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Brahma kumaris murli 3 July 2017 : Daily Murli (Hindi)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 2 July 2017

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03/07/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – किसी देहधारी से दैहिक लव न रख, एक बाप से लव रखो, अशरीरी बनने का पूरा-पूरा अभ्यास करो”
प्रश्नः-रहमदिल बच्चों का कर्तव्य क्या है?
उत्तर:-जब कोई फालतू बात करे तो उसकी फालतू बात न सुन उनके कल्याण अर्थ बड़ों को सुनाना – यह रहमदिल बच्चों का कर्तव्य है। जिनमें कोई पुरानी आदतें हैं उन्हें मिटाने में सहयोगी बनना ही रहमदिल बनना है।
प्रश्नः-कौन सा टाइटिल किसी देहधारी को नहीं दे सकते लेकिन ब्रह्मा बाप को दे सकते हैं?
उत्तर:-श्री का टाइटिल क्योंकि श्री अर्थात् श्रेष्ठ पवित्र को कहा जाता है। किसी देहधारी मनुष्य को यह टाइटिल दे नहीं सकते क्योंकि भ्रष्टाचार से जन्म लेते हैं। ब्रह्मा बाप को श्री कहते क्योंकि इनका यह अलौकिक जन्म है।
गीत:-इस पाप की दुनिया से….

ओम् शान्ति। बच्चे अब समझ गये हैं अर्थात् समझदार बन गये हैं, तो जरूर पहले बेसमझ थे। यह भी नहीं समझ में आता है कि यह पतित दुनिया है और इस भारत में ही देवी देवताओं का राज्य था, उसमें पावन सुखी थे। उसमें दु:ख की बात नहीं थी। परन्तु शास्त्रों में कई बातें सुनने के कारण यह भी समझ में नहीं आता है कि स्वर्ग में सदैव सुख था। स्वर्ग का किसको पता नहीं। समझते हैं वहाँ भी दु:ख था, यह है बेसमझी। अब तुम बच्चे समझदार बने हो। बाप ने आकर समझाया है, उनकी श्रीमत पर चल रहे हो। यह पतित दुनिया है, स्वर्ग पावन दुनिया थी। पावन दुनिया में भी दु:ख हो फिर तो दु:ख की दुनिया ही कहेंगे। फिर गीत भी रांग हो जाता है। कहते भी हैं हे बाबा ऐसी जगह ले चलो जहाँ आराम सुख चैन हो। बच्चे यह भी जानते हैं कि स्वर्ग सोने की चिड़िया थी। देवी-देवतायें थे। कभी भी किसको दु:ख नहीं देते थे। गाते भी हैं फिर भी शास्त्रों में ऐसी बातें लिखी हैं जो समझते हैं यह परम्परा से चला आता है। कृष्ण पर भी झूठे कलंक लगा दिये हैं। कहा जाता है जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। समझते हैं सारी सृष्टि ही पतित है। इस समय उन्हों की दृष्टि ही पतित है तो सारी सृष्टि को ही पतित समझते हैं। समझते हैं परम्परा से पतितपना चला आया है। अभी तुम बच्चों में समझ आती जा रही है, सो भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। परमपिता परमात्मा के बच्चों को डायरेक्शन मिलते हैं। आत्माओं को बैठ बाप समझाते हैं। सभी आत्मायें पतित हैं इसलिए पतित आत्मा, पुण्य आत्मा कहा जाता है। बाप आत्माओं से बैठ बात करते हैं। तुम हमारे अविनाशी बच्चे हो, फिर मम्मा बाबा भी कहते हो। इस दुनिया में किसी को भी पिताश्री नहीं कह सकते। श्री माना श्रेष्ठ। एक भी मनुष्य श्रेष्ठ है नहीं। यह तो एक की ही महिमा हो सकती है। यहाँ तो सब भ्रष्टाचार से ही पैदा होते हैं, इसलिए श्री कह नहीं सकते। भल तुम इनको इस समय कहते हो क्योंकि सन्यास किया हुआ है – श्रेष्ठ बनने के लिए। तुम जानते हो कि अभी हम फरिश्ते बनने वाले हैं। भ्रष्ट को श्री कह नहीं सकते। श्री लक्ष्मी, श्री नारायण, श्री राधे, श्री कृष्ण कहते हैं। मन्दिरों में भी उन्हों की महिमा गाते हैं। अपने को श्रेष्ठ कह नहीं सकते। अब तुम बच्चों ने समझा है भारत श्रेष्ठ था, शुद्ध सृष्टि थी। अभी पतित सृष्टि है, पतित को ही भ्रष्टाचारी कहेंगे। वे लोग भ्रष्टाचारियों को श्रेष्ठ बनाने के लिए सभायें करते हैं। परन्तु दुनिया ही भ्रष्टाचारी है तो कोई किसी को श्रेष्टाचारी बना कैसे सकते।

बरोबर यह रावण राज्य है। जिस कारण रावण को वर्ष-वर्ष जलाते हैं। जलता ही नहीं, फिर खड़ा हो जाता है। यह भी मनुष्यों को समझ में नहीं आता, जिसे जला दिया उसे फिर हम नया क्यों बनाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि रावणराज्य गया नहीं है। स्वर्ग में जब रामराज्य होता है वहाँ तो एफीजी निकालेंगे नहीं। कहते हैं रावण को जलाया फिर लंका को लूटा। रावण की लंका सोनी बताते हैं। परन्तु ऐसा है नहीं। यह तो सारी दुनिया लंका है। रावणराज्य में तो सब हैं, वह श्रीलंका तो आइलैण्ड है ना। दिखलाया भी है – भारत की पुछड़ी है। परन्तु सिर्फ उसमें रावण राज्य तो नहीं है ना। रावणराज्य तो सारे विश्व पर है, यह भी तुम समझते हो। कॉलेज में कोई बेसमझ जाकर बैठे तो क्या समझ सकेंगे! कुछ भी नहीं। वेस्ट ऑफ टाइम करेंगे। यह ईश्वरीय कॉलेज है, इसमें नया आदमी कुछ समझ नहीं सकेंगे। 7 दिन क्वारनटाइन में बिठाना पड़े, जब तक लायक बनें। फिर भी अच्छा आदमी रिलीजस माइन्डेड हो तो उनसे पूछना है – परमपिता परमात्मा तुम्हारा क्या लगता है? वह तो है आत्माओं का पिता और प्रजापिता भी तो बाप है। यह प्वाइंट्स बड़ी अच्छी हैं परन्तु बच्चे अजुन इतना हर्षित नहीं होते हैं। बाप कहते हैं तुमको नई-नई प्वाइंट्स सुनाता हूँ जिससे तुमको नशा चढ़े। किसको समझाने की युक्ति आये। फार्म भराने की कॉपी में पहले यह प्रश्न लिखाना है – कहेंगे परमपिता, तो पिता हुआ ना। फिर उस समय सर्वव्यापी का ज्ञान उड़ जायेगा। तुम जब प्रश्न पूछेंगे तो कहेंगे वह तो बाप है। हम सब बच्चे हैं। इतना मान जायें तो झट लिखा लेना चाहिए। प्रजापिता के भी बच्चे ठहरे। शिव हो गया दादा और वह बाप। शिवबाबा तो स्वर्ग की स्थापना करने वाला है तो जरूर उनसे ही वर्सा मिलेगा। सहज से सहज बातें निकालनी पड़ती हैं। बहुत सहज है। मित्र सम्बन्धियों के पास भी जाओ उनको भी यह समझाओ। यह तो नशा है ना – हम बाबा द्वारा दादे से वर्सा पाते हैं। बापदादा से वर्सा पाते हैं, माता से वर्सा नहीं मिलेगा। बाप को ही स्वर्ग की स्थापना करनी है ना। वही मालिक है। जैसे उनको दादे से वर्से का हक है, वैसे पोत्रे पोत्रियों को भी हक है। बाप कहते हैं मुझे याद करो। मैं तो कहता नहीं हूँ कि इस देहधारी को याद करो। बाप सम्मुख बात कर रहे हैं। कल्प पहले भी ऐसे ही समझाया था। वर्सा भी तुमको बापदादा द्वारा मिलता है। ऐसे नहीं कि मम्मा से मिलता है। तुमको देह-अभिमान बहुत आ जाता है। देहधारियों से लव हो जाता है। हे आत्मायें तुम नंगी आई थी फिर पार्ट बजाते-बजाते अब 84 जन्म पूरे किये हैं। अभी मैं कहता हूँ तुमको वापिस चलना है। मामेकम् याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। देहधारी को याद करने से विकर्म विनाश नहीं होंगे। तुम अन्जाम करते हो बाबा हम आपको ही याद करेंगे। तुमको इस पुरानी दुनिया में अब रहना ही नहीं है, इसमें कोई चैन नहीं इसलिए कहते हो-ऐसी जगह ले चलो जहाँ सुख चैन मिले। तुम कहते हो हम पहले जायेंगे शान्तिधाम, जहाँ शान्ति ही शान्ति होगी। फिर जायेंगे वहाँ से सुखधाम में, जहाँ शान्ति-सुख दोनों हैं। जब दु:ख है तो अशान्ति है। सुख में तो शान्ति है ही। परन्तु वह शान्ति नहीं। शान्तिधाम है आत्माओं का स्वीट होम। बाप सारे आदि-मध्य-अन्त को जानने वाला है।

