Daily Gyan Murli : Hindi

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 4 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 4 July 2020

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04-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – ऊंच बनना है तो अपना पोतामेल रोज़ देखो, कोई भी कर्मेन्द्रिय धोखा न दे, आंखें बहुत धोखेबाज हैं इनसे सम्भाल करो”
प्रश्नः-सबसे बुरी आदत कौन-सी है, उनसे बचने का उपाय क्या है?
उत्तर:-सबसे बुरी आदत है – जबान का स्वाद। कोई अच्छी चीज़ देखी तो छिपाकर खा लेंगे। छिपाना अर्थात् चोरी। चोरी रूपी माया भी बहुतों को नाक कान से पकड़ लेती है। इससे बचने का साधन जब भी कहाँ बुद्धि जाए तो खुद ही खुद को सज़ा दो। बुरी आदतों को निकालने के लिए अपने आपको खूब फटकार लगाओ।

ओम शान्ति। आत्म-अभिमानी होकर बैठे हो? हर एक बात अपने आपसे पूछनी होती है। हम आत्म-अभिमानी हो बैठे हैं और बाप को याद कर रहे हैं? गाया हुआ भी है शिव शक्ति पाण्डव सेना। यह शिवबाबा की सेना बैठी है ना। उस जिस्मानी सेना में सिर्फ जवान होते हैं, बूढ़े वा बच्चे आदि नहीं। इस सेना में तो बूढ़े, बच्चे, जवान आदि सब बैठे हैं। यह है माया पर जीत पाने के लिए सेना। हर एक को माया पर जीत पाकर बाप से बेहद का वर्सा लेना है। बच्चे जानते हैं माया बड़ी प्रबल है। कर्मेन्द्रियाँ ही सबसे जास्ती धोखा देती हैं। चार्ट में यह भी लिखो कि आज कौन-सी कर्मेन्द्रिय ने धोखा दिया? आज फलानी को देखा तो दिल हुई इनको हाथ लगायें, यह करें। आंखें बहुत नुकसान करती हैं। हर एक कर्मेन्द्रिय देखो, कौन-सी कर्मेन्द्रिय बहुत नुकसान करती है? सूरदास का भी इस पर मिसाल देते हैं। अपनी जांच रखनी चाहिए। आंखें बहुत धोखा देने वाली हैं। अच्छे-अच्छे बच्चों को भी माया धोखा दे देती है। भल सर्विस अच्छी करते हैं परन्तु आंखें धोखा देती हैं। इस पर बड़ी जांच रखनी होती है क्योंकि दुश्मन है ना। हमारे पद को भ्रष्ट कर देती है। जो सेन्सीबुल बच्चे हैं, उन्हों को अच्छी रीति नोट करना चाहिए। डायरी पॉकेट में पड़ी हो। जैसे भक्ति मार्ग में बुद्धि और तरफ भागती है तो अपने को चुटकी काटते हैं। तुमको भी सज़ा देनी चाहिए। बड़ी खबरदारी रखनी चाहिए। कर्मेन्द्रियाँ धोखा तो नहीं देती! किनारा कर लेना चाहिए। खड़ा होकर देखना भी नहीं चाहिए। स्त्री-पुरूष का ही बहुत हंगामा है। देखने से काम विकार की दृष्टि जाती है इसलिए संन्यासी लोग आंखें बन्द करके बैठते हैं। कोई-कोई संन्यासी तो स्त्री को पीठ देकर बैठते हैं। उन संन्यासियों आदि को क्या मिलता है? करके 10-20 लाख, करोड़ इकट्ठा करेंगे। मर गये तो खलास। फिर दूसरे जन्म में इकट्ठा करना पड़े। तुम बच्चों को तो जो कुछ मिलता है वह अविनाशी वर्सा हो जाता है। वहाँ धन की लालच होती ही नहीं। ऐसी कोई अप्राप्ति होती नहीं, जिसके लिए माथा मारना पड़े। कलियुग अन्त और सतयुग आदि में रात-दिन का फ़र्क है। वहाँ तो अपार सुख होता है। यहाँ कुछ भी नहीं। बाबा हमेशा कहते हैं – संगम अक्षर के साथ पुरूषोत्तम अक्षर जरूर लिखो। साफ-साफ अक्षर बोलने चाहिए। समझाने में सहज होता है। मनुष्य से देवता किये … तो जरूर संगम पर ही आयेगा ना देवता बनाने, नर्कवासी को स्वर्गवासी बनाने। मनुष्य तो घोर अन्धियारे में हैं। स्वर्ग क्या होता है, पता ही नहीं। और धर्म वाले तो स्वर्ग को देख भी नहीं सकते इसलिए बाबा कहते हैं तुम्हारा धर्म बहुत सुख देने वाला है। उनको कहते ही हैं हेविन। परन्तु यह थोड़ेही समझते हैं कि हम भी हेविन में जा सकते हैं। किसको भी पता नहीं है। भारतवासी यह भूल गये हैं। हेविन को लाखों वर्ष कह देते हैं। क्रिश्चियन लोग खुद कहते हैं 3 हज़ार वर्ष पहले हेविन था। लक्ष्मी-नारायण को कहते ही हैं गॉड-गॉडेज। जरूर गॉड ही गॉड-गॉडेज बनायेंगे। तो मेहनत करनी चाहिए। रोज़ अपना पोतामेल देखना चाहिए। कौनसी कर्मेन्द्रिय ने धोखा दिया? जबान भी कोई कम नहीं। कोई अच्छी चीज़ देखी तो छिपाकर खा लेंगे। समझते थोड़ेही हैं कि यह भी पाप हैं। चोरी हुई ना। सो भी शिवबाबा के यज्ञ से चोरी करना बहुत खराब है। कख का चोर सो लख का चोर कहा जाता है। बहुतों को माया नाक से पकड़ती रहती है। यह सब बुरी आदतें निकालनी हैं। अपने पर फटकार डालनी चाहिए। जब तक बुरी आदतें हैं तब तक ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। स्वर्ग में जाना तो बड़ी बात नहीं है। परन्तु कहाँ राजा-रानी कहाँ प्रजा! तो बाप कहते हैं कर्मेन्द्रियों की बड़ी जांच करनी चाहिए। कौन-सी कर्मेन्द्रिय धोखा देती है? पोतामेल निकालना चाहिए। व्यापार है ना। बाप समझाते हैं मेरे से व्यापार करना है, ऊंच पद पाना है तो श्रीमत पर चलो। बाप डायरेक्शन देंगे, उसमें भी माया विघ्न डालेगी। करने नहीं देगी। बाप कहते हैं यह भूलो मत। ग़फलत करने से फिर बहुत पछतायेंगे। कभी ऊंच पद नहीं पायेंगे। अभी तो खुशी से कहते हैं हम नर से नारायण बनेंगे परन्तु अपने से पूछते रहो – कहाँ कर्मेन्द्रियाँ धोखा तो नहीं देती हैं?

अपनी उन्नति करनी है तो बाप जो डायरेक्शन देते हैं उसे अमल में लाओ। सारे दिन का पोतामेल देखो। भूलें तो बहुत होती रहती हैं। आंखें बड़ा धोखा देती हैं। तरस पड़ेगा – इनको खिलाऊं, सौगात दूँ। अपना बहुत टाइम वेस्ट कर लेते हैं। माला का दाना बनने में बड़ी मेहनत है। 8 रत्न हैं मुख्य। 9 रत्न कहते हैं। एक तो बाबा, बाकी हैं 8, बाबा की निशानी तो चाहिए ना बीच में, कोई ग्रहचारी आदि आती है तो 9 रत्न की अंगूठी आदि पहनाते हैं। इतने ढेर पुरूषार्थ करने वालों से 8 निकलते हैं – पास विद् ऑनर्स। 8 रत्नों की बहुत महिमा है। देह-अभिमान में आने से कर्मेन्द्रियाँ बहुत धोखा देती हैं। भक्ति में भी चिंता रहती है ना, सिर पर पाप बहुत हैं – दान-पुण्य करें तो पाप मिट जाएं। सतयुग में कोई चिंता की बात नहीं क्योंकि वहाँ रावण-राज्य ही नहीं। वहाँ भी ऐसी बातें हो फिर तो नर्क और स्वर्ग में कुछ फ़र्क ही न रहे। तुमको इतना ऊंच पद पाने के लिए भगवान बैठ पढ़ाते हैं। बाबा याद नहीं पड़ता है, अच्छा पढ़ाने वाला टीचर तो याद पड़े। अच्छा भला यह याद करो कि हमारा एक ही बाबा सतगुरू है। मनुष्यों ने आसुरी मत पर बाप का कितना तिरस्कार किया है। बाप अब सब पर उपकार करते हैं। तुम बच्चों को भी उपकार करना चाहिए। किसी पर भी अपकार नहीं, कुदृष्टि भी नहीं। अपना ही नुकसान करते हैं। वह वायब्रेशन फिर दूसरों पर भी असर करता है। बाप कहते हैं बहुत बड़ी मंजिल है। रोज़ अपना पोतामेल देखो – कोई विकर्म तो नहीं बनाया? यह है ही विकर्मी दुनिया, विकर्मी संवत। विकर्माजीत देवताओं के संवत का कोई को पता नहीं। बाप समझाते हैं, विकर्माजीत संवत को 5 हज़ार वर्ष हुए फिर बाद में विकर्म संवत शुरू होता है। राजायें भी विकर्म ही करते रहते हैं, तब बाप कहते हैं कर्म-अकर्म-विकर्म की गति मैं तुमको समझाता हूँ। रावण राज्य में तुम्हारे कर्म विकर्म बन जाते हैं। सतयुग में कर्म अकर्म होते हैं। विकर्म बनता नहीं। वहाँ विकार का नाम ही नहीं। यह ज्ञान का तीसरा नेत्र अभी तुमको मिला है। अभी तुम बच्चे बाप के द्वारा त्रिनेत्री-त्रिकालदर्शी बने हो। मनुष्य कोई बना न सके। तुमको बनाने वाला है बाप। पहले जब आस्तिक हो तब त्रिनेत्री-त्रिकालदर्शी बनें। सारा ड्रामा का राज़ बुद्धि में है। मूलवतन, सूक्ष्मवतन, 84 का चक्र सब बुद्धि में है। फिर पीछे और धर्म आते हैं। वृद्धि को पाते रहते हैं। उन धर्म स्थापकों को गुरू नहीं कहेंगे। सर्व की सद्गति करने वाला सतगुरू एक ही है। बाकी वह कोई सद्गति करने थोड़ेही आते हैं। वह धर्म स्थापक हैं। क्राइस्ट को याद करने से सद्गति थोड़ही होगी। विकर्म विनाश थोड़ेही होंगे। कुछ भी नहीं। उन सबको भक्ति की लाइन में कहा जायेगा। ज्ञान की लाइन में सिर्फ तुम हो। तुम पण्डे हो। सबको शान्तिधाम, सुखधाम का रास्ता बताते हो। बाप भी लिबरेटर, गाइड है। उस बाप को याद करने से ही विकर्म विनाश होंगे।

