हो। आधाकल्प तुमने भक्ति की है, इसलिए तुमको ही पहले ज्ञान देते हैं। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं।

तुम्हारी इस पढ़ाई में यह बहाना नहीं चल सकता कि हम दूर रहते हैं इसलिए रोज़ नहीं पढ़ सकते। कोई कहते हैं हम 10 माइल दूर रहते हैं। अरे, बाबा की याद में तुम 10 माइल भी पैदल करके जाओ तो कभी थकावट नहीं होगी। कितना बड़ा खजाना लेने जाते हो। तीर्थो पर मनुष्य दर्शन करने लिए पैदल जाते हैं, कितना धक्का खाते हैं। यह तो एक ही शहर की बात है। बाप कहते हैं मैं इतना दूर से आया हूँ, तुम कहते हो घर 5 माइल दूर है…. वाह! खज़ाना लेने के लिए तो दौड़ते आना चाहिए। अमरनाथ पर सिर्फ दर्शन करने के लिए कहाँ-कहाँ से जाते हैं। यहाँ तो अमरनाथ बाबा स्वयं पढ़ाने आये हैं। तुमको विश्व का मालिक बनाने आया हूँ। तुम बहाना करते रहते हो। सवेरे अमृतवेले तो कोई भी आ सकते हैं। उस समय कोई डर नहीं है। कोई तुमको लूटेंगे भी नहीं। अगर कोई चीज़ जेवर आदि होंगे तो छीनेंगे। चोरों को चाहिए ही धन, पदार्थ। परन्तु किसकी तकदीर में नहीं है तो फिर बहाने बहुत बनाते हैं। पढ़ते नहीं तो अपना पद गंवाते हैं। बाप आते भी भारत में हैं। भारत को ही स्वर्ग बनाते हैं। सेकण्ड में जीवनमुक्ति का रास्ता बताते हैं। परन्तु कोई पुरूषार्थ भी करे ना। कदम ही नहीं उठायेंगे तो पहुँच कैसे सकेंगे।

तुम बच्चे समझते हो कि यह है आत्माओं और परमात्मा का मेला। बाप के पास आये हैं स्वर्ग का वर्सा लेने, नई दुनिया की स्थापना हो रही है। स्थापना पूरी हुई और विनाश शुरू हो जायेगा। यह वही महाभारत की लड़ाई है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप जो ज्ञान का खजाना दे रहे हैं, उसको लेने के लिए दौड़-दौड़ कर आना है, इसमें किसी भी प्रकार का बहाना नहीं देना है। बाप की याद में 10 माइल भी पैदल चलने से थकावट नहीं होगी।

2) विजय माला में आने का आधार पढ़ाई है। पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना है। कांटों को फूल बनाने की सेवा करनी है। स्वीट होम और स्वीट राजाई को याद करना है।

वरदान:-निश्चय रूपी पांव को अचल रखने वाले सदा निश्चयबुद्धि, निश्चितं भव
सबसे बड़ी बीमारी है चिंता, इसकी दवाई डाक्टर्स के पास भी नहीं है। चिंता वाले जितना ही प्राप्ति के पीछे दौड़ते हैं उतना प्राप्ति आगे दौड़ लगाती है इसलिए निश्चय के पांव सदा अचल रहें। सदा एक बल एक भरोसा-यह पांव अचल है तो विजय निश्चित है। निश्चित विजयी सदा ही निश्चितं हैं। माया निश्चय रूपी पांव को हिलाने के लिए ही भिन्न-भिन्न रूप से आती है लेकिन माया हिल जाए-आपका निश्चय रूपी पांव न हिले तो निश्चितं रहने का वरदान मिल जायेगा।
स्लोगन:-हर एक की विशेषता को देखते जाओ तो विशेष आत्मा बन जायेंगे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 17 FEBRUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 17 February 2020

17-02-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – बाप तुम्हें अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देते हैं, तुम फिर औरों को दान देते रहो, इसी दान से सद्गति हो जायेगी”
प्रश्नः-कौन-सा नया रास्ता तुम बच्चों के सिवाए कोई भी नहीं जानता है?
उत्तर:-घर का रास्ता वा स्वर्ग जाने का रास्ता अभी बाप द्वारा तुम्हें मिला है। तुम जानते हो शान्तिधाम हम आत्माओं का घर है, स्वर्ग अलग है, शान्तिधाम अलग है। यह नया रास्ता तुम्हारे सिवाए कोई भी नहीं जानता। तुम कहते हो अब कुम्भकरण की नींद छोड़ो, आंख खोलो, पावन बनो। पावन बनकर ही घर जा सकेंगे।
गीत:-जाग सजनियाँ जाग……….

