daily murli

BRAHMA KUMARIS MURLI 12 JANUARY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 12 January 2017

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12/01/18
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – बाप की दुआयें लेनी हैं तो हर कदम श्रीमत पर चलो, चाल-चलन अच्छी रखो”
प्रश्नः-शिवबाबा की दिल पर कौन चढ़ सकता है?
उत्तर:-जिनकी गैरन्टी ब्रह्मा बाबा लेता कि यह बच्चा सर्विसएबुल है, यह सबको सुख देता है। मन्सा, वाचा, कर्मणा किसी को दु:ख नहीं देता। ऐसे जब यह (ब्रह्मा बाबा) बोले, तब शिवबाबा की दिल पर चढ़ सकते हैं।
प्रश्नः-इस समय तुम रूहानी सर्वेन्ट बाबा के साथ कौन सी सेवा करते हो?
उत्तर:-सारे विश्व की तो क्या लेकिन 5 तत्वों को भी पावन बनाने की सेवा तुम रूहानी सर्वेन्ट करते हो इसलिए तुम हो सच्चे-सच्चे सोशल वर्कर।
गीत:-ले लो दुआयें माँ बाप की…

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। ऐसे तो लौकिक माँ-बाप की दुआयें अनेक लेते हैं। बच्चे पांव पड़ते हैं माँ-बाप आशीर्वाद करते हैं। यह ढिंढोरा लौकिक माँ-बाप के लिए नहीं पिटाया जाता है। ढिंढोरा अर्थात् जिसको बहुत सुनें। यह तो बेहद बाप के लिए ही गाया जाता है तुम मात-पिता हम बालक तेरे… तुम्हारी कृपा वा दुआ से सुख घनेरे। भारत में ही यह महिमा गाई जाती है। जरूर भारत में ही यह हुआ है तब तो गाया जाता है। एकदम बेहद में चला जाना चाहिए। बुद्धि कहती है स्वर्ग का रचयिता बाप एक ही है। स्वर्ग में तो सभी सुख हैं। वहाँ दु:ख का नाम-निशान हो नहीं सकता इसलिए ही गाते हैं कि दु:ख में सिमरण सब करें सुख में करे न कोई। आधाकल्प दु:ख है तो सभी सिमरण करते हैं। सतयुग में अथाह सुख हैं, तो वहाँ सिमरण नहीं करते हैं। मनुष्य पत्थरबुद्धि होने कारण कुछ भी समझते नहीं हैं। कलियुग में तो अथाह दु:ख हैं। कितनी मारामारी है। कितने भी पढ़े लिखे विद्धान हैं, परन्तु इन गीतों का अर्थ बिल्कुल नहीं जानते हैं। गाते हैं तुम मात पिता… परन्तु समझते नहीं हैं कि कौन से माता पिता की महिमा है। यह तो बहुतों की बात है ना। ईश्वर की सन्तान तो सभी हैं, परन्तु इस समय तो सभी दु:खी हैं। सुख घनेरे तो किसको नहीं हैं। कृपा से तो सुख मिलना चाहिए। अकृपा से दु:ख होता है। बाप तो कृपालु गाया हुआ है। साधू सन्तों को भी कृपालु कहते हैं।

अब तुम बच्चे जानते हो भक्ति मार्ग में गाते हैं तुम मात पिता… यह बिल्कुल यथार्थ है, परन्तु कोई बुद्धिवान होगा तो पूछेगा कि परमात्मा को तो गॉड फादर कहा जाता है, उनको फिर मदर कैसे कहते हैं? तो उनकी बुद्धि जगत अम्बा के तरफ जायेगी। जब जगत अम्बा की तरफ बुद्धि जाती है तो फिर जगत पिता के तरफ भी बुद्धि जानी चाहिए। अब ब्रह्मा सरस्वती यह कोई भगवान तो नहीं हैं। यह महिमा उनकी हो नहीं सकती। उनके आगे भी माता-पिता कहना राँग है। मनुष्य गाते तो परमपिता परमात्मा के लिए हैं, परन्तु जानते नहीं हैं कि वह मात-पिता कैसे बनते हैं। अब तुम बच्चों को कहा जाता है ले लो, ले लो दुआयें माँ बाप की… अर्थात् श्रीमत पर चलो। अपनी चाल-चलन अच्छी हो तो अपने पर आपेही दुआयें हो जायेंगी। अगर चलन अच्छी नहीं होगी, किसको दु:ख देते रहेंगे, मात-पिता को याद नहीं करेंगे अथवा दूसरों को याद नहीं करायेंगे तो दुआयें मिल नहीं सकती। फिर इतना सुख भी नहीं पा सकेंगे। बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकेंगे। इस बाप की (ब्रह्मा की) दिल पर चढ़े तो गोया शिवबाबा की दिल पर चढ़े। यह गायन है ही उस मात-पिता का। बुद्धि उस बेहद के मात-पिता के तरफ चली जानी चाहिए। ब्रह्मा की तरफ भी कोई की बुद्धि नहीं जाती है। भल जगत अम्बा की तरफ कोई की जाती है। उनका भी मेला लगता है, परन्तु आक्यूपेशन को कोई जानते ही नहीं। तुम जानते हो हमारी सच्ची-सच्ची माता कायदे अनुसार यह ब्रह्मा है। यह भी समझना है। याद भी ऐसे करेंगे। यह माता भी है तो ब्रह्मा बाबा भी है। लिखते हैं शिवबाबा केयरआफ ब्रह्मा। तो माता भी हो जाती है तो पिता भी हो जाता। अब बच्चों को इस पिता की दिल पर चढ़ना है क्योंकि इनमें ही शिवबाबा प्रवेश होते हैं। यह जब गैरन्टी देते हैं कि हाँ बाबा यह बच्चा बहुत अच्छा सर्विसएबुल है, सभी को सुख देने वाला है। मन्सा-वाचा-कर्मणा किसको दु:ख नहीं देता है तब ही शिवबाबा की दिल पर चढ़ सकता है। मन्सा-वाचा-कर्मणा से जो करो, जो बोलो उससे सबको सुख मिले। दु:ख किसको नहीं देना है। दु:ख देने का विचार पहले मन्सा में आता है फिर कर्मणा में आने से पाप बनता है। मन्सा तूफान तो जरूर आयेंगे परन्तु कर्मणा में कभी नहीं आओ। अगर कोई रन्ज (नाराज) होता है तो बाप से आकर पूछो – बाबा इस बात से हमारे से यह नाराज रहते हैं, तो बाबा समझायेंगे। कोई भी बात पहले मन्सा में आती है। वाचा भी कर्मणा ही हो गया। अगर बच्चों को माँ-बाप की आशीर्वाद लेनी है तो श्रीमत पर चलना है। यह बड़ी गुह्य बात है जो एक को ही माता पिता कहते हैं। यह ब्रह्मा बाप भी है तो बड़ी माँ भी है। अब यह बाबा किसको माँ कहे? यह माता (ब्रह्मा) अब किसको माँ कहे? इस माँ की तो माँ कोई हो नहीं सकती। जैसे शिवबाबा का कोई बाप नहीं, ऐसे इन्हें अपनी कोई माँ नहीं।

मुख्य बात बच्चों को यह समझाते हैं कि अगर मन्सा, वाचा, कर्मणा किसको दु:ख देंगे तो दु:ख पायेंगे और पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। सच्चे साहेब के आगे सच्चा रहना है, इनसे भी सच्चा रहना है। यह दादा ही सर्टीफिकेट देंगे कि बाबा यह बच्चा बड़ा सपूत है। बाबा महिमा तो करते हैं। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं तन-मन-धन से सर्विस करते हैं, कभी भी किसको दु:ख नहीं देते हैं, वही बापदादा और माँ की दिल पर चढ़ते हैं। इनकी दिल पर चढ़े माना उनके तख्त पर चढ़े। हमेशा सपूत बच्चों को यह विचार रहता है कि हम गद्दी नशीन कैसे बनें। यही तात लगी रहती है। गद्दी तो नम्बरवार 8 हैं। फिर 108 फिर 16108 भी हैं, परन्तु अभी हम ऊंच पद पायें। ऐसे तो शोभता नहीं जो दो कला कम हों तब गद्दी पर बैठें। सपूत बच्चे बहुत पुरुषार्थ करेंगे कि हमने अगर अभी लाडले बाबा से सूर्यवंशी का पूरा-पूरा वर्सा नहीं लिया तो कल्प-कल्प नहीं लेंगे। अभी अगर विजय माला में नहीं पिरोये तो कल्प-कल्प नहीं पिरोयेंगे। यह कल्प-कल्प की रेस है। अभी अगर घाटा पड़ा तो कल्प-कल्प पड़ता ही रहेगा। पक्का व्यापारी वह जो श्रीमत पर माँ बाप को पूरा फालो करे, कभी किसको दु:ख न दे। उसमें भी नम्बरवन दु:ख है काम कटारी चलाना।

