dainik gyan murli hindi

Daily Murli Brahma Kumaris 25 may 2017 – Bk Murli Hindi

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25/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हारा प्यार आत्मा से होना चाहिए, चलते-फिरते अभ्यास करो, मैं आत्मा हूँ, आत्मा से बात करता हूँ, मुझे कोई बुरा काम नहीं करना है।”
प्रश्नः-बाप द्वारा रचा हुआ यज्ञ जब तक चल रहा है तब तक ब्राह्मणों को बाप का कौन सा फरमान जरूर पालन करना है?
उत्तर:-बाप का फरमान है – बच्चे जब तक यह रूद्र यज्ञ चल रहा है तब तक तुम्हें पवित्र जरूर रहना है। तुम ब्रह्मा के बच्चे ब्रह्माकुमार कुमारी कभी विकार में नहीं जा सकते। अगर कोई इस फरमान की अवज्ञा करते हैं तो बहुत कड़े दण्ड के भागी बन जाते हैं। अगर किसी में क्रोध का भी भूत है तो वह ब्राह्मण नहीं। ब्राह्मणों को देही-अभिमानी रहना है, कभी विकार के वशीभूत नहीं होना है।
गीत:-ओ दूर के मुसाफिर …

 

ओम् शान्ति। दूर के मुसाफिर को तुम ब्राह्मणों के बिगर कोई भी मनुष्य मात्र जानते नहीं हैं, बुलाते हैं हे परमधाम में निवास करने वाले परमपिता परमात्मा आओ। पिता कहते हैं परन्तु बुद्धि में नहीं आता है कि पिता का रूप क्या है? आत्मा क्या है? भल समझते हैं आत्मा भ्रकुटी के बीच सितारे समान रहती है। बस और कुछ नहीं जानते। हमारी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। इन बातों का कुछ भी ज्ञान नहीं है। आत्मा इस शरीर में कैसे प्रवेश करती है, यह भी नहीं जानते हैं। जब अन्दर चुर-पुर होती है तब पता पड़ता है कि आत्मा ने प्रवेश किया। फिर जब परमपिता परमात्मा कहते हैं तो यह भी आत्मा ही पिता कहती है। आत्मा जानती है यह शरीर लौकिक पिता का है। हमारा बाप तो वह निराकार है। जरूर हमारा बाप भी हमारे जैसा बिन्दी स्वरूप होगा। उनकी महिमा भी गाते हैं – मनुष्य सृष्टि का बीजरूप, ज्ञान सागर, पतित-पावन है। परन्तु कितना बड़ा वा छोटा है, यह सबकी बुद्धि में नहीं बैठता है। पहले तुम्हारी बुद्धि में भी नहीं था कि हमारी आत्मा क्या है। भल परमात्मा को याद करते थे कि हे परमपिता… परन्तु कुछ भी जानते नहीं थे। बाप तो निराकार है फिर वह पतित-पावन कैसे ठहरा। क्या जादू लगाते हैं? पतितों को पावन बनाने जरूर यहाँ आना पड़ता है। जैसे हमारी आत्मा भी शरीर में रहती है वैसे बाप भी निराकार है उनको भी जरूर शरीर में आना पड़े, तब तो शिवरात्रि अथवा शिव जयन्ती मनाते हैं। परन्तु वह पावन कैसे आकर बनाते हैं, यह कोई भी जानते नहीं हैं, इसलिए कह देते हैं सर्वव्यापी। प्रदर्शनी में अथवा कहाँ भी भाषण आदि करने जाओ तो पहले-पहले बाप की ही पहचान देनी है, फिर आत्मा की। आत्मा तो भ्रकुटी के बीच रहती है। उसमें ही सारे संस्कार रहते हैं। शरीर तो खलास हो जाता है। जो कुछ करती है वह आत्मा ही करती है। शरीर के आरगन्स आत्मा के आधार पर ही चलते हैं। आत्मा रात को अशरीरी हो जाती है। आत्मा ही कहती है आज मैंने आराम बहुत अच्छा किया है। आज मुझे आराम नहीं आया। मैं इस शरीर द्वारा यह धन्धा करता हूँ। यह तुम बच्चों को आदत पड़ जानी चाहिए। आत्मा ही सब कुछ करती है। आत्मा शरीर से निकल जाती है तो उनको मुर्दा कहा जाता है। कोई काम का नहीं रहता है। आत्मा निकलने से शरीर में जैसे बांस हो जाती है। शरीर को जाकर जलाते हैं। तो तुम्हारा आत्मा के साथ ही प्यार है। तुम बच्चों को यह शुद्ध अभिमान होना चाहिए कि मैं आत्मा हूँ। पूरा आत्म-अभिमानी बनना है। मेहनत सारी इसमें ही है। मुझ आत्मा को इन आरगन्स द्वारा कोई भी बुरा काम नहीं करना चाहिए। नहीं तो सजा खानी