ओम् शान्ति। भगवानुवाच। यह तो बाप ने समझाया है कि मनुष्य को वा देवताओं को भगवान नहीं कहा जाता क्योंकि इनका साकारी रूप है। बाकी परमपिता परमात्मा का न आकारी, न साकारी रूप है इसलिए उनको शिव परमात्माए नम: कहा जाता है। ज्ञान का सागर वह एक ही है। कोई मनुष्य में ज्ञान हो नहीं सकता। किसका ज्ञान? रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान अथवा आत्मा और परमात्मा का यह ज्ञान कोई में नहीं है। तो बाप आकर जगाते हैं-हे सजनियां, हे भक्तियां जागो। सभी मेल अथवा फीमेल भक्तियां हैं। भगवान को याद करते हैं। सभी ब्राइड्स याद करती हैं एक ब्राइडग्रूम को। सभी आशिक आत्मायें परमपिता परमात्मा माशूक को याद करती हैं। सभी सीतायें हैं, राम एक परमपिता परमात्मा है। राम अक्षर क्यों कहते हैं? रावणराज्य है ना। तो उसकी भेंट में रामराज्य कहा जाता है। राम है बाप, जिसको ईश्वर भी कहते हैं, भगवान भी कहते हैं। असली नाम उनका है शिव। तो अब कहते हैं जागो, अब नवयुग आता है। पुराना खत्म हो रहा है। इस महाभारत लड़ाई के बाद सतयुग स्थापन होता है और इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य होगा। पुराना कलियुग खत्म हो रहा है इसलिए बाप कहते हैं-बच्चे, कुम्भकरण की नींद छोड़ो। अब आंख खोलो। नई दुनिया आती है। नई दुनिया को स्वर्ग, सतयुग कहा जाता है। यह है नया रास्ता। यह घर वा स्वर्ग में जाने का रास्ता कोई भी जानते नहीं हैं। स्वर्ग अलग है, शान्तिधाम जहाँ आत्मायें रहती हैं, वह अलग है। अब बाप कहते हैं जागो, तुम रावणराज्य में पतित हो गये हो। इस समय एक भी पवित्र आत्मा नहीं हो सकती। पुण्य आत्मा नहीं कहेंगे। भल मनुष्य दान-पुण्य करते हैं, परन्तु पवित्र आत्मा तो एक भी नहीं है। यहाँ कलियुग में हैं पतित आत्मायें, सतयुग में हैं पावन आत्मायें, इसलिए कहते हैं-हे शिवबाबा, आकर हमको पावन आत्मा बनाओ। यह पवित्रता की बात है। इस समय बाप आकर तुम बच्चों को अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देते हैं। कहते हैं तुम भी औरों को दान देते रहो तो 5 विकारों का ग्रहण छूट जाए। 5 विकारों का दान दो तो दु:ख का ग्रहण छूट जाए। पवित्र बन सुखधाम में चले जायेंगे। 