अब तुम बच्चों का धन्धा ही है पढ़ना और पढ़ाना और अपने शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करना है। तुम जानते हो हम इस मृत्युलोक से अमरलोक में चले जायेंगे वाया शान्तिधाम। यह बुद्धि में याद रखना है। जब तक मृत्यु नहीं हुआ है, पढ़ना ही है। यह तो याद कर सकते हो ना। अब हमको जाना है अपने घर। यह दुनिया, यह सब कुछ छोड़ना है, खुशी होनी चाहिए। यह बेहद के नाटक का राज़ भी समझ गये हो। हद का नाटक पूरा होता है तो कपड़े बदली कर घर चले जाते हैं। वैसे अब हमको भी जाना है। 84 जन्मों का चक्र पूरा होता है। याद भी करते हैं हे पतित-पावन आओ। याद शिवबाबा को ही करेंगे। एक तरफ कहते पतित-पावन आओ, दूसरे तरफ कह देते परमात्मा सर्वव्यापी है। कोई अर्थ ही नहीं निकलता। बच्चों को कितनी अच्छी रीति समझाते हैं कि शान्तिधाम को याद करो यह दु:खधाम है। और गुरू गोसाई को यह कहना आयेगा नहीं, सिवाए तुम ब्राह्मण ब्राह्मणियों के। इस दु:खधाम का विनाश भी सामने खड़ा है। यह वही महाभारत की लड़ाई है। यूरोपवासी यादव भी हैं और कौरव पाण्डव भाई-भाई भी हैं। एक ही घर के हैं ना। भाई-भाई में युद्ध हो नहीं सकती। यहाँ युद्ध की बात ही नहीं। यह भी वन्डर है ना। मनुष्य क्या नहीं कर सकता है। जो बातें हुई ही नहीं, वह भी बना-बना कर एक दो की दिल को खराब कर देते हैं। व्यास भगवान का धन्धा भी देखो कैसा है। मनुष्यों का धन्धा है एक दो को लड़ाना। यह तो एक रसम है। सब एक दो के दुश्मन बनते हैं। बच्चे भी बाप का दुश्मन बन पड़ते हैं। अब तुम्हारी बुद्धि में देखो क्या है और शास्त्रों में देखो क्या-क्या लिख दिया है। उनका फिर मान कितना रखते हैं। बड़ी परिक्रमा दिलाते हैं। देवताओं की मूर्तियों को भी रथ पर बिठाए बड़ी परिक्रमा दिलाते हैं। फिर सबको समुद्र में डाल देते हैं। मृत्युलोक की रसम-रिवाज सबकी अपनी-अपनी है। बाप का प्लैन देखो कितना बड़ा है। सबके प्लैन खत्म कर देते और सुखधाम की स्थापना करते हैं। बाकी सबको शान्तिधाम में भेज देते हैं। तुम बच्चे देखो किसके सामने बैठे हो। निश्चय है – परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर है। इन आरगन्स द्वारा हमको नॉलेज दे रहे हैं। और कोई ऐसा सतसंग होगा क्या? अभी बाप सामने बैठ समझाते हैं। जानते हो बाप हम आत्माओं से बात करते हैं, हम कानों से सुनते हैं। बाबा इस दादा के मुख द्वारा बोलते हैं। जो रत्न बाबा के मुख से निकलते हैं, वही तुम बच्चों के मुख से निकलने चाहिए। फालतू बातें सुनते भी नहीं सुननी हैं। कोई तो बैठ खुशी से सुनते हैं। बाबा कहते ऐसी बातें सुनो मत। रहमदिल बन किसमें कोई पुरानी आदत है तो मिटानी चाहिए। हाँ जी कर सुनना नहीं चाहिए। जो बाबा सुखधाम का मालिक बनाते हैं, ऐसे बाबा की ग्लानी तो हम सुनेंगे नहीं। हमको तो शिवबाबा से वर्सा लेना चाहिए। और बातों से हमारा क्या तैलुक। कोई सुने या न सुने हम तो ज्ञान का शुर्मा पहन लेवें। कोई ज्ञान अंजन लगाते, कोई धूल अंजन लगा लेते हैं। उससे तीसरा नेत्र खुलता नहीं। बाबा कितना सहज कर समझाते हैं। जो कैसे भी रोगी, अन्धा कुब्जा है वह भी समझ जाये। अल्फ और बे दो अक्षर हैं। सिर्फ पूछो परमपिता और प्रजापिता ब्रह्मा से आपका क्या सम्बन्ध है? यह प्रश्न सबसे अच्छा है। तो सर्वव्यापी का ज्ञान एकदम बाहर निकल जाए। मित्र सम्बन्धियों से दोस्ती कर उन्हें समझाओ। बहुत मीठा बनो। तुम्हारा काम है परिचय देना। भल दुश्मन हो परन्तु उनसे भी मित्रता रखनी है। बाप कहते हैं तुमने आसुरी मत पर चल मुझे गाली दी है। तुमने ईश्वर पर अपकार किया है फिर भी ईश्वर तुम पर कितना उपकार करते हैं। ईश्वर का अपकार होना भी ड्रामा में नूँध है, तब तो कहते हैं यदा यदाहि धर्मस्य… आया भी भारत में है। समझा भी रहे हैं बच्चों को। हर एक बात अच्छी रीति समझने की है। किसकी तकदीर में नहीं है फिर भी वही धन्धा करते हैं। यहाँ से बाहर गये तो यह बातें भी भूल जायेंगी। निंदा करते-करते तो यह हाल हो गया है। अब निंदा करना बन्द करो, सिर्फ पण्डित भी नहीं बनना है।