अभी तुम बच्चे अपने विकर्म विनाश करने का पुरूषार्थ कर रहे हो तो तुम्हें ध्यान रखना है कि एक तरफ पुरूषार्थ, दूसरे तरफ विकर्म न होता रहे। पुरूषार्थ के साथ-साथ विकर्म भी किया तो सौगुणा हो जायेगा। जितना हो सके उतना विकर्म न करो। नहीं तो एडीशन भी होगी। नाम भी बदनाम करेंगे। जबकि जानते हो भगवान हमको पढ़ाते हैं तो फिर कोई विकर्म नहीं करना चाहिए। छोटी चोरी या बड़ी चोरी, पाप तो हो जाता है ना। यह आंखें बड़ा धोखा देती हैं। बाप बच्चों की चलन से समझ जाते हैं, कभी ख्याल भी न आये कि यह हमारी स्त्री है, हम ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं, शिवबाबा के पोत्रे हैं। हमने बाबा से प्रतिज्ञा की है, राखी बांधी है, फिर आंखें क्यों धोखा देती हैं? याद के बल से कोई भी कर्मेन्द्रियों के धोखे से छूट सकते हो। बड़ी मेहनत चाहिए। बाप के डायरेक्शन पर अमल कर चार्ट लिखो। स्त्री-पुरूष भी आपस में यही बातें करो – हम तो बाबा से पूरा वर्सा लेंगे, टीचर से पूरा पढ़ेंगे। ऐसा टीचर कभी मिल न सके, जो बेहद की नॉलेज दे। लक्ष्मी-नारायण ही नहीं जानते तो उनके पिछाड़ी आने वाले कैसे जान सकते हैं। बाप कहते हैं यह सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सिर्फ तुम जानते हो संगम पर। बाबा बहुत समझाते हैं – यह करो, ऐसे करो। फिर यहाँ से उठे तो खलास। यह नहीं समझते कि शिवबाबा हमको कहते हैं। हमेशा समझो शिवबाबा कहते हैं, इनका फोटो भी नहीं रखो। यह रथ तो लोन लिया है। यह भी पुरूषार्थी है, यह भी कहते हैं मैं बाबा से वर्सा ले रहा हूँ। तुम्हारे सदृश्य यह भी स्टूडेन्ट लाइफ में है। आगे चल तुम्हारी महिमा होगी। अभी तो तुम पूज्य देवता बनने के लिए पढ़ते हो। फिर सतयुग में तुम देवता बनेंगे। यह सब बातें सिवाए बाप के कोई समझा न सके। तकदीर में नहीं है तो संशय उठता है – शिवबाबा कैसे आकर पढ़ायेंगे! मैं नहीं मानता। मानते नहीं तो फिर शिवबाबा को याद भी कैसे करेंगे। विकर्म विनाश हो नहीं सकेंगे। यह सारी नम्बरवार राजधानी स्थापन हो रही है। दास-दासियाँ भी तो चाहिए ना। राजाओं को दासियाँ भी दहेज में मिलती हैं। यहाँ ही इतनी दासियाँ रखते हैं तो सतयुग में कितनी होंगी। ऐसा थोड़ेही ढीला पुरूषार्थ करना चाहिए जो दास-दासी जाकर बनें। बाबा से पूछ सकते हो – बाबा अभी मर जायें तो क्या पद मिलेगा? बाबा झट बता देंगे। अपना पोतामेल आपेही देखो। अन्त में नम्बरवार कर्मातीत अवस्था हो जानी है। यह है सच्ची कमाई। उस कमाई में रात-दिन कितना बिज़ी रहते हैं। सट्टे वाले जो होते हैं वह एक हाथ से खाना खाते हैं, दूसरे हाथ से फोन पर कारोबार चलाते रहते हैं। अब बताओ ऐसे आदमी ज्ञान में चल सकेंगे? कहते हैं हमको फुर्सत कहाँ। अरे, सच्ची राजाई मिलती है। बाप को सिर्फ याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। अष्ट देवता आदि को भी याद करते हैं ना। उनकी याद से तो कुछ भी मिलता नहीं। बाबा बार-बार हर एक बात पर समझाते रहते हैं। जो फिर ऐसे कोई न कहे कि फलानी बात पर तो समझाया नहीं। तुम बच्चों को पैगाम भी सबको देना है। एरोप्लेन से भी पर्चे गिराने लिए कोशिश करनी चाहिए। उसमें लिखो शिवबाबा ऐसे कहते हैं। ब्रह्मा भी शिवबाबा का बच्चा है। प्रजापिता है तो वह भी बाप, यह भी बाप। शिवबाबा कहने से भी बहुत बच्चों को प्रेम के आंसू आ जाते हैं। कभी देखा भी नहीं है। लिखते हैं बाबा कब आकर आपसे मिलेंगे, बाबा बन्धन से छुड़ाओ। बहुतों को बाबा का, फिर प्रिन्स का भी साक्षात्कार होता है। आगे चल बहुतों को साक्षात्कार होंगे फिर भी पुरूषार्थ तो करना पड़े। मनुष्य को मरने समय भी कहते हैं भगवान को याद करो। तुम भी देखेंगे पिछाड़ी में खूब पुरूषार्थ करेंगे। याद करने लगेंगे।

बाप राय देते हैं – बच्चे, जो समय मिले उसमें पुरूषार्थ कर मेकप कर लो। बाप की याद में रह विकर्म विनाश करो तो पीछे आते भी आगे जा सकते हो। जैसे ट्रेन लेट होती है तो मेकप कर लेते हैं ना। तुमको भी यहाँ समय मिलता है तो मेकप कर लो। यहाँ आकर कमाई करने लग जाओ। बाबा राय भी देते हैं – ऐसे-ऐसे करो, अपना कल्याण करो। बाप की श्रीमत पर चलो। एरोप्लेन से पर्चे गिराओ, जो मनुष्य समझें कि यह तो बरोबर ठीक पैगाम देते रहते हैं। भारत कितना बड़ा है, सबको मालूम पड़ना चाहिए जो फिर ऐसे न कहें कि बाबा हमको तो पता ही नहीं पड़ा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सेन्सीबुल बन अपनी जांच करनी है कि आंखें धोखा तो नहीं देती हैं। कोई भी कर्मेन्द्रिय के वश हो उल्टा कर्म नहीं करना है। याद के बल से कर्मेन्द्रियों के धोखे से छूटना है।

2) इस सच्ची कमाई के लिए समय निकालना है, पीछे आते भी पुरूषार्थ से मेकप कर लेना है। यह विकर्म विनाश करने का समय है इसलिए कोई भी विकर्म नहीं करना है।

वरदान:-हर कन्डीशन में सेफ रहने वाले एयरकन्डीशन की टिकिट के अधिकारी भव
एयरकन्डीशन की टिकेट उन्हीं बच्चों को मिलती है जो यहाँ हर कन्डीशन में सेफ रहते हैं। कोई भी परिस्थिति आ जाए, कैसी भी समस्यायें आ जाएं लेकिन हर समस्या को सेकण्ड में पार करने का सर्टीफिकेट चाहिए। जैसे उस टिकिट के लिए पैसे देते हो ऐसे यहाँ “सदा विजयी” बनने की मनी चाहिए – जिससे टिकिट मिल सके। यह मनी प्राप्त करने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं, सिर्फ बाप के सदा साथ रहो तो अनगिनत कमाई जमा होती रहेगी।
स्लोगन:-कैसी भी परिस्थिति हो, परिस्थिति चली जाए लेकिन खुशी नहीं जाए।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 3 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 3 July 2020

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03-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – जो सर्व की सद्गति करने वाला जीवनमुक्ति दाता है, वह आपका बाप बना है, तुम उनकी सन्तान हो, तो कितना नशा रहना चाहिए”
प्रश्नः-किन बच्चों की बुद्धि में बाबा की याद निरन्तर नहीं ठहर सकती है?
उत्तर:-जिन्हें पूरा-पूरा निश्चय नहीं है उनकी बुद्धि में याद ठहर नहीं सकती। हमको कौन सिखला रहे हैं, यह जानते नहीं तो याद किसको करेंगे। जो यथार्थ पहचान कर याद करते हैं उनके ही विकर्म विनाश होते हैं। बाप स्वयं ही आकर अपनी और अपने घर की यथार्थ पहचान देते हैं।

ओम् शान्ति। अब ओम् शान्ति का अर्थ तो सदैव बच्चों को याद होगा। हम आत्मा हैं, हमारा घर है निर्वाणधाम वा मूलवतन। बाकी भक्ति मार्ग में मनुष्य जो भी पुरुषार्थ करते हैं उनको पता नहीं कहाँ जाना है। सुख किसमें है, दु:ख किसमें है, कुछ भी पता नहीं। यज्ञ, तप, दान, पुण्य, तीर्थ आदि करते सीढ़ी नीचे उतरते ही आते हैं। अभी तुमको ज्ञान मिला है तो भक्ति बन्द हो जाती है। घण्टे घड़ियाल आदि वह वातावरण सब बन्द। नई दुनिया और पुरानी दुनिया में फ़र्क तो है ना। नई दुनिया है पावन दुनिया। तुम बच्चों की बुद्धि में है सुखधाम। सुखधाम को स्वर्ग, दु:खधाम को नर्क कहा जाता है। मनुष्य शान्ति चाहते हैं, परन्तु वहाँ कोई भी जा नहीं सकते। बाप कहते हैं मैं जब तक यहाँ भारत में न आऊं तब तक मेरे सिवाए तुम बच्चे जा नहीं सकते। भारत में ही शिवजयन्ती गाई जाती है। निराकार जरूर साकार में आयेगा ना। शरीर बिगर आत्मा कुछ कर सकती है क्या? शरीर बिगर तो आत्मा भटकती रहती है। दूसरे तन में भी प्रवेश कर लेती है। कोई अच्छे होते हैं, कोई चंचल होते हैं, एकदम तवाई बना लेती है। आत्मा को शरीर जरूर चाहिए। वैसे ही परमपिता परमात्मा को भी शरीर न हो तो भारत में क्या आकर करेंगे! भारत ही अविनाशी खण्ड है। सतयुग में एक ही भारत खण्ड है। और सब खण्ड विनाश हो जाते हैं। गाते हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। यह लोग फिर आदि सनातन हिन्दू धर्म कह देते हैं। वास्तव में शुरू में कोई हिन्दू नहीं, देवी-देवतायें थे। यूरोप में रहने वाले अपने को क्रिश्चियन कहते हैं। यूरोपियन धर्म थोड़ेही कहेंगे। यह हिन्दूस्तान में रहने वाले हिन्दू धर्म कह देते। जो दैवी धर्म श्रेष्ठ थे, वही 84 जन्मों में आते धर्म भ्रष्ट बन गये हैं। देवता धर्म के जो होंगे वही यहाँ आयेंगे। अगर निश्चय नहीं तो समझो इस धर्म के नहीं हैं। भल यहाँ बैठे होंगे तो भी उनकी समझ में नहीं आयेगा। वहाँ कोई प्रजा में कम पद पाने वाला होगा। चाहते सब सुख-शान्ति हैं, वह तो होता है सतयुग में। सब तो सुखधाम में जा नहीं सकते। सब धर्म अपने-अपने समय पर आते हैं। अनेक धर्म हैं, झाड़ वृद्धि को पाता रहता है। मूल थुर है देवी-देवता धर्म। फिर हैं 3 ट्यूब। स्वर्ग में तो यह हो न सकें। द्वापर से लेकर नये धर्म निकलते हैं, इनको वैराइटी ह्युमन ट्री कहा जाता है। विराट रूप अलग है, यह वैराइटी धर्मों का झाड़ है। किस्म-किस्म के मनुष्य हैं। तुम जानते हो कितने धर्म हैं। सतयुग आदि में एक ही धर्म था, नई दुनिया थी। बाहर वाले भी जानते हैं, भारत ही प्राचीन बहिश्त था। बहुत साहूकार था इसलिए भारत को बहुत मान मिलता है। कोई साहूकार, गरीब बनता है तो उस पर तरस खाते हैं। बिचारा भारत क्या हो पड़ा है! यह भी ड्रामा में पार्ट है। कहते भी हैं सबसे जास्ती रहमदिल ईश्वर ही है और आते भी भारत में हैं। गरीबों पर जरूर साहूकार ही रहम करेंगे ना। बाप है बेहद का साहूकार, ऊंच ते ऊंच बनाने वाला। तुम किसके बच्चे बने हो वह भी नशा होना चाहिए। परमपिता परमात्मा शिव की हम सन्तान हैं, जिसको ही जीवनमुक्ति दाता, सद्गति दाता कहते हैं। जीवनमुक्ति पहले-पहले सतयुग में होती है। यहाँ तो है जीवनबन्ध। भक्ति मार्ग में पुकारते हैं बाबा बंधन से छुड़ाओ। अभी तुम पुकार नहीं सकते।

