Daily Gyan Murli : Hindi

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 1 APRIL 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 1 April 2020

Murli Pdf for Print : – 

01-04-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“ मीठे बच्चे – सुख और दु : ख के खेल को तुम ही जानते हो , आधाकल्प है सुख और आधाकल्प है दु : ख , बाप दु : ख हरने सुख देने आते हैं ”
प्रश्नः-कई बच्चे किस एक बात में अपनी दिल को खुश कर मिया मिट्ठू बनते हैं?
उत्तर:-कई समझते हैं हम सम्पूर्ण बन गये, हम कम्पलीट तैयार हो गये। ऐसे समझ अपने दिल को खुश कर लेते हैं। यह भी मिया मिट्ठू बनना है। बाबा कहते – मीठे बच्चे अभी बहुत पुरूषार्थ करना है। तुम पावन बन जायेंगे तो फिर दुनिया भी पावन चाहिए। राजधानी स्थापन होनी है, एक तो जा नहीं सकता।
गीत:-तुम्हीं हो माता, तुम्हीं पिता हो… 

ओम् शान्ति। यह बच्चों को अपनी पहचान मिलती है। बाप भी ऐसे कहते हैं, हम सभी आत्मायें हैं, सब मनुष्य ही हैं। बड़ा हो या छोटा हो, प्रेजीडेन्ट, राजा रानी सब मनुष्य हैं। अब बाप कहते हैं सभी आत्मायें हैं, मैं फिर सभी आत्माओं का पिता हूँ इसलिए मुझे कहते हैं परमपिता परम आत्मा यानी सुप्रीम। बच्चे जानते हैं हम आत्माओं का वह बाप है, हम सब ब्रदर्स हैं। फिर ब्रह्मा द्वारा भाई बहनों का ऊंच नीच कुल होता है। आत्मायें तो सभी आत्मा हैं। यह भी तुम समझते हो। मनुष्य तो कुछ नहीं समझते। तुमको बाप बैठ समझाते हैं – बाप को तो कोई जानते नहीं। मनुष्य गाते हैं – हे भगवान, हे मात-पिता क्योंकि ऊंच ते ऊंच तो एक होना चाहिए ना। वह है सबका बाप, सबको सुख देने वाला। सुख और दु:ख के खेल को भी तुम जानते हो। मनुष्य तो समझते हैं, अभी-अभी सुख है, अभी-अभी दु:ख है। यह नहीं समझते आधाकल्प सुख, आधाकल्प दु:ख है। सतोप्रधान सतो रजो तमो है ना। शान्तिधाम में हम आत्मायें हैं, तो वहाँ सब सच्चा सोना है। अलाए उसमें हो न सके। भल अपना-अपना पार्ट भरा हुआ है परन्तु आत्मायें सब पवित्र रहती हैं। अपवित्र आत्मा रह नहीं सकती। इस समय फिर कोई भी पवित्र आत्मा यहाँ हो न सके। तुम ब्राह्मण कुल भूषण भी पवित्र बन रहे हो। तुम अभी अपने को देवता नहीं कह सकते हो। वे हैं सम्पूर्ण निर्विकारी। तुमको थोड़ेही सम्पूर्ण निर्विकारी कहेंगे। भल शंकराचार्य हो या कोई भी हो सिवाए देवताओं के और किसको कह नहीं सकते। यह बातें भी तुम ही सुनते हो – ज्ञान सागर के मुख से। यह भी जानते हो ज्ञान सागर एक ही बार आते हैं। मनुष्य तो पुनर्जन्म ले फिर आते हैं। कोई-कोई ज्ञान सुनकर गये हैं, संस्कार ले गये हैं तो फिर आते हैं, आकर सुनते हैं। समझो 6-8 वर्ष वाला होगा तो कोई-कोई में अच्छी समझ भी आ जाती है। आत्मा तो वही है ना। सुनकर उनको अच्छा लगता है। आत्मा समझती है हमको फिर से बाप का वही ज्ञान मिल रहा है। अन्दर में खुशी रहती है, औरों को भी सिखलाने लग पड़ते हैं। फुर्त हो जाते हैं। जैसे लड़ाई वाले वह संस्कार ले जाते हैं तो छोटेपन में ही उसी काम में खुशी से लग जाते हैं। अब तुमको तो पुरूषार्थ कर नई दुनिया का मालिक बनना है। तुम सबको समझा सकते हो या तो नई दुनिया के मालिक बन सकते हो या तो शान्तिधाम के मालिक बन सकते हो। शान्तिधाम तुम्हारा घर है – जहाँ से तुम यहाँ आये हो पार्ट बजाने। यह भी कोई जानते नहीं क्योंकि आत्मा का ही पता नहीं है। तुमको भी पहले यह थोड़ेही पता था कि हम निराकारी दुनिया से यहाँ आये हैं। हम बिन्दी हैं। संन्यासी लोग भल कहते हैं भ्रकुटी के बीच आत्मा स्टॉर रहती है फिर भी बुद्धि में बड़ा रूप आ जाता है। सालिग्राम कहने से बड़ा रूप समझ लेते हैं। आत्मा सालिग्राम है। यज्ञ रचते हैं तो उसमें भी सालिग्राम बड़े-बड़े बनाते हैं। पूजा के समय सालिग्राम बड़ा रूप ही बुद्धि में रहता है। बाप कहते हैं यह सारा अज्ञान है। ज्ञान तो मैं ही सुनाता हूँ और कोई दुनिया भर में सुना न सके। यह कोई समझाते नहीं हैं कि आत्मा भी बिन्दी है, परमात्मा भी बिन्दी है। वह तो अखण्ड ज्योति स्वरूप ब्रह्म कह देते हैं। ब्रह्म को भगवान समझ लेते और फिर अपने को भगवान कह देते। कहते हैं हम पार्ट बजाने के लिए छोटी आत्मा का रूप धरते हैं। फिर बड़ी ज्योति में लीन हो जाते हैं। लीन हो जाए फिर क्या! पार्ट भी लीन हो जाए। कितना रांग हो जाता है।

अभी बाप आकर सेकेण्ड में जीवनमुक्ति देते हैं फिर आधाकल्प बाद सीढ़ी उतरते जीवन-बंध में आते हैं। फिर बाप आकर जीवनमुक्त बनाते हैं, इसलिए उनको सर्व का सद्गति दाता कहा जाता है। तो जो पतित-पावन बाप है उनको ही याद करना है, उनकी याद से ही तुम पावन बनेंगे। नहीं तो बन नहीं सकते। ऊंच ते ऊंच एक ही बाप है। कई बच्चे समझते हैं हम सम्पूर्ण बन गये। हम कम्पलीट तैयार हो गये। ऐसे समझ अपनी दिल को खुश कर लेते हैं। यह भी मिया मिट्ठू बनना है। बाबा कहते मीठे बच्चे, अभी बहुत पुरूषार्थ करना है। पावन बन जायेंगे तो फिर दुनिया भी पावन चाहिए। एक तो जा न सके। कोई कितनी भी कोशिश करे कि हम जल्दी कर्मातीत बन जायें – परन्तु होगा नहीं। राजधानी स्थापन होनी है। भल कोई स्टूडेन्ट पढ़ाई में बहुत होशियार हो जाता है परन्तु इम्तहान तो टाइम पर होगा ना। इम्तहान तो जल्दी हो न सके। यह भी ऐसे है। जब समय होगा तब तुम्हारे पढ़ाई की रिजल्ट निकलेगी। कितना भी अच्छा पुरूषार्थ हो, ऐसे कह न सके – हम कम्पलीट तैयार हैं। नहीं, 16 कला सम्पूर्ण कोई आत्मा अभी बन नहीं सकती। बहुत पुरूषार्थ करना है। अपने दिल को सिर्फ खुश नहीं करना है कि हम सम्पूर्ण बन गये। नहीं, सम्पूर्ण बनना ही है अन्त में। मिया मिट्ठू नहीं बनना है। यह तो सारी राजधानी स्थापन होनी है। हाँ इतना समझते हैं बाकी थोड़ा टाइम है। मूसल भी निकल गये हैं। इन्हें बनाने में भी पहले टाइम लगता है फिर प्रैक्टिस हो जाती है तो फिर झट बना लेते हैं। यह भी सब ड्रामा में नूँध है। विनाश के लिए बाम्बस बनाते रहते हैं। गीता में भी मूसल अक्षर है। शास्त्रों में फिर लिख दिया है पेट से लोहा निकला, फिर यह हुआ। यह सब झूठी बातें हैं ना। बाप आकर समझाते हैं – उनको ही मिसाइल्स कहा जाता है। अब इस विनाश के पहले हमको तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। बच्चे जानते हैं हम आदि सनातन देवी देवता धर्म के थे। सच्चा सोना थे। भारत को सच खण्ड कहते हैं। अब झूठ खण्ड बन गया है। सोना भी सच्चा और झूठा होता है ना। अभी तुम बच्चे जान गये हो – बाप की महिमा क्या है! वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, सत है, चैतन्य है। आगे तो सिर्फ गायन करते थे। अभी तुम समझते हो कि बाप सारे गुण हमारे में भर रहे हैं। बाप कहते हैं कि पहले-पहले याद की यात्रा करो, मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो जाएं। मेरा नाम ही है पतित-पावन। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ परन्तु वह क्या आकर करेंगे, यह नहीं जानते हैं। एक सीता तो नहीं होगी। तुम सभी सीतायें हो।

बाप तुम बच्चों को बेहद में ले जाने के लिए बेहद की बातें सुनाते हैं। तुम बेहद की बुद्धि से जानते हो कि मेल और फीमेल सब सीतायें हैं। सब रावण की कैद में हैं। बाप (राम) आकर सबको रावण की कैद से निकालते हैं। रावण कोई मनुष्य नहीं है। यह समझाया जाता है – हर एक में 5 विकार हैं, इसलिए रावण राज्य कहा जाता है। नाम ही है विशश वर्ल्ड, वह है वाइसलेस वर्ल्ड, दोनों अलग-अलग नाम हैं। यह वेश्यालय और वह है शिवालय। निर्विकारी दुनिया के यह लक्ष्मी नारायण मालिक थे। इन्हों के आगे विकारी मनुष्य जाकर माथा टेकते हैं। विकारी राजायें उन निर्विकारी राजाओं के आगे माथा टेकते हैं। यह भी तुम जानते हो। मनुष्यों को कल्प की आयु का ही पता नहीं तो समझ कैसे सकें कि रावण राज्य कब शुरू होता है। आधा-आधा होना चाहिए ना। रामराज्य, रावणराज्य कब से शुरू करें, मुँझारा कर दिया है।