तुम पक्के राजयोगी हो। ऐसे-ऐसे समझाओ तो तीर भी लगे। खुद में खामी होगी तो दूसरे को बोल नहीं सकेंगे। पाप अन्दर खाता रहेगा। बाबा हर बात बहुत अच्छी रीति समझाते हैं। कल्प पहले भी ऐसे ही समझाया था, भूलो मत। सिमरण करते-करते अन्त मती सो गति हो जायेगी। सवेरे उठ बाप को याद करो जो अन्त में देह भी याद न पड़े। हम आत्मा हैं। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जो रत्न बाप के मुख से निकलते हैं वही अपने मुख से निकालने हैं। व्यर्थ बातें नहीं बोलनी हैं, न सुननी है। ज्ञान का ही शुर्मा पहनना है।

2) सभी से सच्ची मित्रता रखनी है। बहुत मीठे रूप में, हर्षितमुख हो बाप का परिचय देना है। अपकारी पर भी बाप समान उपकारी बनना है।

वरदान:-विश्व कल्याणकारी बन अशान्त आत्माओं को शान्ति का दान देने वाले मास्टर दाता भव 
दुनिया में हंगामा हो, झगड़े हो रहे हो, ऐसे अशान्ति के समय पर आप मास्टर शान्ति दाता बन औरों को भी शान्ति दो, घबराओ नहीं क्योंकि जानते हो जो हो रहा है वो भी अच्छा और जो होना है वह और अच्छा। विकारों के वशीभूत मनुष्य तो लड़ते ही रहेंगे। उनका काम ही यह है लेकिन आप विश्व कल्याणकारी आत्मायें सदा मास्टर दाता बन शान्ति का दान देते रहो। यही आपकी सेवा है।
स्लोगन:-अपनी सर्व प्राप्तियों को सामने रखो तो कमजोरियाँ सहज समाप्त हो जायेंगी।

 

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Daily Murli 23 May 2017 : Bk Dainik Gyan Murli (Hindi)

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23/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम बाप की श्रीमत पर चलो तो तुम्हें कोई भी दु:ख दे नहीं सकता, दु:ख तकलीफ देने वाला रावण है जो तुम्हारे राज्य में होता नहीं”
प्रश्नः-इस ज्ञान यज्ञ में तुम बच्चे कौन सी आहुति देते हो?
उत्तर:-इस ज्ञान यज्ञ में तुम कोई तिल जौं की आहुति नहीं देते, इसमें तुम्हें देह सहित जो कुछ भी है वह सब आहुति देनी है अर्थात् बुद्धि से सब भुला देना है। इस यज्ञ की सम्भाल पवित्र रहने वाले ब्राह्मण ही कर सकते हैं। जो पवित्र ब्राह्मण बनते वही फिर ब्राह्मण सो देवता बनते हैं।
गीत:-तुम्हें पाके हमने जहान…

 

ओम् शान्ति। बच्चे आये हैं बाप के पास। बच्चे जरूर आयेंगे ही तब, जब बाप को पहचान कर बाप कहेंगे। नहीं तो आ ही नहीं सकते। बच्चे जानते हैं हम जाते हैं निराकारी बेहद बाप के पास, उनका नाम शिवबाबा है। उनको अपना शरीर नहीं है, उनका कोई भी दुश्मन बन नहीं सकता। यहाँ दुश्मन बनते हैं तो राजाओं को मार डालते हैं। गांधी को मारा, क्योंकि उनका तो शरीर था। बाप को तो अपना शरीर है नहीं। मारने चाहेंगे वह भी उसको जिसमें प्रवेश करता हूँ। आत्मा को तो कोई मार काट नहीं सकते। तो जो मुझे यथार्थ रीति जानते हैं, उनको ही राज्य-भाग्य देता हूँ। उन्हों के राज्य-भाग्य को कोई जला नहीं सकता। न पानी डुबो सकता, किसी भी हालत में।

तुम बच्चे बाप से वर्सा लेने आये हो अविनाशी राजधानी का। जिसको कोई भी दु:ख अथवा तकलीफ दे न सके। वहाँ तकलीफ देने वाला कोई होता ही नहीं। तकलीफ देने वाला है रावण। रावण को 10 शीश भी दिखाते हैं। सिर्फ रावण दिखाते हैं, मदोदरी दिखाते नहीं। सिर्फ नाम रख दिया है कि रावण की स्त्री थी। तो यहाँ रावण राज्य में तुमको तकलीफ हो सकती है। वहाँ तो रावण होता नहीं। बाप तो है निराकार, उनको कोई मार काट नहीं सकता। तुमको भी ऐसा बनाते हैं जो तुमको शरीर होते भी कोई दु:ख न हो सके। तो ऐसे बाप की मत पर चलना पड़े। बाबा ही ज्ञान का सागर है, और कोई यह ज्ञान दे नहीं सकते। ब्रह्मा द्वारा सभी शास्त्रों का सार समझाते हैं। ब्रह्मा है शिवबाबा का बच्चा। ऐसे नहीं कि विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। अगर नाभी कहें तो शिवबाबा की नाभी-कमल से निकला। तुम भी शिव की नाभी से निकले हो। बाकी चित्र तो सब रांग हैं। एक ही बाबा राइटियस है। रावण अनराइटियस बना देते है। यह खेल है। इस खेल को तुम ही जानते हो। कब से रावणराज्य शुरू हुआ, कैसे मनुष्य गिरते-गिरते गिर ही गये, ऊपर कोई भी चढ़ न सके। बाप के पास जाने का जो रास्ता बताते वह और ही जंगल में डाल देते हैं क्योंकि रास्ता जानते ही नहीं हैं – बाबा के घर और स्वर्ग का। जो भी गुरू आदि हैं, सब हैं हठयोगी। घरबार छोड़ देते हैं। बाबा छुड़ाते नहीं हैं। कहते हैं पवित्र बनो। कुमार और कुमारी पवित्र हैं। द्रोपदी पुकारती है कि बाबा हमको बचाओ। हम पवित्र बनकर कृष्णपुरी में जाने चाहते हैं। कन्यायें भी पुकारती हैं, माँ बाप तंग करते हैं, मारते हैं कि शादी करनी ही होगी। पहले माँ बाप कन्या के पांव पड़ते हैं, क्योंकि खुद को पतित और कन्या को पावन समझते हैं। पुकारते भी हैं – हे पतित-पावन आओ। अब बाबा कहते हैं कुमारियां पतित न बनो। नहीं तो फिर पुकारना पड़ेगा। तुमको अपने को बचाना है। बाबा आया ही है पावन बनाने। कहते हैं स्वर्ग की बादशाही का वर्सा देने आया हूँ इसलिए पवित्र बनना पड़े। पतित बनेंगे तो पतित होकर मरेंगे। स्वर्ग के सुख देख नहीं सकेंगे। स्वर्ग में तो बहुत मौज है। हीरे जवाहरों के महल हैं। वही राधे कृष्ण फिर लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। तो लक्ष्मी-नारायण को भी इतना प्यार करना चाहिए। अच्छा कृष्ण को प्यार करते फिर राधे को क्यों गुम कर दिया है? कृष्ण जन्माष्टमी पर कृष्ण को झूला झुलाते हो। मातायें कृष्ण को बहुत प्यार करती हैं, राधे को नहीं। और फिर ब्रह्मा जो कृष्ण बनने वाला है उनकी इतनी पूजा नहीं है। जगत अम्बा की तो बहुत पूजा करते हैं, जो सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है। आदि देव ब्रह्मा का सिर्फ अजमेर में मन्दिर है। अब मम्मा है ज्ञान ज्ञानेश्वरी। तुम जानते हो वह ब्राह्मणी है, वह कोई स्वर्ग की आदि देवी नहीं है। न कोई 8 भुजायें हैं। मन्दिर में 8 भुजायें दिखाई हैं। बाप कहते हैं माया के राज्य में झूठ ही झूठ है। एक बाप ही सत्य है जो सच बताते हैं, मनुष्य से देवता बनाने के लिए। उस जिस्मानी ब्राह्मणों द्वारा तो तुम कथायें आदि सुनते-सुनते इस हालत में पहुंच गये हो। अब मौत सामने खड़ा है। बाबा कहते हैं जब झाड़ की जड़जड़ीभूत अवस्था होती है तब कलियुग के अन्त में कल्प के संगमयुग पर मैं आता हूँ। मैं युगे-युगे नहीं आता हूँ। मैं कच्छ मच्छ अवतार, वाराह अवतार नहीं लेता हूँ। मैं कण-कण में नहीं रहता हूँ। तुम आत्मायें भी कण-कण में नहीं जाती हो तो मैं कैसे जाऊंगा। मनुष्य के लिए कहते हैं, वह जानवर भी बनते हैं। वह तो अनेक योनियां हैं, गिनती कर ही नहीं सकते हैं। बाप कहते हैं राइट बात अब मैं तुमको समझाता हूँ। अब जज करो 84 लाख जन्म सत्य हैं या झूठ? इस झूठी दुनिया में सच कहाँ से आया? सच तो एक ही होता है। बाप ही आकर सत्य असत्य का निर्णय करते हैं। माया ने सबको असत्य बना दिया है। बाप आकर सबको सत्य बनाते हैं। अब जज करो – राइट कौन? तुम्हारे इतने गुरू गोसाई राइट या एक बाप राइट? एक राइटियस बाबा ही राइटियस दुनिया की स्थापना करते हैं। वहाँ बेकायदे कोई काम होता ही नहीं। वहाँ किसको विष नहीं मिलता।