तुम जानते हो बाप जो ज्ञान का सागर है, वही वर्ल्ड की हिस्ट्री-जाग्रॉफी का सार समझा रहे हैं। नॉलेजफुल हैं। यह तो खुद कहते हैं मैं भगवान नहीं हूँ। तुम्हें तो देह से न्यारा देही-अभिमानी बनना है। सारी दुनिया को, अपने शरीर को भी भूलना है। यह भगवान है नहीं। इनको कहते ही हैं बापदादा। बाप है ऊंच ते ऊंच। यह पतित पुराना तन है। महिमा सिर्फ एक की है। उनसे योग लगाना है तब ही पावन बनेंगे। नहीं तो कभी पावन बन नहीं सकेंगे और पिछाड़ी में हिसाब-किताब चुक्तू कर सज़ायें खाकर चले जायेंगे। भक्ति मार्ग में हम सो, सो हम का मंत्र सुनते आये हो। हम आत्मा सो परमपिता परमात्मा, सो हम आत्मा – यही रांग मंत्र परमात्मा से बेमुख करने वाला है। बाप कहते हैं – बच्चे, परमात्मा सो हम आत्मा कहना यह बिल्कुल रांग है। अभी तुम बच्चों को वर्णों का भी रहस्य समझाया गया है। हम सो ब्राह्मण हैं फिर हम सो देवता बनने के लिए पुरूषार्थ करते हैं। फिर हम सो देवता बन क्षत्रिय वर्ण में आयेंगे। और कोई को थोड़ेही पता है – हम कैसे 84 जन्म लेते हैं? किस कुल में लेते हैं? तुम अभी समझते हो हम ब्राह्मण हैं, बाबा तो ब्राह्मण नहीं है। तुम ही इन वर्णों में आते हो। अब ब्राह्मण धर्म में एडाप्ट किया है। शिवबाबा द्वारा प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान बने हो। यह भी जानते हो निराकारी आत्मायें असली ईश्वरीय कुल की हैं। निराकारी दुनिया में रहने वाली हैं। फिर साकारी दुनिया में आती हैं। पार्ट बजाने आना पड़ता है। वहाँ से आये फिर हमने देवता कुल में 8 जन्म लिए, फिर हम क्षत्रिय कुल में, वैश्य कुल में जाते हैं। बाप समझाते हैं तुमने इतने जन्म दैवीकुल में लिये फिर इतने जन्म क्षत्रिय कुल में लिये। 84 जन्मों का चक्र है। तुम्हारे बिगर यह ज्ञान और कोई को मिल न सके। जो इस धर्म के होंगे वही यहाँ आयेंगे। राजधानी स्थापन हो रही है। कोई राजा-रानी कोई प्रजा बनेंगे। सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण दी फर्स्ट, सेकण्ड, थर्ड – 8 गद्दी चलती हैं फिर क्षत्रिय धर्म में भी फर्स्ट, सेकण्ड, थर्ड ऐसे चलता है। यह सब बातें बाप समझाते हैं। ज्ञान का सागर जब आते हैं तो भक्ति खलास हो जाती है। रात खत्म हो दिन होता है। वहाँ किसी भी प्रकार के धक्के नहीं होते। आराम ही आराम है, कोई हंगामा नहीं। यह भी ड्रामा बना हुआ है। भक्ति कल्ट में ही बाप आते हैं। सबको वापिस जरूर जाना है फिर नम्बरवार उतरते हैं। क्राइस्ट आयेंगे तो फिर उनके धर्म वाले भी आते रहेंगे। अभी देखो कितने क्रिश्चियन हैं। क्राइस्ट हो गया क्रिश्चियन धर्म का बीज। इस देवी-देवता धर्म का बीज है परमपिता परमात्मा शिव। तुम्हारा धर्म स्थापन करते हैं परमपिता परमात्मा। तुमको ब्राह्मण धर्म में किसने लाया? बाप ने एडाप्ट किया तो उनसे छोटा ब्राह्मण धर्म हुआ। ब्राह्मणों की चोटी गाई जाती है। यह है निशानी चोटी फिर नीचे आओ तो शरीर बढ़ता जाता है। यह सब बातें बाप ही बैठ समझाते हैं। जो बाप कल्याणकारी है वही आकर भारत का कल्याण करते हैं। सबसे अधिक कल्याण तो तुम बच्चों का ही करते हैं। तुम क्या से क्या बन जाते हो! तुम अमरलोक के मालिक बन जाते हो। अभी ही तुम काम पर विजय पाते हो। वहाँ अकाले मृत्यु होती नहीं। मरने की बात नहीं। बाकी चोला तो बदलेंगे ना। जैसे सर्प एक खाल उतार दूसरी लेते हैं। यहाँ भी तुम यह पुरानी खाल छोड़ नई दुनिया में नई खाल लेंगे। सतयुग को कहा जाता है गॉर्डन ऑफ फ्लावर्स। कभी कोई कुवचन वहाँ नहीं निकलता। यहाँ तो है ही कुसंग। माया का संग है ना इसलिए इनका नाम ही है रौरव नर्क। जगह पुरानी होती है तो म्युनिसिपाल्टी वाले पहले से ही खाली करा देते हैं। बाप भी कहते हैं जब पुरानी दुनिया होती है तब हम आते हैं।

ज्ञान से सद्गति हो जाती है। राजयोग सिखाया जाता है। भक्ति में तो कुछ भी नहीं है। हाँ, जैसे दान-पुण्य करते हैं तो अल्पकाल के लिए सुख मिलता है। राजाओं को भी संन्यासी लोग वैराग्य दिलाते हैं, यह तो काग विष्टा समान सुख है। अभी तुम बच्चों को बेहद का वैराग्य सिखाया जाता है। यह है ही पुरानी दुनिया, अब सुखधाम को याद करो, फिर वाया शान्तिधाम यहाँ आना है। देलवाड़ा मन्दिर में हूबहू तुम्हारा इस समय का यादगार है। नीचे तपस्या में बैठे हैं, ऊपर में है स्वर्ग। नहीं तो स्वर्ग कहाँ दिखायें। मनुष्य मरते हैं तो कहेंगे स्वर्ग पधारा। स्वर्ग को ऊपर में समझते हैं परन्तु ऊपर में कुछ है नहीं। भारत ही स्वर्ग, भारत ही नर्क बनता है। यह मन्दिर पूरा यादगार है। यह मन्दिर आदि सब बाद में बनते हैं। स्वर्ग में भक्ति होती नहीं। वहाँ तो सुख ही सुख है। बाप आकर सब राज़ समझाते हैं। और सब आत्माओं के नाम बदलते हैं, शिव का नाम नहीं बदलता। उनका अपना शरीर है नहीं। शरीर बिगर पढ़ायेंगे कैसे! प्रेरणा की तो कोई बात ही नहीं। प्रेरणा का अर्थ है विचार। ऐसे नहीं, ऊपर से प्रेरणा करेंगे और पहुँच जायेंगे, इसमें प्रेरणा की कोई बात नहीं। जिन बच्चों को बाप की पूरी पहचान नहीं, पूरा निश्चय नहीं उनकी बुद्धि में याद भी ठहरेगी नहीं। हमको कौन सिखला रहे हैं, वह जानते नहीं तो याद किसको करेंगे? बाप की याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। जो जन्म-जन्मान्तर लिंग को ही याद करते हैं, समझते हैं यह परमात्मा है, उनका यह चिन्ह है, वह है निराकार, साकार नहीं है। बाप कहते हैं मुझे भी प्रकृति का आधार लेना पड़ता है। नहीं तो तुमको सृष्टि चक्र का राज़ कैसे समझाऊं। यह है रूहानी नॉलेज। रूहों को ही यह नॉलेज मिलती है। यह नॉलेज एक बाप ही दे सकते हैं। पुनर्जन्म तो लेना ही है। सब एक्टर्स को पार्ट मिला हुआ है। निर्वाण में कोई भी जा नहीं सकता। मोक्ष को पा नहीं सकते। जो नम्बरवन विश्व के मालिक बनते हैं वही 84 जन्मों में आते हैं। चक्र जरूर लगाना है। मनुष्य समझते हैं मोक्ष मिलता है, कितने मत-मतान्तर हैं। वृद्धि को पाते ही रहते हैं। वापिस कोई भी जाते नहीं। बाप ही 84 जन्मों की कहानी बताते हैं। तुम बच्चों को पढ़कर फिर पढ़ाना है। यह रूहानी नॉलेज तुम्हारे सिवाए और कोई दे न सके। न शूद्र, न देवतायें दे सकते। सतयुग में दुर्गति होती नहीं जो नॉलेज मिले। यह नॉलेज है ही सद्गति के लिए। सद्गति दाता लिबरेटर गाइड एक ही है। सिवाए याद की यात्रा के कोई भी पवित्र बन न सके। सज़ायें जरूर खानी पड़ेंगी। पद भी भ्रष्ट हो जायेगा। सबका हिसाब-किताब चुक्तू तो होना है ना। तुमको तुम्हारी ही बात समझाते हैं और धर्मों में जाने की क्या पड़ी है। भारतवासियों को ही यह नॉलेज मिलती है। बाप भी भारत में ही आकर 3 धर्म स्थापन करते हैं। अभी तुमको शूद्र धर्म से निकाल ऊंच कुल में ले जाते हैं। वह है नीच पतित कुल, अब पावन बनाने के लिए तुम ब्राह्मण निमित्त बनते हो। इनको रुद्र ज्ञान यज्ञ कहा जाता है। रुद्र शिवबाबा ने यज्ञ रचा है, इस बेहद के यज्ञ में सारी पुरानी दुनिया की आहुति पड़नी है। फिर नई दुनिया स्थापन हो जायेगी। पुरानी दुनिया खत्म होनी है। तुम यह नॉलेज लेते ही हो नई दुनिया के लिए। देवताओं की परछाई पुरानी दुनिया में नहीं पड़ती। तुम बच्चे जानते हो कि कल्प पहले जो आये होंगे वही आकर यह नॉलेज लेंगे। नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार पढ़ाई पढ़ेंगे। मनुष्य यहाँ ही शान्ति चाहते हैं। अब आत्मा तो है ही शान्तिधाम की रहने वाली। बाकी यहाँ शान्ति कैसे हो सकती। इस समय तो घर-घर में अशान्ति है। रावण राज्य है ना। सतयुग में बिल्कुल ही शान्ति का राज्य होता है। एक धर्म, एक भाषा होती है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस पुरानी दुनिया से बेहद का वैरागी बन अपनी देह को भी भूल शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है। निश्चयबुद्धि बन याद की यात्रा में रहना है।