अब बाप समझाते हैं यह 5 हजार वर्ष का चक्र फिरता रहता है। अभी तुमको पता पड़ा है कि हम 84 का पार्ट बजाते हैं। फिर हम जाते हैं घर। सतयुग त्रेता में भी पुनर्जन्म लेते हैं। वह है रामराज्य फिर रावणराज्य में आना है। हार-जीत का खेल है। तुम जीत पाते हो तो स्वर्ग के मालिक बनते हो। हार खाते हो तो नर्क के मालिक बनते हो। स्वर्ग अलग है, कोई मरते हैं तो कहते हैं स्वर्ग पधारा। अभी तुम थोड़ेही कहेंगे क्योंकि तुम जानते हो स्वर्ग कब होगा। वह तो कह देते ज्योति ज्योत समाया वा निर्वाण गया। तुम कहेंगे ज्योति ज्योत तो कोई समा नहीं सकते। सर्व का सद्गति दाता एक ही गाया जाता है। स्वर्ग सतयुग को कहा जाता है। अभी है नर्क। भारत की ही बात है। बाकी ऊपर में कुछ नहीं है। देलवाड़ा मन्दिर में ऊपर में स्वर्ग दिखाया है तो मनुष्य समझते हैं बरोबर ऊपर ही स्वर्ग है। अरे ऊपर छत में मनुष्य कैसे होंगे, बुद्धू ठहरे ना। अभी तुम क्लीयर कर समझाते हो। तुम जानते हो यहाँ ही स्वर्गवासी थे, यहाँ ही फिर नर्कवासी बनते हैं। अब फिर स्वर्गवासी बनना है। यह नॉलेज है ही नर से नारायण बनने की। कथा भी सत्य नारायण बनने की ही सुनाते हैं। राम सीता की कथा नहीं कहते, यह है नर से नारायण बनने की कथा। ऊंच ते ऊंच पद लक्ष्मी-नारायण का है। वह फिर भी दो कला कम हो जाती हैं। पुरूषार्थ ऊंच पद पाने का किया जाता है फिर अगर नहीं करते हैं तो जाकर चन्द्रवंशी बनते हैं। भारतवासी पतित बनते हैं तो अपने धर्म को भूल जाते हैं। क्रिश्चियन भल सतो से तमोप्रधान बने हैं फिर भी क्रिश्चियन सम्प्रदाय के तो हैं ना। आदि सनातन देवी देवता सम्प्रदाय वाले तो अपने को हिन्दू कह देते हैं। यह भी नहीं समझते कि हम असुल देवी देवता धर्म के हैं। वण्डर है ना। तुम पूछते हो हिन्दू धर्म किसने स्थापन किया? तो मूँझ जाते हैं। देवताओं की पूजा करते हैं तो देवता धर्म के ठहरे ना। परन्तु समझते नहीं। यह भी ड्रामा में नूँध है। तुम्हारी बुद्धि में सारी नॉलेज है। तुम जानते हो हम पहले सूर्यवंशी थे फिर और धर्म आते हैं। हम पुनर्जन्म लेते आते हैं। तुम्हारे में भी कोई यथार्थ रीति जानते हैं। स्कूल में भी कोई स्टूडेन्ट की बुद्धि में अच्छी रीति बैठता है, कोई की बुद्धि में कम बैठता है। यहाँ भी जो नापास होते हैं उनको क्षत्रिय कहा जाता है। चन्द्रवंशी में चले जाते हैं। दो कला कम हो गई ना। सम्पूर्ण बन न सके। तुम्हारी बुद्धि में अभी बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी है। वह स्कूल में तो हद की हिस्ट्री-जॉग्राफी पढ़ते हैं। वह कोई मूलवतन, सूक्ष्मवतन को थोड़ेही जानते हैं। साधू सन्त आदि किसकी भी बुद्धि में नहीं है। तुम्हारी बुद्धि में है – मूलवतन में आत्मायें रहती हैं। यह है स्थूल वतन। तुम्हारी बुद्धि में सारी नॉलेज है। यह स्वदर्शन चक्रधारी सेना बैठी है। यह सेना बाप को और चक्र को याद करती है। तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान है। बाकी कोई हथियार आदि नहीं हैं। ज्ञान से स्व का दर्शन हुआ है। बाप, रचयिता का और रचना के आदि मध्य अन्त का ज्ञान देते हैं। अब बाप का फरमान है कि रचयिता को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। जितना जो स्वदर्शन चक्रधारी बनते हैं, औरों को बनाते हैं, जो जास्ती सर्विस करते हैं उनको जास्ती पद मिलेगा। यह तो कॉमन बात है। बाप को भूले ही हैं गीता में कृष्ण का नाम डालने से। कृष्ण को भगवान कह नहीं सकते। उनको बाप नहीं कहेंगे। वर्सा बाप से मिलता है। पतित-पावन बाप को कहा जाता, वह जब आये तब हम वापिस शान्ति-धाम में जायें। मनुष्य मुक्ति के लिए कितना माथा मारते हैं। तुम कितना सहज समझाते हो। बोलो – पतित-पावन तो परमात्मा है फिर गंगा में स्नान करने क्यों जाते हो! गंगा के कण्ठे पर जाकर बैठते हैं कि वहाँ ही हम मरें। पहले बंगाल में जब कोई मरने पर होते थे तो गंगा में जाकर हरीबोल करते थे। समझते थे यह मुक्त हो गया। अब आत्मा तो निकल गई। वह तो पवित्र बनी नहीं। आत्मा को पवित्र बनाने वाला बाप ही है, उनको ही पुकारते हैं। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। बाप आकर पुरानी दुनिया को नया बनाते हैं। बाकी नई रचते नहीं हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप में जो गुण हैं, वह स्वयं में भरने हैं। इम्तहान के पहले पुरूषार्थ कर स्वयं को कम्पलीट पावन बनाना है, इसमें मिया मिट्ठू नहीं बनना है।

2) स्वदर्शन चक्रधारी बनना और बनाना है। बाप और चक्र को याद करना है। बेहद बाप द्वारा बेहद की बातें सुनकर अपनी बुद्धि बेहद में रखनी है। हद में नहीं आना है।

वरदान:-स्वीट साइलेन्स की लवलीन स्थिति द्वारा नष्टोमोहा समर्थ स्वरूप भव
देह, देह के सम्बन्ध, देह के संस्कार, व्यक्ति या वैभव, वायुमण्डल, वायब्रेशन सब होते हुए भी अपनी ओर आकर्षित न करें। लोग चिल्ल्लाते रहें और आप अचल रहो। प्रकृति, माया सब लास्ट दांव लगाने के लिए अपनी तरफ कितना भी खीचें लेकिन आप न्यारे और बाप के प्यारे बनने की स्थिति में लवलीन रहो – इसको कहा जाता है देखते हुए न देखो, सुनते हुए न सुनो। यही स्वीट साइलेन्स स्वरूप की लवलीन स्थिति है, जब ऐसी स्थिति बनेंगी तब कहेंगे नष्टोमोहा समर्थ स्वरूप की वरदानी आत्मा।
स्लोगन:-होलीहंस बन अवगुण रूपी कंकड़ को छोड़ अच्छाई रूपी मोती चुगते चलो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 31 March 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 31 March 2020

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31-03-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“ मीठे बच्चे – तुम अभी पुरानी दुनिया के गेट से निकलकर शान्तिधाम और सुखधाम में जा रहे हो , बाप ही मुक्ति – जीवनमुक्ति का रास्ता बताते हैं ”
प्रश्नः-वर्तमान समय सबसे अच्छा कर्म कौन सा है?
उत्तर:-सबसे अच्छा कर्म है मन्सा, वाचा, कर्मणा अन्धों की लाठी बनना। तुम बच्चों को विचार सागर मंथन करना चाहिए कि ऐसा कौन-सा शब्द लिखें जो मनुष्यों को घर का (मुक्ति का) और जीवनमुक्ति का रास्ता मिल जाए। मनुष्य सहज समझ लें कि यहाँ शान्ति सुख की दुनिया में जाने का रास्ता बताया जाता है।

