shiv baba murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 8 AUGUST 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 8 August 2020

Murli Pdf for Print : – 

08-08-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – जैसे बाप गाइड है, ऐसे गाइड बन सबको घर का रास्ता बताना है, अंधों की लाठी बनना है”
प्रश्नः-इस बने-बनाये अनादि ड्रामा का राज़ कौन सा है, जो तुम बच्चे ही जानते हो?
उत्तर:-यह बना बनाया अनादि ड्रामा है इसमें न तो कोई एक्टर एड हो सकता है, न कोई कम हो सकता है। मोक्ष किसी को भी मिलता नहीं। कोई कहे कि हम इस आवागमन के चक्र में आयें ही नहीं। बाबा कहते हाँ कुछ समय के लिए। लेकिन पार्ट से कोई बिल्कुल छूट नहीं सकते। यह ड्रामा का राज़ तुम बच्चे ही जानते हो।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे यह जानते हैं कि भोलानाथ किसको कहा जाता है। तुम संगमयुगी बच्चे ही जान सकते हो, कलियुगी मनुष्य रिंचक भी नहीं जानते। ज्ञान का सागर एक बाप है, वही सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान समझाते हैं। अपनी पहचान देते हैं। तुम बच्चे अभी समझते हो, आगे कुछ नहीं जानते थे। बाप कहते हैं मैं ही आकर भारत को स्वर्ग बनाता हूँ, बेहद का वर्सा देता हूँ। जो तुम अभी ले रहे हो। जानते हैं हम बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा ले रहे हैं। यह बना बनाया ड्रामा है, एक भी एक्टर न एड हो सकता, न कम हो सकता है। सभी को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। मोक्ष को पा नहीं सकते। जो-जो जिस धर्म का है फिर उस धर्म में जाने वाले हैं। बौद्धी वा क्रिश्चियन आदि इच्छा करें हम स्वर्ग में जायें, परन्तु जा नहीं सकते। जब उनका धर्म स्थापक आता है तब ही उनका पार्ट है। यह तुम बच्चों की बुद्धि में है। सारी दुनिया के मनुष्य मात्र इस समय नास्तिक हैं अर्थात् बेहद के बाप को न जानने वाले हैं। मनुष्य ही जानेंगे ना। यह नाटकशाला मनुष्यों की है। हर एक आत्मा निर्वाणधाम से आती है पार्ट बजाने। फिर पुरूषार्थ करती है निर्वाणधाम में जाने के लिए। कहते हैं बुद्ध निर्वाण गया। अब बुद्ध का शरीर तो नहीं गया, आत्मा गई। परन्तु बाप समझाते हैं, जाता कोई भी नहीं है। नाटक से निकल ही नहीं सकते। मोक्ष पा नहीं सकते। बना-बनाया ड्रामा है ना। कोई मनुष्य समझते हैं मोक्ष मिलता है, इसलिए पुरूषार्थ करते रहते हैं। जैसे जैनी लोग पुरूषार्थ करते रहते हैं, उनकी अपनी रस्म-रिवाज है, उनका अपना गुरू है, जिसको मानते हैं। बाकी मोक्ष किसको भी मिलता नहीं है। तुम तो जानते हो हम पार्टधारी हैं, इस ड्रामा में। हम कब आये, फिर कैसे जायेंगे, यह किसको भी पता नहीं है। जानवर तो नहीं जानेंगे ना। मनुष्य ही कहते हैं हम एक्टर्स पार्टधारी हैं। यह कर्मक्षेत्र है, जहाँ आत्मायें रहती हैं। उनको कर्मक्षेत्र नहीं कहा जाता। वह तो निराकारी दुनिया है। उसमें कोई खेलपाल नहीं है, एक्ट नहीं। निराकारी दुनिया से साकारी दुनिया में आते हैं पार्ट बजाने, जो फिर रिपीट होता रहता है। प्रलय कभी होती ही नहीं। शास्त्रों में दिखाते हैं – महाभारत लड़ाई में यादव और कौरव मर गये, बाकी 5 पाण्डव बचे, वह भी पहाड़ों पर गल मरे। बाकी कुछ रहा नहीं। इससे समझते हैं प्रलय हो गई। यह सब बातें बैठ बनाई हैं, फिर दिखाते हैं समुद्र में पीपल के पत्ते पर एक बच्चा अंगूठा चूसता आया। अब इनसे फिर दुनिया कैसे पैदा होगी। मनुष्य जो कुछ सुनते हैं वह सत-सत करते रहते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो कि शास्त्रों में भी क्या-क्या लिख दिया है। यह सब हैं भक्ति मार्ग के शास्त्र। भक्तों को फल देने वाला एक भगवान बाप ही है। कोई मुक्ति में, कोई जीवनमुक्ति में चले जायेंगे। हर एक पार्टधारी आत्मा का जब पार्ट आयेगा तब फिर आयेगी। यह ड्रामा का राज़ सिवाए तुम बच्चों के और कोई नहीं जानते। कहते हैं हम रचता और रचना को नहीं जानते। ड्रामा के एक्टर्स होकर और ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त, ड्युरेशन आदि को न जानें तो बेसमझ कहेंगे ना। समझाने से भी समझते नहीं। 84 लाख समझने कारण ड्युरेशन भी लाखों वर्ष दे देते हैं।