बाप कहते हैं अच्छा कृष्ण भगवानुवाच समझो, तो वह भी नम्बरवन है। उनकी बात भी माननी चाहिए तब तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे। समझते हैं कृष्ण भगवान ने श्रीमत से शिक्षा दी है। अच्छा उनकी मत पर चलो। उसने भी कहा है कि काम महाशत्रु है, भला उनको जीतो। इन विकारों को जीतेंगे तब ही कृष्णपुरी में आ सकेंगे। अब कृष्ण की तो बात नहीं। कृष्ण तो बच्चा था। वह कैसे मत देंगे। जब बड़ा होकर गद्दी पर बैठेगा तब वह मत देगा। मत देने के लायक बनेंगे तब तो राज्य चलायेंगे ना। अब शिवबाबा तो कहते हैं मुझे निराकारी दुनिया में याद करो। कृष्ण फिर कहेगा कि मुझे स्वर्ग में याद करो। वह भी कहते हैं काम महाशत्रु है, इन पर जीत पहनो। वहाँ विष नहीं मिलेगा, तो विष को छोड़ पवित्र बनो। यह तो कृष्ण का बाप बैठ समझाते हैं। अच्छा समझो मनुष्यों ने मेरा नाम निकाल बच्चे का नाम डाल दिया है, वह भी तो सर्वगुण सम्पन्न है। वह भी कहते हैं, गीता में लिखा हुआ है कि काम महाशत्रु है। उनको भी मानते थोड़ेही हैं। उन पर भी चलते थोड़ेही हैं। समझते हैं कृष्ण खुद आये तब हम उनकी मत पर चलेंगे तब तक तो गोता ही खाते रहेंगे। सन्यासी आदि कह नहीं सकते कि मैं तुमको राजयोग सिखलाने आया हूँ। यह तो बाप ही समझाते हैं और संगम की ही बात है। कृष्ण है सतयुग में। उनको भी ऐसा लायक बनाने वाला कोई तो होगा ना। तो शिवबाबा खुद कहते हैं कृष्ण और उनके सारे घराने को अब मैं स्वर्ग में जाने लायक बना रहा हूँ। बाबा कितनी मेहनत करते हैं कि बच्चे स्वर्ग में चल ऊंच पद पायें। नहीं तो पढ़े लिखे के आगे जाकर भरी उठायेंगे। बाप से तो पूरा वर्सा लेना है। अपने से पूछो हम इतने सपूत हैं? सपूत भी नम्बरवार होते हैं। उत्तम, मध्यम, कनिष्ट। उत्तम तो कभी छिपे नहीं रहते। उनकी दिल में रहम आयेगा हम भारत की सेवा करें। सोशल वर्कर्स भी नम्बरवार होते हैं – उत्तम, मध्यम, कनिष्ट। कई तो बहुत लूटते हैं, माल बेचकर खा जाते हैं। फिर उनको सपूत सोशल वर्कर कैसे कहेंगे? सोशल वर्कर्स तो अपने को बहुत कहलाते हैं क्योंकि सोसायटी की सेवा करते हैं। सच्ची सेवा तो बाप ही करते हैं।

तुम कहते हो कि हम भी बाबा के साथ रूहानी सर्वेन्ट हैं। सारी सृष्टि तो क्या तत्वों को भी पवित्र करते हैं। सन्यासी तो यह नहीं जानते कि तत्व भी इस समय तमोप्रधान हैं, इनको भी सतोप्रधान बनाना है। सतोप्रधान तत्वों से तुम्हारा शरीर भी सतोप्रधान बन जायेगा। सन्यासियों के तो कभी सतोप्रधान शरीर बनते नहीं। वह आते ही रजोप्रधान समय में हैं। बाबा समझाते तो बहुत हैं परन्तु बच्चे फिर भी भूल जाते हैं। याद उनको रहेगा जो औरों को सुनाते रहेंगे। दान नहीं करेंगे तो धारणा भी नहीं होगी। जो अच्छी सर्विस करते हैं, उनका बापदादा भी नाम बाला करते हैं। यह तो बच्चे भी जानते हैं कि सर्विस में कौन-कौन तीखे हैं। जो सर्विस पर हैं वह दिल पर चढ़ते हैं। सदैव फालो माँ-बाप को करना है। उनके ही तख्तनशीन बनना है। जो सर्विस पर होंगे वह दूसरों को सुख देंगे। अपना मुँह दर्पण में देखो कि बाबा का सपूत बच्चा बना हूँ? खुद भी लिख सकते हैं कि हमारी सर्विस का यह चार्ट है। मैं यह-यह सर्विस कर रहा हूँ, आप जज करो। तो बाप को भी मालूम पड़े। खुद भी जज कर सकता है कि मैं उत्तम हूँ, मध्यम हूँ या कनिष्ट हूँ? बच्चे भी जानते हैं कौन महारथी हैं, कौन घोड़ेसवार हैं। कोई भी छिपा नहीं रह सकता है। बाप को पोतामेल भेजे तो बाबा सावधान भी करे। बिगर पोतामेल भी सावधानी तो मिलती रहती है। अब जितना वर्सा लेना हो पूरा-पूरा ले लो। फिर बापदादा से भी सर्टीफिकेट मिलेगा। यह बड़ी माँ बैठी है, इनसे सर्टीफिकेट मिल सकता है। इस वन्डरफुल मम्मी को कोई मम्मी नहीं। जैसे उस बाप को कोई बाप नहीं। फिर मम्मा फीमेल्स में नम्बरवन है। ड्रामा में जगत अम्बा गाई हुई है। सर्विस भी बहुत की है। जैसे बाबा जाते हैं, मम्मा भी जाती थी। छोटे-छोटे गांवों में सर्विस करती थी। सबमें तीखी गई। बाबा के साथ तो बड़ा बाबा है, इसलिए बच्चों को इनकी सम्भाल रखनी पड़ती है। सतयुग में प्रजा बहुत सुखी रहती है। अपने महल, गायें, बैल आदि सब कुछ होते हैं।

अच्छा – बच्चे, खुश रहो आबाद रहो, न बिसरो न याद रहो क्योंकि याद तो शिवबाबा को करना है। अपने शरीर को भी भूल जाना है तो औरों को कैसे याद करें। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिये मुख्य सार:-

1) कोई को भी नाराज नहीं करना है। मन्सा-वाचा-कर्मणा सबको सुख दे बाप की और परिवार की दुआयें लेनी हैं।

2) सपूत बच्चा बन भारत की रूहानी सेवा करनी है। रहमदिल बन रूहानी सोशल वर्कर बनना है। तन-मन-धन से सेवा करनी है। सच्चे साहेब के साथ सच्चा रहना है।

वरदान:-दिल एक दिलाराम में बसाकर सहजयोगी बनने वाले सर्व आकर्षण मूर्त भव 
दिलाराम को दिल देना अर्थात् दिल में बसाना – इसी को ही सहजयोग कहा जाता है। जहाँ दिल होगी वहाँ ही दिमाग भी चलेगा। जब दिल और दिमाग अर्थात् स्मृति, संकल्प, शक्ति सब बाप को दे दी, मन-वाणी और कर्म से बाप के हो गये तो और कोई भी संकल्प वा किसी भी प्रकार की आकर्षण आने की मार्जिन ही नहीं। स्वप्न भी इसी आधार पर आते हैं। जब सब कुछ तेरा कहा तो दूसरी आकर्षण आ ही नहीं सकती। सहज ही सर्व आकर्षण मूर्त बन जायेंगे।
स्लोगन:-बाप से और ईश्वरीय परिवार से जिगरी प्यार हो तो सफलता मिलती रहेगी।

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TODAY MURLI 11 JANUARY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 11 DECEMBER 2017

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11/01/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence:Sweet children, you are instruments to establish peace. Therefore, you have to remain very, very peaceful. Let it remain in your intellects that you are the Father’s adopted children and are therefore brothers and sisters.
Question:Whom would you call fully surrendered and what would indicate that?
Answer:“Fully surrendered ones” are those whose intellects are aware that they are being sustained by the Godly Mother and Father. They say: Baba, all of this is Yours. You sustain us. Even though some may have jobs, they understand that everything is for Baba. They continue to help the Father and it is through this that the entire business of such a big sacrificial fire continues and that everyone is sustained from it. Such children are those with surrendered intellects. Together with that, in order to claim a high status, you also have to study and teach others. While doing everything for the livelihood of your body, you have to remember the unlimited Mother and Father in every breath.
Song:Salutations to Shiva.