ओम् शान्ति। जादूगर की बत्ती सुना है? अलाउद्दीन की बत्ती भी गाया जाता है। अलाउद्दीन की बत्ती वा जादूगर की बत्ती क्या-क्या दिखाती है! वैकुण्ठ, स्वर्ग, सुखधाम। बत्ती को प्रकाश कहा जाता है। अभी तो अन्धियारा है ना। अब यह जो प्रकाश दिखाने के लिए बच्चे प्रदर्शनी मेले करते हैं, इतना खर्चा करते हैं, माथा मारते हैं। पूछते हैं बाबा इनका नाम क्या रखें? यहाँ बाम्बे को कहते हैं गेट-वे ऑफ इन्डिया। स्टीमर पहले बाम्बे में ही आते हैं। देहली में भी इन्डिया गेट है। अब अपना यह है गेट ऑफ मुक्ति जीवनमुक्ति। दो गेट्स हैं ना। हमेशा गेट दो होते हैं इन और आउट। एक से आना, दूसरे से जाना। यह भी ऐसे है-हम नई दुनिया में आते हैं फिर पुरानी दुनिया से बाहर निकल अपने घर चले जाते हैं। परन्तु वापस आपेही तो हम जा नहीं सकते क्योंकि घर को भूल गये हैं, गाइड चाहिए। वह भी हमको मिला है जो रास्ता बताते हैं। बच्चे जानते हैं बाबा हमको मुक्ति-जीवनमुक्ति, शान्ति और सुख का रास्ता बताते हैं। तो गेट ऑफ शान्तिधाम सुखधाम लिखें। विचार सागर मंथन करना होता है ना। बहुत ख्यालात चलते हैं-मुक्ति-जीवनमुक्ति किसको कहा जाता है, वह भी कोई को पता नहीं है। शान्ति और सुख तो सभी चाहते हैं। शान्ति भी हो और धन दौलत भी हो। वह तो होता ही है सतयुग में। तो नाम लिख दें-गेट ऑफ शान्तिधाम और सुखधाम अथवा गेट ऑफ प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी। यह तो अच्छे अक्षर हैं। तीनों ही यहाँ नहीं हैं। तो इस पर फिर समझाना भी पड़े। नई दुनिया में यह सब था। नई दुनिया की स्थापना करने वाला है पतित-पावन, गाड फादर। तो जरूर हमको इस पुरानी दुनिया से निकल घर जाना पड़े। तो यह गेट हुआ ना-प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी का। बाबा को यह नाम अच्छा लगता है। अब वास्तव में उसकी ओपनिंग तो शिवबाबा करते हैं। परन्तु हम ब्राह्मणों द्वारा कराते हैं। दुनिया में ओपनिंग सेरीमनी तो बहुत होती रहती हैं ना। कोई हॉस्पिटल की करेंगे, कोई युनिवर्सिटी की करेंगे। यह तो एक ही बार होती है और इस समय ही होती है तो इसलिए विचार किया जाता है। बच्चों ने लिखा-ब्रह्मा बाबा आकर उद्घाटन करें। बापदादा दोनों को बुलायें। बाप कहते हैं तुम बाहर कहीं जा नहीं सकते। उद्घाटन करने के लिए जायें, विवेक नहीं कहता, कायदा नहीं। यह तो कोई भी खोल सकते हैं। अखबार में भी पड़ेगा-प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारियां। यह नाम भी बड़ा अच्छा है ना। प्रजापिता तो सबका बाप हो गया। वह कोई कम है क्या! और फिर बाप खुद सेरीमनी कराते हैं। करनकरावनहार है ना। बुद्धि में रहना चाहिए ना हम स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। तो कितना पुरूषार्थ कर श्रीमत पर चलना चाहिए। वर्तमान समय मंसा-वाचा-कर्मणा सबसे अच्छा कर्म तो एक ही है-अंधों की लाठी बनना। गाते भी हैं – हे प्रभू अंधों की लाठी। सब अन्धे ही अन्धे हैं। तो बाप आकर लाठी बनते हैं। ज्ञान का तीसरा नेत्र देते हैं, जिससे तुम स्वर्ग में नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जाते हो। नम्बरवार तो हैं ही। यह बहुत बड़ी बेहद की हॉस्पिटल कम युनिवर्सिटी है। समझाया जाता है-आत्माओं का बाप परमपिता परमात्मा पतित-पावन है। तुम उस बाप को याद करो तो सुखधाम चले जायेंगे। यह है हेल, इनको हेविन नहीं कहेंगे। हेविन में है ही एक धर्म। भारत स्वर्ग था, दूसरा कोई धर्म नहीं था। यह सिर्फ याद करें, यह भी मनमनाभव है। हम स्वर्ग में सारे विश्व के मालिक थे-इतना भी याद नहीं पड़ता है! बुद्धि में है हमको बाप मिला है तो वह खुशी रहनी चाहिए। परन्तु माया भी कम नहीं है। ऐसे बाप का बनकर फिर भी इतनी खुशी में नहीं रहते हैं। घुटके खाते रहते हैं। माया घड़ी-घड़ी बहुत घुटके खिलाती है। शिवबाबा की याद भुला देती है। खुद भी कहते हैं याद ठहरती नहीं है। बाप घुटका खिलाते हैं ज्ञान सागर में, माया फिर घुटका खिलाती है विषय सागर में। बड़ा खुशी से घुटका खाने लग पड़ते हैं। बाप कहते हैं शिवबाबा को याद करो। माया फिर भुला देती है। बाप को याद ही नहीं करते। बाप को जानते ही नहीं। दु:ख हर्ता सुख कर्ता तो परमपिता परमात्मा है ना। वह है ही दु:ख हरने वाला। वह फिर गंगा में जाकर डुबकी लगाते हैं। समझते हैं गंगा पतित-पावनी है। सतयुग में गंगा को दु:ख हरनी पाप कटनी नहीं कहेंगे। साधू सन्त आदि सब जाकर नदियों के किनारे बैठते हैं। सागर के किनारे क्यों नहीं बैठते हैं? अभी तुम बच्चे सागर के किनारे बैठे हो। ढेर के ढेर बच्चे सागर पास आते हैं। फिर समझते हैं सागर से निकली हुई यह छोटी-बड़ी नदियाँ भी हैं। ब्रह्म पुत्रा, सिंध, सरस्वती यह भी नाम रखे हुए हैं।

बाप समझाते हैं – बच्चे, तुम्हें मन्सा-वाचा-कर्मणा बहुत-बहुत ध्यान रखना है, कभी भी तुम्हें क्रोध नहीं आना चाहिए। क्रोध पहले मन्सा में आता फिर वाचा और कर्मणा में भी आ जाता है। यह तीन खिड़कियाँ हैं इसलिए बाप समझाते हैं-मीठे बच्चे, वाचा अधिक नहीं चलाओ, शान्त में रहो, वाचा में आये तो कर्मणा में आ जायेगा। गुस्सा पहले मन्सा में आता है फिर वाचा-कर्मणा में आता है। तीनों खिड़कियों से निकलता है। पहले मन्सा में आयेगा। दुनिया वाले तो एक-दो को दु:ख देते रहते हैं, लड़ते-झगड़ते रहते हैं। तुमको तो कोई को भी दु:ख नहीं देना है। ख्याल भी नहीं आना चाहिए। साइलेन्स में रहना बड़ा अच्छा है। तो बाप आकर स्वर्ग का अथवा सुख-शान्ति का गेट बतलाते हैं। बच्चों को ही बतलाते हैं। बच्चों को कहते हैं तुम भी औरों को बतलाओ। प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी होती है स्वर्ग में। वहाँ कैसे जाते हैं, वह समझना है। यह महाभारत लड़ाई भी गेट खोलती है। बाबा का विचार सागर मंथन तो चलता है ना। क्या नाम रखें? सवेरे विचार सागर मंथन करने से मक्खन निकलता है। अच्छी राय निकलती है, तब बाबा कहते हैं सवेरे उठ बाप को याद करो और विचार सागर मंथन करो-क्या नाम रखा जाए? विचार करना चाहिए, कोई का अच्छा विचार भी निकलता है। अब तुम समझते हो पतित को पावन बनाना माना नर्कवासी से स्वर्गवासी बनाना। देवतायें पावन हैं, तब तो उनके आगे माथा टेकते हैं। तुम अभी किसको माथा नहीं टेक सकते हो, कायदा नहीं। बाकी युक्ति से चलना होता है। साधू लोग अपने को ऊंच पवित्र समझते हैं, औरों को अपवित्र नींच समझते हैं। तुम भल जानते हो हम सबसे ऊंच हैं परन्तु कोई हाथ जोड़े तो रेसपान्ड देना पड़े। हरीओम् तत्सत् करते हैं, तो करना पड़े। युक्ति से नहीं चलेंगे तो वह हाथ नहीं आयेंगे। बड़ी युक्तियां चाहिए। जब मौत सिर पर आता है तो सभी भगवान का नाम लेते हैं। आजकल इत़फाक तो बहुत होते रहेंगे। आहिस्ते-आहिस्ते आग फैलती है। आग शुरू होगी विलायत से फिर आहिस्ते-आहिस्ते सारी दुनिया जल जायेगी। पिछाड़ी में तुम बच्चे ही रह जाते हो। तुम्हारी आत्मा पवित्र हो जाती है तो फिर तुमको वहाँ नई दुनिया मिलती है। दुनिया का नया नोट तुम बच्चों को मिलता है। तुम राज्य करते हो। अलाउद्दीन की बत्ती भी मशहूर है ना! नोट ऐसा करने से कारून का खजाना मिल जाता है। है भी बरोबर। तुम जानते हो अल्लाह अवलदीन झट इशारे से साक्षात्कार कराते हैं। सिर्फ तुम शिवबाबा को याद करो तो सब साक्षात्कार हो जायेंगे। नौधा भक्ति से भी साक्षात्कार होता है ना। यहाँ तुमको एम ऑब्जेक्ट का साक्षात्कार तो होता ही है फिर तुम बाबा को, स्वर्ग को बहुत याद करेंगे। घड़ी-घड़ी देखते रहेंगे। जो बाबा की याद में और ज्ञान में मस्त होंगे वही अन्त की सभी सीन सीनरी देख सकेंगे। बड़ी मंजिल है। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना, मासी का घर नहीं है। बहुत मेहनत है। याद ही मुख्य है। जैसे बाबा दिव्य दृष्टि दाता है तो स्वयं अपने लिए दिव्य दृष्टि दाता बन जायेंगे। जैसे भक्ति मार्ग में तीव्र वेग से याद करते हैं तो साक्षात्कार होता है। अपनी मेहनत से जैसे दिव्य दृष्टि दाता बन जाते हैं। तुम भी याद की मेहनत में रहेंगे तो बहुत खुशी में रहेंगे और साक्षात्कार होते रहेंगे। यह सारी दुनिया भूल जाए। मनमनाभव हो जाएं। बाकी क्या चाहिए! योगबल से फिर तुम अपना शरीर छोड़ देते हो। भक्ति में भी मेहनत होती है, इसमें भी मेहनत चाहिए। मेहनत का रास्ता बाबा बहुत फर्स्टक्लास बताते रहते हैं। अपने को आत्मा समझने से फिर देह का भान ही नहीं रहेगा। जैसे बाप समान बन जायेंगे। साक्षात्कार करते रहेंगे। खुशी भी बहुत रहेगी। रिजल्ट सारी पिछाड़ी की गाई हुई है। अपने नाम-रूप से भी न्यारा होना है तो फिर दूसरे के नाम-रूप को याद करने से क्या हालत होगी! नॉलेज तो बहुत सहज है। प्राचीन भारत का योग जो है, जादू उसमें है। बाबा ने समझाया है ब्रह्म ज्ञानी भी ऐसे शरीर छोड़ते हैं। हम आत्मा हैं, परमात्मा में लीन होना है। लीन कोई होते नहीं हैं। हैं ब्रह्म ज्ञानी। बाबा ने देखा है बैठे-बैठे शरीर छोड़ देते हैं। वायुमण्डल बड़ा शान्त रहता है, सन्नाटा हो जाता है। सन्नाटा भी उनको भासेगा जो ज्ञान मार्ग में होंगे, शान्त में रहने वाले होंगे। बाकी कई बच्चे तो अभी बेबियाँ हैं। घड़ी-घड़ी गिर पड़ते हैं, इसमें बहुत-बहुत गुप्त मेहनत है। भक्ति मार्ग की मेहनत प्रत्यक्ष होती है। माला फेरो, कोठी में बैठ भक्ति करो। यहाँ तो चलते-फिरते तुम याद में रहते हो। कोई को पता पड़ न सके कि यह राजाई ले रहे हैं। योग से ही सारा हिसाब-किताब चुक्तू करना है। ज्ञान से थोड़ेही चुक्तू होता है। हिसाब-किताब चुक्तू होगा याद से। कर्मभोग याद से चुक्तू होगा। यह है गुप्त। बाबा सब कुछ गुप्त सिखलाते हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मन्सा-वाचा-कर्मणा कभी भी क्रोध नहीं करना है। इन तीनों खिड़कियों पर बहुत ध्यान रखना है। वाचा अधिक नहीं चलाना है। एक-दो को दु:ख नहीं देना है।

2) ज्ञान और योग में मस्त रह अन्तिम सीन सीनरी देखनी हैं। अपने वा दूसरों के नाम-रूप को भूल मैं आत्मा हूँ, इस स्मृति से देहभान को समाप्त करना है।