तुम जानते हो हम भारतवासी बरोबर देवी-देवता थे। अब पतित बन गये हैं। पुकारते भी हैं हे पतित-पावन आओ। यथा राजा रानी तथा प्रजा सब पतित हैं तब तो लक्ष्मी-नारायण आदि को पूजते हैं ना। भारत में ही पवित्र राजायें थे, अब अपवित्र हैं। पवित्र को पूजते हैं। अब बाबा आकर तुमको महाराजा महारानी बनाते हैं। तो पुरूषार्थ करना चाहिए। बाकी 8 भुजा वाला तो कोई है नहीं। लक्ष्मी-नारायण को भी दो भुजायें हैं। चित्रों में फिर नारायण को सांवरा, लक्ष्मी को गोरा दिखाते हैं। अब एक पवित्र, एक अपवित्र कैसे हो सकता, तो चित्र झूठे हुए ना। अब बाप समझाते हैं राधे कृष्ण दोनों गोरे थे फिर काम चिता पर बैठ दोनों सांवरे हो गये। एक गोरा, एक सांवरा तो हो न सके। कृष्ण को श्याम सुन्दर कहते हैं। राधे को श्याम सुन्दर क्यों नहीं कहते हैं। यह फर्क क्यों रखा है। जोड़ा तो एक जैसा होना चाहिए। अभी तुम ज्ञान चिता पर बैठे हो, तुम फिर काम चिता पर क्यों बैठते हो! बच्चों को भी यह पुरुषार्थ कराना है। हम ज्ञान चिता पर बैठे हैं तुम फिर काम चिता पर बैठने की चेष्टा क्यों करते हो। अगर पुरुष ज्ञान उठाता, स्त्री नहीं उठाती तो भी झगड़ा पड़ जाता है। यज्ञ में विघ्न तो बहुत पड़ते हैं। यह ज्ञान कितना लम्बा चौड़ा है। जब से बाबा आया है तो रूद्र यज्ञ शुरू हुआ है। जब तक तुम ब्राह्मण न बनो तब तक देवता बन नहीं सकते। शूद्र पतित से पावन देवता बनने के लिए ब्राह्मण बनना पड़ेगा। ब्राह्मण ही यज्ञ की सम्भाल करते हैं, इसमें पवित्र बनना है। बाकी कोई तिल जौं आदि इकट्ठे करके नहीं रखने हैं, जैसे और लोग करते हैं। आफत के समय यज्ञ रचते हैं। समझते हैं भगवान ने भी ऐसा यज्ञ रचा था। बाप तो कहते हैं यह ज्ञान यज्ञ है जिसमें तुम आहुति डालते हो। देह सहित जो सब कुछ है, आहुति देनी है। पैसा आदि नहीं डालना है, इसमें सब कुछ स्वाहा करना है। इनके ऊपर एक कहानी है। दक्ष प्रजापिता ने यज्ञ रचा (कहानी) अब प्रजापिता तो एक है। प्रजापिता ब्रह्मा फिर दक्ष प्रजापिता कहाँ से आया? बाप प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा यज्ञ रचते हैं। तुम सब ब्राह्मण हो। तुमको मिलता है दादे का वर्सा। तुम कहते ही हो हम शिवबाबा के पास आये हैं थ्रू ब्रह्मा। यह शिवबाबा की पोस्ट ऑफिस है। चिट्ठी भी लिखो तो शिवबाबा थ्रू ब्रह्मा। बाबा का निवास इसमें है। यह सब ब्राह्मण पावन बनने के लिए ज्ञान योग सीख रहे हैं। तुम ऐसे नहीं कहेंगे हम पतित नहीं हैं। हम पतित हैं परन्तु पतित-पावन हमको पावन बना रहे हैं और कोई मनुष्य-मात्र पावन हैं नहीं तब तो गंगा स्नान करने जाते हैं। अभी तुम जानते हो कि एक सतगुरू बाबा ही हमें पावन बनाते हैं। उनकी श्रीमत है बच्चे तुम मुझ एक के साथ अपना बुद्धियोग जोड़ो। जज करो। चाहे उन गुरुओं के पास जाओ, चाहे मेरी मत पर चलो। तुम्हारा तो एक ही बाप टीचर सतगुरू है। बेहद का बाप सभी मनुष्य मात्र को कहते हैं आत्म-अभिमानी बनो। देवतायें आत्म-अभिमानी होते हैं। यहाँ तो यह ज्ञान किसी में है नहीं। सन्यासी तो कह देते हैं आत्मा सो परमात्मा। आत्मा ब्रह्म तत्व में लीन हो जाती है। ऐसी बातें सुनते-सुनते तुम कितने दु:खी पतित बन पड़े हो। भ्रष्टाचारी पतित उनको कहा जाता है जो विकार से पैदा होते हैं। वह रावण राज्य में भ्रष्टाचारी काम ही करते हैं। फिर गुल-गुल बनाने के लिए बाप को ही आना पड़ता है। भारत में ही आते हैं। बाप कहते हैं तुमको ज्ञान और योग सिखलाता हूँ। 5 हजार वर्ष पहले भी यह तुमको सिखलाकर स्वर्ग का मालिक बनाया था फिर से बनाता हूँ। कल्प-कल्प मैं आता ही रहता हूँ। इसकी न आदि है, न अन्त है। चक्र चलता ही रहता है। प्रलय की तो बात ही नहीं। तुम बच्चे इस समय इन अविनाशी ज्ञान रत्नों से झोली भरते हो। शिवबाबा को कहते हैं बम-बम महादेव। बम-बम अर्थात् शंखध्वनि कर हमारी झोली भर दो। नॉलेज बुद्धि में रहती है ना। आत्मा में ही संस्कार हैं। आत्मा ही पढ़कर इंजीनियर, बैरिस्टर आदि बनती है। अभी तुम आत्मायें क्या बनेंगी? कहते हो बाबा से वर्सा लेकर लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। आत्मा पुनर्जन्म तो जरूर लेती है। यह समझने की बातें हैं ना। कोई को सिर्फ यह दो अक्षर कान में डालो – तुम आत्मा हो, शिवबाबा को याद करो तो स्वर्ग की बादशाही मिलेगी। कितना सहज है। एक ही बाप सत्य बताते हैं, सबको सद्गति देते हैं। बाकी सब झूठ बताकर दुर्गति ही करेंगे। यह शास्त्र आदि भी सब बाद में बने हैं। भारत का शास्त्र एक ही गीता है। कहते हैं परम्परा से यह चले आये हैं। परन्तु कब से? समझते हैं सृष्टि को लाखों वर्ष हुए। अच्छा।