Om shanti. This song is of praise. In fact, all the praise is of God, the Highest on High, whom the children know. Everyone in the whole world comes to know through the children that He is our Mother and Father. You are now sitting in the family with the Mother and Father. Shri Krishna cannot be called the Mother and Father. Even if Radhe is with him, they still cannot be called the Mother and Father because they are a prince and princess. There is this mistake in the scriptures. This unlimited Father now tells you the essence of all the scriptures. At this time, only you children are personally sitting in front of Him and, even though some children are far away, they too are listening. They know that the Mother and Father is explaining to them the secrets of the beginning, the middle and the end of the world and is showing them the way and the method to have constant happiness. This is exactly like a home. A few children are here and many are outside. This is the mouth-born new creation of Brahma and that is an old creation. You children know that Baba has come to make you constantly happy. Physical parents also bring up a child and take him to school. Here, the unlimited Father is teaching us and also sustaining us. You children now have no one except the One. The Mother and Father also understand that you are His children. In a worldly family, there would be 10 to 15 children, out of whom two or three would be married. All of you sitting here are Baba’s children. All the children that are to be created are to be created through the lotus-mouth of Brahma. Later, no more children will be created because everyone has to return home. This one is the adopted mother who is an instrument. These are very wonderful matters. It is certain that the child of a poor person would know that his father is poor and that the child of a wealthy father would know that his father is wealthy. There are many mothers and fathers. Here, that One is the Mother and Father of the whole world. All of you know that you have been adopted through this one’s mouth. That One is our Mother and Father from beyond. He comes into the old world when people are very, very unhappy. You children know that you have been adopted by that Mother and Father from beyond. All of us are brothers and sisters. We have no other relationship. So, brothers and sisters should be very sweet, royalknowledge-full, peaceful and blissful. Since you are establishing peace, you have to remain very peaceful. The intellects of you children know that you are the adopted children of the Father from beyond. You have come from the supreme abode. That One is Dada, the Grandfather. This Dada (Brahma) means the senior brother. Those who are fully surrendered would understand that they are being sustained by the Godly Parent: Baba, all of this is Yours. You are sustaining us. Everyone is sustained by the children who have completely surrendered themselves. Even though some may have jobs, they understand that everything is for Baba and so they continue to help the Father. Otherwise, how would the business of the yagya continue? A king and queen are also called mother and father, but they are still physical parents. It is said: Queen Mother, King Father. This One is unlimited. You children know that you are sitting with the Mother and Father. You children also know that, to the extent you study and teach others, you will accordingly claim a high status. Together with that, you also have to perform actions for the livelihood of your bodies. This Dada is elderly. Shiv Baba would never be called old or young. He is incorporeal. You also know that the incorporeal Father has adopted us souls. Then, there is this Brahma in the corporeal form. We souls say that the Father has made us belong to Him. Then, as you come down, you would say that you brothers and sisters have made Brahma belong to you. Shiv Baba says: You have become My mouth-born creation through Brahma. Brahma also says: You have become my children. You Brahmins have it in your intellects, in every breath, that this one is your father and that that One is your Grandfather. You remember your Grandfather even more than your father. Those people fight their father in order to claim their property from the grandfather. You too have to try to claim a greater inheritance than the father does from the Grandfather. When Baba asks, all of you say that you will marry Narayan. Some new ones who used to come couldn’t remain pure and would not raise their hands. They would say that Maya is very powerful. They could not say that they would marry Shri Narayan or Shri Lakshmi. When Baba is personally speaking to you, your mercury of happiness rises so high. When your intellects are refreshed, you experience intoxication. Then, some of you are able to keep that intoxication permanently whereas it decreases in others. You have to remember the unlimited Father. You have to remember your 84 births and also the kingdom of the rulers of the globe. Those who don’t believe this will not be able to remember Baba. BapDada then understands that, although they say, “Baba, Baba”, they don’t truly remember Him. They are not worthy of marrying Lakshmi or Narayan. Their activity is such! The Father knows what is within everyone and understands the intellect of everyone. Here, it is not a matter of the scriptures. The Father came and taught you Raja Yoga and that is called the Gita. Those of smaller religions create their own scriptures and they continue to study them. Baba has not studied the scriptures. He says: Children, I have come to show you the path to heaven. Just as you came bodiless, so you have to return bodiless. You have to shed your bodies and all the karmic accounts of your bodies because bodies cause sorrow. If you have an illness and you aren’t able to go to class , that is a bondage of the body. You need a very good and powerful intellect for this. First of all, there has to be the faith that Baba truly does create heaven, but that it is now hell. When a person dies, people say that he has gone to heaven. Therefore, he must surely have been in hell. You understand this now because you have heaven in your intellects. Baba explains to you in new ways every day. So, this has sat in your intellects very well. Our Mother and Father is unlimited. Therefore, first of all, your intellects have to go completely up above. Then you would say: At this time, Baba is in Abu. People go on a pilgrimage to the Badrinath Temple (Lord who transforms) which is high up. Guides take you there. Badrinath Himself doesn’t come to take you there. People become guides. Here, Shiv Baba, Himself, comes from the supreme abode. He says: O souls, you have to shed those bodies and go to the land of Shiva. You definitely have to remember the target that you have to go to. It is not possible that that Badrinath (idol) would come into a living form and take the children back with him. He is a resident of this place. The Supreme Father, the Supreme Soul, says: I am the Resident of the supreme abode. I have come to take you back to the supreme abode. Krishna cannot say this. Rudra Shiv Baba says: The sacrificial fire of knowledge has been created. Rudra has been mentioned in the Gita, too. That spiritual Father says: Remember Me. The Father teaches you the pilgrimage in such a clever way so that when destruction takes place, you souls will shed your bodies and go directly to the Father. Then pure souls will need pure bodies, but that can only happen when the world is new. Now, all souls will return with Baba like a swarm of mosquitoes, and this is why He is also called the Boatman. This is because He takes you across from this ocean of poison to that side. Krishna cannot be called the Boatman. The Father Himself takes you from this world of sorrow to the world of happiness. This Bharat was the land of Vishnu, the kingdom of Lakshmi and Narayan. It is now the land of Ravan. You should show a picture of Ravan. You have to use the pictures a great deal. As are you souls, so too is the soul of Baba. It is just that, previously, you didn’t have knowledge. He is the Ocean of Knowledge. Those who don’t know the Creator or creation are called ignorant. Those who come to know the Creator and creation from the Creator are said to be knowledgeable. You receive this knowledge here, not in the golden age. Those people say that God is the Master of the world. People remember that Master. However, it is Lakshmi and Narayan who become the masters of the world. Incorporeal Shiv Baba doesn’t become the Master of the world. Therefore, you have to ask them: Is that Master incorporeal or corporeal? The incorporeal One cannot be the Master of the corporeal world. He is the Master of Brahmand. He comes and makes the impure world pure. He Himself doesn’t become the Master of the pure world. It is Lakshmi and Narayan who become the masters of that and it is the Father who makes them that. These are very deep matters that have to be understood. When we souls reside in the brahm element, we are the masters of Brahmand. The king and queen would say that they are the masters of Bharat and so their people would also say that they are masters; they live there too. In the same way, the Father is the Master of Brahmand and we too are masters. Baba comes and creates the new human world. He says: I don’t want to rule this world. I don’t become a human being. I take this body on loan. I teach you Raja Yoga in order to make you into the masters of the world. According to how much effort you make, so you will accordingly claim a high status. You mustn’t miss anything in this. A teacher would teach everyone. If many students pass the examination, the teacher would be glorified and he would also receive a lift(promotion) from the Government. It is the same here. To the extent that you study well, so you will receive a good status. The parents would also be very happy. When students pass their exams, their parents distribute sweets. Here, you distribute sweets every day. Then, when you pass your examination, golden flowers will be showered on you. It isn’t that flowers will fall on you from the sky but that you will become the masters of golden palaces. Here, people have golden flowers made in order to praise someone and they shower that person with those flowers. For instance, the King of Durbanga was very wealthy. When his son went abroad, he (the king) threw a party and spent a lot of money. He had golden flowers made and had them showered on everyone. It cost him a great deal and his name was glorified. They used to say: Look how the people of Bharat waste their money! You yourselves will go and live in golden palaces. You should have so much intoxication. The Father says: Simply remember Me and the cycle and your boat will go across. This is so easy! You children are living moths. Baba is the living Flame. You say that our kingdom is now to be established. The true Baba has now come to give you the fruit of your devotion. Baba Himself has told you how He comes and creates the new world of Brahmins. I definitely have to come. You children know that you are Brahma Kumars and Kumaris and are the grandchildren of Shiv Baba. This is a wonderful family. Look how the sapling of the deities is being planted! This is clear in the picture of the tree. You are sitting down below. You children are so fortunate! The most beloved Father sits here and explains to you: I have come to liberate you children from the chains of Ravan. Ravan has made you diseased. The Father says: Now, remember Me, that is, Remember Shiv Baba. Through this, your light will be ignited. Then you will become worthy to fly. Maya has broken everyone’s wings. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to make your intellect good and powerful, remain detached from any bondage of the body while in the body. Practise being bodiless. At a time of illness, stay in remembrance of the Father.
  2. You have become the children of the Mother and Father from beyond and you must therefore become very, very sweet, royalpeacefulknowledgefull and blissful. You have to stay in peace and establish peace.
Blessing:May you be a flying bird who finds solutions to all problems with unbroken remembrance.
You have to experience Baba being yours. Then you automatically remember whatever is yours. You don’t have to make effort to remember Him. “Mine” means to claim a right. Baba is mine and I am Baba’s. This is called easy yoga. Become such easy yogis who are lost in love in remembrance of the Father and continue to move forward. This unbroken remembrance becomes the solution to all problems; it makes you into a flying bird and takes you into the flying stage.
Slogan:Become experienced in the power of churning, and your power and wealth of knowledge will continue to increase.