वरदान:-रूहानी ड्रिल के अभ्यास द्वारा फाइनल पेपर में पास होने वाले सदा शक्तिशाली भव
जैसे वर्तमान समय के प्रमाण शरीर के लिए सर्व बीमारियों का इलाज एक्सरसाइज़ सिखाते हैं। ऐसे आत्मा को सदा शक्तिशाली बनाने के लिए रूहानी एक्सरसाइज का अभ्यास चाहिए। चारों ओर कितना भी हलचल का वातावरण हो लेकिन आवाज में रहते आवाज से परे स्थिति का अभ्यास करो। मन को जहाँ और जितना समय स्थित करने चाहो उतना समय वहाँ स्थित कर लो – तब शक्तिशाली बन फाइनल पेपर में पास हो सकेंगे।
स्लोगन:-अपने विकारी स्वभाव-संस्कार व कर्म को समर्पण कर देना ही समर्पित होना है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 30 March 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 30 March 2020

Murli Pdf for Print : – 

30-03-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“ मीठे बच्चे – तुम्हारा चेहरा सदा खुशनुम : चाहिए ‘ हमें भगवान पढ़ाते हैं ‘, यह खुशी चेहरे से झलकनी चाहिए ”
प्रश्नः-अभी तुम बच्चों का मुख्य पुरूषार्थ क्या है?
उत्तर:-तुम सजाओं से छूटने का ही पुरूषार्थ करते रहते हो। उसके लिए मुख्य है याद की यात्रा, जिससे ही विकर्म विनाश होते हैं। तुम प्यार से याद करो तो बहुत कमाई जमा होती जायेगी। सवेरे-सवेरे उठकर याद में बैठने से पुरानी दुनिया भूलती जायेगी। ज्ञान की बातें बुद्धि में आती रहेंगी। तुम बच्चों को मुख से कोई किचड़-पट्टी की बातें नहीं बोलनी हैं।
गीत:-तुम्हें पाके हमने……

ओम् शान्ति। गीत जब सुनते हैं तो उस समय कोई-कोई को उसका अर्थ समझ में आता है और वह खुशी भी चढ़ती है। भगवान हमको पढ़ाते हैं, भगवान हमको विश्व की बादशाही देते हैं। परन्तु इतनी खुशी कोई विरले को यहाँ रहती है। स्थाई वह याद ठहरती नहीं है। हम बाप के बने हैं, बाप हमको पढ़ाते हैं। बहुत हैं जिनको यह नशा चढ़ता नहीं है। उन सतसंगों आदि में कथायें सुनते हैं, उनको भी खुशी होती है। यहाँ तो बाप कितनी अच्छी बातें सुनाते हैं। बाप पढ़ाते हैं और फिर विश्व का मालिक बनाते हैं तो स्टूडेन्ट को कितनी खुशी होनी चाहिए। उस जिस्मानी पढ़ाई पढ़ने वालों को जितनी खुशी रहती है, यहाँ वालों को उतनी खुशी नहीं रहती। बुद्धि में बैठता ही नहीं। बाप ने समझाया है ऐसे-ऐसे गीत 4-5 बार सुनो। बाप को भूलने से फिर पुरानी दुनिया और पुराने सम्बन्ध भी याद आ जाते हैं। ऐसे समय गीत सुनने से भी बाप की याद आ जायेगी। बाप कहने से वर्सा भी याद आ जाता है। पढ़ाई से वर्सा मिलता है। तुम शिवबाबा से पढ़ते हो सारे विश्व का मालिक बनने। तो बाकी और क्या चाहिए। ऐसे स्टूडेन्ट को अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए! रात-दिन नींद भी फिट जाए। खास नींद फिटा करके भी ऐसे बाप और टीचर को याद करते रहना चाहिए। जैसे मस्ताने। ओहो, हमको बाप से विश्व की बादशाही मिलती है! परन्तु माया याद करने नहीं देती है। मित्र-सम्बन्धियों आदि की याद आती रहती है। उनका ही चिंतन रहता है। पुराना सड़ा हुआ किचड़ा बहुतों को याद आता है। बाप जो बतलाते हैं, तुम विश्व के मालिक बनते हो वह नशा नहीं चढ़ता। स्कूल में पढ़ने वालों का चेहरा खुशनुम: रहता है। यहाँ भगवान पढ़ाते हैं, वह खुशी कोई विरले को रहती है। नहीं तो खुशी का पारा अथाह चढ़ा रहना चाहिए। बेहद का बाप हमको पढ़ाते हैं, यह भूल जाते हैं। यह याद रहे तो भी खुशी रहे। परन्तु पास्ट का कर्मभोग ही ऐसा है तो बाप को याद करते ही नहीं। मुँह फिर भी किचड़े तरफ चला जाता है। बाबा सबके लिए तो नहीं कहते हैं, नम्बरवार हैं। महान सौभाग्यशाली वह जो बाप की याद में रहे। भगवान, बाबा हमको पढ़ाते हैं! जैसे उस पढ़ाई में रहता है फलाना टीचर हमको बैरिस्टर बनाते हैं, वैसे यहाँ हमको भगवान पढ़ाते हैं – भगवान भगवती बनाने के लिए तो कितना नशा रहना चाहिए। सुनने समय कोई-कोई को नशा चढ़ता है। बाकी तो कुछ भी नहीं समझते हैं। बस गुरू किया, समझेंगे यह हमको साथ ले जायेंगे। भगवान से मिलायेंगे। यह तो खुद भगवान हैं। अपने से मिलाते हैं, साथ ले जायेंगे। मनुष्य गुरू करते ही इसलिए हैं कि भगवान के पास ले जाए वा शान्तिधाम ले जाये। यह बाप सम्मुख कितना समझाते हैं। तुम स्टूडेन्ट हो। पढ़ाने वाले टीचर को तो याद करो। बिल्कुल ही याद नहीं करते, बात मत पूछो। अच्छे-अच्छे बच्चे भी याद नहीं करते। शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं, वह ज्ञान का सागर है, हमको वर्सा देते हैं, यह याद रहे तो भी खुशी का पारा चढ़ा रहे। बाप सम्मुख बताते हैं फिर भी वह नशा नहीं चढ़ता। बुद्धि और-और तरफ चली जाती है। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। मैं गैरन्टी करता हूँ – एक बाप के सिवाए और कोई को याद न करो। विनाश होने वाली चीज़ को याद क्या करना है। यहाँ तो कोई मरता है तो 2-4 वर्ष तक भी उनको याद करते रहते। उनका गायन करते रहते। अब बाप सम्मुख कहते हैं बच्चों को कि मुझे याद करो। जो जितना प्यार से याद करते हैं उतना पाप कटते जाते हैं। बहुत कमाई होती है। सवेरे उठकर बाप को याद करो। भक्ति भी मनुष्य सवेरे उठकर करते हैं। तुम तो हो ज्ञान वाले। तुम्हें पुरानी दुनिया की किचड़पट्टी में नहीं फँसना है। परन्तु कई बच्चे ऐसे फँस पड़ते हैं जो बात मत पूछो। किचड़पट्टी से निकलते ही नहीं। सारा दिन किचड़ा ही बोलते रहते। ज्ञान की बातें बुद्धि में आती ही नहीं। कई तो ऐसे बच्चे भी हैं जो सारा दिन सर्विस पर भागते रहते हैं। बाप की जो सर्विस करते हैं, याद भी वह आयेंगे। इस समय सबसे जास्ती सर्विस पर तत्पर मनोहर देखने में आती है। आज करनाल गई, आज कहाँ गई, सर्विस पर भागती रहती है। जो आपस में लड़ते रहते वो सर्विस क्या करते होंगे! बाप को प्यारे कौन लगेंगे? जो अच्छी सर्विस करते हैं, दिन-रात सर्विस की ही चिंता रहती है, बाप की दिल पर भी वही चढ़ते हैं। घड़ी-घड़ी ऐसे गीत तुम सुनते रहो तो भी याद रहे, कुछ नशा चढ़े। बाबा ने कहा है, कोई समय किसको उदासी आ जाती है तो रिकार्ड बजाने से खुशी आ जायेगी। ओहो! हम विश्व के मालिक बनते हैं। बाप तो सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो। कितनी सहज पढ़ाई है। बाबा ने अच्छे-अच्छे 10-12 रिकार्ड छांटकर निकाले थे कि हरेक के पास रहने चाहिए। परन्तु फिर भी भूल जाते हैं। कई तो चलते-चलते पढ़ाई ही छोड़ देते हैं। माया वार कर लेती है। बाप तमोप्रधान बुद्धि को सतोप्रधान बनाने की कितनी सहज युक्ति बताते हैं। अभी तुमको रांग राइट सोचने की बुद्धि मिली है। बुलाते भी बाप को हैं-हे पतित-पावन आओ। अब बाप आये हैं तो पावन बनना चाहिए ना। तुम्हारे सिर पर जन्म-जन्मान्तर का बोझा है, उसके लिए जितना याद करेंगे, पवित्र बनेंगे, खुशी भी रहेगी। भल सर्विस तो करते रहते हैं परन्तु अपना भी हिसाब रखना है। हम बाप को कितना समय याद करते हैं। याद का चार्ट कोई रख नहीं सकते। प्वाइंट तो भल लिखते हैं परन्तु याद को भूल जाते हैं। बाप कहते हैं तुम याद में रह भाषण करेंगे तो बल बहुत मिलेगा। नहीं तो बाप कहते हैं मैं ही जाकर बहुतों को मदद करता हूँ। कोई में प्रवेश कर मैं ही जाकर सर्विस करता हूँ। सर्विस तो करनी है ना। देखता हूँ किसका भाग्य खुलने का है, समझाने वाले में इतना अक्ल नहीं है तो मैं प्रवेश कर सर्विस कर लेता हूँ फिर कोई-कोई लिखते हैं-बाबा ने ही यह सर्विस की। हमारे में तो इतनी ताकत नहीं, बाबा ने मुरली चलाई। कोई को फिर अपना अहंकार आ जाता है, हमने ऐसा अच्छा समझाया। बाप कहते हैं मैं कल्याण करने के लिए प्रवेश करता हूँ फिर वह ब्राह्मणी से भी तीखे हो जाते हैं। कोई बुद्धू को भेज दूँ तो वह समझते हैं इससे तो हम अच्छा समझा सकते हैं। गुण भी नहीं हैं। इससे तो हमारी अवस्था अच्छी है। कोई-कोई हेड बनकर रहते हैं तो बड़ा नशा चढ़ जाता है। बहुत भभके से रहते हैं। बड़े आदमी से भी तू-तू कर बात करते हैं। बस उनको देवी-देवी कहते हैं तो उसमें ही खुश हो जाते। ऐसे भी बहुत हैं। टीचर से भी स्टूडेन्ट होशियार हो जाते हैं। इम्तहान पास किया हुआ तो एक बाबा ही है, वह है ज्ञान सागर। उन द्वारा तुम पढ़कर फिर पढ़ाते हो। कोई तो अच्छी रीति धारणा कर लेते हैं। कोई भूल जाते हैं। बड़े ते बड़ी मुख्य बात है याद की यात्रा। हमारे विकर्म विनाश कैसे हों? कई बच्चे तो ऐसी चलन चलते हैं जो बस यह बाबा जाने और वह बाबा जाने।