तुम बच्चे बाबा के लिए अंगूर ले आते हो। तुम ही लाते हो तुम ही खाते हो, मैं नहीं खाता हूँ। मैं तो अभोक्ता हूँ। सतयुग में भी तुम्हारे लिए महल बनाते हैं। यहाँ भी तुमको नये महल में रखता हूँ, हम तो पुराने में ही रहते हैं। यह वन्डरफुल बाबा है। यह बाप भी है तो मेहमान भी है। बाम्बे में जाये तो मेहमान कहेंगे ना। यूँ तो यह बहुत बड़ा सारी दुनिया का मेहमान है। इनको आने और जाने में देर नहीं लगती है। मेहमान भी वन्डरफुल है। दूरदेश के रहने वाले आये देश पराये। तो मेहमान हुआ ना। आते हैं तुमको गुल-गुल (फूल) बनाए वर्सा देने। कौड़ी से हीरे जैसा बनाने। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अविनाशी ज्ञान रत्नों की धारणा कर शंख-ध्वनि करनी है। सबको यह ज्ञान रत्न देने हैं।

2) सत्य और असत्य को समझकर सत्य मत पर चलना है। कोई भी बेकायदे कर्म नहीं करना है।

वरदान:-एक बाप की याद द्वारा एकरस स्थिति का अनुभव करने वाले सार स्वरूप भव
एकरस स्थिति में रहने की सहज विधि है एक की याद। एक बाबा दूसरा न कोई। जैसे बीज में सब कुछ समाया हुआ होता है। ऐसे बाप भी बीज है, जिसमें सर्व सम्बन्धों का, सर्व प्राप्तियों का सार समाया हुआ है। एक बाप को याद करना अर्थात् सार स्वरूप बनना। तो एक बाप, दूसरा न कोई – यह एक की याद एकरस स्थिति बनाती है। जो एक सुखदाता बाप की याद में रहते हैं उनके पास दु:ख की लहर कभी आ नहीं सकती। उन्हें स्वप्न भी सुख के, खुशी के, सेवा के और मिलन मनाने के आते हैं।
स्लोगन:-श्रेष्ठ आशाओं का दीपक जगाने वाले ही सच्चे कुल दीपक हैं।

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Daily Murli 21 May 2017 : Bk Dainik Gyan Murli (Hindi)

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21/05/17
मधुबन
“अव्यक्त-बापदाद”‘
ओम् शान्ति
01-04-82

भाग्य का आधार त्याग

आज भाग्य विधाता बापदादा अपने सर्व बच्चों के त्याग और भाग्य दोनों को देख रहे हैं। त्याग क्या किया है और भाग्य क्या पाया है – यह तो जानते ही हो कि एक गुणा त्याग उसके रिटर्न में पदमगुणा भाग्य मिलता है। त्याग की गुह्य परिभाषा जानते हुए भी जो बच्चे थोड़ा भी त्याग करते हैं तो भाग्य की लकीर स्पष्ट और बहुत बड़ी हो जाती है। त्याग की भी भिन्न-भिन्न स्टेज हैं। वैसे तो ब्रह्माकुमार वा ब्रह्माकुमारी बने तो यह भी त्याग का भाग्य ब्राह्मण जीवन मिली। इस हिसाब से जैसे ब्राह्मण सभी कहलाते हो वैसे त्याग करने वाली आत्मा भी सब हो गये। लेकिन त्याग में भी नम्बर हैं, इसलिए भाग्य पाने में भी नम्बर हैं। ब्राह्मकुमार वा ब्रह्माकुमारी तो सब कहलाते हो लेकिन ब्रह्माकुमार-कुमारियों में से ही कोई माला का नम्बरवन दाना बना, कोई लास्ट दाना बना लेकिन हैं दोनों ही ब्रह्माकुमार-कुमारी। शूद्र जीवन सबने त्याग की फिर भी नम्बरवन और लास्ट का अन्तर क्यों? चाहे प्रवृत्ति में रह ट्रस्टी बन चल रहे हो, चाहे प्रवृत्ति से निवृत्त हो सेवाधारी बन सदा सेवाकेन्द्र पर रहे हुए हो लेकिन दोनों ही प्रकार की ब्राह्मण आत्मायें चाहे ट्रस्टी, चाहे सेवाधारी, दोनों ही ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलाते हो। सरनेम दोनों का एक ही है लेकिन दोनों का त्याग के आधार पर भाग्य बना हुआ है। ऐसे नहीं कह सकते कि सेवाधारी बन सेवाकेन्द्र पर रहना – यही श्रेष्ठ त्याग वा भाग्य है। ट्रस्टी आत्मायें भी त्याग वृत्ति द्वारा माला में अच्छा नम्बर ले सकती हैं। लेकिन सच्चे और साफ दिल वाला ट्रस्टी हो। भाग्य प्राप्त करने का अधिकार दोनों को है। लेकिन श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींचने का आधार है “श्रेष्ठ संकल्प और श्रेष्ठ कर्म।” चाहे ट्रस्टी आत्मा हो, चाहे सेवाधारी आत्मा हो दोनों इसी आधार द्वारा नम्बर ले सकते हैं। दोनों को फुल अथॉरिटी है भाग्य बनाने की। जो बनाने चाहें, जितना बनाना चाहें बना सकते हैं। संगमयुग पर वरदाता द्वारा ड्रामा अनुसार समय को वरदान मिला हुआ है। जो चाहे वह श्रेष्ठ भाग्यवान बन सकता है। ब्रह्माकुमार-कुमारी बनना अर्थात् जन्म से भाग्य ले ही आते हो। जन्मते ही भाग्य का सितारा सर्व के मस्तक पर चमकता हुआ है। यह तो जन्म-सिद्ध अधिकार हो गया। ब्राह्मण माना ही भाग्यवान। लेकिन प्राप्त हुए जन्म सिद्ध अधिकार को वा चमकते हुए भाग्य के सितारे को कहाँ तक आगे बढ़ाते, कितना श्रेष्ठ बनाते जाते हैं वह हरेक के पुरूषार्थ पर है। मिले हुए भाग्य के अधिकार को जीवन में धारण कर कर्म में लाना अर्थात् मिली हुई बाप की प्रॉपर्टी को कमाई द्वारा बढ़ाते रहना वा खा के खत्म कर देना, वह हरेक के ऊपर है। जन्मते ही बापदादा सबको एक जैसा श्रेष्ठ ‘भाग्यवान भव का’ वरदान कहो वा भाग्य की प्रापर्टी कहो, एक जैसी ही देते हैं। सब बच्चों को एक जैसा ही टाइटल देते हैं – सिकीलधे बच्चे, लाडले बच्चे, कोई को सिकीलधे, कोई को न सिकीलधे नहीं कहते हैं। लेकिन प्रापर्टी को सम्भालना और बढ़ाना इसमें नम्बर बन जाते हैं। ऐसे नहीं कि सेवाधारियों को 10 पदम देते और ट्रस्टियों को 2 पदम देते हैं। सबको पदमापदमपति कहते हैं। लेकिन भाग्य रूपी खज़ाने को सम्भालना अर्थात् स्व में धारण करना और भाग्य के खजाने को बढ़ाना अर्थात् मन-वाणी-कर्म द्वारा सेवा में लगाना। इसमें नम्बर बन जाते हैं। सेवाधारी भी सब हो, धारणा मूर्त भी सब हो, परन्तु धारणा स्वरूप में नम्बरवार हो। कोई सर्वगुण सम्पन्न बने हैं, कोई गुण सम्पन्न बने हैं। कोई सदा धारणा स्वरूप हैं, कोई कभी धारणा स्वरूप, कभी डगमग स्वरूप। एक गुण को धारण करेंगे तो दूसरा समय पर कर्तव्य में ले नहीं सकेंगे। जैसे एक ही समय पर सहनशक्ति भी चाहिए और साथ-साथ समाने की शक्ति भी चाहिए। अगर एक शक्ति वा एक सहनशीलता के गुण को धारण कर लेंगे और समाने की शक्ति वा गुण को साथ-साथ यूज़ नहीं कर सकेंगे और कहेंगे कि इतना सहन तो किया ना। यह कोई कम किया क्या! यह भी मुझे मालूम है मैंने कितना सहन किया, लेकिन सहन करने के बाद अगर समाया नहीं, समाने की शक्ति को यूज़ नहीं किया तो क्या होगा? यहाँ-वहाँ वर्णन होगा इसने यह किया, मैंने यह किया, तो सहन किया, यह कमाल जरूर की लेकिन कमाल का वर्णन कर कमाल को धमाल में चेन्ज कर लिया क्योंकि वर्णन करने से एक तो देह-अभिमान और दूसरा परचिन्तन दोनों ही स्वरूप कर्म में आ जाते हैं। इसी प्रकार से एक गुण को धारण किया दूसरे को नहीं किया तो जो धारणा स्वरूप होना चाहिए वह नहीं बन पाते। इस कारण मिले हुए खजाने को सदा धारण नहीं कर सकते अर्थात् सम्भाल नहीं सकते। सम्भाला नहीं अर्थात् गंवा दिया ना! कोई सम्भालता है कोई गंवा देता है। नम्बर तो होंगे ही ना! ऐसे सेवा में लगाना अर्थात् भाग्य की प्रापर्टी को बढ़ाना। इसमें भी सेवा तो सभी करते ही हो लेकिन सच्चे दिल से, लगन से सेवा करना, सेवाधारी बन करके सेवा करना इसमें भी अन्तर हो जाता है। कोई सच्चे दिल से सेवा करते हैं और कोई दिमाग के आधार पर सेवा करते हैं। अन्तर तो होगा ना।