*** Om Shanti ***

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BRAHMA KUMARIS MURLI 11 JANUARY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 11 January 2017

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11/01/18
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

‘मीठे बच्चे – तुम पीस स्थापन करने के निमित्त हो, इसलिए बहुत-बहुत पीस में रहना है, बुद्धि में रहे कि हम बाप के एडाप्टेड बच्चे आपस में भाई-बहन हैं”
प्रश्नः-पूरा सरेण्डर किसे कहेंगे, उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:-पूरा सरेण्डर वह, जिनकी बुद्धि में रहता कि हम ईश्वरीय माँ-बाप से पलते हैं। बाबा यह सब कुछ आपका है, आप हमारी पालना करते हो। भल कोई नौकरी आदि करते हैं लेकिन बुद्धि से समझते हैं यह सब बाबा के लिए है। बाप को मदद करते रहते, उससे इतने बड़े यज्ञ की कारोबार चलती, सबकी पालना होती… ऐसे बच्चे भी अर्पण बुद्धि हुए। साथ-साथ पद ऊंचा पाने के लिए पढ़ना और पढ़ाना भी है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते हुए बेहद के मात-पिता को श्वाँसों श्वाँस याद करना है।
गीत:-ओम् नमो शिवाए…

ओम् शान्ति। यह गीत तो है गायन। वास्तव में महिमा सारी है ही ऊंचे ते ऊंचे परमात्मा की, जिसको बच्चे जानते हैं और बच्चों द्वारा सारी दुनिया भी जानती है कि मात-पिता हमारा वही है। अब तुम मात-पिता के साथ कुटुम्ब में बैठे हो। श्रीकृष्ण को तो मात-पिता कह नहीं सकते। भल उनके साथ राधे भी हो तो भी उनको माता पिता नहीं कहेंगे क्योंकि वह तो प्रिन्स-प्रिन्सेज हैं। शास्त्रों में यह भूल है। अब यह बेहद का बाप तुमको सभी शास्त्रों का सार बताते हैं। भल इस समय सिर्फ तुम बच्चे सम्मुख बैठे हो। कोई बच्चे भल दूर हैं। परन्तु वह भी सुन रहे हैं। वे जानते हैं कि मात-पिता हमको सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझा रहे हैं और सदा सुखी बनाने का रास्ता वा युक्ति बता रहे हैं। यह हू ब हू जैसा घर है। थोड़े बच्चे यहाँ हैं, बहुत तो बाहर हैं। यह है ब्रह्मा मुख वंशावली, नई रचना है। वह हो गई पुरानी रचना। बच्चे जानते हैं कि बाबा हमको सदा सुखी बनाने आये हैं। लौकिक माँ-बाप भी बच्चे को बड़ा कर स्कूल में ले जाते हैं। यहाँ बेहद का बाप हमको पढ़ा भी रहे हैं, हमारी पालना भी कर रहे हैं। तुम बच्चों को अब एक के बिगर दूसरा कोई रहा ही नहीं है। माँ-बाप भी समझते हैं – यह हमारे बच्चे हैं। लौकिक कुटुम्ब होगा तो 10-15 बच्चे होंगे, 2-3 शादी की होगी। यहाँ तो यह सब बाबा के बच्चे बैठे हैं। जितने भी बच्चे पैदा करने हैं सो अभी ही ब्रह्मा मुख कमल द्वारा करने हैं। पीछे तो बच्चे पैदा करने ही नहीं हैं। सभी को वापिस जाना है। यह एक ही एडाप्टेड माता निमित्त है। यह बड़ी वण्डरफुल बात है। यह तो जरूर है गरीब का बच्चा समझेगा कि हमारा बाप गरीब है। साहूकार का बच्चा समझेगा कि हमारा बाप साहूकार है। वह तो अनेक माँ-बाप हैं। यह तो सारे जगत का एक ही माता-पिता है। तुम सभी जानते हो कि हम उनके मुख से एडाप्ट हुए हैं। यह हमारा पारलौकिक माँ-बाप है। यह आते ही पुरानी सृष्टि में हैं, जब मनुष्य बहुत-बहुत दु:खी होते हैं। बच्चे जानते हैं कि हमने इस पारलौकिक मात-पिता की गोद ली है। हम सब आपस में भाई-बहन हैं। दूसरा कोई हमारा सम्बन्ध नहीं है। तो भाई बहन को आपस में बहुत मीठा, रॉयल, पीसफुल, नॉलेजफुल, ब्लिसफुल बनना चाहिए। जबकि तुम पीस स्थापन कर रहे हो तो तुमको भी बहुत पीस में रहना चाहिए। बच्चों को यह तो बुद्धि में होना चाहिए कि हम पारलौकिक बाप के एडाप्टेड बच्चे हैं। परमधाम से बाप आये हैं। वह है डाडा (ग्रैण्ड फादर) यह दादा (बड़ा भाई) है, जो पूरा सरेण्डर हैं वो समझेंगे हम ईश्वरीय माँ-बाप से पलते हैं। बाबा यह सब कुछ आपका है। आप हमारी पालना करते हो। जो बच्चे अर्पण होते हैं उनसे सभी की पालना हो जाती है। भल कोई नौकरी करते हैं तो भी समझते हैं यह सब कुछ बाबा के लिए है। तो बाप को भी मदद करते रहते हैं। नहीं तो यज्ञ की कारोबार कैसे चले। राजा रानी को भी मात-पिता कहते हैं। परन्तु वह फिर भी जिस्मानी मात-पिता हुए। राज-माता भी कहते हैं तो राज-पिता भी कहते हैं। यह फिर हैं बेहद के। बच्चे जानते हैं कि हम मात-पिता के साथ बैठे हैं। यह भी बच्चे जानते हैं कि हम जितना पढ़ेंगे और पढ़ायेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। साथ-साथ शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करना है। यह दादा भी बुजुर्ग है। शिवबाबा को कभी बूढ़ा वा जवान नहीं कहेंगे। वह है ही निराकार। यह भी तुम जानते हो कि हम आत्माओं को निराकार बाप ने एडाप्ट किया है। और फिर साकार में है यह ब्रह्मा। अहम् आत्मा कहती हैं हमने बाप को अपना बनाया है। फिर नीचे आओ तो कहेंगे हम भाई बहनों ने ब्रह्मा को अपना बनाया है। शिवबाबा कहते हैं – तुम ब्रह्मा द्वारा हमारे ब्रह्मा मुख वंशावली बने हो। ब्रह्मा भी कहते हैं तुम हमारे बच्चे बने हो। तुम ब्राह्मणों की बुद्धि में श्वाँसों श्वाँस यही चलेगा कि यह हमारा बाप है, वह हमारा दादा है। बाप से जास्ती दादे को याद करते हैं। वह मनुष्य तो बाप से झगड़ा आदि करके भी दादे से प्रापर्टी लेते हैं। तुमको भी कोशिश करके बाप से भी जास्ती दादे से वर्सा लेना है। बाबा जब पूछते हैं तो सभी कहते हैं हम नारायण को वरेंगे। कोई-कोई नये आते थे, पवित्र नहीं रह सकते तो वह हाथ नहीं उठा सकते। कह देते माया बड़ी प्रबल है। वह तो कह भी नहीं सकते कि हम श्री नारायण को वा लक्ष्मी को वरेंगे। देखो, जब बाबा सम्मुख सुनाते हैं तो कितना खुशी का पारा चढ़ता है। बुद्धि को रिफ्रेश किया जाता है तो नशा चढ़ता है। फिर किसी-किसी को वह नशा स्थाई रहता है, किसी-किसी में कम हो जाता है। बेहद के बाप को याद करना है, 84 जन्मों को याद करना है और चक्रवर्ती राजाई को भी याद करना है। जो मानने वाले नहीं होंगे उनको याद नहीं रहेगी। बापदादा समझ जाते हैं कि बाबा-बाबा कहते तो हैं परन्तु सच-सच याद करते नहीं हैं और न लक्ष्मी-नारायण को वरने लायक हैं। चलन ही ऐसी है। अन्तर्यामी बाप हर एक की बुद्धि को समझते हैं। यहाँ शास्त्रों की तो कोई बात ही नहीं। बाप ने आकर राजयोग सिखाया है, जिसका नाम गीता रखा है। बाकी तो छोटे मोटे धर्मों वाले सब अपना-अपना शास्त्र बना लेते हैं फिर वह पढ़ते रहते हैं। बाबा शास्त्र नहीं पढ़े हैं। कहते हैं बच्चे – मैं तुमको स्वर्ग की राह बताने आया हूँ। तुम जैसे अशरीरी आये थे, वैसे ही तुमको जाना है। देह सहित सब इन दु:खों के कर्मबन्धन को छोड़ देना है क्योंकि देह भी दु:ख देती है। बीमारी होगी तो क्लास में आ नहीं सकेंगे। तो यह भी देह का बन्धन हो गया, इसमें बुद्धि बड़ी सालिम चाहिए। पहले तो निश्चय चाहिए कि बरोबर बाबा स्वर्ग रचता है। अभी तो है नर्क। जब कोई मरता है तो कहते हैं स्वर्ग गया, तो जरूर नर्क में था ना। परन्तु यह तुम अभी समझते हो क्योंकि तुम्हारी बुद्धि में स्वर्ग है। बाबा रोज़ नये-नये तरीके से समझाते हैं। तो तुम्हारी बुद्धि में अच्छी रीति बैठे। हमारा बेहद का मात-पिता है। तो पहले बुद्धि एकदम ऊपर चली जायेगी। फिर कहेंगे इस समय बाबा आबू में है। जैसे यात्रा पर जाते हैं तो बद्रीनाथ का मन्दिर ऊपर रहता है। पण्डे ले जाते हैं, बद्रीनाथ खुद तो ले चलने लिए नहीं आता है। मनुष्य पण्डा बनते हैं। यहाँ शिवबाबा खुद आते हैं परमधाम से। कहते हैं हे आत्मायें तुमको यह शरीर छोड़ शिवपुरी चलना है। जहाँ जाना है वह निशाना जरूर याद रहेगा। वह बद्रीनाथ चैतन्य में आकर बच्चों को साथ ले जाये, ऐसे तो हो नहीं सकता। वह तो यहाँ का रहवासी है। यह परमपिता परमात्मा कहते हैं मैं परमधाम का रहवासी हूँ। तुमको लेने लिए आया हूँ। कृष्ण तो ऐसे कह न सके। रुद्र शिवबाबा कहते हैं, यह रुद्र यज्ञ रचा हुआ है। गीता में भी रुद्र की बात लिखी हुई है। वह रूहानी बाप कहते हैं मुझे याद करो। बाप ऐसी युक्ति से यात्रा सिखाते हैं, जो जब विनाश हो तो तुम आत्मा शरीर छोड़ सीधा बाप के पास चले जायेंगे। फिर तो शुद्ध आत्मा को शुद्ध शरीर चाहिए, सो तब होगा जब नई सृष्टि हो। अभी तो सभी आत्मायें मच्छरों सदृश्य वापस जायेंगी, बाबा के साथ, इसलिए उनको खिवैया भी कहा जाता है। इस विषय सागर से उस पार ले जाते हैं। कृष्ण को खिवैया नहीं कह सकते। बाप ही इस दु:ख के संसार से सुख के संसार में ले जाते हैं। यही भारत विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। अब रावणपुरी है। रावण का चित्र भी दिखाना चाहिए। चित्रों से बहुत काम लेना है। जैसे हमारी आत्मा है वैसे बाबा की आत्मा है। सिर्फ हम पहले अज्ञानी थे, वह ज्ञान का सागर है। अज्ञानी उसको कहा जाता है जो रचता और रचना को नहीं जानते हैं। रचता द्वारा जो रचता और रचना को जानते हैं उनको ज्ञानी कहा जाता है। यह ज्ञान तुमको यहाँ मिलता है। सतयुग में नहीं मिलता। वो लोग कहते हैं परमात्मा विश्व का मालिक है। मनुष्य उस मालिक को याद करते हैं, परन्तु वास्तव में विश्व का अथवा सृष्टि का मालिक तो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। निराकार शिवबाबा तो विश्व का मालिक बनता नहीं। तो उन्हों से पूछना पड़े कि वह मालिक निराकार है या साकार? निराकार तो साकार सृष्टि का मालिक हो न सके। वह है ब्रह्माण्ड का मालिक। वही आकर पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। खुद पावन दुनिया का मालिक नहीं बनते। उनका मालिक तो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं और बनाने वाला है बाप। यह बड़ी गुह्य बातें हैं समझने की। हम आत्मा भी जब ब्रह्म तत्व में रहती हैं तो ब्रह्माण्ड के मालिक हैं। जैसे राजा रानी कहेंगे हम भारत के मालिक हैं तो प्रजा भी कहेगी हम मालिक हैं। वहाँ रहते तो हैं ना। वैसे बाप ब्रह्माण्ड का मालिक है, हम भी मालिक ही ठहरे। फिर बाबा आकर नई मनुष्य सृष्टि रचते हैं। कहते हैं मुझे इस पर राज्य नहीं करना है, मैं मनुष्य नहीं बनता हूँ। मैं तो यह शरीर भी लोन लेता हूँ। तुमको सृष्टि का मालिक बनाने राजयोग सिखाता हूँ। तुम जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना पद ऊंचा पायेंगे, इसमें कमी मत करो। टीचर तो सभी को पढ़ाते हैं। अगर इम्तहान में बहुत पास होते हैं तो टीचर का भी शो होता है। फिर उनको गवर्मेन्ट से लिफ्ट मिलती है। यह भी ऐसे है। जितना अच्छा पढ़ेंगे उतना अच्छा पद मिलेगा। माँ-बाप भी खुश होंगे। इम्तहान में पास होते हैं तो मिठाई बाँटते हैं। यहाँ तो तुम रोज़ मिठाई बाँटते हो। फिर जब इम्तहान में पास हो जाते हो तो सोने के फूलों की वर्षा होती है। तुम्हारे ऊपर कोई आकाश से फूल नही गिरेंगे परन्तु तुम एकदम सोने के महलों के मालिक बन जाते हो। यह तो कोई की महिमा करने के लिए सोने के फूल बनाकर उन पर डालते हैं। जैसे दरभंगा का राजा बहुत साहूकार था, उनका बच्चा विलायत गया तो पार्टी दी, बहुत पैसा खर्च किया। उसने सोने के फूल बनाकर वर्षा की थी। उस पर बहुत खर्चा हो गया। बहुत नाम हुआ था। कहते थे देखो भारतवासी कैसे पैसे उड़ाते हैं। तुम तो खुद ही सोने के महलों में जाकर बैठेंगे तो तुमको कितना नशा रहना चाहिए। बाप कहते हैं सिर्फ मेरे को और चक्र को याद करो तो तुम्हारा बेड़ा पार हो जायेगा। कितना सहज है।