पड़ेगी। भोगना भी तब भोगी जाती है जब आत्मा को शरीर है। बिगर शरीर आत्मा दु:ख भोग न सके। तो पहले आत्म-अभिमानी फिर परमात्म-अभिमानी बनना है। मैं परमपिता परमात्मा की सन्तान हूँ। कहते भी हैं कि परमात्मा ने हमको पैदा किया है। वह रचयिता है परन्तु वह रचता कैसे है, कोई भी नहीं जानते हैं। अभी तुम जानते हो कि परमपिता परमात्मा नई दुनिया की कैसे स्थापना करते हैं, पुरानी दुनिया में रहते हैं। देखो कैसी युक्ति है। उन्होंने तो प्रलय दिखा दी। कहते हैं पीपल के पत्ते पर एक बालक आया फिर बालकी तो दिखाते नहीं। इसको कहा जाता है अज्ञान। कहते हैं भगवान ने शास्त्र बनाये। व्यास भगवान तो हो न सके। भगवान शास्त्र बैठ लिखते हैं क्या? उनके लिए तो गाया हुआ है वह सब शास्त्रों का सार समझाते हैं। बाकी इन वेद शास्त्र पढ़ने से कोई का कल्याण नहीं हो सकता। समझो ब्रह्म ज्ञानी हैं। समझते हैं ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। ब्रह्म तो महतत्व है। आत्मायें वहाँ रहती हैं। यह न जानने कारण जो आता है सो बोलते रहते हैं और मनुष्य भी सत-सत करते रहते हैं। बहुत ही हठयोग, प्राणायाम आदि करते हैं, तुम तो कर न सको। तुम नाज़ुक कन्याओं, माताओं को क्या तकलीफ देंगे। पहले तो मातायें राज विद्या भी नहीं पढ़ती थी। थोड़ी सी भाषा सीखने के लिए स्कूल में भेजा जाता था। बाकी नौकरी तो करनी नहीं है। अभी तो माताओं को पढ़ना पड़ता है। कमाई करने वाला न हो तो अपने पैरों पर खड़ी हो सके, भीख न लेनी पड़े। नहीं तो कायदे अनुसार बच्चियों को घर का काम सिखाया जाता है। अब तो बैरिस्टरी, डॉक्टरी आदि सीखती रहती हैं। यहाँ तो तुमको और कुछ करना नहीं है, सिर्फ पहले-पहले कोई को भी बाप का परिचय देना है। निराकार को तो सभी शिवबाबा कहते हैं, परन्तु उनका रूप क्या है। कोई भी जानते नहीं हैं। ब्रह्म तो तत्व है। जैसे यह आकाश कितना बड़ा है। अन्त नहीं पा सकते। वैसे ब्रह्म तत्व का भी अन्त नहीं है। उनके अंशमात्र में हम आत्मायें रहती हैं। बाकी तो पोलार ही पोलार है। सागर भी अथाह है, चलते जाओ। पोलार का भी अन्त नहीं पा सकते। कोशिश करते हैं ऊपर जाने की परन्तु जाते-जाते उनका सामान ही खुट जाता है। वैसे ही महतत्व भी बहुत बड़ा है। वहाँ जाकर कुछ ढूँढने की दरकार नहीं है। वहाँ आत्माओं को यह विचार करने की भी दरकार नहीं। ढूंढने से फायदा ही क्या होगा। समझो स्टार्स में जाकर दुनिया ढूंढते हैं, परन्तु फायदा ही क्या है? वहाँ कोई बाप को पाने का रास्ता नहीं है। भगत भक्ति करते हैं भगवान को पाने के लिए। तो उनको भगवान मिलता है। वह मुक्ति जीवनमुक्ति देते हैं। ढूँढना भगवान को होता है, न कि पोलार को। जहाँ से कुछ मिलता नहीं। कितना गवर्मेन्ट का खर्चा होता है। यह भी आलमाइटी गवर्मेन्ट है। पाण्डव और कौरव दोनों को ताज नहीं दिखाते हैं। बाप आकर तुमको सब बातें समझाते हैं। जबकि तुम इतनी सब नॉलेज पाते हो तो तुमको बहुत खुश रहना चाहिए। तो हमको पढ़ाने वाला बेहद का बाप है। तुम्हारी आत्मा कहती है हम पहले सो देवी देवता थे। बहुत सुखी थे। पुण्य आत्मा थे। इस समय हम पाप आत्मा बन पड़े हैं क्योंकि यह रावण राज्य है। यह रावण की मत पर हैं। तुम हो ईश्वरीय मत पर। रावण भी गुप्त है तो ईश्वर भी गुप्त है। अभी ईश्वर तुमको मत दे रहे हैं। रावण कैसे मत देते हैं? रावण का कोई रूप तो है नहीं। यह तो रूप धरते हैं। रावण के तो सभी रूप हैं। जानते हैं हमारी आत्मा में 5 विकार हैं। हम आसुरी मत पर चल रहे हैं। मेल फीमेल दोनों में 5 विकार हैं। यह सब बातें मनुष्य की बुद्धि में तब बैठेंगी जब वह जानेंगे