दिमाग तेज है, प्वांइन्ट्स बहुत हैं, उसके आधार पर सेवा करना और सच्चे दिल से सेवा करना इसमें रात दिन का अन्तर है। दिल से सेवा करने वाला दिलाराम का बनायेगा। और दिमाग द्वारा सेवा करने वाला सिर्फ बोलना और बुलवाना सिखायेगा। वह मनन करता, वह वर्णन करता। एक हैं सेवाधारी बन सेवा करने वाले और दूसरे हैं नामधारी बनने के लिए सेवा करने वाले। फ़र्क हो गया ना। सच्चे सेवाधारी जिन आत्माओं की सेवा करेंगे उन्हों को प्राप्ति के प्रत्यक्षफल का अनुभव करायेंगे। नामधारी बनने वाले सेवाधारी उसी समय नामाचार को पायेंगे – बहुत अच्छा सुनाया, बहुत अच्छा बोला, लेकिन प्राप्ति के फल की अनुभूति नहीं करा सकेंगे। तो अन्तर हो गया ना! ऐसे एक है लगन से सेवा करना, एक है डियुटी के प्रमाण सेवा करना। लगन वाले हर आत्मा की लगन लगाने के बिना रह नहीं सकेंगे। डियुटी वाला अपना काम पूरा कर लेगा, सप्ताह कोर्स करा लेगा, योगशिविर भी करा लेगा, धारणा शिविर भी करा लेगा, मुरली सुनाने तक भी पहुंचा लेगा, लेकिन आत्मा की लगन लग जाए इसकी जिम्मेवारी अपनी नहीं समझेंगे। कोर्स के ऊपर कोर्स करा लेंगे लेकिन आत्मा में फोर्स नहीं भर सकेंगे। और सोचेंगे मैंने बहुत मेहनत कर ली। लेकिन यह नियम है कि सेवा की लगन वाला ही लगन लगा सकता है। तो अन्तर समझा? यह है मिली हुई प्रापर्टी को बढ़ाना। इस कारण जितना सम्भालते हैं, जितना बढ़ाते हैं उतना नम्बर आगे ले लेते हैं। भाग्यविधाता ने भाग्य सबको एक जैसा बांटा लेकिन कोई कमाने वाले कोई गंवाने वाले बन जाते। कोई खाके खत्म करने वाले बन जाते इसलिए दो प्रकार की माला बन गई है और माला में भी नम्बर बन गये हैं। समझा नम्बर क्यों बने? तो बापदादा त्याग के भाग्य को देख रहे थे। त्याग की भी लीला अपरमअपार है। वह फिर सुनायेंगे। अच्छा।

ऐसे श्रेष्ठ तकदीरवान, सदा श्रेष्ठ संकल्प और श्रेष्ठ कर्म द्वारा भाग्य की लकीर बढ़ाते रहने वाले सदा सच्चे सेवाधारी, सदा सर्व गुणों, सर्व शक्तियों को जीवन में लाने वाले, हर आत्मा को प्रत्यक्षफल अर्थात् प्राप्ति स्वरूप बनाने वाले, ऐसे श्रेष्ठ त्यागी और श्रेष्ठ भागी सदा बाप द्वारा मिले हुए अधिकार को, खजाने को सम्भालने और बढ़ाने वाले, ऐसे धारणा स्वरूप सदा सेवाधारी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ

1- ब्राह्मण सो फरिश्ता और फरिश्ता सो देवता – यह लक्ष्य सदा स्मृति में रखो:-

सभी अपने को ब्राह्मण सो फरिश्ता समझते हो? अभी ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण से फरिश्ता बनने वाले हैं फिर फरिश्ता सो देवता बनेंगे – वह याद रहता है? फरिश्ता बनना अर्थात् साकार शरीरधारी होते हुए लाइट रूप में रहना अर्थात् सदा बुद्धि द्वारा ऊपर की स्टेज पर रहना। फरिश्ते के पांव धरनी पर नहीं रहते। ऊपर कैसे रहेंगे? बुद्धि द्वारा। बुद्धि रूपी पांव सदा ऊंची स्टेज पर। ऐसे फरिश्ते बन रहे हो या बन गये हो? ब्राह्मण तो हो ही – अगर ब्राह्मण न होते तो यहाँ आने की छुट्टी भी नहीं मिलती। लेकिन ब्राह्मणों ने फरिश्तेपन की स्टेज कहाँ तक अपनाई है? फरिश्तों को ज्योति की काया दिखाते हैं। तो जितना अपने को प्रकाश स्वरूप आत्मा समझेंगे, प्रकाशमय तो चलते फिरते अनुभव करेंगे जैसे प्रकाश की काया वाले फरिश्ते बनकर चल रहे हैं। फरिश्ता अर्थात् अपनी देह के भान का भी रिश्ता नहीं, देहभान से रिश्ता टूटना अर्थात् फरिश्ता। देह से नहीं, देह के भान से। देह से रिश्ता खत्म होगा तब तो चले जायेंगे लेकिन देहभान का रिश्ता खत्म हो। तो यह जीवन बहुत प्यारी लगेगी। फिर कोई माया भी आकर्षण नहीं करेगी। अच्छा।

2- हम अल्लाह के बगीचे के पुष्प हैं – इस स्वमान में रहो – सदा अपने को बापदादा के अर्थात् अल्लाह के बगीचे के फूल समझकर चलते हो? सदा अपने आप से पूछो कि मैं रूहानी गुलाब बन सदा रूहानी खुशबू फैलाता हूँ? जैसे गुलाब की खुशबू सबको मीठी लगती है, चारों ओर फैल जाती है, तो वह है स्थूल, विनाशी चीज़ और आप सब अविनाशी सच्चे गुलाब हो। तो सदा अविनाशी रूहानियत की खुशबू फैलाते रहते हो? सदा इसी स्वमान में रहो कि हम अल्लाह के बगीचे के पुष्प बन गये – इससे बड़ा स्वमान और कोई हो नहीं सकता। ‘वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य’ – यही गीत गाते रहो। भोलानाथ से सौदा कर लिया तो चतुर हो गये ना! किसको अपना बनाया है? किससे सौदा किया है? कितना बड़ा सौदा किया है? तीनों लोक ही सौदे में ले लिए। आज की दुनिया में सबसे बड़े ते बड़ा कोई भी धनवान हो लेकिन इतना बड़ा सौदा कोई नहीं कर सकता, इतनी महान आत्मायें हो – इस महानता को स्मृति में रखकर चलते चलो।

3- ब्राह्मणों का कर्तव्य है – खुशी का दान कर महादानी बनना – सबसे बड़े से बड़ा खज़ाना, खुशी का खज़ाना है, जो खज़ाना अपने पास होता है उसे दान किया जाता है। आप खुशी के खज़ाने का दान करते रहो। जिसको खुशी देंगे वह बार-बार आपको धन्यवाद देगा। दु:खी आत्माओं को खुशी का दान दे दिया तो आपके गुण गायेंगे। महादानी बनो, खुशी के खज़ाने बांटो। अपने हमजिन्स को जगाओ। रास्ता दिखाओ। सेवा के बिना ब्राह्मण जीवन नहीं। सेवा नहीं तो खुशी नहीं इसलिए सेवा में तत्पर रहो। रोज़ किसी न किसी को दान ज़रूर करो। दान करने के बिना नींद ही नहीं आनी चाहिए।

प्रश्न:- बापदादा के गले में कौन से बच्चे माला के रूप में पिरोये रहते हैं?

उत्तर:- जिनके गले अर्थात् मुख द्वारा बाप के गुण, बाप का दिया हुआ ज्ञान वा बाप की महिमा निकलती रहती, जो बाप ने सुनाया वही मुख से आवाज़ निकलता, ऐसे बच्चे बापदादा के गले का हार बन गले में पिरोये रहते हैं। अच्छा – ओम् शान्ति।

वरदान:-शान्ति की शक्ति से, संस्कार मिलन द्वारा सर्व कार्य सफल करने वाले सदा निर्विघ्न भव
सदा निर्विघ्न वही रह सकता है जो सी फादर, फालो फादर करता है। सी सिस्टर, सी ब्रदर करने से ही हलचल होती है इसलिए अब बाप को फालो करते हुए बाप समान संस्कार बनाओ तो संस्कार मिलन की रास करते हुए सदा निर्विघ्न रहेंगे। शान्ति की शक्ति से अथवा शान्त रहने से कितना भी बड़ा विघ्न सहज समाप्त हो जाता है और सर्व कार्य स्वत: सम्पन्न हो जाते हैं।
स्लोगन:-त्रिकालदर्शी वह है जो किसी भी बात को एक काल की दृष्टि से नहीं देखते, हर बात में कल्याण समझते हैं।

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TODAY MURLI 21 May 2017 DAILY MURLI (English)

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21/05/17
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
01/04/82

The basis of fortune is renunciation.

Today, BapDada, the Bestower of Fortune, was seeing both the fortune and the renunciation of all His children. What have you renounced and what fortune have you attained? You know that in return for one-fold renunciation, you receive a return of multimillion-fold fortune. When children who know the deep meaning of renunciation, renounce even a little, a very clear and long line of fortune is drawn. There are different stages of renunciation. In fact, your becoming Brahma Kumars and Kumaris is also a renunciation and, in return for this, you have received the fortune of a Brahmin life. In this respect, just as all of you are called Brahmins, so too, all of you have become souls who have practiced renunciation. However, there is a number in renunciation and there is therefore also a number in attaining your fortune. All of you are called Brahma Kumars and Kumaris, but someone becomes the number one bead of the rosary and someone else becomes the last number bead, even though all are Brahma Kumars and Kumaris. All of you have renounced your shudra life, so why is there a difference between the first number and the last number? Whether someone is moving along whilst living at home as a trustee, or whether someone has become free from the household and, and is living as a server at a centre, whether someone is a trustee or a server, both types of Brahmin souls are called Brahma Kumars and Kumaris. The surname of both is the same, but the basis of the fortune of both is their renunciation. It cannot be said that to become a server and live at a centre is the most elevated renunciation or fortune. Even trustee souls can claim very good number s in the rosary through their attitude of renunciation. But a trustee has to be one who is truthful and has a clean and honest heart. Both have a right to attain their fortune, but the basis of drawing a line of elevated fortune is to have elevated thoughts and to perform elevated actions. Whether you are a trustee soul or a server soul, both of you can claim a number on this basis. Both of you have full authority to create your fortune. You can create whatever fortune you want to whatever extent you want. At the confluence age, according to the drama, time has received a blessing from the Bestower of Blessings. Anyone who has the desire can become one with an elevated fortune. To become a Brahma Kumar or Kumari means that you bring your fortune with you from birth. The moment you take birth, your star of fortune is sparkling on the forehead of each one of you. This has become your birthright: to be a Brahmin means to be fortunate. However, the extent to which you increase the birthright that you have attained, or make the star of your fortune sparkle even more or make it elevated, depends on your own efforts. To imbibe and use in your practical life the rights of fortune you have received in your practical life means to increase the property you have received from the Father; earning it or using it up depends on each one. As soon as you take birth, BapDada gives all of you the same property of fortune and the same elevated blessing: “May you be fortunate”. All of you children are given the same title: Long-lost and now-found, beloved, lovely child. He hasn’t said to some: “You are a long-lost and now-found child” and to others “You are not a long-lost and now-found child!” However, your number is created by looking after the property and increasing it. It isn’t that Baba gives ten times multi-millionfold to the servers and only two times multi-millionfold to the trustees. He says: All of you are multi-million times fortunate. However, to look after the treasure of fortune means that you imbibe it whereas to increase the treasure of fortune means to use it for service through your thoughts, words and actions. It is in this way that a number is created. All of you are servers. All of you are embodiments of dharna – but you are numberwise in becoming that. Some have become full of all virtues and some have become full of some virtues. Some are constant embodiments of dharna and some are sometimes embodiments of dharna and at other times embodiments of fluctuation. When they adopt one virtue, they are not then able to use another virtue at the same time. For instance, you may need the power to tolerate and the power to accommodate at the same time. If you simply imbibe the power or virtue of tolerance but are not able to use the power to accommodate at the same time, and then say, “Well, I have tolerated that for so long; is this a small thing? Only I know how much I have tolerated”. So, if after tolerating it, you were unable to accommodate it, and you didn’t use the power to accommodate, what would happen? You would speak about it here and there that that one did this and that you did that. So, you definitely performed a wonder (kamaal) in tolerating it, but you spoke of the wonder you performed and turned it into chaotic confusion (dhamaal). This is because, by speaking about it, you first become body conscious, and secondly you think about others. You do both of these things. In this way, if you imbibe one virtue and not the other, you are then unable to become the an embodiment of dharna that you want to become. Because of this you are not always able to imbibe the treasures you have received, that is, you are unable to look after them. Not looking after them means you have wasted them. Some look after them and others lose them. There would be a number then, would there not? To use something for service in this way means to increase the property of fortune. In this too, all of you do service, but there is a difference between serving with a true heart and with true love and serving as a server. Some serve with a true heart, whereas others serve from their head. So, there would be a difference, would there not?