तुम बच्चे हो चैतन्य परवाने, बाबा है चैतन्य शमा। तुम कहते हो अभी हमारा राज्य स्थापन होना है। अब सच्चा बाबा आया हुआ है भक्ति का फल देने। बाबा ने खुद बतलाया है मैं कैसे आकर नये ब्राह्मणों की सृष्टि रचता हूँ। मुझे जरूर आना पड़े। तुम बच्चे जानते हो हम ब्रह्माकुमार और कुमारियाँ हैं। शिवबाबा के पोत्रे हैं। यह फैमिली है वण्डरफुल। कैसे देवी-देवता धर्म का कलम लग रहा है। झाड़ में क्लीयर है। नीचे तुम बैठे हो। तुम बच्चे कितने सौभाग्यशाली हो। मोस्ट बिलवेड बाप बैठ समझाते हैं कि मैं आया हूँ तुम बच्चों को रावण की जंजीरों से छुड़ाने। रावण ने तुमको रोगी बना दिया है। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो अर्थात् शिवबाबा को याद करो इससे तुम्हारी ज्योति जगेगी, फिर तुम उड़ने लायक बन जायेंगे। माया ने सबके पंख तोड़ डाले हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बुद्धि को सालिम बनाने के लिए देह में रहते, देह के बन्धन से न्यारा रहना है। अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। बीमारी आदि के समय भी बाप की याद में रहना है।

2) पारलौकिक मात-पिता के बच्चे बने हैं, इसलिए बहुत-बहुत मीठा, रॉयल, पीसफुल, नॉलेजफुल और ब्लिसफुल रहना है। पीस में रह पीस स्थापन करनी है।

वरदान:-अटूट याद द्वारा सर्व समस्याओं का हल करने वाले उड़ता पंछी भव 
जब यह अनुभव हो जाता है कि मेरा बाबा है, तो जो मेरा होता है वह स्वत: याद रहता है। याद किया नहीं जाता है। मेरा अर्थात् अधिकार प्राप्त हो जाना। मेरा बाबा और मैं बाबा का -इसी को कहा जाता है सहजयोग। ऐसे सहजयोगी बन एक बाप की याद के लगन में मगन रहते हुए आगे बढ़ते चलो। यह अटूट याद ही सर्व समस्याओं को हल करके उड़ता पंछी बनाए उड़ती कला में ले जायेगी।
स्लोगन:-मनन शक्ति के अनुभवी बनो तो ज्ञान धन बढ़ता रहेगा।

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TODAY MURLI 10 JANUARY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 10 DECEMBER 2017

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 9 January 2018 :- Click Here

10/01/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence:Sweet children, to remember a corporeal body is to be element (evil spirit) conscious, because bodies are made of the five elements. You have to become soul conscious and remember the one bodiless Father.
Question:What is the most elevated task which only the Father carries out?
Answer:To make the whole tamopradhan world satopradhan and constantly happy is the most elevated task which only the Father carries out. Because of this elevated task, His memorials have been made very great.
Question:Which two terms hold the secrets of the whole drama?
Answer:Worthy of worship and worshipper. When you are worthy of worship, you are the most elevated. Then you become the middle quality and then the lowest. Maya changes you from being worthy of worship into worshippers.
Song:The Flame has ignited in the gathering of the moths