कि हमको पढ़ाने वाला निराकार परमपिता परमात्मा है। परमात्मा निराकार है। जब वह साकार में आवे तब तो हम ब्राह्मण बनें। बाप भी रात को ही आता है। शिवरात्रि सो ब्रह्मा की रात्रि हो गई। ब्रह्मा द्वारा ही ब्राह्मण बनेंगे। यज्ञ में ब्राह्मण जरूर चाहिए। ब्राह्मणों को जब तक यज्ञ सम्भालना है तब तक पवित्र रहना है। जिस्मानी ब्राह्मण भी जब यज्ञ रचते हैं तो विकार में नहीं जाते। भल हैं विकारी, परन्तु यज्ञ रचने समय विकार में नहीं जायेंगे। जैसे तीर्थो पर जाते हैं तो जब तक तीर्थो पर रहते हैं तो विकार में नहीं जाते हैं। तुम ब्राह्मण भी यज्ञ में रहते हो फिर अगर कोई विकार में जाते हैं तो बड़े पाप आत्मा बन पड़ते हैं। यज्ञ चल रहा है तो अन्त तक तुमको पवित्र रहना है। ब्रह्मा के बच्चे ब्रह्माकुमार कुमारियाँ कब विकार में नहीं जा सकते। बाप ने फरमान किया है तुम कब विकार में नहीं जाना। नहीं तो बहुत दण्ड के भागी बन जायेंगे। विकार में गया तो सत्यानाश हुई। वह ब्रह्माकुमार कुमारी नहीं, परन्तु शूद्र मलेच्छ है। बाबा हमेशा पूछते हैं तुमने पवित्र रहने की प्रतिज्ञा की है। अगर बाप से प्रतिज्ञा कर ब्राह्मण बन फिर विकार में गये तो चण्डाल का जन्म पायेंगे। यहाँ वेश्या जैसा गन्दा जन्म कोई होता नहीं। यह है ही वैश्यालय। दोनों एक दो को विष पिलाते हैं। बाबा कहते हैं माया भल कितने भी संकल्प लावे परन्तु नंगन नहीं होना है। कई तो जबरदस्ती भी नंगन करते हैं। बच्चियों को ताकत कम रहती है – पवित्रता के साथ चलन भी बहुत अच्छी चाहिए। चलन खराब है तो वह भी काम के नहीं। लौकिक माँ बाप में विकार हैं तो बच्चे भी माँ बाप से ही सीखते हैं। तुमको पारलौकिक बाप तो यह शिक्षा नहीं देते। बाप तो देही-अभिमानी बनाते हैं। कभी क्रोध नहीं करना। उसी समय तुम ब्राह्मण नहीं चण्डाल हो क्योंकि क्रोध का भूत है। भूत मनुष्य को दु:ख देते हैं। बाप कहते हैं ब्राह्मण बनकर कोई शैतानी काम नहीं करना है। विकार में जाने से यज्ञ को तुम अपवित्र बनाते हो, इसमें बड़ी खबरदारी रखनी है। ब्राह्मण बनना कोई मासी का घर नहीं है। यज्ञ में कोई गन्द नहीं करना है। 5 विकारों में से कोई भी विकार न हो। ऐसे नहीं क्रोध किया तो हर्जा नहीं। यह भूत आया तो तुम ब्राह्मण नहीं। कोई कहे यह तो मंजिल बहुत ऊंची है। नहीं चल सकते हो तो जाकर गन्दे बनो। इस ज्ञान में तो सदा पवित्र हर्षित रहना पड़े। पतित-पावन बाप का बच्चा बनकर बाप को मदद देनी है। कोई भी विकार नहीं होना चाहिए। कोई तो आते ही फट से विकारों को छोड़ देते हैं। समझना चाहिए हम रूद्र ज्ञान यज्ञ का ब्राह्मण हूँ। हमारे से ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए जो दिल खाती रहे। दिल रूपी दर्पण में देखना है कि हम लायक हैं? भारत को पवित्र बनाने के हम निमित्त हैं तो योग में भी जरूर रहना है। सन्यासी लोग सिर्फ पवित्र बनते हैं, बाप को तो जानते ही नहीं। हठयोग आदि बहुत करते हैं। पाते कुछ भी नहीं। तुम जानते हो बाप आये हैं – शान्तिधाम में ले जाने लिए। हम आत्मायें वहाँ की निवासी हैं। हम सुखधाम में थे, अब दु:खधाम में हैं। अभी है संगम… यह सिमरण चलता रहे तो भी सदा मुस्कराते रहे। जैसे देखो यह अंगना बच्चा (बैंगलोर का) सदैव मुस्कराते रहते हैं। बाबा कहने से ही खुशी में भरपूर हो जाता है। इनको खुशी है हम बाबा के बच्चे हैं। जो भी मिले उनको ज्ञान देते रहो। हाँ कोई हँसी भी उड़ायेंगे क्योंकि नई बात है कोई भी नहीं जानते कि भगवान आकर पढ़ाते हैं। कृष्ण तो कभी आकर पढ़ाते नहीं हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार :-