अभी तुम बच्चों को सजाओं से छूटने का ही मुख्य पुरूषार्थ करना है। उसके लिए मुख्य है याद की यात्रा, जिससे ही विकर्म विनाश होते हैं। भल कोई पैसे में मदद करते हैं, समझते हैं हम साहूकार बनेंगे परन्तु पुरूषार्थ तो सजाओं से बचने का करना है। नहीं तो बाप के आगे सजा खानी पड़ेगी। जज का बच्चा कोई ऐसा काम करे तो जज को भी लज्जा आयेगी ना। बाप भी कहेंगे हम जिनकी पालना करता हूँ उनको फिर सजा खिलाऊंगा! उस समय कांध नीचे कर हाय-हाय करते रहेंगे-बाप ने इतना समझाया, पढ़ाया, हमने ध्यान नहीं दिया। बाप के साथ धर्मराज भी तो है ना। वह तो जन्मपत्री को जानते हैं। अभी तो तुम प्रैक्टिकल में देखते हो। 10 वर्ष पवित्रता में चला, अचानक ही माया ने ऐसा घूँसा लगाया, की कमाई चट कर दी, पतित बन पड़ा। ऐसे बहुत मिसाल होते रहते हैं। बहुत गिरते हैं। माया के तूफानों में सारा दिन हैरान रहते हैं, फिर बाप को ही भूल जाते हैं। बाप से हमको बेहद की बादशाही मिलती है, वह खुशी नहीं रहती। काम के पीछे फिर मोह भी है। इसमें नष्टोमोहा बनना पड़े। पतितों से क्या दिल लगानी है। हाँ, यही ख्याल रखना है-इनको भी हम बाप का परिचय दे उठावें। इनको किस रीति शिवालय का लायक बनायें। अन्दर में यह युक्ति रचो। मोह की बात नहीं। कितना भी प्यारा सम्बन्धी हो, उनको भी समझाते रहो। किसी में भी हड्डी प्यार की रग न जाये। नहीं तो सुधरेंगे नहीं। रहमदिल बनना चाहिए। अपने पर भी रहम करना है और औरों पर भी रहम करना है। बाप को भी तरस पड़ता है। देखना है हम कितनों को आपस-मान बनाते हैं। बाबा को सबूत देना पड़े। हमने कितनों को परिचय दिया। वह भी फिर लिखते-बाबा हमको इन द्वारा परिचय बहुत अच्छा मिला। बाबा के पास सबूत आये तब बाबा समझे हाँ यह सर्विस करते हैं। बाबा को लिखें बाबा यह ब्राह्मणी तो बड़ी होशियार है। बहुत अच्छी सर्विस करती है, हमको अच्छा पढ़ाती है। योग में फिर बच्चे फेल होते हैं। याद करने का अक्ल नहीं है। बाप समझाते हैं भोजन खाते हो तो भी शिवबाबा को याद करके खाओ। कहाँ घूमने फिरने जाते हो शिवबाबा को याद करो। झरमुई झगमुई न करो। भल कोई बात का ख्यालात भी आता है फिर बाप को याद करो तो गोया कामकाज का ख्याल भी किया फिर बाबा की याद में लग गया। बाप कहते हैं कर्म तो भल करो, नींद भी करो, साथ-साथ यह भी करो। कम से कम 8 घण्टे तक आना चाहिए-यह होगा पिछाड़ी तक। धीरे-धीरे अपना चार्ट बढ़ाते रहो। कोई-कोई लिखते हैं दो घण्टा याद में रहा फिर चलते-चलते चार्ट ढीला हो जाता है। वह भी माया गुम कर देती है। माया बड़ी जबरदस्त है। जो इस सर्विस में सारा दिन बिजी रहेंगे वही याद भी कर सकेंगे। घड़ी-घड़ी बाप का परिचय देते रहेंगे। बाबा याद के लिए बहुत जोर देते रहते हैं। खुद भी फील करते हैं हम याद में रह नहीं सकते हैं। याद में ही माया विघ्न डालती है। पढ़ाई तो बहुत सहज है। बाप से हम पढ़ते भी हैं। जितना धन लेंगे उतना साहूकार बनेंगे। बाप तो सभी को पढ़ाते हैं ना। वाणी सबके पास जाती है सिर्फ तुम नहीं, सब पढ़ रहे हैं। वाणी नहीं जाती तो चिल्लाते हैं। कई तो फिर ऐसे भी हैं जो सुनेंगे ही नहीं। ऐसे ही चलते रहते। मुरली सुनने का शौक होना चाहिए। गीत कितना फर्स्ट क्लास है-बाबा हम अपना वर्सा लेने आये हैं। कहते भी हैं ना-बाबा, जैसी हूँ, तैसी हूँ, कानी हूँ, कैसी भी हूँ, आपकी हूँ। वह तो ठीक है परन्तु छी-छी से तो अच्छा बनना चाहिए ना। सारा मदार है योग और पढ़ाई पर।

बाप का बनने के बाद यह विचार हर बच्चे को आना चाहिए कि हम बाप का बने हैं तो स्वर्ग में चलेंगे ही परन्तु हमें स्वर्ग में क्या बनना है, वह भी सोचना है। अच्छी रीति पढ़ो, दैवीगुण धारण करो। बन्दर के बन्दर ही होंगे तो क्या पद पायेंगे? वहाँ भी तो प्रजा नौकर चाकर सब चाहिए ना। पढ़े हुए के आगे अनपढ़े भरी ढोयेंगे। जितना पुरूषार्थ करेंगे उतना अच्छा सुख पायेंगे। अच्छा धनवान बनेंगे तो इज्जत बहुत होगी। पढ़ने वाले की इज्जत अच्छी होती है। बाप तो राय देते रहते हैं। बाप की याद में शान्ति में रहो। परन्तु बाबा जानते हैं सम्मुख रहने वालों से भी दूर रहने वाले बहुत याद में रहते हैं और अच्छा पद पा लेते हैं। भक्ति मार्ग में भी ऐसा होता है। कोई भक्त अच्छे फर्स्टक्लास होते हैं जो गुरू से भी जास्ती याद में रहते हैं। जो बहुत अच्छी भक्ति करते होंगे वही यहाँ आते हैं। सभी भक्त हैं ना। सन्यासी आदि नहीं आयेंगे, सभी भक्त भक्ति करते-करते आ जायेंगे। बाप कितना क्लीयर कर समझाते हैं। तुम ज्ञान उठा रहे हो, सिद्ध होता है तुमने बहुत भक्ति की है। जास्ती भक्ति करने वाले जास्ती पढ़ेंगे। कम भक्ति करने वाले कम पढ़ेंगे। मुख्य मेहनत है याद की। याद से ही विकर्म विनाश होंगे और बहुत मीठा भी बनना है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे सर्विसएबुल, व़फादार, फरमानबरदार बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कितना भी कोई प्यारा सम्बन्धी हो उसमें मोह की रग नहीं जानी चाहिए। नष्टोमोहा बनना है। युक्ति से समझाना है। अपने ऊपर और दूसरों पर रहम करना है।

2) बाप और टीचर को बहुत प्यार से याद करना है। नशा रहे भगवान हमको पढ़ाते हैं, विश्व की बादशाही देते हैं! घूमते फिरते याद में रहना है, झरमुई, झगमुई नहीं करना है।

वरदान:-सर्व आत्माओं को यथार्थ अविनाशी सहारा देने वाले आधार , उद्धारमूर्त भव
वर्तमान समय विश्व के चारों ओर कोई न कोई हलचल है, कहाँ मन के अनेक टेन्शन की हलचल है, कहाँ प्रकृति के तमोप्रधान वायुमण्डल के कारण हलचल है, अल्पकाल के साधन सर्व को चिंता की चिता पर लिये जा रहे हैं इसलिए अल्पकाल के आधार से, प्राप्तियों से, विधियों से थककर वास्तविक सहारा ढूंढ रहे हैं। तो आप आधार, उद्धारमूर्त आत्मायें उन्हें श्रेष्ठ अविनाशी प्राप्तियों की यथार्थ, वास्तविक, अविनाशी सहारे की अनुभूति कराओ।
स्लोगन:-समय अमूल्य खजाना है इसलिए इसे नष्ट करने के बजाए फौरन निर्णय कर सफल करो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 29 March 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 March 2020

Murli Pdf for Print : – 

29-03-20
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 16-12-85 मधुबन

राइट हैन्ड कैसे बनें ?

आज बापदादा अपनी अनेक भुजाओं को देख रहे हैं। 1 भुजायें सदा प्रत्यक्ष कर्म करने का आधार हैं। हर आत्मा अपनी भुजाओं द्वारा ही कर्म करती है। 2. भुजायें सहयोग की निशानी भी कही जातीं। सहयोगी आत्मा को राइटहैण्ड कहा जाता है। 3. भुजाओं को शक्ति रूप में भी दिखाया जाता है, इसलिए बाहुबल कहा जाता है। भुजाओं की और विशेषता है 4. भुजा अर्थात् हाथ स्नेह की निशानी है इसलिए जब भी स्नेह से मिलते हैं तो आपस में हाथ मिलाते हैं। भुजाओं का विशेष स्वरूप पहला सुनाया – संकल्प को कर्म में प्रत्यक्ष करना। आप सभी बाप की भुजायें हो। तो यह चार ही विशेषतायें अपने में दिखाई देती हैं? इन चारों ही विशेषताओं द्वारा अपने आपको जान सकते हो कि मैं कौन-सी भुजा हूँ? भुजा तो सभी हो लेकिन राइट हैं वा लेफ्ट हैं यह इन विशेषताओं से चेक करो।

पहली बात बाप के हर एक श्रेष्ठ संकल्प को, बोल को, कर्म में अर्थात् प्रत्यक्ष जीवन में कहाँ तक लाया है? कर्म सभी के प्रत्यक्ष देखने की सहज वस्तु है। कर्म को सभी देख सकते हैं और सहज जान सकते वा कर्म द्वारा अनुभव कर सकते हैं इसलिए सब लोग भी यही कहते हैं कि कहते तो सब हैं लेकिन करके दिखाओ। प्रत्यक्ष कर्म में देखें तब मानें कि, यह जो कहते हैं वह सत्य है। तो कर्म, संकल्प के साथ बोल को भी प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में स्पष्ट करने वाला है। ऐसे राइट हैण्ड वा राइट भुजा हर कर्म द्वारा बाप को प्रत्यक्ष कर रही है? राइट हैण्ड की विशेषता है – उससे सदा शुभ और श्रेष्ठ कर्म होता है। राइट हैण्ड के कर्म की गति लेफ्ट से तीव्र होती है। तो ऐसे चेक करो। सदा शुभ और श्रेष्ठ कर्म तीव्रगति से हो रहे हैं? श्रेष्ठ कर्मधारी राइट हैण्ड हैं? अगर यह विशेषतायें नहीं तो स्वत: ही लेफ्ट हैण्ड हो गये क्योंकि ऊंचे ते ऊंचे बाप को प्रत्यक्ष करने के निमित्त ऊंचे ते ऊंचे कर्म हैं। चाहे रूहानी दृष्टि द्वारा चाहे अपने खुशी के रूहानियत के चेहरे द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करते हो। यह भी कर्म ही है। तो ऐसे श्रेष्ठ कर्मधारी बने हो?