5 विकारों में नम्बरवन है काम, उसको छोड़ पवित्र बनो। खुद भी कहते हैं-हे पतित-पावन, हमको पावन बनाओ। पतित विकारी को कहा जाता है। यह सुख और दु:ख का खेल भारत के लिए ही है। बाप भारत में ही आकर साधारण तन में प्रवेश करते हैं फिर इनकी भी बायोग्राफी बैठ सुनाते हैं। यह हैं सब ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ, प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद। तुम सबको पवित्र बनने की युक्ति बताते हो। ब्रह्माकुमार और कुमारियां तुम विकार में जा नहीं सकते हो। तुम ब्राह्मणों का यह एक ही जन्म है। देवता वर्ण में तुम 20 जन्म लेते हो, वैश्य, शूद्र वर्ण में 63 जन्म। ब्राह्मण वर्ण का यह एक अन्तिम जन्म है, जिसमें ही पवित्र बनना है। बाप कहते हैं पवित्र बनो। बाप की याद अथवा योगबल से विकर्म भस्म होंगे। यह एक जन्म पवित्र बनना है। सतयुग में तो कोई पतित होता नहीं। अभी यह अन्तिम जन्म पावन बनेंगे तो 21 जन्म पावन रहेंगे। पावन थे, अब पतित बने हो। पतित हैं तब तो बुलाते हैं। पतित किसने बनाया है? रावण की आसुरी मत ने। सिवाए मेरे तुम बच्चों को रावण राज्य से, दु:ख से कोई भी लिबरेट कर नहीं सकते। सभी काम चिता पर बैठ भस्म हो पड़े हैं। मुझे आकर ज्ञान चिता पर बिठाना पड़ता है। ज्ञान जल डालना पड़ता है। सबकी सद्गति करनी पड़े। जो अच्छी रीति पढ़ाई पढ़ते हैं उनकी ही सद्गति होती है। बाकी सब चले जाते हैं शान्तिधाम में। सतयुग में सिर्फ देवी-देवतायें हैं, उनको ही सद्गति मिली हुई है। बाकी सबको गति अथवा मुक्ति मिलती है। 5 हज़ार वर्ष पहले इन देवी-देवताओं का राज्य था। लाखों वर्ष की बात है नहीं। अब बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों, मुझ बाप को याद करो। मन्मनाभव अक्षर तो प्रसिद्ध है। भगवानुवाच-कोई भी देहधारी को भगवान नहीं कहा जाता। आत्मायें तो एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हैं। कभी स्त्री, कभी पुरूष बनती हैं। भगवान कभी भी जन्म-मरण के खेल में नहीं आता। यह ड्रामा अनुसार नूँध है। एक जन्म न मिले दूसरे से। फिर तुम्हारा यह जन्म रिपीट होगा तो यही एक्ट, यही फीचर्स फिर लेंगे। यह ड्रामा अनादि बना-बनाया है। यह बदल नहीं सकता। श्रीकृष्ण को जो शरीर सतयुग में था वह फिर वहाँ मिलेगा। वह आत्मा तो अभी यहाँ है। तुम अभी जानते हो हम सो बनेंगे। यह लक्ष्मी-नारायण के फीचर्स एक्यूरेट नहीं हैं। बनेंगे फिर भी वही। यह बातें नया कोई समझ न सके। अच्छी रीति जब किसको समझाओ तब 84 का चक्र जानेंगे और समझेंगे बरोबर हरेक जन्म में नाम, रूप, फीचर्स आदि अलग-अलग होते हैं। अभी इनके अन्तिम 84 वें जन्म के फीचर्स यह हैं इसलिए नारायण के फीचर्स करीब-करीब ऐसे दिखाये हैं। नहीं तो मनुष्य समझ न सकें।