Om shanti. God sits here and explains to you children that human beings cannot be called God. Even Brahma, Vishnu and Shankar have images, but they too cannot be called God. The residence of the Supreme Father, the Supreme Soul, is higher than theirs. He alone is called Prabhu, Ishwar, Bhagwan etc. When people call out, they are unable to see a subtle or corporeal form in front of them. This is why they call the form of a human being God. Even when they see a sannyasi, they say that he is God, but God, Himself, explains: Human beings cannot be called God. Many people remember incorporeal God a lot. Those who have not adopted gurus or are small children are also taught to remember the Supreme Soul. However, they are not told which Supreme Soul they should remember. They do not have an image in their intellects. At a time of sorrow, they call out: O Prabhu! No picture of a guru or deity appears in front of them. Although they have adopted many gurus, when they say “O God” they never remember their guru. Even if they do remember their guru and call him God, he is still a human being who takes birth and dies. Therefore, this means that they are remembering the body made of the five elements which are called the five evil spirits. A soul is not called an evil spirit. So that is worshipping the elements. Their intellects’ yoga is diverted to the body. If they consider a human being to be God, it isn’t that they remember the soul that is in that body; no. A soul is in each of them: the one who remembers and the one whom he remembers. They say that God is omnipresent. However, you cannot call God a sinful soul. In fact, when they say “The Supreme Soul” their intellects go to the incorporeal One. Incorporeal souls remember the incorporeal Father. That is called being soul conscious. Those who remember a corporeal body are element (evil spirit) conscious. Evil spirits remember evil spirits because they consider themselves to be bodies of the five elements instead of considering themselves to be souls. Their names are also given to the bodies. They consider themselves to be spirits (human beings) of the five elements and they remember the bodies of others; they are not soul conscious. If they were to consider themselves to be incorporeal souls, they would remember incorporeal God. The relationship of all souls is first of all with God. Souls remember God when they are in sorrow. They have a relationship with Him. He liberates souls from all sorrow. He is also called the Flame. It is not a question of a light etc. He is the Supreme Father, the Supreme Soul. When they call Him a Flame, people think that He is light. The Father Himself has explained: I am the Supreme Soul and I am called Shiva. Shiva is also called Rudra. That incorporeal One has many names. No one else has as many names. Brahma, Vishnu and Shankar have one name each. All bodily beings just have the one name. The one God is given many names. His praise is limitless. Human beings have one fixed name. You have now died alive and so you are given another name so that you forget everything of the past. You die alive in front of the Supreme Father, the Supreme Soul, and so this is the birth in which you have died alive. Therefore, you surely take birth to the Mother and Father. The Father sits here and explains these deep things to you. The world doesn’t know Shiva. They know Brahma, Vishnu and Shankar. They even speak of the day of Brahma and the night of Brahma. They have just heard that establishment takes place through Brahma, but they don’t know how. He is the Creator and so He would definitely create a new religion and a new world. Only through Brahma would He create the Brahmin clan. You Brahmins remember the Supreme Father, the Supreme Soul, and not Brahma, because you belong to Him through Brahma. Body-conscious brahmins outside would not call themselves children of Brahma, the grandchildren of Shiva. They even celebrate the birthday of Shiv Baba but, because of not knowing Him, they don’t value Him. They go to His temple and understand that He is not Brahma, Vishnu, Shankar or Lakshmi and Narayan. He is definitely the incorporeal Supreme Father, the Supreme Soul. All actors have their own part s. Even when they take rebirth, they are given their own names. The Supreme Father, the Supreme Soul, is the only one who doesn’t have a corporeal name or form. However, people with foolish intellects don’t understand this. Since there is the memorial of God, He must surely have come and created heaven. Otherwise, who would create heaven? He has come and once again created this sacrificial fire of the knowledge of Rudra. This is called a sacrificial fire because you have to sacrifice yourselves here. Many people create sacrificial fires. All of those are physical sacrificial fires of the path of devotion. The Supreme Father, the Supreme Soul, comes and creates a sacrificial fire Himself. He teaches you children. When a sacrificial fire is created, those brahmins relate the scriptures and religious stories etc. The Father is k nowledge-full. That Gita, Bhagawad and all the scriptures etc. belong to the path of devotion. Material sacrificial fires belong to the path of devotion. This is the time of the path of devotion. When the end of the iron age comes, devotion too can come to an end. Only then does God come and meet you, because He is the One who gives you the fruit of your devotion. He is called the Sun of Knowledge. There are the Sun of Knowledge, the moon of knowledge and the lucky stars. Achcha, the Father is the Sun of Knowledge. Then, there has to be the mother, the moon of knowledge. So the body He entered is the mother, the moon of knowledge. All the rest are the children, the lucky stars. According to this calculation, Jagadamba is a lucky star, because you are children. Among stars, some are brighter. It is the same here, numberwise. Those are the physical sun, moon and stars of the sky whereas these are aspects of knowledge. Similarly, those are rivers of water whereas these are rivers of knowledge that have emerged from the Ocean of Knowledge. People celebrate the birthday of Shiva, and so that Father of the whole world definitely comes. He must definitely come and create heaven. The Father comes to establish the original eternal deity religion that has disappeared. The Government doesn’t believe in religion. They say that they don’t have a religion. They are right. The Father also says that the original eternal deity religion of Bharat has disappeared. Religion is might. The people of Bharat were very happy when they were in the deity religion. There was the world almighty authority kingdom when the most elevated beings ruled the kingdom. Shri Lakshmi and Shri Narayan are called the most elevated beings. There are the highest and the lowest, numberwise. There are the most elevated beings, the highest beings, the middle level and the lowest human beings. Those who first of all become the most elevated beings then become the middle and then the lowest. Therefore, Lakshmi and Narayan are the most elevated; they are the most elevated of all human beings. Then, when they come down, they change from deities into warriors, from warriors into merchants, then into shudras and the lowest ones. Sita and Rama cannot be called the most elevated beings. The king and queen of all kings, the most elevated satopradhan beings, are Lakshmi and Narayan. You have all of these things in your intellects. How does this world cycle turn? First of all, they are the highest and then they become those of the middle level and then the lowest. At this time, the whole world is tamopradhan. The Father whose birthday you now celebrate explains this. You can tell people that, 5000 years ago, the Supreme Father, the Supreme Soul, Shiva came here. Otherwise, why do they celebrate the birthday of Shiva? The Supreme Father, the Supreme Soul, would definitely bring a gift for the children and He would definitely carry out the most elevated task. He makes the whole of the tamopradhan world satopradhan and constantly happy. To the extent that He is elevated, accordingly there is also just as great a memorial to Him. They looted that. People attack others for wealth. People even came from abroad because of the wealth here. Even at that time, there was a lot of wealth. However, Maya, Ravan made Bharat worth a shell and the Father has now come to make it worth a diamond. No one knows such a Shiv Baba. They say that He is omnipresent. It is a mistake to say this. The Satguru who takes the boat across is just the One whereas there are many who make you drown. All are drowning in the ocean of poison and this is why they say: Take us from this tasteless ocean of poison across to the other side where there is the ocean of milk. It is remembered that Vishnu used to live in an ocean of milk. Heaven is called the ocean of milk where Lakshmi and Narayan rule. It isn’t that Vishnu rests there in an ocean of milk. Those people create a big lake and place Vishnu in the middle of it. They make a very big image of Vishnu. Lakshmi and Narayan are not that big; at the most, they would perhaps be six feet tall. They also make big statues of the Pandavas. They create big effigies of Ravan too. Their names are important and so they create big images of them. Although Baba’s name is the most elevated, a small image is made of Him. They have given Him such a big form in order to explain. The Father says: I do not have such a big form. Just as souls are tiny, in the same way, I, the Supreme Soul, am also like a star. He is called the Supreme Soul. He is the most elevated of all. He has all the knowledge contained in Him. His praise is sung: He is the Seed of the human world tree. He is the Ocean of Knowledge. He is a living soul. However, He can only speak knowledge when He takes organs. Just as a child is unable to speak with his little organs, but when he grows older and he sees the scriptures etc., he remembers the sanskars of the past, so the Father sits here and explains to you children: I have come after 5000 years to teach you that same Raja Yoga. Krishna didn’t teach Raja Yoga. They just experienced their reward. They were in the sun dynasty for eight births, the moon dynasty for 12 births and then for 63 births they were in the merchant and shudra dynasties. This is the last birth of everyone. The Krishna soul is listening to this and you are also listening to it. This is the clan of the Brahmins of the confluence age. Then, from Brahmins you will go and become deities. The one Supreme Father, the Supreme Soul, establishes the three religions – the Brahmin religion, the sun-dynasty deity religion and the moon-dynasty warrior religion. Therefore, the scripture of all three should be just one. There aren’t different scriptures. Brahma, the greatest one, is the father of all, Prajapita. There is no scripture of his. “God speaks” is only mentioned in the Gita. It is not said: God Brahma speaks. It is God Shiva who speaks through Brahma and converts shudras into Brahmins. It is Brahmins who become deities and those who fail become warriors. They are reduced by two degrees. He explains everything so clearly. The Highest on High is the Supreme Father, the Supreme Soul. Then there are Brahma, Vishnu and Shankar. They too cannot be called the most elevated beings. Those who become the most elevated beings then become the lowest too. Out of all human beings, Lakshmi and Narayan are the most elevated and there is a temple to them. However, no one knows their praise. People simply continue as worshippers to worship them. From worshippers you are now becoming worthy of worship. Maya makes you worshippers again. The drama is created in this way. When the play comes to an end, I have to come and expansion automatically stops. You children then have to come and repeat your own part s. The Supreme Father, the Supreme Soul, Himself, sits here and explains to you. People celebrate His birthday on the path of devotion; they continue to celebrate it. In heaven, they do not celebrate anyone’s birthday. They don’t even celebrate the birthday of Krishna or Rama. They themselves would exist there in a practical form. Here, they have been and gone and this is why people celebrate it. There, they would not celebrate the birthday of Krishna every year. There, they are always in happiness, and so why would they celebrate a birthday? Children would be named by their parents. There are no gurus there. In fact, those things have no connection with knowledge or yoga. However, if you want to ask what systems exist there, Baba would say to you: Whatever systems are there, they will continue; you have no need to ask about them. First of all, make effort to claim your status. Become worthy and then ask. There must be one system or another in the drama. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Consider yourself to be an incorporeal soul and remember the incorporeal Father, not any bodily beings. Die alive and remove the old things of the past from your intellect.
  2. You have to surrender yourself completely in this sacrificial fire of the knowledge of Rudra that the Father has created. Do the service of convertingshudras to the Brahmin religion.
Blessing:May you be an elevated server who “wills” power to everyone with your own will power.
At present, some souls are thirsty for your co-operation, for they don’t have any power of their own. You especially have to give them help with your own powers and this is why you servers who have become instruments need to have the power of all powers. Just as Father Brahma in his final moments will ed his powers to the children so that this task is being carried out with that will, so, follow the f ather in the same way. Will your powers to souls and service will be completed according to the time.
Slogan:Where there is the power of unity and concentration, success is easily achieved.