इसी प्रकार भुजा अर्थात् सहयोग की निशानी। तो चेक करो हर समय बाप के कर्तव्य में सहयोगी हैं? तन-मन-धन तीनों से सदा सहयोगी हैं? वा कभी-कभी के सहयोगी हैं? जैसे लौकिक कार्य में कोई फुल टाइम कार्य करने वाले होते हैं। कोई थोड़ा समय काम करने वाले हैं। उसमें अन्तर होता है ना। तो कभी-कभी के सहयोगी जो हैं उन्हों की प्राप्ति और सदा के सहयोग की प्राप्ति में अन्तर हो जाता है। जब समय मिला, जब उमंग आया वा जब मूड बनी तब सहयोगी बने। नहीं तो सहयोगी के बदले वियोगी बन जाते हैं। तो चेक करो तीनों रूपों से अर्थात् तन-मन-धन सभी रूप से पूर्ण सहयोगी बने हैं वा अधूरे बने हैं? देह और देह के सम्बन्ध उसमें ज्यादा तन-मन-धन लगाते हो वा बाप के श्रेष्ठ कार्य में लगाते हो? देह के सम्बन्धों की जितनी प्रवृत्ति है उतना ही अपने देह की भी प्रवृत्ति लम्बी चौड़ी है। कई बच्चे सम्बन्ध की प्रवृत्ति से परे हो गये हैं लेकिन देह की प्रवृत्ति में समय, संकल्प, धन ईश्वरीय कार्य से ज्यादा लगाते हैं। अपने देह की प्रवृत्ति की गृहस्थी भी बड़ी जाल है। इस जाल से परे रहना, इसको कहेंगे राइट हैण्ड। सिर्फ ब्राह्मण बन गये, ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारी कहने के अधिकारी बन गये इसको सदा के सहयोगी नहीं कहेंगे। लेकिन दोनों ही प्रवृत्तियों से न्यारे और बाप के कार्य के प्यारे। देह की प्रवृत्ति की परिभाषा बहुत विस्तार की है। इस पर भी फिर कभी स्पष्ट करेंगे। लेकिन सहयोगी कहाँ तक बने हैं – यह अपने को चेक करो!

तीसरी बात- भुजा स्नेह की निशानी है। स्नेह अर्थात् मिलन। जैसे देहधारी आत्माओं का देह का मिलन हाथ में हाथ मिलाना होता है। ऐसे जो राइट हैण्ड वा राइट भुजा है उसकी निशानी है – संकल्प में मिलन, बोल में मिलन और संस्कार में मिलन। जो बाप का संकल्प वह राइट हैण्ड का संकल्प होगा। बाप के व्यर्थ संकल्प नहीं होते। सदा समर्थ संकल्प यह निशानी है। जो बाप के बोल, सदा सुखदाई बोल, सदा मधुर बोल, सदा महा-वाक्य हो, साधारण बोल नहीं। सदा अव्यक्त भाव हो, आत्मिक भाव हो। व्यक्त भाव के बोल नहीं। इसको कहते हैं स्नेह अर्थात् मिलन। ऐसे ही संस्कार मिलन। जो बाप के संस्कार, सदा उदारचित, कल्याणकारी, नि:स्वार्थ ऐसे विस्तार तो बहुत है। सार रूप में जो बाप के संस्कार वह राइट हैण्ड के संस्कार होंगे। तो चेक करो ऐसे समान बनना – अर्थात् स्नेही बनना। यह कहाँ तक है?

चौथी बात – भुजा अर्थात् शक्ति। तो यह भी चेक करो कहाँ तक शक्तिशाली बने हैं? संकल्प शक्तिशाली, दृष्टि, वृत्ति शक्तिशाली कहाँ तक बनी है? शक्तिशाली संकल्प, दृष्टि वा वृत्ति की निशानी है – वह शक्तिशाली होने के कारण किसी को भी परिवर्तन कर लेगा। संकल्प से श्रेष्ठ सृष्टि की रचना करेगा। वृत्ति से वायुमण्डल परिवर्तन करेगा। दृष्टि से अशरीरी आत्मा स्वरूप का अनुभव करायेगा। तो ऐसी शक्तिशाली भुजा हो! वा कमजोर हो? अगर कमजोरी है तो लेफ्ट हैं। अभी समझा राइट हैण्ड किसको कहा जाता है! भुजायें तो सभी हो। लेकिन कौन-सी भुजा हो? वह इन विशेषताओं से स्वयं को जानो। अगर दूसरा कोई कहेगा कि तुम राइट हैण्ड नहीं हो तो सिद्ध भी करेंगे और जिद भी करेंगे लेकिन अपने आपको जो हूँ जैसा हूँ वैसे जानो क्योंकि अभी फिर भी स्वयं को परिवर्तन करने का थोड़ा समय है। अलबेलेपन में आ करके चला नहीं दो कि मैं भी ठीक हूँ। मन खाता भी है लेकिन अभिमान वा अलबेलापन परिवर्तन कराए आगे नहीं बढ़ाता है इसलिए इससे मुक्त हो जाओ। यथार्थ रीति से अपने को चेक करो। इसी में ही स्व कल्याण भरा हुआ है। समझा। अच्छा!

सदा स्व परिवर्तन में, स्व-चिन्तन में रहने वाले, सदा स्वयं में सर्व विशेषताओं को चेक कर सम्पन्न बनने वाले, सदा दोनों प्रवृत्तियों से न्यारे, बाप और बाप के कार्य में प्यारे रहने वाले, अभिमान और अलबेलेपन से सदा मुक्त रहने वाले, ऐसे तीव्र पुरूषार्थी श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों से :- सदा अपने को स्वदर्शन चक्रधारी अनुभव करते हो? स्वदर्शन चक्र अनेक प्रकार के माया के चक्करों को समाप्त करने वाला है। माया के अनेक चक्र हैं और बाप उन चक्रों से छुड़ाकर विजयी बना देता। स्वदर्शन चक्र के आगे माया ठहर नहीं सकती – ऐसे अनुभवी हो? बापदादा रोज इसी टाइटिल से यादप्यार भी देते हैं। इसी स्मृति से सदा समर्थ रहो। सदा स्व के दर्शन में रहो तो शक्तिशाली बन जायेंगे। कल्प-कल्प की श्रेष्ठ आत्मायें थे और हैं यह याद रहे तो मायाजीत बने पड़े हैं। सदा ज्ञान को स्मृति में रख, उसकी खुशी में रहो। खुशी अनेक प्रकार के दु:ख भुलाने वाली है। दुनिया दु:खधाम में है और आप सभी संगमयुगी बन गये। यह भी भाग्य है।

2. सदा पवित्रता की शक्ति से स्वयं को पावन बनाए औरों को भी पावन बनने की प्रेरणा देने वाले हो ना? घर-गृहस्थ में रह पवित्र आत्मा बनना, इस विशेषता को दुनिया के आगे प्रत्यक्ष करना है। ऐसे बहादुर बने हो! पावन आत्मायें हैं इसी स्मृति से स्वयं भी परिपक्व और दुनिया को भी यह प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाते चलो। कौन-सी आत्मा हो? असम्भव को सम्भव कर दिखाने के निमित्त, पवित्रता की शक्ति फैलाने वाली आत्मा हूँ। यह सदा स्मृति में रखो।

3. कुमार सदा अपने को मायाजीत कुमार समझते हो? माया से हार खाने वाले नहीं लेकिन सदा माया को हार खिलाने वाले। ऐसे शक्तिशाली बहादुर हो ना! जो बहादुर होता है उससे माया भी स्वयं घबराती है। बहादुर के आगे माया कभी हिम्मत नहीं रख सकती। जब किसी भी प्रकार की कमजोरी देखती है तब माया आती है। बहादुर अर्थात् सदा मायाजीत। माया आ नहीं सकती, ऐसे चैलेन्ज करने वाले हो ना! सभी आगे बढ़ने वाले हो ना! सभी स्वयं को सेवा के निमित्त अर्थात् सदा विश्व कल्याणकारी समझ आगे बढ़ने वाले हो! विश्व कल्याणकारी बेहद में रहते हैं, हद में नहीं आते। हद में आना अर्थात् सच्चे सेवाधारी नहीं। बेहद में रहना अर्थात् जैसा बाप वैसे बच्चे। बाप को फालो करने वाले श्रेष्ठ कुमार हैं, सदा इसी स्मृति में रहो। जैसे बाप सम्पन्न है, बेहद का है ऐसे बाप समान सम्पन्न सर्व खजानों से भरपूर आत्मा हूँ – इस स्मृति से व्यर्थ समाप्त हो जायेगा। समर्थ बन जायेंगे। अच्छा!

अव्यक्त मुरलियों से चुने हुए प्रश्न  उत्तर

प्रश्न :- कौन सा विशेष गुण सम्पूर्ण स्थिति को प्रत्यक्ष करता है? जब आत्मा की सम्पूर्ण स्टेज बन जाती है तो उसका प्रैक्टिकल कर्म में कौन सा गायन होता है?

उत्तर :- समानता का। निंदा-स्तुति, जय-पराजय, सुख-दु:ख सभी में समानता रहे इसको कहा जाता है सम्पूर्णता की स्टेज। दु:ख में भी सूरत वा मस्तक पर दु:ख की लहर के बजाए सुख वा हर्ष की लहर दिखाई दे। निंदा करने वाले के प्रति जरा भी दृष्टि-वृत्ति में अन्तर ना आये। सदा कल्याणकारी दृष्टि शुभचिंतक की वृत्ति रहे। यही है समानता।

प्रश्न :- स्वयं पर ब्लिस करने वा बापदादा से ब्लिस लेने का साधन क्या है?

उत्तर :- सदा बैलेन्स ठीक रहे तो बाप की ब्लिस मिलती रहेगी। महिमा सुनते महिमा का नशा भी न चढ़े और ग्लानि सुनते घृणा भाव भी पैदा न हो। जब दोनों में बैलेन्स ठीक रहेगा तब कमाल वा अपने आपसे सन्तुष्टता का अनुभव होगा।

प्रश्न :- तुम्हारा प्रवृत्ति मार्ग है इसलिए किन दो-दो बातों में बैलेन्स रखना आवश्यक है?