तुम बच्चे जानते हो – मम्मा-बाबा ही यह लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। यहाँ तो 5 तत्व पवित्र हैं नहीं। यह शरीर सब पतित हैं। सतयुग में शरीर भी पवित्र होते हैं। कृष्ण को मोस्ट ब्युटीफुल कहते हैं। नैचुरल ब्युटी होती है। यहाँ विलायत में भल गोरे मनुष्य हैं परन्तु उनको देवता थोड़ेही कहेंगे। दैवीगुण तो नहीं हैं ना। तो बाप कितना अच्छी रीति बैठ समझाते हैं। यह है ऊंच ते ऊंच पढ़ाई, जिससे तुम्हारी कितनी ऊंच कमाई होती है। अनगिनत हीरे जवाहर, धन होता है। वहाँ तो हीरे जवाहरों के महल थे। अभी वह सब गुम हो गया है। तो तुम कितने धनवान बनते हो। अपरमअपार कमाई है 21 जन्मों के लिए, इसमें बहुत मेहनत चाहिए। देही-अभिमानी बनना है, हम आत्मा हैं, यह पुराना शरीर छोड़ अब वापस अपने घर जाना है। बाप अभी लेने लिए आये हैं। हम आत्मा ने 84 जन्म अब पूरे किये, अब फिर पावन बनना है, बाप को याद करना है। नहीं तो कयामत का समय है। सजायें खाकर वापिस चले जायेंगे। हिसाब-किताब तो सबको चुक्तू करना ही है। भक्ति मार्ग में काशी कलवट खाते थे तो भी कोई मुक्ति को नहीं पाते। वह है भक्ति मार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। इसमें जीवघात करने की दरकार नहीं रहती। वह है जीव-घात। फिर भी भावना रहती है कि मुक्ति को पावें इसलिए पापों का हिसाब-किताब चुक्तू हो फिर चालू होता है। अभी तो काशी कलवट का कोई मुश्किल साहस रखते हैं। बाकी मुक्ति वा जीवनमुक्ति नहीं मिल सकती। बाप बिगर जीवनमुक्ति कोई दे ही नहीं सकते। आत्मायें आती रहती हैं फिर वापस कैसे जायेंगे? बाप ही आकर सर्व की सद्गति कर वापिस ले जायेंगे। सतयुग में बहुत थोड़े मनुष्य रहते हैं। आत्मा तो कभी विनाश नहीं होती है। आत्मा अविनाशी है, शरीर विनाशी है। सतयुग में आयु बड़ी होती है। दु:ख की बात नहीं। एक शरीर छोड़ दूसरा ले लेते हैं। जैसे सर्प का मिसाल है, उसको मरना नहीं कहा जाता है। दु:ख की बात नहीं। समझते हैं अब टाइम पूरा हुआ है, इस शरीर को छोड़ दूसरा लेंगे। तुम बच्चों को इस शरीर से डिटैच होने का अभ्यास यहाँ ही डालना है। हम आत्मा हैं, अब हमको घर जाना है फिर नई दुनिया में आयेंगे, नई खाल लेंगे, यह अभ्यास डालो। तुम जानते हो आत्मा 84 शरीर लेती है। मनुष्यों ने फिर 84 लाख कह दिया है। बाप के लिए तो फिर अनगिनत ठिक्कर भित्तर में कह देते हैं। उसको कहा जाता है धर्म की ग्लानि। मनुष्य स्वच्छ बुद्धि से बिल्कुल तुच्छ बन जाते हैं। अब बाप तुमको स्वच्छ बुद्धि बनाते हैं। स्वच्छ बनते हो याद से। बाप कहते हैं अब नवयुग आता है, उसकी निशानी यह महाभारत लड़ाई है। यह वही मूसलों वाली लड़ाई है, जिसमें अनेक धर्म विनाश, एक धर्म की स्थापना हुई थी, तो जरूर भगवान होगा ना। कृष्ण यहाँ कैसे आ सके? ज्ञान का सागर निराकार या कृष्ण? कृष्ण को यह ज्ञान ही नहीं होगा। यह ज्ञान ही गुम हो जाता है। तुम्हारे भी फिर भक्ति मार्ग में चित्र बनेंगे। तुम पूज्य ही पुजारी बनते हो, कला कम हो जाती है। आयु भी कम होती जाती है क्योंकि भोगी बन जाते हो। वहाँ हैं योगी। ऐसे नहीं कि किसकी याद में योग लगाते हो। वहाँ है ही पवित्र। कृष्ण को भी योगेश्वर कहते हैं। इस समय कृष्ण की आत्मा बाप के साथ योग लगा रही है। कृष्ण की आत्मा इस समय योगेश्वर है, सतयुग में योगेश्वर नहीं कहेंगे। वहाँ तो प्रिन्स बनती है। तो तुम्हारी पिछाड़ी में ऐसी अवस्था रहनी चाहिए जो सिवाए बाप के और कोई शरीर की याद न रहे। शरीर से और पुरानी दुनिया से ममत्व मिट जाए। सन्यासी रहते तो पुरानी दुनिया में हैं परन्तु घरबार से ममत्व मिटा देते हैं। ब्रह्म को ईश्वर समझ उनसे योग लगाते हैं। अपने को ब्रह्म ज्ञानी, तत्व ज्ञानी कहते हैं। समझते हैं हम ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। बाप कहते हैं यह सब रांग है। राइट तो मैं हूँ, मुझे ही ट्रूथ कहा जाता है।