अभी तुम समझते हो बाबा हम आपसे कल्प-कल्प आकर स्वर्ग की बादशाही लेते हैं। 5 हज़ार वर्ष पहले भी आपसे मिले थे, बेहद का वर्सा लेने। यथा राजा-रानी तथा प्रजा सब विश्व के मालिक बनते हैं। प्रजा भी कहेगी हम विश्व के मालिक हैं। तुम जब विश्व के मालिक बनते हो, उस समय चन्द्रवंशी राज्य नहीं होता है। तुम बच्चे ड्रामा के सारे आदि-मध्य-अन्त को जानते हो। मनुष्य भक्ति मार्ग में जिसकी पूजा करते हैं उनको भी जानते नहीं। जिसकी भक्ति करनी होती है तो उनकी बायोग्राफी को भी जानना चाहिए। तुम बच्चे अभी सबकी बायोग्राफी जानते हो बाप के द्वारा। तुम बाप के बने हो। बाप की बायोग्राफी का पता है। वह बाप है पतित-पावन, लिबरेटर, गाइड। तुमको कहते हैं पाण्डव। तुम सबके गाइड बनते हो, अन्धों की लाठी बनते हो सबको रास्ता बताने के लिए। यथा बाप गाइड तथा तुम बच्चों को भी बनना है। सबको रास्ता बताना है। तुम आत्मा, वह परमात्मा है, उनसे बेहद का वर्सा मिलता है। भारत में बेहद का राज्य था, अब नहीं है। तुम बच्चे जानते हो हम बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा लेते हैं अर्थात् मनुष्य से देवता बनते हैं। हम ही देवतायें थे फिर 84 जन्म लेकर शूद्र बने हैं। बाप आकर शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। यज्ञ में ब्राह्मण जरूर चाहिए। यह है ज्ञान यज्ञ, भारत में यज्ञ बहुत रचते हैं। इसमें खास आर्य समाजी बहुत यज्ञ करते हैं। अब यह तो है रूद्र ज्ञान यज्ञ, जिसमें सारी पुरानी दुनिया स्वाहा होनी है। अब बुद्धि से काम लेना पड़ता है। कलियुग में तो बहुत मनुष्य हैं, इतनी सारी पुरानी दुनिया खलास हो जायेगी। कोई भी चीज काम में नहीं आनी है। सतयुग में तो फिर सब कुछ नया होगा। यहाँ तो कितना गन्द है। मनुष्य कैसे गन्दे रहते हैं। धनवान बड़े अच्छे महलों में रहते हैं। गरीब तो बिचारे गन्द में, झोपड़ियों में पड़े हैं। अब इन झोपड़ियों को डिस्ट्राय करते रहते हैं। उनको दूसरी जगह दे वह जमीन फिर बेचते रहते हैं। नहीं उठते तो जबरदस्ती उठाते हैं। गरीब दु:खी बहुत हैं, जो सुखी हैं वह भी स्थाई सुखी नहीं। अगर सुख होता तो क्यों कहते कि यह काग विष्टा समान सुख है।