1) रूद्र ज्ञान यज्ञ का ब्राह्मण बनकर ऐसा कोई काम नहीं करना है – जो दिल को खाता रहे। कोई भी भूत के वशीभूत नहीं होना है।

2) पतित-पावन बाप का पूरा मददगार बनने के लिए सदा पवित्र और हर्षित रहना है। ज्ञान का सिमरण कर मुस्कराते रहना है।

वरदान:-मन-बुद्धि-संस्कार वा सर्व कर्मेन्द्रियों को नीति प्रमाण चलाने वाले स्वराज्य अधिकारी भव
स्वराज्य अधिकारी आत्मायें अपने योग की शक्ति द्वारा हर कर्मेन्द्रिय को ऑर्डर के अन्दर चलाती हैं। न सिर्फ यह स्थूल कर्मेन्द्रियां लेकिन मन-बुद्धि-संस्कार भी राज्य अधिकारी के डायरेक्शन अथवा नीति प्रमाण चलते हैं। वे कभी संस्कारों के वश नहीं होते लेकिन संस्कारों को अपने वश में कर श्रेष्ठ नीति से कार्य में लगाते हैं, श्रेष्ठ संस्कार प्रमाण सम्बन्ध-सम्पर्क में आते हैं। स्वराज्य अधिकारी आत्मा को स्वप्न में भी धोखा नहीं मिल सकता।
स्लोगन:-निर्माणता की विशेषता को धारण कर लो तो सफलता मिलती रहेगी।

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Daily Murli Brahma Kumaris 24 may 2017 – Bk Murli Hindi

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24/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – जिस बाप को तुमने आधाकल्प याद किया, अब उसका फरमान मिलता है तो उसे पालन करो इससे तुम्हारी चढ़ती कला हो जायेगी”
प्रश्नः-तुम बच्चों को अपनी नेचर-क्योर आपेही करनी है, कैसे?
उत्तर:-एक बाप की याद में रहने और यज्ञ की प्यार से सेवा करने से नेचर-क्योर हो जाती है क्योंकि याद से आत्मा निरोगी बनती है और सेवा से अपार खुशी रहती है। तो जो याद और सेवा में बिजी रहते हैं उनकी नेचर क्योर होती रहती है।
गीत:-तूने रात गंवाई…