2) हम सो, सो हम के मंत्र को यथार्थ समझकर अब ब्राह्मण सो देवता बनने का पुरुषार्थ करना है। सभी को इसका यथार्थ अर्थ समझाना है।

वरदान:-तीन सेवाओं के बैलेन्स द्वारा सर्व गुणों की अनुभूति करने वाले गुणमूर्त भव
जो बच्चे संकल्प, बोल और हर कर्म द्वारा सेवा पर तत्पर रहते हैं वही सफलतामूर्त बनते हैं। तीनों में मार्क्स समान हैं, सारे दिन में तीनों सेवाओं का बैलेन्स है तो पास विद आनर वा गुणमूर्त बन जाते हैं। उनके द्वारा सर्व दिव्य गुणों का श्रृंगार स्पष्ट दिखाई देता है। एक दूसरे को बाप के गुणों का वा स्वयं की धारणा के गुणों का सहयोग देना ही गुणमूर्त बनना है क्योंकि गुणदान सबसे बड़ा दान है।
स्लोगन:-निश्चय रूपी फाउण्डेशन पक्का है तो श्रेष्ठ जीवन का अनुभव स्वत: होता है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 2 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 2 July 2020

Murli Pdf for Print : – 

02-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हें अभी भविष्य 21 जन्मों के लिए यहाँ ही पढ़ाई पढ़नी है, कांटे से खुशबूदार फूल बनना है, दैवीगुण धारण करने और कराने हैं”
प्रश्नः-किन बच्चों की बुद्धि का ताला नम्बरवार खुलता जाता है?
उत्तर:-जो श्रीमत पर चलते रहते हैं। पतित-पावन बाप की याद में रहते हैं। पढ़ाई पढ़ाने वाले के साथ जिनका योग है उनकी बुद्धि का ताला खुलता जाता है। बाबा कहते – बच्चे, अभ्यास करो हम आत्मा भाई-भाई हैं, हम बाप से सुनते हैं। देही-अभिमानी हो सुनो और सुनाओ तो ताला खुलता जायेगा।

ओम् शान्ति। बाप बच्चों को समझाते हैं जब यहाँ बैठते हो तो ऐसे भी नहीं कि सिर्फ शिवबाबा की याद में रहना है। वह हो जायेगी सिर्फ शान्ति फिर सुख भी चाहिए। तुमको शान्ति में रहना है और स्वदर्शन चक्रधारी बन राजाई को भी याद करना है। तुम पुरूषार्थ करते ही हो नर से नारायण अथवा मनुष्य से देवता बनने के लिए। यहाँ भल कितने भी कोई में दैवीगुण हों तो भी उनको देवता नहीं कहेंगे। देवता होते ही हैं स्वर्ग में। दुनिया में मनुष्यों को स्वर्ग का पता नहीं है। तुम बच्चे जानते हो नई दुनिया को स्वर्ग, पुरानी दुनिया को नर्क कहा जाता है। यह भी भारतवासी ही जानते हैं। जो देवतायें सतयुग में राज्य करते थे उन्हों के चित्र भी भारत में ही हैं। यह है आदि सनातन देवी-देवता धर्म के। फिर भल करके उन्हों के चित्र बाहर में ले जाते हैं, पूजा के लिए। बाहर कहाँ भी जाते हैं तो जाकर वहाँ मन्दिर बनाते हैं। हर एक धर्म वाले कहाँ भी जाते हैं तो अपने चित्रों की ही पूजा करते हैं। जिन-जिन गांवों पर विजय पाते हैं वहाँ चर्च आदि जाकर बनाते हैं। हर एक धर्म के चित्र अपने-अपने हैं पूजा के लिए। आगे तुम भी नहीं जानते थे कि हम ही देवी-देवता थे। अपने को अलग समझकर उन्हों की पूजा करते थे। और धर्म वाले पूजा करते हैं तो जानते हैं कि हमारा धर्म स्थापक क्राइस्ट है, हम क्रिश्चियन हैं अथवा बौद्धी हैं। यह हिन्दू लोग अपने धर्म को न जानने कारण अपने को हिन्दू कह देते हैं और पूजते हैं देवताओं को। यह भी नहीं समझते कि हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। हम अपने बड़ों को पूजते हैं। क्रिश्चियन एक क्राइस्ट को पूजते हैं। भारतवासियों को यह पता नहीं कि हमारा धर्म कौन-सा है? वह किसने और कब स्थापन किया था? बाप कहते हैं यह भारत का आदि सनातन देवी-देवता धर्म जब प्राय: लोप हो जाता है तब मैं आता हूँ फिर से स्थापन करने। यह ज्ञान अभी तुम बच्चों की बुद्धि में है। पहले कुछ भी नहीं जानते थे। बिगर समझे भक्ति मार्ग में चित्रों की पूजा करते रहते थे। अभी तुम जानते हो हम भक्ति मार्ग में नहीं हैं। अभी तुम ब्राह्मण कुल भूषण और शूद्र कुल वालों में रात-दिन का फर्क है। वह भी इस समय तुम समझते हो। सतयुग में नहीं समझेंगे। इस समय ही तुमको समझ मिलती है। बाप आत्माओं को समझ देते हैं। पुरानी दुनिया और नई दुनिया का तुम ब्राह्मणों को ही पता है। पुरानी दुनिया में ढेर मनुष्य हैं। यहाँ तो मनुष्य कितना लड़ते झगड़ते हैं। यह है ही कांटों का जंगल। तुम जानते हो हम भी कांटे थे। अभी बाबा हमको फूल बना रहे हैं। कांटे इन खुशबूदार फूलों को नमन करते हैं। यह राज़ अभी तुमने जाना है। हम सो देवता थे जो फिर आकर अब खुशबूदार फूल (ब्राह्मण) बने हैं। बाप ने समझाया है यह ड्रामा है। आगे यह ड्रामा, बाइसकोप आदि नहीं थे। यह भी अभी बने हैं। क्यों बने हैं? क्योंकि बाप को दृष्टान्त देने में सहज हो। बच्चे भी समझ सकते हैं। यह साइंस भी तो तुम बच्चों को सीखनी है ना। बुद्धि में यह सब साइंस के संस्कार ले जायेंगे जो फिर वहाँ काम में आयेंगे। दुनिया कोई एकदम तो खत्म नहीं हो जाती। संस्कार ले जाकर फिर जन्म लेते हैं। विमान आदि भी बनाते हैं। जो-जो काम की चीजें वहाँ के लायक हैं वह बनती हैं। स्टीमर बनाने वाले भी होते हैं परन्तु स्टीमर तो वहाँ काम में नहीं आयेंगे। भल कोई ज्ञान लेवे या न लेवे परन्तु उनके संस्कार काम में नहीं आयेंगे। वहाँ स्टीमर्स आदि की दरकार ही नहीं। ड्रामा में है नहीं। हाँ विमानों की, बिजलियों आदि की दरकार पड़ेगी। वह इन्वेन्शन निकालते रहते हैं। वहाँ से बच्चे सीख कर आते हैं। यह सब बातें तुम बच्चों की बुद्धि में ही हैं।

तुम जानते हो हम पढ़ते ही हैं नई दुनिया के लिए। बाबा हमको भविष्य 21 जन्मों के लिए पढ़ाते हैं। हम स्वर्गवासी बनने के लिए पवित्र बन रहे हैं। पहले नर्कवासी थे। मनुष्य कहते भी हैं फलाना स्वर्गवासी हुआ। परन्तु हम नर्क में हैं यह नहीं समझते। बुद्धि का ताला नहीं खुलता। तुम बच्चों का अब धीरे-धीरे ताला खुलता जाता है, नम्बरवार। ताला उनका खुलेगा जो श्रीमत पर चलने लग पड़ेंगे और पतित-पावन बाप को याद करेंगे। बाप ज्ञान भी देते हैं और याद भी सिखलाते हैं। टीचर है ना। तो टीचर जरूर पढ़ायेंगे। जितना टीचर और पढ़ाई से योग होगा उतना ऊंच पद पायेंगे। उस पढ़ाई में तो योग रहता ही है। जानते हैं बैरिस्टर पढ़ाते हैं। यहाँ बाप पढ़ाते हैं। यह भी भूल जाते हैं क्योंकि नई बात है ना। देह को याद करना तो बहुत सहज है। घड़ी-घड़ी देह याद आ जाती है। हम आत्मा हैं यह भूल जाते हैं। हम आत्माओं को बाप समझाते हैं। हम आत्मायें भाई-भाई हैं। बाप तो जानते हैं हम परमात्मा हैं, आत्माओं को सिखलाते हैं कि अपने को आत्मा समझ और आत्माओं को बैठ सिखलाओ। यह आत्मा कानों से सुनती है, सुनाने वाला है परमपिता परमात्मा। उनको सुप्रीम आत्मा कहेंगे। तुम जब किसको समझाते हो तो यह बुद्धि में आना चाहिए कि हमारी आत्मा में ज्ञान है, आत्मा को यह सुनाता हूँ। हमने बाबा से जो सुना है वह आत्माओं को सुनाता हूँ। यह है बिल्कुल नई बात। तुम दूसरे को जब पढ़ाते हो तो देही-अभिमानी होकर नहीं पढ़ाते हो, भूल जाते हो। मंजिल है ना। बुद्धि में यह याद रहना चाहिए – मैं आत्मा अविनाशी हूँ। मैं आत्मा इन कर्मेन्द्रियों द्वारा पार्ट बजा रही हूँ। तुम आत्मा शूद्र कुल में थी, अभी ब्राह्मण कुल में हो। फिर देवता कुल में जायेंगे। वहाँ शरीर भी पवित्र मिलेगा। हम आत्मायें भाई-भाई हैं। बाप बच्चों को पढ़ाते हैं। बच्चे फिर कहेंगे हम भाई-भाई हैं, भाई को पढ़ाते हैं। आत्मा को ही समझाते हैं। आत्मा शरीर द्वारा सुनती है। यह बड़ी महीन बातें हैं। स्मृति में नहीं आती हैं। आधाकल्प तुम देह-अभिमान में रहे। इस समय तुमको देही-अभिमानी हो रहना है। अपने को आत्मा निश्चय करना है, आत्मा निश्चय कर बैठो। आत्मा निश्चय कर सुनो। परमपिता परमात्मा ही सुनाते हैं तब तो कहते हैं ना – आत्मा परमात्मा अलग रहे बहुकाल….. वहाँ तो नहीं पढ़ाता हूँ। यहाँ ही आकर पढ़ाता हूँ। और सभी आत्माओं को अपना-अपना शरीर है। यह बाप तो है सुप्रीम आत्मा। उनको शरीर है नहीं। उनकी आत्मा का ही नाम है शिव। जानते हो यह शरीर हमारा नहीं है। मैं सुप्रीम आत्मा हूँ। मेरी महिमा अलग है। हर एक की महिमा अपनी-अपनी है ना। गायन भी है ना – परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं। वह ज्ञान का सागर, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। वह सत है, चैतन्य है, आनन्द, सुख-शान्ति का सागर है। यह है बाप की महिमा। बच्चे को बाप की प्रापर्टी का मालूम रहता है – हमारे बाप के पास यह कारखाना है, यह मील है, नशा रहता है ना। बच्चा ही उस प्रापर्टी का मालिक बनता है। यह प्रापर्टी तो एक ही बार मिलती है। बाप के पास क्या प्रापर्टी है, वह सुना।