*** Om Shanti ***

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BRAHMA KUMARIS MURLI 10 JANUARY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 10 January 2017

To Read Murli 9 January 2018 :- Click Here
10/01/18
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – साकार शरीर को याद करना भी भूत अभिमानी बनना है, क्योंकि शरीर 5 भूतों का है, तुम्हें तो देही-अभिमानी बन एक विदेही बाप को याद करना है”
प्रश्नः-सबसे सर्वोत्तम कार्य कौन सा है जो बाप ही करते हैं?
उत्तर:-सारी तमोप्रधान सृष्टि को सतोप्रधान सदा सुखी बना देना यह है सबसे सर्वोत्तम कार्य, जो बाप ही करते हैं। इस ऊंचे कार्य के कारण उनके यादगार भी बहुत ऊंचे-ऊंचे बनाये हैं।
प्रश्नः-किन दो शब्दों में सारे ड्रामा का राज़ आ जाता है?
उत्तर:-पूज्य और पुजारी, जब तुम पूज्य हो तब पुरुषोत्तम हो, फिर मध्यम, कनिष्ट बनते। माया पूज्य से पुजारी बना देती है।
गीत:-महफिल में जल उठी शमा…

ओम् शान्ति। भगवान बैठ बच्चों को समझाते हैं कि मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी चित्र है उनको भगवान नहीं कह सकते। परमपिता परमात्मा का निवास उनसे भी ऊंच है। उनको ही प्रभू, ईश्वर, भगवान आदि कहते हैं। मनुष्य जब पुकारते हैं तो उन्हों को कोई भी आकार वा साकार मूर्ति दिखाई नहीं पड़ती, इसलिए किस भी मनुष्य आकार को भगवान कह देते हैं। सन्यासियों को भी देखते हैं तो कहते हैं भगवान, परन्तु भगवान खुद समझाते हैं कि मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। निराकार भगवान को तो बहुत याद करते हैं। जिन्होंने गुरू नहीं किया है, छोटे बच्चे हैं उनको भी सिखाया जाता है परमात्मा को याद करो, परन्तु किस परमात्मा को याद करो – यह नहीं बताया जाता। कोई भी चित्र बुद्वि में नहीं रहता। दु:ख के समय कह देते हैं हे प्रभु। कोई गुरू वा देवता आदि का चित्र उनके सामने नहीं आता है। भल बहुत गुरू किये हों तो भी जब हे भगवान कहते हैं तो कभी उनको गुरू याद नहीं आयेगा। अगर गुरू को याद कर और ही भगवान कहें तो वह मनुष्य तो जन्म-मरण में आने वाला हो गया। तो यह गोया 5 तत्वों के बने हुए शरीर को याद करते हैं, जिसको 5 भूत कहा जाता है। आत्मा को भूत नहीं कहा जाता। तो वह जैसे भूत पूजा हो गई। बुद्धियोग शरीर तरफ चला गया। अगर किसी मनुष्य को भगवान समझते तो ऐसे नहीं कि उनमें जो आत्मा है उसको याद करते हैं। नहीं। आत्मा तो दोनों में है। याद करने वाले में भी है तो जिसको याद करते हैं उनमें भी है। परमात्मा को तो सर्वव्यापी कह देते। परन्तु परमात्मा को पाप आत्मा नहीं कहा जा सकता। वास्तव में परमात्मा नाम जब निकलता है तो बुद्धि निराकार तरफ चली जाती है। निराकार बाप को निराकार आत्मा याद करती है। उसको देही-अभिमानी कहेंगे। साकार शरीर को जो याद करते हैं वह जैसे भूत अभिमानी हैं। भूत, भूत को याद करते हैं क्योंकि अपने को आत्मा समझने बदले 5 भूतों का शरीर समझते हैं। नाम भी शरीर पर पड़ता है। अपने को भी 5 तत्वों का भूत समझते हैं और उनको भी शरीर से याद करते हैं। देही-अभिमानी तो हैं नहीं। अपने को निराकार आत्मा समझें तो निराकार परमात्मा को याद करें। सभी आत्माओं का सम्बन्ध पहले-पहले परमात्मा से है। आत्मा दु:ख में परमात्मा को ही याद करती है, उनके साथ सम्बन्ध है। वह आत्माओं को सभी दु:खों से छुड़ाते हैं। उनको शमा भी कहते हैं। कोई बत्ती आदि की तो बात नहीं। वह तो परमपिता परम आत्मा है। शमा कहने से मनुष्य फिर ज्योति समझ लेते हैं। यह तो बाप ने खुद समझाया है मैं परम आत्मा हूँ, जिसका नाम शिव है। शिव को रूद्र भी कहते हैं। उस निराकार के ही अनेक नाम हैं और कोई के इतने नाम नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का एक ही नाम है। जो भी देहधारी हैं उन्हों का एक ही नाम है। एक ईश्वर को ही अनेक नाम दिये जाते हैं। उनकी महिमा अपरमअपार है। मनुष्य का एक नाम फिक्स है। अब तुम मरजीवा बने हो तो तुम्हारे पर दूसरा नाम रखा गया है, जिससे पुराना सब भूल जाये। तुम परमपिता परमात्मा के आगे जीते जी मरते हो। तो यह है मरजीवा जन्म। तो जरूर मात पिता पास जन्म लिया जाता है। यह गुह्य बातें बाप बैठ तुमको समझाते हैं। दुनिया तो शिव को जानती नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को जानती है। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात भी कहते हैं। यह भी सिर्फ सुना है। ब्रह्मा द्वारा स्थापना… परन्तु कैसे, यह नहीं जानते। अब क्रियेटर तो जरूर नया धर्म, नई दुनिया रचेगा। ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण कुल ही रचेगा। तुम ब्राह्मण ब्रह्मा को नहीं परमपिता परमात्मा को याद करते हो क्योंकि ब्रह्मा द्वारा तुम उनके बने हो। बाहर वाले देह-अभिमानी ब्राह्मण ऐसे अपने को ब्रह्मा के बच्चे शिव के पोत्रे नहीं कहेंगे। शिवबाबा जिसकी जयन्ती भी मनाते हैं, परन्तु उनको न जानने कारण उनका कदर नहीं है। उनके मन्दिर में जाते हैं, समझते हैं यह ब्रह्मा, विष्णु शंकर वा लक्ष्मी-नारायण तो नहीं हैं। वह जरूर निराकार परमात्मा है। और सभी एक्टर्स का अपना-अपना पार्ट है, पुनर्जन्म लेते हैं, तो भी अपना नाम धरते हैं। यह परमपिता परमात्मा एक ही है, जिसका व्यक्त नाम रूप नहीं है, परन्तु मूढ़मति मनुष्य समझते नहीं हैं। परमात्मा का यादगार है तो जरूर वह आया होगा, स्वर्ग रचा होगा। नहीं तो स्वर्ग कौन रचेगा। अब फिर आकर यह रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा है। इसको यज्ञ कहा जाता है क्योंकि इसमें स्वाहा होना होता है। यज्ञ तो बहुत मनुष्य रचते हैं। वह तो सब हैं भक्ति मार्ग के स्थूल यज्ञ। यह परमपिता परमात्मा स्वयं आकर यज्ञ रचते हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं। यज्ञ जब रचते हैं तो उसमें भी ब्राह्मण लोग शास्त्र कथायें आदि सुनाते हैं। यह बाप तो नॉलेजफुल है। कहते हैं यह गीता भागवत आदि शास्त्र सभी भक्ति मार्ग के हैं। यह मैटेरियल यज्ञ भी भक्ति मार्ग के हैं। यह है ही भक्ति मार्ग का समय। जब कलियुग का अन्त आये तब भक्ति का भी अन्त आये, तब ही भगवान आकर मिले क्योंकि वही भक्ति का फल देने वाला है। उनको ज्ञान सूर्य कहा जाता है। ज्ञान चन्द्रमा, ज्ञान सूर्य और ज्ञान लकी सितारे। अच्छा ज्ञान सूर्य तो है बाप। फिर माता चाहिए ज्ञान चन्द्रमा। तो जिस तन में प्रवेश किया है वह हो गई ज्ञान चन्द्रमा माता और बाकी सब हैं बच्चे लकी सितारे। इस हिसाब से जगदम्बा भी लकी स्टार हो गई क्योंकि बच्चे ठहरे ना। स्टार्स में कोई सबमें तीखा भी होता है। वैसे यहाँ भी नम्बरवार हैं। वह हैं स्थूल आकाश के सूर्य चाँद और सितारे और यह है ज्ञान की बात। जैसे वह पानी की नदियां और यह है ज्ञान की नदियां, जो ज्ञान सागर से निकली हैं।