तो बाप समझाते हैं याद की यात्रा बड़ी पक्की चाहिए। ज्ञान तो बड़ा सहज है। देही-अभिमानी बनने में ही मेहनत है। बाप कहते हैं किसकी भी देह याद न आये, यह है भूतों की याद, भूत पूजा। मैं तो अशरीरी हूँ, तुमको याद करना है मुझे। इन आंखों से देखते हुए बुद्धि से बाप को याद करो। बाप के डायरेक्शन पर चलो तो धर्मराज की सजाओं से छूट जायेंगे। पावन बनेंगे तो सजायें खत्म हो जायेंगी, बड़ी भारी मंज़िल है। प्रजा बनना तो बहुत सहज है, उसमें भी साहूकार प्रजा, गरीब प्रजा कौन-कौन बन सकते हैं, सब समझाते हैं। पिछाड़ी में तुम्हारे बुद्धि का योग रहना चाहिए बाप और घर से। जैसे एक्टर्स का नाटक में पार्ट पूरा होता है तो बुद्धि घर में चली जाती है। यह है बेहद की बात। वह होती है हद की आमदनी, यह है बेहद की आमदनी। अच्छे एक्टर्स की आमदनी भी बहुत होती है ना। तो बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते बुद्धियोग वहाँ लगाना है। वह आशिक-माशूक होते हैं एक-दो के। यहाँ तो सब आशिक हैं एक माशूक के। उनको ही सब याद करते हैं। वन्डरफुल मुसाफिर है ना। इस समय आये हैं सब दु:खों से छुड़ाकर सद्गति में ले जाने लिए। उनको कहा जाता है सच्चा-सच्चा माशूक। वह एक-दो के शरीर पर आशिक होते हैं, विकार की बात नहीं। उसको कहेंगे देह-अभिमान का योग। वह भूतों की याद हो गई। मनुष्य को याद करना माना 5 भूतों को, प्रकृति को याद करना। बाप कहते हैं प्रकृति को भूल मुझे याद करो। मेहनत है ना और फिर दैवीगुण भी चाहिए। कोई से बदला लेना, यह भी आसुरी गुण है। सतयुग में होता ही है एक धर्म, बदले की बात नहीं। वह है ही अद्वेत देवता धर्म जो शिवबाबा बिगर कोई स्थापन कर न सके। सूक्ष्मवतनवासी देवताओं को कहेंगे फ़रिश्ते। इस समय तुम हो ब्राह्मण फिर फ़रिश्ता बनेंगे। फिर वापिस जायेंगे घर फिर नई दुनिया में आकर दैवी गुण वाले मनुष्य अर्थात् देवता बनेंगे। अभी शूद्र से ब्राह्मण बनते हो। प्रजापिता ब्रह्मा का बच्चा न बनें तो वर्सा कैसे लेंगे। यह प्रजापिता ब्रह्मा और मम्मा, वह फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। अब देखो तुमको जैनी लोग कहते हैं हमारा जैन धर्म सबसे पुराना है। अब वास्तव में महावीर तो आदि देव ब्रह्मा को ही कहते हैं। है ब्रह्मा ही, परन्तु कोई जैन मुनि आया तो उसने महावीर नाम रख दिया। अभी तुम सब महावीर हो ना। माया पर जीत पा रहे हो। तुम सब बहादुर बनते हो। सच्चे-सच्चे महावीर-महावीरनियाँ तुम हो। तुम्हारा नाम है शिव शक्ति, शेर पर सवारी है और महारथियों की हाथी पर। फिर भी बाप कहते हैं बड़ी भारी मंजिल है। एक बाप को याद करना है तो विकर्म विनाश हों, और कोई रास्ता नहीं हैं। योगबल से तुम विश्व पर राज्य करते हो। आत्मा कहती है, अब मुझे घर जाना है, यह पुरानी दुनिया है, यह है बेहद का सन्यास। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है और चक्र को समझने से चक्रवर्ती राजा बन जायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) धर्मराज की सजाओं से बचने के लिए किसी की भी देह को याद नहीं करना है, इन आंखों से सब कुछ देखते हुए एक बाप को याद करना है, अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। पावन बनना है।

2) मुक्ति और जीवनमुक्ति का रास्ता सबको बताना है। अब नाटक पूरा हुआ, घर जाना है-इस स्मृति से बेहद की आमदनी जमा करनी है।

वरदान:-लक्ष्य और मंजिल को सदा स्मृति में रख तीव्र पुरूषार्थ करने वाले सदा होली और हैपी भव
ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है बिना कोई हद के आधार के सदा आन्तरिक खुशी में रहना। जब यह लक्ष्य बदल हद की प्राप्तियों की छोटी-छोटी गलियों में फंस जाते हो तब मंजिल से दूर हो जाते हो इसलिए कुछ भी हो जाए, हद की प्राप्तियों का त्याग भी करना पड़े तो उन्हें छोड़ दो लेकिन अविनाशी खुशी को कभी नहीं छोड़ो। होली और हैपी भव के वरदान को स्मृति में रख तीव्र पुरुषार्थ द्वारा अविनाशी प्राप्तियां करो।
स्लोगन:-गुण मूर्त बनकर गुणों का दान देते चलो-यही सबसे बड़ी सेवा है।
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