तुम आत्मायें तो अमर हो। कभी मृत्यु को नहीं पाती हो। प्रेम के सागर भी बनते हो। यह लक्ष्मी-नारायण प्रेम के सागर हैं। कभी लड़ते-झगड़ते नहीं। यहाँ तो कितना लड़ते-झगड़ते हैं। प्रेम में और ही घोटाला पड़ता है। बाप आकर विकार बन्द कराते हैं तो कितना मार पड़ती है। बाप कहते हैं बच्चे पावन बनो तो पावन दुनिया के मालिक बनेंगे। काम महाशत्रु है इसलिए बाबा के पास आते हैं तो कहते हैं जो विकर्म किये हैं, वह बताओ तो हल्का हो जायेगा, इसमें भी मुख्य विकार की बात है। बाप बच्चों के कल्याण अर्थ पूछते हैं। बाप को ही कहते हैं हे पतित-पावन आओ क्योंकि पतित विकार में जाने वाले को ही कहा जाता है। यह दुनिया भी पतित है, मनुष्य भी पतित हैं, 5 तत्व भी पतित हैं। वहाँ तुम्हारे लिए तत्व भी पवित्र चाहिए। इस आसुरी पृथ्वी पर देवताओं की परछाया नहीं पड़ सकती। लक्ष्मी का आह्वान करते हैं परन्तु यहाँ थोड़ेही आ सकती है। यह 5 तत्व भी बदलने चाहिए। सतयुग है नई दुनिया, यह है पुरानी दुनिया। इनके खलास होने का समय है। मनुष्य समझते हैं अभी 40 हज़ार वर्ष पड़े हैं। जबकि कल्प ही 5 हज़ार वर्ष का है तो फिर सिर्फ एक कलियुग 40 हज़ार वर्ष का कैसे हो सकता है। कितना अज्ञान अन्धियारा है। ज्ञान है नहीं। भक्ति है ब्राह्मणों की रात। ज्ञान है ब्रह्मा और ब्राह्मणों का दिन। जो अब प्रैक्टिकल में हो रहा है। सीढ़ी में बड़ा क्लीयर दिखाया हुआ है। नई दुनिया और पुरानी दुनिया को आधा-आधा कहेंगे। ऐसे नहीं कि नई दुनिया को जास्ती टाइम, पुरानी दुनिया को थोड़ा टाइम देंगे। नहीं, पूरा आधा-आधा होगा। तो क्वार्टर भी कर सकेंगे। आधा में न हो तो पूरा क्वार्टर भी न हो सके। स्वास्तिका में भी 4 भाग देते हैं। समझते हैं हम गणेश निकालते हैं। अब बच्चे समझते हैं यह पुरानी दुनिया विनाश होनी है। हम नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं। हम नर से नारायण बनते हैं नई दुनिया के लिए। कृष्ण भी नई दुनिया का है। कृष्ण का तो गायन हुआ, उनको महात्मा कहते हैं क्योंकि छोटा बच्चा है। छोटे बच्चे प्यारे लगते हैं। बड़ों को इतना प्यार नहीं करते हैं जितना छोटों को करते हैं क्योंकि सतोप्रधान अवस्था है। विकार की बदबू नहीं है। बड़े होने से विकारों की बदबू हो जाती है। बच्चों की कभी क्रिमिनल आई हो न सके। यह आंखें ही धोखा देने वाली हैं इसलिए दृष्टान्त देते हैं कि उसने अपनी आंखें निकाल दी। ऐसी कोई बात है नहीं। ऐसे कोई आंखें निकालते नहीं हैं। यह इस समय बाबा ज्ञान की बातें समझाते हैं। तुमको तो अभी ज्ञान की तीसरी आंख मिली है। आत्मा को स्प्रीचुअल नॉलेज मिली है। आत्मा में ही ज्ञान है। बाप कहते हैं मुझे ज्ञान है। आत्मा को निर्लेप नहीं कह सकते। आत्मा ही एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। आत्मा अविनाशी है। है कितनी छोटी। उनमें 84 जन्मों का पार्ट है। ऐसी बात कोई कह न सके। वह तो निर्लेप कह देते हैं इसलिए बाप कहते हैं पहले आत्मा को रियलाइज़ करो। कोई पूछते हैं जानवर कहाँ जायेंगे? अरे, जानवर की तो बात ही छोड़ो। पहले आत्मा को तो रियलाइज़ करो। मैं आत्मा कैसी हूँ, क्या हूँ……? बाप कहते हैं जबकि अपने को आत्मा ही नहीं जानते हो, मुझे फिर क्या जानेंगे। यह सब महीन बातें तुम बच्चों की बुद्धि में हैं। आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट है। वह बजता रहता है। कोई फिर कहते हैं ड्रामा में नूँध है फिर हम पुरूषार्थ ही क्यों करें! अरे, पुरूषार्थ बिगर तो पानी भी नहीं मिल सकता। ऐसे नहीं, ड्रामा अनुसार आपेही सब कुछ मिलेगा। कर्म तो जरूर करना ही है। अच्छा वा बुरा कर्म होता है। यह बुद्धि से समझ सकते हैं। बाप कहते हैं यह रावण राज्य है, इसमें तुम्हारे कर्म विकर्म बन जाते हैं। वहाँ रावण राज्य ही नहीं जो विकर्म हो। मैं ही तुमको कर्म, अकर्म, विकर्म की गति समझाता हूँ। वहाँ तुम्हारे कर्म अकर्म हो जाते हैं, रावण राज्य में कर्म विकर्म हो जाते हैं। गीता-पाठी भी कभी यह अर्थ नहीं समझाते, वह तो सिर्फ पढ़कर सुनाते हैं, संस्कृत में श्लोक सुनाकर फिर हिन्दी में अर्थ करते हैं। बाप कहते हैं कुछ-कुछ अक्षर ठीक हैं। भगवानुवाच है परन्तु भगवान किसको कहा जाता है, यह किसी को पता नहीं है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बेहद बाप के प्रापर्टी की मैं आत्मा मालिक हूँ, जैसे बाप शान्ति, पवित्रता, आनंद का सागर है, ऐसे मैं आत्मा मास्टर सागर हूँ, इसी नशे में रहना है।

2) ड्रामा कह पुरूषार्थ नहीं छोड़ना है, कर्म ज़रूर करने हैं। कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को समझ सदा श्रेष्ठ कर्म ही करने हैं।

वरदान:-सदा बाप के अविनाशी और नि:स्वार्थ प्रेम में लवलीन रहने वाले मायाप्रूफ भव
जो बच्चे सदा बाप के प्यार में लवलीन रहते हैं उन्हें माया आकर्षित नहीं कर सकती। जैसे वाटरप्रूफ कपड़ा होता है तो पानी की एक बूंद भी नहीं टिकती। ऐसे जो लगन में लवलीन रहते हैं वह मायाप्रूफ बन जाते हैं। माया का कोई भी वार, वार नहीं कर सकता क्योंकि बाप का प्यार अविनाशी और नि:स्वार्थ है, इसके जो अनुभवी बन गये वह अल्पकाल के प्यार में फँस नहीं सकते। एक बाप दूसरा मैं, उसके बीच में तीसरा कोई आ ही नहीं सकता।
स्लोगन:-न्यारे-प्यारे होकर कर्म करने वाला ही सेकण्ड में फुलस्टॉप लगा सकता है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 1 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 1 July 2020

Murli Pdf for Print : – 

01-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – बड़े-बड़े स्थानों पर बड़े-बड़े दुकान (सेन्टर) खोलो, सर्विस को बढ़ाने के लिए प्लैन बनाओ, मीटिंग करो, विचार चलाओ”
प्रश्नः-स्थूल वन्डर्स तो सब जानते हैं लेकिन सबसे बड़ा वन्डर कौन-सा है, जिसे तुम बच्चे ही जानते हो?
उत्तर:-सबसे बड़ा वन्डर तो यह है जो सर्व का सद्गति दाता बाप स्वयं आकर पढ़ाते हैं। यह वन्डरफुल बात बताने के लिए तुम्हें अपने-अपने दुकानों का भभका करना पड़ता है क्योंकि मनुष्य भभका (शो) देखकर ही आते हैं। तो सबसे अच्छा और बड़ा दुकान कैपीटल में होना चाहिए, ताकि सब आकर समझें।
गीत:-मरना तेरी गली में……… Audio Player