 

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। मालायें फेरते-फेरते युग बीते। कितने युग? दो युग। सतयुग त्रेता में तो कोई भी माला नहीं फेरते हैं। कोई की भी बुद्धि में यह नहीं है कि हम ऊंच जाते हैं फिर नीचे आते हैं। हमारी अब चढ़ती कला होती है। हमारी अर्थात् भारत की। जितनी भारतवासियों की चढ़ती कला और उतरती कला होती है उतना और कोई की भी नहीं। भारत ही श्रेष्ठाचारी और भ्रष्टाचारी बनता है। भारत ही निर्विकारी, भारत ही विकारी। और खण्डों वा धर्मों से इतना तैलुक नहीं है। वह कोई हेविन में नहीं आते हैं। भारतवासियों के ही चित्र हैं। बरोबर राज्य करते थे। तो बाप समझाते हैं तुम्हारी अब चढ़ती कला है। जिसका हाथ पकड़ा है वह तुमको साथ ले जायेंगे। हम भारतवासियों की ही चढ़ती कला है। मुक्ति में जाकर फिर जीवनमुक्ति में आयेंगे। आधाकल्प देवी-देवता धर्म का राज्य चलता है। 21 पीढ़ी चढ़ते हैं, फिर उतरती कला हो जाती है। कहते हैं चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला। अब सर्व का भला होता है ना। परन्तु चढ़ती कला और उतरती कला में तुम आते हो। इस समय भारत जितना कर्ज लेता है उतना और कोई नहीं लेते। बच्चे जानते हैं हमारा भारत सोने की चिड़िया था। बहुत साहूकार थे। अभी भारत की उतरती कला पूरी होती है। विद्वान आदि तो समझते हैं कलियुग की आयु अजुन 40 हजार वर्ष चलनी है। बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में हैं। समझाना भी बड़ी युक्ति से है, नहीं तो भगत लोग चमक जाते हैं। पहले-पहले तो परिचय दो बाप का देना है। भगवानुवाच है कि गीता सबका माई बाप है। वर्सा गीता से मिलता है, बाकी सब हैं उनके बच्चे। बच्चों से वर्सा मिल न सके। तुम बच्चों को गीता से वर्सा मिल रहा है ना। गीता माता का फिर पिता भी है। बाइबिल आदि कोई को भी माता नहीं कहेंगे। तो पहले-पहले पूछना ही यह है कि परमपिता परमात्मा से तुम्हारा क्या तैलुक है? सभी का बाप एक है ना। सभी आत्मायें भाई-भाई हैं ना। एक बाप के बच्चे। बाप मनुष्य सृष्टि रचते हैं प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा, तो फिर तुम आपस में भाई-बहन हो जाते हो। तो जरूर पवित्र रहते होंगे। पतित-पावन बाप ही आकर तुमको पावन बनाते हैं युक्ति से। बच्चे जानते हैं पवित्र बनेंगे तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। बहुत भारी आमदनी है। कौन मूर्ख होगा – जो 21 जन्म की बादशाही लेने के लिए पवित्र नहीं बनेंगे। और फिर श्रीमत भी मिलती है। जिस बाप को आधाकल्प याद किया है उसका फरमान तुम नहीं मानेंगे! उनके फरमान पर नहीं चलेंगे तो तुम पाप आत्मा बन जायेंगे। यह दुनिया ही पाप आत्माओं की है। राम राज्य पुण्य आत्माओं की दुनिया थी। अब रावण राज्य पाप आत्माओं की दुनिया है। अभी तुम बच्चों की चढ़ती कला है। तुम विश्व के मालिक बनते हो। कैसे गुप्त बैठे हो। सिर्फ बाप को याद करना है। माला आदि फेरने की कोई बात नहीं। बाप को याद करते तुम काम करो। बाबा आपके यज्ञ की सेवा स्थूल, सूक्ष्म दोनों हम कैसे इकट्ठे करते हैं। बाबा ने फरमान किया है ऐसे याद करो। नेचर-क्योर कराते हैं ना। तुम्हारी आत्मा क्योर होने से शरीर भी क्योर हो जायेगा। सिर्फ बाप की ही याद से तुम पतित से पावन बनते हो। पावन भी बनो और यज्ञ की सेवा भी करते रहो। सर्विस करने में बड़ी खुशी होगी। हमने इतना समय बाप की याद में रह अपने को निरोगी बनाया अथवा भारत को शान्ति का दान दिया। भारत को तुम शान्ति और सुख का दान देते हो श्रीमत पर। दुनिया में आश्रम तो ढेर हैं। परन्तु वहाँ कुछ भी है नहीं। उनको यह पता नहीं कि 21 पीढ़ी स्वर्ग का राज्य कैसे मिलता है।