There is the difference of day and night between doing service on the basis of having a powerful brain with many points and serving with an honest heart. Those who serve with their hearts will make others belong to Dilaram, the Comforter of Hearts. Those who serve with their heads will only teach others how to speak and make others speak. One churns and the other one simply speaks. One is a server who truly serves as a server and the other is one who serves just to earn a name for themselves. So, there is a difference, is there not? Whoever true servers serve will be given the experience of the instant fruit of attainment. Those who serve simply to earn a name will at that time attain a good name for themselves in the form of praise: “You explained that very well, you spoke very well”. However, they wouldn’t be able to give the experience of the fruit of attainment. So, there is a difference, is there not? In this way, one serves with true love and the other serves as a duty. Those who serve with true love won’t be able to stay without enabling others to forget a connection of love. Those who serve just as a duty will finish their work and complete the week’s course and give them the yoga course, the dharna course and even bring them to the point of listening to the murli, but they will not consider it to be their responsibility to enable the love of that soul to become connected to the Father. He would give course after course, but would not fill souls with any force but would think that he has made a lot of effort. However, it is a law that only those who have deep love for service are able to connect the love of others. So, do you understand the difference? This is to increase the property that you have received. Due to this, to the extent that you look after it and to the extent that you increase it, you accordingly claim a number ahead. The Bestower of Fortune distributed the same fortune to everyone, but some become those who earn and some become those who waste. Some become those who use everything up and finish it. This is why there are two types of rosary and why it is numberwise in each rosary. Do you understand how the numbers are created? So BapDada was seeing the fortune of renunciation. The wonderful game of renunciation is also unending. Baba will tell you about that at some other time. Achcha.

To those who have an elevated fortune, to the true servers who constantly increase their line of fortune though elevated thoughts and elevated actions, to those who constantly bring all the virtues and all the powers into their lives, to those who give every soul instant fruit, that is, to those who make every soul an embodiment of attainment, to the elevated renunciates and those with an elevated fortune who constantly look after and increase the rights and treasures they have received from the Father, to the constant servers who are embodiments of dharna, BapDada’s love, remembrance and namaste.

BapDada meeting groups: Constantly keep this aim in your awareness: A Brahmin becomes an angel and an angel becomes a deity.

Do all of you consider yourselves to be Brahmins and therefore angels? Do you remember that you are now Brahmins and that you will become angels from Brahmins and that those angels will then become deities? To become an angel means that whilst in a corporeal body you stay in the form of light, that is, with your intellect you remain constantly in the stage up above. Angels don’t set foot on the ground. How will you stay up above? With the intellect. Let the foot of the intellect always be in an elevated stage. Are you becoming such angels, or have you already become those? You are Brahmins anyway. If you weren’t Brahmins, you wouldn’t have got permission to come here. However, to what extent have you Brahmins adopted the angelic stage? Angels are shown with bodies of light. The more you consider yourself to be a soul, an embodiment of light, the more you consider yourself to be as light as you walk and move around, the more you will feel as though you are an angel walking in a body of light. An angel means to be one who has no connection with the awareness of his own body. To break your connection with body consciousness – not from the body, but from the consciousness of the body – means to be an angel. When your connection with the body is broken, you will then leave here. However, at the moment, your connection with the consciousness of the body has to be broken. You will then love this life a great deal and Maya will not attract you in any way. Achcha.

2. Maintain th is self-respect: We are the flowers of Allah’s (God’s) garden.

Do you constantly move along while considering yourself to be a flower of BapDada’s, that is, of Allah’s garden? Ask yourself: Am I constantly a spiritual rose who is constantly spreading spiritual fragrance? Everyone finds rose fragrance very sweet and it spreads everywhere. That is something physical and perishable whereas you are true imperishable roses. So, do you constantly keep spreading the imperishable fragrance of spirituality? Constantly maintain this self-respect: We have become the flowers of Allah’s garden. No other self-respect is greater than this. “Wah my elevated fortune!” Continue to sing this song. You have made a deal with the Innocent Lord and so you have become clever, have you not? Who did you make yours? Who did you make a deal with? How big a deal did you make? You claimed all three worlds in your deal. In today’s world, even the wealthiest of all cannot make such a big deal. You are such elevated souls. Continue to move along while keeping this greatness in your awareness.

3. The duty of Brahmins is to donate happiness and to become great donors.

The greatest treasure of all is the treasure of happiness. You generally donate the treasure you have. You simply have to continue to donate the treasure of happiness and those you give happiness to will repeatedly thank you. When you donate happiness to unhappy souls, they will sing your praise. Be a great donor and share the treasure of happiness. Awaken those who are like you and show them the path. There is no Brahmin life without service. If there is no service, there is no happiness therefore remain busy in service. Definitely donate to someone or other. Let it be that you cannot even sleep without having donated something.

Question: Which children can be threaded around BapDada’s neck in the form of a garland?

Answer: Those who have around their necks, that is, those from those whose mouths the Father’s virtues, the knowledge that the Father has given and the Father’s praise constantly emerge, and who only relate what the Father has spoken. Only such children become a garland around BapDada’s neck and remain garlanded around His neck.

Blessing:May you be constantly free from obstacles and have success in all tasks with the power of silence and by harmonise your sanskars.
Only those who see the Father and follow the Father can be constantly free from obstacles. Fluctuation only comes when you see a sister or brother. So, now follow the Father, make your sanskars exactly like those of the Father and perform the dance of harmonising your sanskars and you will remain constantly free from obstacles. No matter how big an obstacle may be, with the power of silence and by your remaining quiet, it can easily be removed and all tasks will automatically be accomplished.
Slogan:One who doesn’t see a situation in terms of one aspect and who considers there to be benefit in every situation is called trikaldarshi.

 

*** Om Shanti ***
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