ओम् शान्ति। शिव भगवानुवाच। रूद्र भगवानुवाच भी कहा जा सकता है क्योंकि शिव माला नहीं गाई जाती है। जो मनुष्य भक्ति मार्ग में बहुत फेरते हैं उसका नाम रखा हुआ है रूद्र माला। बात एक ही है परन्तु राइट-वे में शिवबाबा पढ़ाते हैं। वह नाम ही होना चाहिए, परन्तु रूद्र माला नाम चला आता है। तो वह भी समझाना होता है। शिव और रूद्र में कोई फ़र्क नहीं है। बच्चों की बुद्धि में है कि हम अच्छी रीति पुरूषार्थ कर बाबा के माला में नजदीक आ जाएं। यह दृष्टान्त भी बताया जाता है। जैसे बच्चे दौड़ी लगाकर जाते हैं, निशान तक जाए फिर लौट आकर टीचर पास खड़े होते हैं। तुम बच्चे भी जानते हो हमने 84 का चक्र लगाया। अभी पहले-पहले जाकर माला में पिरोना है। वह है ह्युमन स्टूडेन्ट की रेस। यह है रूहानी रेस। वह रेस तुम कर न सको। यह तो है ही आत्माओं की बात। आत्मा तो बूढ़ी, जवान वा छोटी-बड़ी होती नहीं। आत्मा तो एक ही है। आत्मा को ही अपने बाप को याद करना है, इसमें कोई तकलीफ की बात नहीं। भल पढ़ाई में ढीले भी हो जाएं परन्तु इसमें क्या तकलीफ है, कुछ भी नहीं। सभी आत्मायें भाई-भाई हैं। उस रेस में जवान तेज दौड़ेंगे। यहाँ तो वह बात नहीं। तुम बच्चों की रेस है रूद्र माला में पिरोने की। बुद्धि में है हम आत्माओं का भी झाड़ है। वह है शिवबाबा की सब मनुष्य-मात्र की माला। ऐसे नहीं कि सिर्फ 108 या 16108 की माला है। नहीं। जो भी मनुष्य मात्र हैं, सबकी माला है। बच्चे समझते हैं नम्बरवार हर एक अपने-अपने धर्म में जाकर विराजमान होंगे, जो फिर कल्प-कल्प उसी जगह पर ही आते रहेंगे। यह भी वन्डर है ना। दुनिया इन बातों को नहीं जानती। तुम्हारे में भी जो विशालबुद्धि वाले हैं वह इन बातों को समझ सकते हैं। बच्चों की बुद्धि में यही ख्याल रहना चाहिए कि हम सबको रास्ता कैसे बतायें। यह है विष्णु की माला। शुरू से लेकर सिजरा शुरू होता है, टाल-टालियां सब हैं ना। वहाँ भी छोटी-छोटी आत्मायें रहती हैं। यहाँ हैं मनुष्य। फिर सब आत्मायें एक्यूरेट वहाँ खड़ी होंगी। यह वन्डरफुल बातें हैं। मनुष्य यह स्थूल वन्डर्स सब देखते हैं परन्तु वह तो कुछ भी नहीं है। यह कितना वन्डर है जो सर्व का सद्गति दाता परमपिता परमात्मा आकर पढ़ाते हैं। कृष्ण को सर्व का सद्गति दाता थोड़ेही कहेंगे। तुमको यह सब प्वाइंट्स भी धारण करनी है। मूल बात है ही गीता के भगवान की। इस पर जीत पाई तो बस। गीता है ही सर्व शास्त्रमई शिरोमणी, भगवान की गाई हुई। पहले-पहले यह कोशिश करनी है। आजकल तो बड़ा भभका चाहिए, जिस दुकान में बहुत शो होता है वहाँ मनुष्य बहुत घुसते हैं। समझेंगे यहाँ अच्छा माल होगा। बच्चे डरते हैं, इतने बड़े-बड़े सेन्टर खोलें तो लाख दो लाख सलामी देवें, तब दिलपसन्द मकान मिले। एक ही रॉयल बड़ा दुकान हो, बड़े दुकान बड़े-बड़े शहरों में ही निकलते हैं। तुम्हारा सबसे बड़ा दुकान निकलना चाहिए केपीटल में। बच्चों को विचार सागर मंथन करना चाहिए कि कैसे सर्विस बढ़े। बड़ा दुकान निकालेंगे तो बड़े-बड़े आदमी आयेंगे। बड़े आदमी का आवाज़ झट फैलता है। पहले-पहले तो यह कोशिश करनी चाहिए। सर्विस के लिए बड़े से बड़ा स्थान ऐसी जगह बनायें जो बड़े-बड़े मनुष्य आकर देखकर वन्डर खायें और फिर वहाँ समझाने वाले भी फर्स्टक्लास चाहिए। कोई एक भी हल्की बी.के. समझाती है तो समझते हैं – शायद सब बी.के. ही ऐसी हैं इसलिए दुकान पर सेल्समैन भी अच्छे फर्स्टक्लास चाहिए। यह भी धन्धा है ना। बाप कहते हैं हिम्मते बच्चे मददे बापदादा। वह विनाशी धन तो कोई काम नहीं आयेगा। हमको तो अपनी अविनाशी कमाई करनी है, इसमें बहुतों का कल्याण होगा। जैसे इस ब्रह्मा ने भी किया। फिर कोई भूख थोड़ेही मरते हैं। तुम भी खाते हो, यह भी खाते हैं। यहाँ जो खान-पान मिलता है वह और कहीं नहीं मिलता। यह सब कुछ बच्चों का ही है ना। बच्चों को अपनी राजाई स्थापन करनी है, इसमें बड़ी विशालबुद्धि चाहिए। कैपीटल में नाम निकला तो सब समझ जायेंगे। कहेंगे बरोबर यह तो सच बतलाती हैं, विश्व का मालिक तो भगवान ही बनायेगा। मनुष्य, मनुष्य को विश्व का मालिक थोड़ेही बनायेगा। बाबा सर्विस की वृद्धि के लिए राय देते रहते हैं।

सर्विस की वृद्धि तभी होगी जब बच्चों की फ्राकदिल होगी। जो भी कार्य करते हो फ्राकदिली से करो। कोई भी शुभ कार्य आपेही करना – यह बहुत अच्छा है। कहा भी जाता है आपेही करे सो देवता, कहने से करे वह मनुष्य। कहने से भी न करे…… बाबा तो दाता है, बाबा थोड़ेही किसको कहेंगे यह करो। इस कार्य में इतना लगाओ। नहीं। बाबा ने समझाया है बड़े-बड़े राजाओं का हाथ कभी बन्द नहीं रहता। राजायें हमेशा दाता होते हैं। बाबा राय देते हैं – क्या-क्या जाकर करना चाहिए। खबरदारी भी बहुत चाहिए। माया पर जीत पानी है, बहुत ऊंच पद है। पिछाड़ी में रिजल्ट निकलती है फिर जो बहुत मार्क्स से पास होते हैं उनको खुशी भी होती है। पिछाड़ी में साक्षात्कार तो सबको होंगे ना, परन्तु उस समय कर क्या सकेंगे। तकदीर में जो है वही मिलता है। पुरूषार्थ की बात अलग है। बाप बच्चों को समझाते हैं विशाल बुद्धि बनो। अभी तुम धर्म आत्मायें बनते हो। दुनिया में धर्मात्मा तो बहुत होकर गये हैं ना। बहुत उन्हों का नामाचार होता है। फलाना बहुत धर्मात्मा मनुष्य था। कोई-कोई तो पैसे इकट्ठे करते-करते अचानक मर जाते हैं। फिर ट्रस्टी बनते हैं। कोई बच्चा भी नालायक होता है तो फिर ट्रस्ट्री करते हैं। इस समय तो यह है ही पाप आत्माओं की दुनिया। बड़े-बड़े गुरुओं आदि को दान करते हैं। जैसे कश्मीर का महाराजा था, विल करके गया कि आर्य समाजियों को मिले। उनका धर्म वृद्धि को पाये। अभी तुमको क्या करना है, किस धर्म को वृद्धि में लाना है? आदि सनातन देवी-देवता धर्म ही है। यह भी किसको पता नहीं है। अभी तुम फिर से स्थापन कर रहे हो। ब्रह्मा द्वारा स्थापना। अब बच्चों को एक की याद में रहना चाहिए। तुम याद के बल से ही सारे सृष्टि को पवित्र बनाते हो क्योंकि तुम्हारे लिए तो पवित्र सृष्टि चाहिए। इनको आग लगने से पवित्र बनती है। खराब चीज़ को आग में पवित्र बनाते हैं। इनमें सब अपवित्र वस्तु पड़कर फिर अच्छी होकर निकलेगी। तुम जानते हो यह बहुत छी-छी तमोप्रधान दुनिया है। फिर सतोप्रधान होनी है। यह ज्ञान यज्ञ है ना। तुम हो ब्राह्मण। यह भी तुम जानते हो शास्त्रों में अनेक बातें लिख दी हैं, यज्ञ पर फिर दक्ष प्रजापिता का नाम दिखाया है। फिर रूद्र ज्ञान यज्ञ कहाँ गया। इसके लिए भी क्या-क्या कहानियां बैठ लिखी हैं। यज्ञ का वर्णन कायदेसिर है नहीं। बाप ही आकर सब कुछ समझाते हैं। अभी तुम बच्चों ने ज्ञान यज्ञ रचा है श्रीमत से। यह है ज्ञान यज्ञ और फिर विद्यालय भी हो जाता है। ज्ञान और यज्ञ दोनों अक्षर अलग-अलग हैं। यज्ञ में आहुति डालनी है। ज्ञान सागर बाप ही आकर यज्ञ रचते हैं। यह बड़ा भारी यज्ञ है, जिसमें सारी पुरानी दुनिया स्वाहा होनी है।

तो बच्चों को सर्विस का प्लैन बनाना है। भल गाँवड़ों आदि में भी सर्विस करो। तुमको बहुत कहते हैं गरीबों को यह नॉलेज देनी चाहिए। सिर्फ राय देते हैं, खुद कोई काम नहीं करते। सर्विस नहीं करते सिर्फ राय देते हैं कि ऐसा करो, बहुत अच्छा है। परन्तु हमको फुर्सत नहीं है। नॉलेज बहुत अच्छी है। सबको यह नॉलेज मिलनी चाहिए। अपने को बड़ा आदमी, तुमको छोटा आदमी समझते हैं। तुमको बहुत खबरदार रहना है। उस पढ़ाई के साथ फिर यह पढ़ाई भी मिलती है। पढ़ाई से बातचीत करने का अक्ल आ जाता है। मैनर्स अच्छे हो जाते हैं। अनपढ़े तो जैसे भुट्टू होते हैं। कैसे बात करनी चाहिए, अक्ल नहीं। बड़े आदमी को हमेशा “आप” कह बात करनी होती है। यहाँ तो कोई-कोई ऐसे भी हैं जो पति को भी तुम-तुम कह देंगी। आप अक्षर रॉयल है। बड़े आदमी को आप कहेंगे। तो बाबा पहले-पहले राय देते हैं कि देहली जो परिस्तान थी, फिर से इसे परिस्तान बनाना है। तो देहली में सबको सन्देश देना चाहिए, एडवरटाइजमेंट बहुत अच्छी करनी है। टॉपिक्स भी बताते रहते हैं, टापिक की लिस्ट बनाओ फिर लिखते जाओ। विश्व में शान्ति कैसे हो सकती है आकर समझो, 21 जन्मों के लिए निरोगी कैसे बन सकते हो, आकर समझो। ऐसी खुशी की बातें लिखी हुई हो। 21 जन्मों के लिए निरोगी, सतयुगी डबल सिरताज आकर बनो। सतयुगी अक्षर तो सबमें डालो। सुन्दर-सुन्दर अक्षर हो तो मनुष्य देखकर खुश हो। घर में भी ऐसे बोर्ड चित्र आदि लगे हुए हों। अपना धंधा आदि भल करो। साथ-साथ सर्विस भी करते रहो। धन्धे में सारा दिन थोड़ेही रहना होता है। ऊपर से सिर्फ देखभाल करनी होती है। बाकी काम असिस्टेंट मैनेजर चलाते हैं। कोई सेठ लोग फ्राकदिल होते हैं तो असिस्टेंट को अच्छा पगार (मजदूरी) देकर भी गद्दी पर बिठा देते हैं। यह तो बेहद की सर्विस है। और सब हैं हद की सर्विस। इस बेहद की सर्विस में कितनी विशालबुद्धि होनी चाहिए। हम विश्व पर जीत पाते हैं। काल पर भी हम जीत पाकर अमर बन जाते हैं। ऐसी-ऐसी लिखत देखकर आयेंगे और समझने की कोशिश करेंगे। अमरलोक का मालिक तुम कैसे बन सकते हो आकर समझो, बहुत टॉपिक्स निकल सकती हैं। तुम किसको विश्व का मालिक बना सकते हो। वहाँ दु:ख का नाम-निशान नहीं रहता। बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। बाबा हमको फिर से क्या बनाने आये हैं! बच्चे जानते हैं पुरानी सृष्टि से नई बननी है, मौत भी सामने खड़ा है। देखते हो लड़ाई लगती रहती है। बड़ी लड़ाई लगी तो खेल ही खलास हो जायेगा। तुम तो अच्छी रीति जानते हो। बाप बहुत प्यार से कहते हैं – मीठे बच्चों, विश्व की बादशाही तुम्हारे लिए है। तुम विश्व के मालिक थे, भारत में तुमने अथाह सुख देखे। वहाँ रावण राज्य ही नहीं। तो इतनी खुशी चाहिए। बच्चों को आपस में मिलकर राय निकालनी चाहिए। अखबारों में डालना चाहिए। देहली में भी एरोप्लेन से पर्चे गिराओ। निमंत्रण देते हैं, खर्चा कोई बहुत थोड़ेही लगता है, बड़ा ऑफीसर समझ जाए तो फ्री भी कर सकते हैं। बाबा राय देते हैं, जैसे कलकत्ता है वहाँ चौरंगी में फर्स्टक्लास एक ही बड़ा दुकान हो रॉयल, तो ग्राहक बहुत आयेंगे। मद्रास, बाम्बे बड़े-बड़े शहरों में बड़ा दुकान हो। बाबा बिजनेसमैन भी तो है ना। तुमसे कखपन पाई पैसे लेकर एक्सचेंज में क्या देता हूँ! इसलिए गाया जाता है रहमदिल। कौड़ी से हीरे जैसा बनाने वाला, मनुष्य को देवता बनाने वाला। बलिहारी एक बाप की है। बाप न होता, तो तुम्हारी क्या महिमा होती।