तुम अभी राजयोग की पढ़ाई करते हो। वो लोग भी कहते रहते हैं कि गॉड फादर आ गया है। कहाँ है जरूर। सो तो जरूर होगा ना। विनाश के लिए बाम्ब्स भी निकल चुके हैं। जरूर बाप ही हेविन की स्थापना, हेल का विनाश कराते होंगे। यह तो नर्क है ना। कितनी लड़ाई मारामारी आदि हैं। बहुत डर है। बच्चों को कैसे भगाकर ले जाते हैं। कितने उपद्रव होते हैं। अभी तुम जानते हो कि यह दुनिया बदल रही है। कलियुग बदल फिर सतयुग हो रहा है। हम सतयुग की स्थापना में बाबा के मददगार हैं। ब्राह्मण ही मददगार होते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा से ब्राह्मण पैदा होते हैं। वह हैं कुख वंशावली, तुम हो मुखवंशावली। वह ब्रह्मा की सन्तान तो हो न सकें। तुमको एडाप्ट किया जाता है। तुम ब्राह्मण हो-ब्रह्मा की औलाद। प्रजापिता ब्रह्मा तो संगम पर ही हो सकता है। ब्राह्मण सो फिर देवी-देवता बनते हैं। तुम उन ब्राह्मणों को भी समझा सकते हो कि तुम कुख वंशावली हो। कहते हो ब्राह्मण देवी देवताए नम:। ब्राह्मणों को भी नमस्ते, देवताओं को भी नमस्ते करते हैं। परन्तु ब्राह्मणों को नमस्ते तब करें जबकि अभी हों। समझते हैं यह ब्राह्मण लोग हैं, तन-मन-धन से बाबा की श्रीमत पर चलते हैं। वह ब्राह्मण जिस्मानी यात्रा पर ले जाते हैं। यह तुम्हारी है रूहानी यात्रा। तुम्हारी यात्रा कितनी मीठी है। वह जिस्मानी यात्रायें तो ढेर हैं। गुरू लोग भी ढेर हैं। सबको गुरू कह देते। अभी तुम बच्चे जानते हो हम मीठे शिवबाबा की मत पर चल उनसे वर्सा ले रहे हैं ब्रह्मा द्वारा। वर्सा शिवबाबा से लेते हैं। तुम यहाँ आते हो तो फट से पूछता हूँ – किसके पास आये हो? बुद्धि में है यह शिवबाबा का लोन लिया हुआ रथ है। हम उनके पास जाते हैं। सगाई ब्राह्मण लोग कराते हैं। परन्तु कनेक्शन सजनी साजन का आपस में होता है, न कि सगाई कराने वाले ब्राह्मण से। स्त्री पति को याद करती है या हथियाला बांधने वाले को याद करती है? तुम्हारा भी साजन है शिव। फिर किसी देहधारी को तुम क्यों याद करते हो? याद करना है शिव को। यह लॉकेट आदि भी बाबा ने बनवाये हैं समझाने के लिए। बाबा खुद ही दलाल बन सगाई कराते हैं। तो दलाल को याद नहीं करना है। सज़नियों का योग साजन के साथ है। मम्मा बाबा आकर तुम बच्चों द्वारा मुरली सुनाते हैं, बाबा कहते हैं बहुत ऐसे बच्चे हैं जिनकी भ्रकुटी के बीच हम बैठ मुरली चलाता हूँ – कल्याण करने अर्थ। कोई को साक्षात्कार कराने, मुरली सुनाने, कोई का कल्याण करने आता हूँ। ब्राह्मणियों में इतनी ताकत नहीं, जानता हूँ इनको यह ब्राह्मणी उठा नहीं सकेगी तो मैं ऐसा तीर लगाता हूँ जो वह ब्राह्मणी से भी तीखा जाये। ब्राह्मणी समझती हैं इनको हमने समझाया। देह-अभिमान में आ जाते हैं। वास्तव में यह अहंकार भी नहीं आना चाहिए। सब कुछ शिवबाबा करने वाला है। यहाँ तो तुमको कहते हैं बाबा को याद करो। कनेक्शन