उत्तर :- जैसे आत्मा और शरीर दो हैं, बाप और दादा भी दो हैं। दोनों के कर्तव्य से विश्व परिवर्तन होता है। ऐसे ही दो-दो बातों का बैलेन्स रखो तो श्रेष्ठ प्राप्ति कर सकेंगे : 1-न्यारा और प्यारा 2- महिमा और ग्लानि 3-स्नेह और शक्ति। 4-धर्म और कर्म 5-एकान्तवासी और रमणीक 6-गम्भीर और मिलनसार… ऐसे अनेक प्रकार के बैलेन्स जब समान हों तब सम्पूर्णता के समीप आ सकेंगे। ऐसे नहीं एक मर्ज हो दूसरा इमर्ज हो। इसका प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रश्न :- किस बात में समानता लानी है किस बात में नहीं?

उत्तर :- श्रेष्ठता में समानता लानी है, साधारणता में नहीं। जैसे कर्म श्रेष्ठ वैसे धारणा भी श्रेष्ठ हो। धारणा कर्म को मर्ज न करे। धर्म और कर्म दोनों ही श्रेष्ठता में समान रहें तब कहेंगे धर्मात्मा। तो अपने आपसे पूछो ऐसे धर्मात्मा बने हैं? ऐसे कर्मयोगी बने हैं? ऐसे ब्लिसफुल बने हैं?

प्रश्न :- बुद्धि में यदि किसी भी प्रकार की हलचल होती है तो उसका कारण क्या है?

उत्तर :- उसका कारण है सम्पन्नता में कमी। कोई भी चीज अगर फुल है तो उसके बीच में कभी हलचल नहीं हो सकती। तो अपने आपको किसी भी हलचल से बचाने के लिए सम्पन्न बनते जाओ तो सम्पूर्ण हो जायेंगे। जब कोई भी वस्तु सम्पन्न होती है तो अपने आप आकर्षण करती है। सम्पूर्णता में प्रभाव की शक्ति होती है। तो जितनी अपने में सम्पूर्णता होगी उतना अनेक आत्मायें स्वत: आकर्षित होंगी।

प्रश्न :- देही अभिमानी की सूक्ष्म स्टेज क्या है?

उत्तर :- जो देही अभिमानी हैं, उन्हें यदि किसी भी बात का इशारा मिलता है तो उस इशारे को वर्तमान वा भविष्य दोनों के लिए उन्नति का साधन समझकर उस इशारे को समा लेते वा सहन कर लेते हैं। सूक्ष्म में भी उनकी दृष्टि वृत्ति में क्या कैसे की हलचल उत्पन्न नहीं हो सकती। जैसे महिमा सुनने के समय उस आत्मा के प्रति स्नेह की भावना रहती है वैसे अगर कोई शिक्षा वा इशारा देता है तो भी उसके प्रति स्नेह की शुभचिंतक की भावना रहे। अच्छा- ओम् शान्ति

वरदान:-वरदान :- सदा खुशी  मौज़ की स्थिति में रहने वाले कम्बाइन्ड स्वरूप के अनुभवी भव
बापदादा बच्चों को सदा कहते हैं बच्चे बाप को हाथ में हाथ देकर चलो, अकेले नहीं चलो। अकेले चलने से कभी बोर हो जायेंगे, कभी किसकी नज़र भी पड़ जायेगी। बाप के साथ कम्बाइन्ड हूँ-इस स्वरुप का अनुभव करते रहो तो कभी भी माया की नज़र नहीं पड़ेगी और साथ का अनुभव होने के कारण खुशी से मौज से खाते, चलते मौज मनाते रहेंगे। धोखा व दु:ख देने वाले सम्बन्धों में फँसने से भी बच जायेंगे।
स्लोगन:-योग रूपी कवच पहन कर रखो तो माया रूपी दुश्मन का वार नहीं लगेगा।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 28 March 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 March 2020

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28-03-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“ मीठे बच्चे – यह ज्ञान तुम्हें शीतल बनाता है , इस ज्ञान से काम – क्रोध की आग खत्म हो जाती है , भक्ति से वह आग खत्म नहीं होती ”
प्रश्नः-याद में मुख्य मेहनत कौन सी है?
उत्तर:-बाप की याद में बैठते समय देह भी याद न आये। आत्म-अभिमानी बन बाप को याद करो, यही मेहनत है। इसमें ही विघ्न पड़ता है क्योंकि आधाकल्प देह-अभिमानी रहे हो। भक्ति माना ही देह की याद।

ओम् शान्ति। तुम बच्चे जानते हो याद के लिए एकान्त की बहुत जरूरत है। जितना तुम एकान्त वा शान्त में बाप की याद में रह सकते हो उतना झुण्ड में नहीं रह सकते हो। स्कूल में भी बच्चे पढ़ते हैं तो एकान्त में जाकर स्टडी करते हैं। इसमें भी एकान्त चाहिए। घूमने जाते हो तो उसमें भी याद की यात्रा मुख्य है। पढ़ाई तो बिल्कुल सहज है क्योंकि आधाकल्प माया का राज्य आने से ही तुम देह-अभिमानी बनते हो। पहला-पहला शत्रु है देह-अभिमान। बाप को याद करने के बदले देह को याद कर लेते हैं। इसको देह का अहंकार कहा जाता है। यहाँ तुम बच्चों को कहा जाता है आत्म-अभिमानी बनो, इसमें ही मेहनत लगती है। अब भक्ति तो छूटी। भक्ति होती ही है शरीर के साथ। तीर्थों आदि पर शरीर को ले जाना पड़ता है। दर्शन करना है, यह करना है। शरीर को जाना पड़े। यहाँ तुमको यही चिंतन करना है कि हम आत्मा हैं, हमको परमपिता परमात्मा बाप को याद करना है। बस जितना याद करेंगे तो पाप कट जायेंगे। भक्ति मार्ग में तो कभी पाप कटते नहीं हैं। कोई बुढ़े आदि होते हैं तो अन्दर में यह वहम होता है-हम भक्ति नहीं करेंगे तो नुकसान होगा, नास्तिक बन जायेंगे। भक्ति की जैसे आग लगी हुई है और ज्ञान में है शीतलता। इसमें काम क्रोध की आग खत्म हो जाती है। भक्ति मार्ग में मनुष्य कितनी भावना रखते हैं, मेहनत करते हैं। समझो बद्रीनाथ पर गये, मूर्ति का साक्षात्कार हुआ फिर क्या! झट भावना बन जाती है, फिर बद्रीनाथ के सिवाए और कोई की याद बुद्धि में नहीं रहती। आगे तो पैदल जाते थे। बाप कहते हैं मैं अल्पकाल के लिए मनोकामना पूरी कर देता हूँ, साक्षात्कार कराता हूँ। बाकी मैं इनसे मिलता नहीं हूँ। मेरे बिगर वर्सा थोड़ेही मिलेगा। वर्सा तो तुमको मेरे से ही मिलना है ना। यह तो सभी देहधारी हैं। वर्सा एक ही बाप रचता से मिलता है, बाकी जो भी हैं जड़ अथवा चैतन्य वह सारी है रचना। रचना से कभी वर्सा मिल न सके। पतित-पावन एक ही बाप है। कुमारियों को तो संगदोष से बहुत बचना है। बाप कहते हैं इस पतितपने से तुम आदि-मध्य-अन्त दु:ख पाते हो। अभी सब हैं पतित। तुम्हें अभी पावन बनना है। निराकार बाप ही आकर तुमको पढ़ाते हैं। ऐसे कभी नहीं समझो कि ब्रह्मा पढ़ाते हैं। सबकी बुद्धि शिवबाबा तरफ रहनी चाहिए। शिवबाबा इन द्वारा पढ़ाते हैं। तुम दादियों को भी पढ़ाने वाला शिवबाबा है। उनकी क्या खातिरी करेंगे! तुम शिवबाबा के लिए अंगूर आम ले आते हो, शिवबाबा कहते हैं-मैं तो अभोक्ता हूँ। तुम बच्चों के लिए ही सब कुछ है। भक्तों ने भोग लगाया और बांटकर खाया। मैं थोड़ेही खाता हूँ। बाप कहते हैं मैं तो आता ही हूँ तुम बच्चों को पढ़ाकर पावन बनाने। पावन बनकर तुम इतना ऊंच पद पायेंगे। मेरा धन्धा यह है। कहते ही हैं शिव भगवानुवाच। ब्रह्मा भगवानुवाच तो कहते नहीं हैं। ब्रह्मा वाच भी नहीं कहते हैं। भल यह भी मुरली चलाते हैं परन्तु हमेशा समझो शिवबाबा चलाते हैं। किसी बच्चे को अच्छा तीर लगाना होगा तो खुद प्रवेश कर लेंगे। ज्ञान का तीर तीखा गाया जाता है ना। साइंस में भी कितनी पावर है। बॉम्बस आदि का कितना धमाका होता है। तुम कितनी साइलेन्स में रहते हो। साइंस पर साइलेन्स विजय पाती है।