तुम बच्चों को फ़खुर होना चाहिए कि भगवान हमको पढ़ाते हैं। एम ऑब्जेक्ट नर से नारायण बनने की सामने खड़ी है। पहले-पहले जिन्होंने अव्यभिचारी भक्ति शुरू की है, वही आकर ऊंच पद पाने का पुरूषार्थ करेंगे। बाबा कितनी अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स समझाते हैं, बच्चों को भूल जाती हैं, तब बाबा कहते हैं प्वाइंट्स लिखो। टॉपिक्स लिखते रहो। डॉक्टर लोग भी किताब पढ़ते हैं। तुम हो मास्टर रूहानी सर्जन। तुमको सिखलाते हैं आत्मा को इन्जेक्शन कैसे लगाना है। यह है ज्ञान का इन्जेक्शन। इसमें सुई आदि तो कुछ नहीं है। बाबा है अविनाशी सर्जन, आत्माओं को आकर पढ़ाते हैं। वही अपवित्र बनी है। यह तो बहुत इज़ी है। बाप हमको विश्व का मालिक बनाते हैं, उनको हम याद नहीं कर सकते हैं! माया का आपोजीशन बहुत है इसलिए बाबा कहते हैं – चार्ट रखो और सर्विस का ख्याल करो तो बहुत खुशी होगी। कितनी भी अच्छी मुरली चलाते हैं परन्तु योग है नहीं। बाप से सच्चा बनना भी बड़ा मुश्किल है। अगर समझते हैं हम बहुत तीखे हैं तो बाबा को याद कर चार्ट भेजें तो बाबा समझेंगे कहाँ तक सच है या झूठ? अच्छा, बच्चों को समझाया – सेल्समैन बनना है, अविनाशी ज्ञान रत्नों का। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) एम ऑब्जेक्ट को सामने रख फ़खुर में रहना है, मास्टर रूहानी सर्जन बन सबको ज्ञान इन्जेक्शन लगाना है। सर्विस के साथ-साथ याद का भी चार्ट रखना है तो खुशी रहेगी।

2) बातचीत करने के मैनर्स अच्छे रखने हैं, ‘आप’ कह बात करनी है। हर कार्य फ्राकदिल बनकर करना है।

वरदान:-स्व कल्याण के प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा विश्व कल्याण की सेवा में सदा सफलतामूर्त भव
जैसे आजकल शारीरिक रोग हार्टफेल का ज्यादा है वैसे आध्यात्मिक उन्नति में दिलशिकस्त का रोग ज्यादा है। ऐसी दिलशिकस्त आत्माओं में प्रैक्टिकल परिवर्तन देखने से ही हिम्मत वा शक्ति आ सकती है। सुना बहुत है अब देखना चाहते हैं। प्रमाण द्वारा परिवर्तन चाहते हैं। तो विश्व कल्याण के लिए स्व कल्याण पहले सैम्पल रूप में दिखाओ। विश्व कल्याण की सेवा में सफलतामूर्त बनने का साधन ही है प्रत्यक्ष पमाण, इससे ही बाप की प्रत्यक्षता होगी। जो बोलते हो वह आपके स्वरूप से प्रैक्टिकल दिखाई दे तब मानेंगे।
स्लोगन:-दूसरे के विचारों को अपने विचारों से मिलाना – यही है रिगार्ड देना।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 30 JUNE 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 30 June 2020

Murli Pdf for Print : – 

30-06-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे-तुम अभी पुजारी से पूज्य बन रहे हो, पूज्य बाप आये हैं तुम्हें आप समान पूज्य बनाने”
प्रश्नः-तुम बच्चों के अन्दर कौन-सा दृढ़ विश्वास है?
उत्तर:-तुम्हें दृढ़ विश्वास है कि हम जीते जी बाप से पूरा वर्सा लेकर ही छोड़ेंगे। बाबा की याद में यह पुराना शरीर छोड़ बाप के साथ जायेंगे। बाबा हमें घर का सहज रास्ता बता रहे हैं।
गीत:-ओम् नमो शिवाए……….

ओम् शान्ति। ओम् शान्ति। ओम् शान्ति तो बहुत मनुष्य कहते रहते हैं। बच्चे भी कहते हैं, ओम् शान्ति। अन्दर जो आत्मा है – वह कहती है ओम् शान्ति। परन्तु आत्मायें तो यथार्थ रीति अपने को जानती नहीं हैं, न बाप को जानती हैं। भल पुकारते हैं परन्तु बाप कहते हैं मैं जो हूँ, जैसा हूँ यथार्थ रीति मुझे कोई नहीं जानते। यह (ब्रह्मा) भी कहते हैं कि मैं अपने को नहीं जानता था कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ! आत्मा तो मेल है ना। बच्चा है। फादर है परमात्मा। तो आत्मायें आपस में ब्रदर्स हो गई। फिर शरीर में आने कारण कोई को मेल, कोई को फीमेल कहते हैं। परन्तु यथार्थ आत्मा क्या है, यह कोई भी मनुष्य मात्र नहीं जानते। अभी तुम बच्चों को यह नॉलेज मिलती है जो फिर तुम साथ ले जाते हो। वहाँ यह नॉलेज रहती है, हम आत्मा हैं यह पुराना शरीर छोड़ दूसरा लेते हैं। आत्मा की पहचान साथ में ले जाते। पहले तो आत्मा को भी नहीं जानते थे। हम कब से पार्ट बजाते हैं, कुछ नहीं जानते थे। अभी तक भी कई अपने को पूरा पहचानते नहीं हैं। मोटे रूप से जानते हैं और मोटे लिंग रूप को ही याद करते हैं। मैं आत्मा बिन्दी हूँ। बाप भी बिन्दी है, उस रूप में याद करें, ऐसे बहुत थोड़े हैं। नम्बरवार बुद्धि है ना। कोई तो अच्छी रीति समझकर औरों को भी समझाने लग पड़ते हैं। तुम समझाते हो अपने को आत्मा समझ और बाप को याद करना है। वही पतित-पावन है। पहले तो मनुष्यों को आत्मा की ही पहचान नहीं है, तो वह भी समझाना पड़े। अपने को जब आत्मा निश्चय करें तब बाप को भी जान सकें। आत्मा को ही नहीं पहचानते हैं इसलिए बाप को भी पूरा जान नहीं सकते। अभी तुम बच्चे जानते हो हम आत्मा बिन्दी हैं। इतनी छोटी-सी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट है, यह भी तुमको समझाना पड़े। नहीं तो सिर्फ कहते ज्ञान बहुत अच्छा है। भगवान से मिलने का रास्ता बड़ा अच्छा बताते हैं। परन्तु मैं कौन हूँ, बाप कौन है, यह नहीं जानते। सिर्फ अच्छा-अच्छा कह देते हैं। कोई तो फिर ऐसे भी कहते हैं कि यह तो नास्तिक बना देते हैं। तुम जानते हो-ज्ञान की समझ कोई में भी नहीं है। तुम समझाते हो अभी हम पूज्य बन रहे हैं। हम किसकी पूजा नहीं करते हैं क्योंकि जो सबका पूज्य है ऊंच ते ऊंच भगवान, उनकी हम सन्तान हैं। वह है ही पूज्य पिताश्री। अभी तुम बच्चे जानते हो – पिताश्री हमको अपना बनाकर और पढ़ा रहे हैं। सबसे ऊंच ते ऊंच पूज्य एक ही है, उनके सिवाए और कोई पूज्य बना न सके। पुजारी जरूर पुजारी ही बनायेंगे। दुनिया में सब हैं पुजारी। तुमको अभी पूज्य मिला है, जो आपसमान बना रहे हैं। तुमसे पूजा छुड़ा दी है। अपने साथ ले जाते हैं। यह छी-छी दुनिया है। यह है ही मृत्युलोक। भक्ति शुरू ही तब होती है जब रावण राज्य होता है। पूज्य से पुजारी बन जाते हैं। फिर पुजारी से पूज्य बनाने के लिए बाप को आना पड़ता है। अभी तुम पूज्य देवता बन रहे हो। आत्मा शरीर द्वारा पार्ट बजाती है। अभी बाप हमको पूज्य देवता बना रहे हैं, आत्मा को पवित्र बनाने के लिए। तो तुम बच्चों को युक्ति दी है-बाप को याद करने से तुम पुजारी से पूज्य बन जायेंगे क्योंकि वह बाप है सर्व का पूज्य। जो आधाकल्प पुजारी बनते हैं, वह फिर आधाकल्प पूज्य बनते हैं। यह भी ड्रामा में पार्ट है। ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को कोई भी नहीं जानते। अभी बाप द्वारा तुम बच्चे जानते हो और दूसरे को भी समझाते हो। पहली-पहली मुख्य बात यह समझानी है-अपने को आत्मा बिन्दी समझो। आत्मा का बाप वह निराकार है, वह नॉलेजफुल ही आकर पढ़ाते हैं। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। बाप आते हैं एक बार। उनको जानना भी एक बार होता है। आते भी एक ही बार संगमयुग पर हैं। पुरानी पतित दुनिया को आकर पावन बनाते हैं। अभी बाप ड्रामा प्लैन अनुसार आये हैं। कोई नई बात नहीं है। कल्प-कल्प ऐसे ही आता हूँ। एक सेकण्ड भी आगे-पीछे नहीं हो सकता है। तुम बच्चों की दिल में जंचता है कि बरोबर बाबा हम आत्माओं को सच्चा ज्ञान दे रहे हैं, फिर कल्प बाद भी बाप को आना पड़ेगा। बाप द्वारा जो इस समय जाना है वह फिर कल्प बाद जानेंगे। यह भी जानते हैं अब पुरानी दुनिया का विनाश होगा फिर हम सतयुग में आकर अपना पार्ट बजायेंगे। सतयुगी स्वर्गवासी बनेंगे। यह तो बुद्धि में याद है ना। याद रहने से खुशी भी रहती है। स्टूडेन्ट लाइफ है ना। हम स्वर्गवासी बनने के लिए पढ़ रहे हैं। यह खुशी स्थाई रहनी चाहिए, जब तक स्टडी पूरी हो। बाप समझाते रहते हैं कि स्टडी पूरी तब होगी जब विनाश के लिए सामग्री तैयार होगी। फिर तुम समझ जायेंगे-आग जरूर लगेगी। तैयारियां तो होती रहती हैं ना। एक-दो में कितना गर्म होते रहते हैं। चारों तरफ भिन्न-भिन्न प्रकार की सेनायें हैं। सब लड़ने के लिए तैयार होते रहते हैं। कोई न कोई अटक ऐसी डालते जो लड़ाई जरूर लगे। कल्प पहले मुआफिफक विनाश तो होना ही है। तुम बच्चे देखेंगे। आगे भी बच्चों ने देखा है एक चिनगारी से कितनी लड़ाई लगी थी। एक-दो को डराते रहते हैं कि ऐसा करो नहीं तो हमें यह बॉम्ब्स हाथ में उठाने पड़ेंगे। मौत सामने आ जाता है तो फिर बनाने के सिवाए रह नहीं सकते हैं। आगे भी लड़ाई लगी थी तो बॉम्ब्स लगा दिये। भावी थी ना। अभी तो हज़ारों बॉम्ब्स हैं।