अब शिवजयन्ती मनाते हैं, जरूर वह सारे सृष्टि का बाप आते हैं। आकर जरूर स्वर्ग रचते होंगे। बाप आते ही हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करने, जो प्राय: लोप हो गया है। गवर्मेन्ट भी कोई धर्म को नहीं मानती है। कहते हैं हमारा कोई धर्म नहीं। यह ठीक कहते हैं। बाप भी कहते हैं भारत का आदि सनातन देवी-देवता धर्म प्राय: लोप है। धर्म में ताकत रहती है। भारतवासी अपने दैवी धर्म में थे तो बहुत सुखी थे। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी राज्य था। पुरुषोत्तम राज्य करते थे। श्री लक्ष्मी-नारायण को ही पुरुषोत्तम कहा जाता है। नम्बरवार ऊंच नीच तो होते हैं। सर्वोत्तम पुरुष, उत्तम पुरुष, मध्यम, कनिष्ट पुरुष तो होते ही हैं। पहले-पहले सभी से सर्वोत्तम पुरुष जो बनते हैं वही फिर मध्यम, कनिष्ट बनते हैं। तो लक्ष्मी-नारायण हैं पुरुषोत्तम। सभी पुरुषों में उत्तम। फिर नीचे उतरते हैं तो देवता से क्षत्रिय, क्षत्रिय से फिर वैश्य, शूद्र कनिष्ट बनते हैं। सीता राम को भी पुरुषोत्तम नहीं कहेंगे। सभी राजाओं के राजा, सर्वोत्तम सतोप्रधान पुरुषोत्तम हैं लक्ष्मी-नारायण। यह सब बातें तुम्हारी बुद्वि में बैठी हैं। कैसे यह सृष्टि का चक्र चलता है। पहले-पहले उत्तम फिर मध्यम, कनिष्ट बनते हैं। इस समय तो सारी दुनिया तमोप्रधान है, यह बाप समझाते हैं। जिसकी अब जयन्ती मनायेंगे, तुम बता सकते हो कि आज से 5 हजार वर्ष पहले परमपिता परमात्मा शिव पधारे थे। नहीं तो शिव जयन्ती क्यों मनाते! परमपिता परमात्मा जरूर बच्चों के लिए सौगात ले आयेंगे और जरूर सर्वोत्तम कार्य करेंगे। सारी तमोप्रधान सृष्टि को सतोप्रधान सदा सुखी बनाते हैं। जितना ऊंच है उतना ऊंच यादगार भी था जिस मन्दिर को लूटकर ले गये। मनुष्य चढ़ाई करते ही हैं धन के लिए। फारेन से भी आये धन के लिए, उस समय भी धन बहुत था। परन्तु माया रावण ने भारत को कौड़ी तुल्य बना दिया है। बाप आकर हीरे तुल्य बनाते हैं। ऐसे शिवबाबा को कोई भी नहीं जानते हैं। कह देते सर्वव्यापी है, यह कहना भी भूल है। नईया पार करने वाला सतगुरू एक है। डुबोने वाले अनेक हैं। सभी विषय सागर में डूबे हुए हैं तब तो कहते हैं इस असार संसार, विषय सागर से उस पार ले चलो, जहाँ क्षीरसागर है। गाया भी जाता है कि विष्णु क्षीरसागर में रहते थे। स्वर्ग को क्षीरसागर कहा जाता है। जहाँ लक्ष्मी-नारायण राज्य करते हैं। बाकी ऐसे नहीं विष्णु वहाँ क्षीरसागर में विश्राम करते हैं। वो लोग तो बड़ा तलाब बनाकर उसके बीच में विष्णु को रखते हैं। विष्णु भी लम्बा चौड़ा बनाते हैं। इतने बड़े तो लक्ष्मी-नारायण होते नहीं। बहुत-बहुत 6 फुट होंगे। पाण्डवों के भी बड़े-बड़े बुत बनाते हैं। रावण का कितना बड़ा बुत बनाते हैं। बड़ा नाम है तो बड़ा चित्र बनाते हैं। बाबा का नाम भल बड़ा है परन्तु उनका चित्र छोटा है। यह तो समझाने लिए इतना बड़ा रूप दे दिया है। बाप कहते हैं मेरा इतना बड़ा रूप नहीं है। जैसे आत्मा छोटी है वैसे ही मैं परमात्मा भी स्टार मिसल हूँ। उसको सुप्रीम सोल कहा जाता है, वह है सबसे ऊंच। उसी में सारा ज्ञान भरा हुआ है, उनकी महिमा गाई हुई है कि वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, ज्ञान का सागर है, चैतन्य आत्मा है। परन्तु सुनावे तब जब आरगन्स लेवे। जैसे बच्चा भी छोटे आरगन्स से बात नहीं कर सकता है, बड़ा होता है तो शास्त्र आदि देखने से अगले संस्कारों की स्मृति आ जाती है। तो बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं मैं फिर से 5 हजार वर्ष बाद तुमको वही राजयोग सिखाने आया हूँ। कृष्ण ने कोई राजयोग नहीं सिखाया है। उन्होंने तो प्रालब्ध भोगी है। 8 जन्म सूर्यवंशी, 12 जन्म चन्द्रवंशी फिर 63 जन्म वैश्य, शूद्र वंशी बनें। अभी सबका यह अन्तिम जन्म है। यह कृष्ण की आत्मा भी सुनती है। तुम भी सुनते हो। यह है संगमयुगी ब्राह्मणों का वर्ण। फिर तुम ब्राह्मण से जाकर देवता बनेंगे। ब्राह्मण धर्म, सूर्यवंशी देवता धर्म और चन्द्रवंशी क्षत्रिय धर्म तीनों का स्थापक एक ही परमपिता परमात्मा है। तो तीनों का शास्त्र भी एक होना चाहिए। अलग-अलग कोई शास्त्र हैं नहीं। ब्रह्मा इतना बड़ा सभी का बाप है, प्रजापिता। उनका भी कोई शास्त्र है नहीं। एक गीता में ही भगवानुवाच है। ब्रह्मा भगवानुवाच नहीं है। यह है शिव भगवानुवाच ब्रह्मा द्वारा, जिससे शूद्रों को कनवर्ट कर ब्राह्मण बनाया जाता है। ब्राह्मण ही देवता और जो नापास होते हैं, वह क्षत्रिय बन जाते हैं। दो कला कम हो जाती हैं। कितना अच्छी रीति समझाते हैं। ऊंच ते ऊंच है परमपिता परमात्मा फिर ब्रह्मा, विष्णु, शंकर उनको भी पुरुषोत्तम नहीं कहेंगे। जो पुरुषोत्तम बनते हैं, वही फिर कनिष्ट भी बनते हैं। मनुष्यों में सर्वोत्तम हैं लक्ष्मी-नारायण, जिसके मन्दिर भी हैं। परन्तु उनकी महिमा को कोई जानते नहीं हैं। सिर्फ पूजा करते रहते हैं। अब तुम पुजारी से पूज्य बन रहे हो। माया फिर पुजारी बना देती है। ड्रामा ऐसा बना हुआ है। जब नाटक पूरा होता है तभी मुझे आना पड़ता है। फिर वृद्धि होना भी आटोमेटिकली बन्द हो जाता है। फिर तुम बच्चों को आकर अपना-अपना पार्ट रिपीट करना है। यह परमपिता परमात्मा खुद बैठ समझाते हैं, जिसकी जयन्ती भक्तिमार्ग में मनाते हैं। यह तो मनाते ही रहेंगे। स्वर्ग में तो कोई की भी जयन्ती नहीं मनाते हैं। कृष्ण, राम आदि की भी जयन्ती नहीं मनायेंगे। वह तो खुद प्रैक्टिकल में होंगे। यह तो होकर गये हैं, तब मनाते हैं। वहाँ वर्ष-वर्ष कृष्ण का बर्थ डे नहीं मनायेंगे। वहाँ तो सदैव खुशियां हैं ही, बर्थ डे क्या मनायेंगे। बच्चे का नाम तो मात-पिता ही रखते होंगे। गुरू तो वहाँ होता नहीं। वास्तव में इन बातों का ज्ञान और योग से कोई कनेक्शन नहीं है। बाकी वहाँ की रसम क्या है, सो पूछना होता है, या तो बाबा कह देंगे वहाँ के कायदे जो होंगे वह चल पड़ेंगे, तुमको पूछने की क्या दरकार है। पहले मेहनत कर अपना पद तो प्राप्त कर लो। लायक तो बनो, फिर पूछना। ड्रामा में कोई न कोई कायदा होगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपने को निराकार आत्मा समझ निराकार बाप को याद करना है। किसी भी देहधारी को नहीं। मरजीवा बन पुरानी बातों को बुद्धि से भूल जाना है।

2) बाप के रचे हुए इस रूद्र यज्ञ में सम्पूर्ण स्वाहा होना है। शूद्रों को ब्राह्मण धर्म में कनवर्ट करने की सेवा करनी है।

वरदान:-अपनी विल पावर द्वारा हर एक को विल कराने वाले श्रेष्ठ सेवाधारी भव 
वर्तमान समय कई आत्मायें आपके सहयोग के लिए चात्रक हैं लेकिन अपनी शक्ति नहीं है। उन्हें आपको अपने शक्तियों की मदद विशेष देनी पड़ेगी इसलिए निमित्त बने हुए सेवाधारियों में सर्व शक्तियों की पावर चाहिए। जैसे ब्रह्मा बाप ने लास्ट में बच्चों को शक्तियों की विल की, उस विल से यह कार्य चल रहा है, ऐसे फालो फादर। अपने शक्तियों की विल आत्माओं के प्रति करो तो समय के प्रमाण सेवा सम्पन्न हो जायेगी।
स्लोगन:-जहाँ एकता और एकाग्रता की शक्ति है वहाँ सफलता सहज प्राप्त होती है।

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