तुम इस सृष्टि को पावन बनाते हो। पहले तो अपने को पावन बनाना है। ड्रामा अनुसार पावन भी बनना ही है, इसलिए विनाश भी नूँधा हुआ है। ड्रामा को समझ कर बहुत हर्षित रहना चाहिए। अभी हमको जाना है शान्तिधाम। बाप कहते हैं वह तुम्हारा घर है। घर में तो खुशी से जाना चाहिए ना। इसमें देही-अभिमानी बनने की बहुत मेहनत करनी है। इस याद की यात्रा पर ही बाबा बहुत जोर देते हैं, इसमें ही मेहनत है। बाप पूछते हैं चलते फिरते याद करना सहज है या एक जगह बैठकर याद करना सहज है? भक्ति मार्ग में भी कितनी माला फेरते हैं, राम-राम जपते रहते हैं। फायदा तो कुछ भी नहीं। बाप तो तुम बच्चों को बिल्कुल सहज युक्ति बतलाते हैं-भोजन बनाओ, कुछ भी करो, बाप को याद करो। भक्ति मार्ग में श्रीनाथ द्वारे में भोग बनाते हैं, मुँह को पट्टी बांध देते हैं। ज़रा भी आवाज़ न हो। वह है भक्ति मार्ग। तुमको तो बाप को याद करना है। वो लोग इतना भोग लगाते हैं फिर वह कोई खाते थोड़ेही हैं। पण्डे लोगों के कुटुम्ब होते हैं, वह खाते हैं। तुम यहाँ जानते हो हमको शिवबाबा पढ़ाते हैं। भक्ति में थोड़ेही यह समझते हैं कि हमको शिवबाबा पढ़ाते हैं। भल शिव पुराण बनाया है परन्तु उनमें शिव-पार्वती, शिव-शंकर सब मिला दिया है, वह पढ़ने से कोई फायदा नहीं होता है। हर एक को अपना शास्त्र पढ़ना चाहिए। भारतवासियों की है एक गीता। क्रिश्चियन का बाइबिल एक होता है। देवी-देवता धर्म का शास्त्र है गीता। उसमें ही नॉलेज है। नॉलेज ही पढ़ी जाती है। तुमको नॉलेज पढ़नी है। लड़ाई आदि की बातें जिन किताबों में हैं, उससे तुम्हारा कोई काम ही नहीं है। हम हैं योगबल वाले फिर बाहुबल वालों की कहानियां क्यों सुनें! तुम्हारी वास्तव में लड़ाई है नहीं। तुम योगबल से 5 विकारों पर विजय पाते हो। तुम्हारी लड़ाई है 5 विकारों से। वह तो मनुष्य, मनुष्य से लड़ाई करते हैं। तुम अपने विकारों से लड़ाई लड़ते हो। यह बातें सन्यासी आदि समझा न सकें। तुमको कोई ड्रिल आदि भी नहीं सिखलाई जाती है। तुम्हारी ड्रिल है ही एक। तुम्हारा है ही योगबल। याद के बल से 5 विकारों पर जीत पाते हो। यह 5 विकार दुश्मन हैं। उनमें भी नम्बरवन है देह-अभिमान। बाप कहते हैं तुम तो आत्मा हो ना। तुम आत्मा आती हो, आकर गर्भ में प्रवेश करती हो। मैं तो इस शरीर में विराजमान हुआ हूँ। मैं कोई गर्भ में थोड़ेही जाता हूँ। सतयुग में तुम गर्भ महल में रहते हो। फिर रावण राज्य में गर्भ जेल में जाते हो। मैं तो प्रवेश करता हूँ। इसको दिव्य जन्म कहा जाता है। ड्रामा अनुसार मुझे इसमें आना पड़ता है। इनका नाम ब्रह्मा रखता हूँ क्योंकि मेरा बना है ना। एडाप्ट होते हैं तो नाम कितने अच्छे-अच्छे रखते हैं। तुम्हारे भी बहुत अच्छे-अच्छे नाम रखे। लिस्ट बड़ी वन्डरफुल आई थी, सन्देशी द्वारा। बाबा को सब नाम थोड़ेही याद हैं। नाम से तो कोई काम नहीं। शरीर पर नाम रखा जाता है ना। अब तो बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझो, बाप को याद करो। बस। तुम जानते हो हम पूज्य देवता बनते हैं फिर राज्य करेंगे। फिर भक्ति मार्ग में हमारे ही चित्र बनायेंगे। देवियों के बहुत चित्र बनाते हैं। आत्माओं की भी पूजा होती है। मिट्टी के सालिग्राम बनाते हैं फिर रात को तोड़ डालते हैं। देवियों को भी सज़ाकर, पूजा कर फिर समुद्र में डाल देते हैं। बाप कहते हैं मेरा भी रूप बनाकर, खिला पिलाकर फिर मुझे कह देते ठिक्कर-भित्तर में है। सबसे दुर्दशा तो मेरी करते हैं। तुम कितने गरीब बन गये हो। गरीब ही फिर ऊंच पद पाते हैं। साहूकार मुश्किल उठाते हैं। बाबा भी साहूकारों से इतना लेकर क्या करेंगे! यहाँ तो बच्चों के बूँद-बूँद से यह मकान आदि बनते हैं। कहते हैं बाबा हमारी एक ईट लगा दो। समझते हैं रिटर्न में हमको सोने-चांदी के महल मिलेंगे। वहाँ तो सोना ढेर रहता है। सोने की ईटें होगी तब तो मकान बनेंगे। तो बाप बहुत प्यार से कहते हैं-मीठे-मीठे बच्चों, अब मुझे याद करो, अब नाटक पूरा होता है।

बाप गरीब बच्चों को साहूकार बनने की युक्ति बताते हैं-मीठे बच्चे, तुम्हारे पास जो कुछ भी है ट्रांसफर कर दो। यहाँ तो कुछ भी रहना नहीं है। यहाँ जो ट्रॉसफर करेंगे वह नई दुनिया में तुमको सौ गुणा होकर मिलेगा। बाबा कुछ मांगते नहीं हैं। वह तो दाता है, यह युक्ति बताई जाती है। यहाँ तो सब मिट्टी में मिल जाना है। कुछ ट्रॉसफर कर देंगे तो तुमको नई दुनिया में मिलेगा। इस पुरानी दुनिया के विनाश का समय है। यह कुछ भी काम में नहीं आयेगा इसलिए बाबा कहते हैं घर-घर में युनिवर्सिटी कम हॉस्पिटल खोल़ो जिससे हेल्थ और वेल्थ मिलेगी। यही मुख्य है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास 12-3-68

इस समय तुम गरीब साधारण मातायें पुरुषार्थ करके ऊंच पद पा लेती हो। यज्ञ में मदद आदि भी मातायें बहुत करती हैं, पुरुष बहुत थोड़े हैं जो मददगार बनते हैं। माताओं को वारिसपने का नशा नहीं रहता। वह बीज बोती रहती, अपना जीवन बनाती रहती। तुम्हारा ज्ञान है यथार्थ, बाकी है भक्ति। रूहानी बाप ही आकर ज्ञान देते हैं। बाप को समझें तो बाप से वर्सा जरूर लेवें। तुमको बाप पुरुषार्थ कराते रहते हैं, समझाते रहते हैं। टाइम वेस्ट मत करो। बाप जानते हैं कोई अच्छे पुरुषार्थी हैं कोई मीडियम, कोई थर्ड। बाबा से पूछें तो बाबा झट बता दे – तुम फर्स्ट हो या सेकण्ड हो या थर्ड हो। किसको ज्ञान नहीं देते हो तो थर्ड क्लास ठहरे। सबूत नहीं देते तो बाबा जरूर कहेंगे ना। भगवान आकर जो ज्ञान सिखलाते हैं वो फिर प्राय:लोप हो जाता है। यह किसको भी पता नहीं है। ड्रामा के प्लैन अनुसार यह भक्ति मार्ग है, इनसे कोई मुझे प्राप्त कर नहीं सकता। सतयुग में कोई जा नहीं सकता। अभी तुम बच्चे पुरुषार्थ कर रहे हो। कल्प पहले मिसल जितना जिसने पुरुषार्थ किया है, उतना करते रहते हैं। बाप समझ सकते हैं अपना कल्याण कौन कर रहे हैं। बाप तो कहेंगे रोज़ इन लक्ष्मी नारायण के चित्र के आगे आकर बैठो। बाबा आपकी श्रीमत पर यह वर्सा हम जरूर लेंगे। आप समान बनाने की सर्विस का शौक जरूर चाहिए। सेन्टर्स वालों को भी लिखता हूँ, इतने वर्ष पढ़े हो किसको पढ़ा नहीं सकते हो तो बाकी पढ़े क्या हो! बच्चों की उन्नति तो करनी चाहिए ना। बुद्धि में सारा दिन सर्विस के ख्याल चलने चाहिए।

तुम वानप्रस्थी हो ना। वानप्रस्थियों के भी आश्रम होते हैं। वानप्रस्थियों के पास जाना चाहिए, मरने के पहले लक्ष्य तो बता दो। वाणी से परे तुम्हारी आत्मा जायेगी कैसे! पतित आत्मा तो जा न सके। भगवानुवाच मामेकम् याद करो तो तुम वानप्रस्थ में चले जायेंगे। बनारस में भी सर्विस ढेर है। बहुत साधु लोग काशी-वास के लिये वहाँ रहते हैं, सारा दिन कहते रहते हैं शिव काशी विश्वनाथ गंगा। तुम्हारे अन्दर में सदैव खुशी की ताली बजती रहनी चाहिए। स्टूडेन्ट हो ना! सर्विस भी करते हैं, पढ़ते भी हैं। बाप को याद करना है, वर्सा लेना है। हम अब शिवबाबा के पास जाते हैं। यह मन्मनाभव है। परन्तु बहुतों को याद रहती नहीं है। झरमुई झगमुई करते रहते। मूल बात है याद की। याद ही खुशी में लायेगी। सभी चाहते तो हैं कि विश्व में शान्ति हो। बाबा भी कहते हैं उन्हें समझाओ कि विश्व में शान्ति अब स्थापन हो रही है, इसलिये बाबा लक्ष्मी- नारायण के चित्र को जास्ती महत्व देते हैं। बोलो, यह दुनिया स्थापन हो रही है, जहाँ सुख-शान्ति, पवित्रता सब था। सभी कहते हैं विश्व में शान्ति हो। प्राईज भी बहुतों को मिलती रहती है। वर्ल्ड में पीस स्थापन करने वाला तो मालिक होगा ना। इन्हों के राज्य में विश्व में शान्ति थी। एक भाषा, एक राज्य, एक धर्म था। बाकी सभी आत्मायें निराकारी दुनिया में थी। ऐसी दुनिया किसने स्थापन की थी! पीस किसने स्थापन की थी! फारेनर्स भी समझेंगे यह पैराडाइज़ था, इन्हों का राज्य था। वर्ल्ड में पीस तो अब स्थापन हो रही है। बाबा ने समझाया था प्रभात फेरी में भी यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र निकालो। जो सभी के कानों में आवाज पड़े कि यह राज्य स्थापन हो रहा है। नर्क का विनाश सामने खड़ा है। यह तो जानते हैं ड्रामा अनुसार शायद देरी है। बड़ो-बड़ों के तकदीर में अभी नहीं है। फिर भी बाबा पुरुषार्थ कराते रहते हैं। ड्रामा अनुसार सर्विस चल रही है। अच्छा। गुडनाईट।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) संगदोष से अपनी बहुत-बहुत सम्भाल करनी है। कभी पतितों के संग में नहीं आना है। साइलेन्स बल से इस सृष्टि को पावन बनाने की सेवा करनी है।

2) ड्रामा को अच्छी तरह समझकर हर्षित रहना है। अपना सब कुछ नई दुनिया के लिए ट्रांसफर करना है।

वरदान:-रूहानियत के प्रभाव द्वारा फरिश्ते पन का मेकप करने वाले सर्व के स्नेही भव
जो बच्चे सदा बापदादा के संग में रहते हैं-उन्हें संग का रंग ऐसा लगता है जो हर एक के चेहरे पर रूहानियत का प्रभाव दिखाई देता है। जिस रूहानियत में रहने से फरिश्ते पन का मेकप स्वत: हो जाता है। जैसे मेकप करने के बाद कोई कैसा भी हो लेकिन बदल जाता है, मेकप करने से सुन्दर लगता है। यहाँ भी फरिश्ते पन के मेकप से चमकने लगेंगे और यह रूहानी मेकप सर्व का स्नेही बना देगा।
स्लोगन:-ब्रह्मचर्य, योग तथा दिव्यगुणों की धारणा ही वास्तविक पुरूषार्थ है।
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