शिवबाबा से होना चाहिए। यह तो बीच में दलाल है, इनको उसका एवजा मिल जाता है। फिर भी यह वृद्ध अनुभवी तन है। यह बदल नहीं सकता। ड्रामा में नूंध है। ऐसे नहीं दूसरे कल्प में दूसरे के तन में आयेंगे। नहीं, जो लास्ट में है उनको ही फिर पहले जाना है। झाड़ में देखो पिछाड़ी में खड़े हैं ना। अभी तुम संगम पर बैठे हो। बाबा ने इस प्रजापिता ब्रह्मा में प्रवेश किया है। जगत अम्बा है कामधेनु और कपिलदेव भी कहते हैं। कपल अर्थात् जोड़ी, बाप-दादा मात-पिता, यह कपल जोड़ी हुई ना। माता से वर्सा नहीं मिलेगा। वर्सा फिर भी शिवबाबा से मिलता है। तो उनको याद करना पड़े। मैं आया हूँ तुमको ले जाने इनके द्वारा। ब्रह्मा भी शिवबाबा को याद करते हैं। शंकर के आगे भी शिव का चित्र रखते हैं। यह सब हैं महिमा के लिए। इस समय तो शिवबाबा आकर अपना बच्चा बनाते हैं। फिर तुम बाप को बैठ थोड़ेही पूजेंगे। बाप आकर बच्चों को गुल-गुल बनाते हैं। गटर से निकालते हैं। फिर प्रतिज्ञा भी करते हैं हम कभी पतित नहीं बनेंगे। बाप कहते हैं गोद लेकर फिर काला मुंह नहीं करना। अगर किया तो कुल कलंकित बन पड़ेंगे। हारने से उस्ताद का नाम बदनाम कर देंगे। माया से हारे तो पद भ्रष्ट हो पड़ेगा। और कोई सन्यासी आदि यह बातें नहीं सिखलाते हैं। कोई हैं जो कहेंगे मास में एक बार विकार में जाओ। कोई कहते 6 मास में एक बार जाओ। कोई तो बहुत अजामिल होते हैं। बाबा ने तो बहुत गुरू किये हुए हैं। वह ऐसे कभी नहीं कहेगे कि पवित्र बनो। समझते हैं हम ही नहीं रह सकते हैं। सेन्सीबुल जो होगा, वह झट कहेगा तुम ही नहीं रह सकते हो, हमको कैसे कहते हो। फिर भी कहते हैं जनक मिसल सेकेण्ड में जीवनमुक्ति का रास्ता बताओ। फिर गुरू लोग कहते हैं – ब्रह्म को याद करो तो तुम निर्वाणधाम में जायेंगे। जाते तो कोई नहीं हैं, ताकत ही नहीं। सर्व आत्माओं के रहने का स्थान है मूलवतन, जहाँ हम आत्मायें स्टार मिसल रहती हैं। यह पूजा के लिए बड़ा लिंग बनाते हैं। बिन्दी की पूजा कैसे होगी? कहते भी हैं भ्रकुटी के बीच चमकता है अजब सितारा। तो आत्मा का बाप भी ऐसे होगा ना। बाप को देह नहीं है। उस स्टार की पूजा कैसे हो सकती। बाप को परम आत्मा कहा जाता है। वह तो फादर है। जैसे आत्मा है वैसे परमात्मा है। वह कोई बड़ा नहीं है। उनमें यह नॉलेज है। इस बेहद के झाड़ को और कोई भी नहीं जानते हैं। बाप ही नॉलेजफुल है। ज्ञान में भी फुल है, पवित्रता में भी फुल है। सर्व का सद्गति दाता है। सर्व को सुख-शान्ति देने वाला। तुम बच्चों को कितना भारी वर्सा मिलता है और कोई को मिल न सके। मनुष्य तो कितना गुरू को पूजते हैं। अपने बादशाह को भी इतना नहीं पूजते हैं। तो यह सब अन्धश्रद्धा है ना। क्या-क्या करते रहते हैं। सबमें ग्लानी ही ग्लानी है। कृष्ण को लार्ड भी कहते हैं तो गॉड भी कहते हैं। गॉड कृष्णा हेविन का पहला प्रिन्स, लक्ष्मी-नारायण