तुम बच्चों को यह जरूर समझाना है कि अभी बाप आया हुआ है, सबको वापिस ले जाने। सब पुकार रहे हैं, हे पतित-पावन आओ। इस छी-छी दुनिया से हमको पावन दुनिया में ले चलो। तुम बच्चे जानते हो पावन दुनियायें हैं दो – मुक्ति और जीवनमुक्ति। सबकी आत्मायें पवित्र बन मुक्तिधाम चली जायेंगी। यह दु:खधाम विनाश हो जायेगा, जिसको मृत्युलोक कहा जाता है। पहले अमरलोक था, फिर चक्र लगाए अब मृत्युलोक में आये हो। फिर अमरलोक की स्थापना होती है। वहाँ अकाले मृत्यु कोई होती नहीं इसलिए उनको अमरलोक कहा जाता है। शास्त्रों में भी भल अक्षर हैं, परन्तु यथार्थ रीति कोई भी समझते नहीं हैं। यह भी तुम जानते हो-अब बाबा आया हुआ है। मृत्युलोक का विनाश जरूर होना है। यह 100 परसेन्ट सरटेन है। बाप समझा रहे हैं कि अपनी आत्मा को योगबल से पवित्र बनाओ। मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हो जायेंगे। परन्तु यह भी बच्चे याद नहीं कर सकते हैं। बाप से वर्सा अथवा राजाई लेने में मेहनत तो चाहिए ना। जितना हो सके याद में रहना है। अपने को देखना है-कितना समय हम याद में रहते हैं और कितनों को याद दिलाते हैं? मनमनाभव, इनको मंत्र भी नहीं कहा जाए, यह है बाप की याद। देह-अभिमान को छोड़ देना है। तुम आत्मा हो, यह तुम्हारा रथ है, इससे तुम कितना काम करते हो। सतयुग में तुम देवी-देवता बन कैसे राज्य करते हो फिर तुम यही अनुभव पायेंगे। उस समय तो प्रैक्टिकल में आत्म-अभिमानी रहते हो। आत्मा कहेगी हमारा यह शरीर बूढ़ा हुआ है, यह छोड़ नया लेंगे। दु:ख की बात ही नहीं। यहाँ तो शरीर न छूटे उसके लिए भी कितनी डॉक्टर की दवाइयों आदि की मेहनत करते हैं। तुम बच्चों को बीमारी आदि में भी पुराने शरीर से कभी तंग नहीं होना है क्योंकि तुम समझते हो इस शरीर में ही जी करके बाप से वर्सा पाना है। शिवबाबा की याद से ही पवित्र बन जायेंगे। यह है मेहनत। परन्तु पहले तो आत्मा को जानना पड़े। मुख्य तुम्हारी है ही याद की यात्रा। याद में रहते-रहते फिर हम चले जायेंगे मूलवतन। जहाँ के हम निवासी हैं, वही हमारा शान्तिधाम है। शान्तिधाम, सुखधाम को तुम ही जानते हो और याद करते हो। और कोई नहीं जानते। जिन्होंने कल्प पहले बाप से वर्सा लिया है, वही लेंगे।

मुख्य है याद की यात्रा। भक्ति मार्ग की यात्रायें अब खत्म होनी हैं। भक्ति मार्ग ही खलास हो जायेगा। भक्ति मार्ग क्या है? जब ज्ञान हो तब समझें। समझते हैं भक्ति से भगवान मिलेगा। भक्ति का फल क्या देंगे? कुछ भी पता नहीं। तुम बच्चे अब समझते हो बाप बच्चों को जरूर स्वर्ग की बादशाही का ही वर्सा देंगे। सबको वर्सा दिया था, यथा राजा-रानी तथा प्रजा सब स्वर्गवासी थे। बाप कहते हैं 5000 वर्ष पहले भी तुमको स्वर्गवासी बनाया था। अब फिर तुमको बनाता हूँ। फिर तुम ऐसे 84 जन्म लेंगे। यह बुद्धि में याद रहना चाहिए, भूलना नहीं चाहिए। जो नॉलेज सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की बाप के पास है वह बच्चों की बुद्धि में टपकती है। हम कैसे 84 जन्म लेते हैं, अभी फिर बाबा से वर्सा लेते हैं, अनेक बार बाप से वर्सा लिया है, बाप कहते हैं जैसे लिया था फिर लो। बाप तो सबको पढ़ाते रहते हैं। दैवीगुण धारण करने के लिए भी सावधानी मिलती रहती है। अपनी जांच करने के लिए साक्षी हो देखना चाहिए कि कहाँ तक हम पुरूषार्थ करते हैं, कोई समझते हैं हम बहुत अच्छा पुरूषार्थ कर रहे हैं। प्रदर्शनी आदि का प्रबन्ध करता रहता हूँ ताकि सबको मालूम पड़ जाए कि भगवान बाप आया हुआ है। मनुष्य बिचारे सब घोर नींद में सोये हुए हैं। ज्ञान का किसी को पता ही नहीं है तो जरूर भक्ति को ऊंच ही समझेंगे। आगे तुम्हारे में भी कोई ज्ञान था क्या? अभी तुमको मालूम पड़ा है, ज्ञान का सागर बाप ही है, वही भक्ति का फल देते हैं, जिसने जास्ती भक्ति की है, उनको जास्ती फल मिलेगा। वही अच्छी रीति पढ़ते हैं ऊंच पद पाने के लिए। यह कितनी मीठी-मीठी बातें हैं। बुढ़ियों आदि के लिए भी बहुत सहज कर समझाते हैं। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। ऊंच ते ऊंच है भगवान शिव। शिव परमात्माए नम: कहा जाता है, वह कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हों। बस। और कोई तकलीफ नहीं देते हैं। आगे चल शिवबाबा को भी याद करने लग पड़ेंगे। वर्सा तो लेना है, जीते जी बाप से वर्सा लेकर ही छोड़ेंगे। शिवबाबा की याद में शरीर छोड़ देते हैं, तो वह फिर संस्कार ले जाते हैं। स्वर्ग में जरूर आयेंगे, जितना योग उतना फल मिलेगा। मूल बात है-चलते-फिरते जितना हो सके याद में रहना है। अपने सिर से बोझा उतारना है, सिर्फ याद चाहिए और कोई तकलीफ बाप नहीं दते हैं। जानते हैं आधाकल्प से बच्चों ने तकलीफ देखी है इसलिए अभी आया हूँ, तुमको सहज रास्ता बताने – वर्सा लेने का। बाप को सिर्फ याद करो। भल याद तो आगे भी करते थे परन्तु कोई ज्ञान नहीं था, अभी बाप ने ज्ञान दिया है कि इस रीति मुझे याद करने से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। भल शिव की भक्ति तो दुनिया में बहुत करते हैं, बहुत याद करते हैं परन्तु पहचान नहीं है। इस समय बाप खुद ही आकर पहचान देते हैं कि मुझे याद करो। अभी तुम समझते हो हम अच्छी रीति जानते हैं। तुम कहेंगे हम जाते हैं बापदादा के पास। बाप ने यह भागीरथ लिया है, भागीरथ भी मशहूर है, इन द्वारा बैठ ज्ञान सुनाते हैं। यह भी ड्रामा में पार्ट है। कल्प-कल्प इस भाग्यशाली रथ पर आते हैं। तुम जानते हो कि यह वही है जिसको श्याम सुन्दर कहते हैं। यह भी तुम समझते हो। मनुष्यों ने फिर अर्जुन नाम रख दिया है। अभी बाप यथार्थ समझाते हैं-ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा कैसे बनते हैं। बच्चों में अभी समझ है कि हम ब्रह्मापुरी के हैं फिर विष्णुपुरी के बनेंगे। विष्णुपुरी से ब्रह्मापुरी में आने में 84 जन्म लगते हैं। यह भी अनेक बार समझाया है जो तुम फिर से सुनते हो। आत्मा को अब बाप कहते हैं सिर्फ मामेकम् याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे इसलिए तुमको खुशी भी होती है। यह एक अन्तिम जन्म पवित्र बनने से हम पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। तो क्यों न पवित्र बनें। हम एक बाप के बच्चे ब्रह्माकुमार कुमारी हैं, फिर भी वह जिस्मानी वृत्ति बदलने में टाइम लगता है। धीरे-धीरे पिछाड़ी में कर्मातीत अवस्था होनी है। इस समय किसकी कर्मातीत अवस्था होना असम्भव है। कर्मातीत अवस्था हो जाए फिर तो यह शरीर भी न रहे, इनको छोड़ना पड़े। लड़ाई लग जाए, एक बाप की ही याद रहे, इसमें मेहनत है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) साक्षी हो अपने को देखना है कि हम कहाँ तक पुरूषार्थ करते हैं? चलते फिरते, कर्म करते कितना समय बाप की याद में रहते हैं?

2) इस शरीर से कभी भी तंग नहीं होना है। इस शरीर में ही जी करके बाप से वर्सा पाना है। स्वर्गवासी बनने के लिए इस लाइफ में पूरी स्टडी करनी है।

वरदान:-मास्टर रचयिता की स्टेज द्वारा आपदाओं में भी मनोरंजन का अनुभव करने वाले सम्पूर्ण योगी भव
मास्टर रचयिता की स्टेज पर स्थित रहने से बड़े से बड़ी आपदा एक मनोरंजन का दृश्य अनुभव होगी। जैसे महाविनाश की आपदा को भी स्वर्ग के गेट खुलने का साधन बताते हो, ऐसे किसी भी प्रकार की छोटी बड़ी समस्या व आपदा मनोरंजन का रूप दिखाई दे, हाय-हाय के बजाए ओहो शब्द निकले – दु:ख भी सुख के रूप में अनुभव हो। दु:ख-सुख की नॉलेज होते हुए भी उसके प्रभाव में न आयें, दु:ख को भी बलिहारी सुख के दिन आने की समझें-तब कहेंगे सम्पूर्ण योगी।
स्लोगन:-दिलतख्त को छोड़ साधारण संकल्प करना अर्थात् धरनी में पांव रखना।
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