के लिए भी कहते हैं यह दोनों गॉड-गॉडेज हैं। पुराने-पुराने चित्रों को बहुत खरीद करते हैं। पुरानी-पुरानी स्टेम्प्स भी बिकती हैं ना। वास्तव में सबसे पुराना तो शिवबाबा है ना। परन्तु किसको पता नहीं। महिमा सारी शिवबाबा की है। वह चीज़ तो मिल न सके। पुराने ते पुरानी चीज़ कौन सी है? नम्बरवन शिवबाबा। कोई भी समझ नहीं सकते कि हमारा फादर कौन है? उनका नाम रूप क्या है? कह देते उनका कोई नाम रूप नहीं है, तब पूजते किसको हो? शिव नाम तो है ना। देश भी है, काल भी है। खुद कहते हैं मैं संगम पर आता हूँ। आत्मा शरीर द्वारा बोलती है ना। अभी तुम बच्चे समझते हो शास्त्रों में कितनी दन्त कथायें लगा दी हैं, जिससे उतरती कला हो गई है। चढ़ती कला सतयुग त्रेता, उतरती कला द्वापर कलियुग। अब फिर चढ़ती कला होगी। बाप बिगर कोई चढ़ती कला बना न सके। यह सब बातें धारण करनी होती हैं। तो कोई भी काम आदि करते याद में रहना है। जैसे श्रीनाथ द्वारे में मुँह को कपड़ा बांध काम करते हैं। श्रीनाथ कृष्ण को कहते हैं। श्रीनाथ का भोजन बनता है ना। शिवबाबा तो भोजन आदि नहीं खाते हैं। तुम पवित्र भोजन बनाते हो तो याद में रह बनाना चाहिए, तो उससे बल मिलेगा। कृष्ण लोक में जाने के लिए व्रत नेम आदि रखते हैं। अभी तुम जानते हो हम कृष्णपुरी में जा रहे हैं इसलिए तुमको लायक बनाया जाता है। तुम बाप को याद करते तो फिर बाबा गैरन्टी करते हैं तुम कृष्णपुरी में जरूर जायेंगे। तुम जानते हो हम अपने लिए कृष्णपुरी स्थापन कर रहे हैं फिर हम ही राज्य करेंगे। जो श्रीमत पर चलेंगे वह कृष्णपुरी में आयेंगे। लक्ष्मी-नारायण से भी अधिक कृष्ण का नाम बाला है। कृष्ण छोटा बच्चा है तो महात्मा के समान है। बाल अवस्था सतोप्रधान है इसलिए कृष्ण का नाम जास्ती है। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपना पूरा कनेक्शन एक शिवबाबा से रखना है। कभी किसी भी देहधारी को याद नहीं करना है। कभी अपने उस्ताद (बाप) का नाम बदनाम नहीं करना है।

2) अपने द्वारा यदि किसी का कल्याण होता है, तो मैंने इसका कल्याण किया, इस अहंकार में नहीं आना है। यह भी देह-अभिमान है। कराने वाले बाप को याद करना है।

वरदान:-निमित्त पन की स्मृति से हर पेपर में पास होने वाले एवररेडी, नष्टोमोहा भव
एवररेडी का अर्थ ही है – नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप। उस समय कोई भी संबंधी अथवा वस्तु याद न आये। किसी में भी लगाव न हो, सबसे न्यारा और सबका प्यारा। इसका सहज पुरुषार्थ है निमित्त भाव। निमित्त समझने से “निमित्त बनाने वाला” याद आता है। मेरा परिवार है, मेरा काम है – नहीं। मैं निमित्त हूँ। इस निमित्त पन की स्मृति से हर पेपर में पास हो जायेंगे।
स्लोगन:-ब्रह्मा बाप के संस्कार को अपना संस्कार बनाना ही फालो फादर करना है।

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