शिव भगवानुवाच, हम इन माताओं के द्वारा स्वर्ग के द्वार खोल रहे हैं। माताओं पर क्लष रखा है। वह फिर सबको ज्ञान अमृत पिलाती हैं। परन्तु तुम्हारा है प्रवृत्ति मार्ग। तुम हो सच्चे-सच्चे ब्राह्मण, तो सबको ज्ञान चिता पर बिठाते हो। अभी तुम बनते हो दैवी सम्प्रदाय। आसुरी सम्प्रदाय अर्थात् रावण राज्य। गांधी भी कहते थे राम राज्य हो। बुलाते हैं हे पतित-पावन आओ परन्तु अपने को पतित समझते थोड़ेही हैं। बाप बच्चों को सुजाग करते हैं, तुम घोर अन्धियारे से सोझरे में आये हो। मनुष्य तो समझते हैं गंगा स्नान करने से पावन बन जायेंगे। ऐसे ही गंगा में हरिद्वार का सारा किचड़ा पड़ता है। कहाँ फिर वह किचड़ा सारा खेती में ले जाते हैं। सतयुग में ऐसे काम होते नहीं। वहाँ तो अनाज ढेर के ढेर होता है। पैसा थोड़ेही खर्च करना पड़ता है। बाबा अनुभवी है ना। पहले कितना अनाज सस्ता था। सतयुग में बहुत थोड़े मनुष्य हैं हर चीज़ सस्ती रहती है। तो बाप कहते हैं – मीठे बच्चे, अभी तुमको पतित से पावन बनना है। युक्ति बहुत सहज बताते हैं, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। आत्मा में ही खाद पड़ने से मुलम्मे की बन गई है। जो पारसबुद्धि थे वही अब पत्थरबुद्धि बने हैं। तुम बच्चे अभी बाप के पास पत्थरनाथ से पारसनाथ बनने आये हो। बेहद का बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं, सो भी गोल्डन एजेड विश्व का। यह है आइरन एजेड विश्व। बाप बैठ बच्चों को पारसपुरी का मालिक बनाते हैं। तुम जानते हो यहाँ के इतने महल माड़ियाँ आदि कोई काम में नहीं आयेंगे। सब खत्म हो जायेंगे। यहाँ क्या रखा है! अमेरिका के पास कितना सोना है! यहाँ तो थोड़ा बहुत सोना जो माताओं के पास है, वह भी लेते रहते हैं क्योंकि उनको तो कर्ज में सोना देना है। तुम्हारे पास वहाँ सोना ही सोना होता है। यहाँ कौड़ियाँ, वहाँ हीरे होंगे। इनको कहा जाता है आइरन एज। भारत ही अविनाशी खण्ड है, कभी विनाश नहीं होता। भारत है सबसे ऊंच ते ऊंच। तुम मातायें सारे विश्व का उद्धार करती हो। तुम्हारे लिए जरूर नई दुनिया चाहिए। पुरानी दुनिया का विनाश चाहिए। कितनी समझने की बातें हैं। शरीर निर्वाह अर्थ धन्धा आदि भी करना है। छोड़ना कुछ भी नहीं है। बाबा कहते हैं सब कुछ करते हुए मुझे याद करते रहो। भक्ति मार्ग में भी तुम मुझ माशूक को याद करते आये हो कि हमको आकर सांवरे से गोरा बनाओ। उनको मुसाफिर कहा जाता है। तुम सब मुसाफिर हो ना। तुम्हारा घर वह है, जहाँ सब आत्मायें रहती हैं।

तुम सबको ज्ञान चिता पर बिठाते हो। सब हिसाब-किताब चुक्तू कर जाने वाले हैं। फिर नयेसिर तुम आयेंगे, जितना याद में रहेंगे उतना पवित्र बनेंगे और ऊंच पद पायेंगे। माताओं को तो फुर्सत रहती है। मेल्स की बुद्धि धन्धे आदि तरफ चक्र लगाती रहती है, इसलिए बाप ने कलष भी माताओं पर रखा है। यहाँ तो स्त्री को कहते हैं कि पति ही तुम्हारा ईश्वर गुरू सब कुछ है। तुम उनकी दासी हो। अभी फिर बाप तुम माताओं को कितना ऊंच बनाते हैं। तुम नारियाँ ही भारत का उद्धार करती हो। कोई-कोई बाबा से पूछते हैं – आवागमन से छूट सकते हैं? बाबा कहते हैं – हाँ, कुछ समय के लिए। तुम बच्चे तो आलराउन्ड आदि से अन्त तक पार्ट बजाते हो। दूसरे जो हैं वह मुक्तिधाम में रहते हैं। उनका पार्ट ही थोड़ा है। वह स्वर्ग में तो जाने वाले हैं नहीं। आवागमन से मोक्ष उसको कहेंगे जो पिछाड़ी को आये और यह गये। ज्ञान आदि तो सुन न सकें। सुनते वही हैं जो शुरू से अन्त तक पार्ट बजाते हैं। कोई कहते हैं – हमको तो यही पसन्द है। हम वहाँ ही बैठे रहें। ऐसे थोड़ेही हो सकता है। ड्रामा में नूँधा हुआ है, जाकर पिछाड़ी में आयेंगे जरूर। बाकी सारा समय शान्तिधाम में रहते हैं। यह बेहद का ड्रामा है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सच्चा-सच्चा ब्राह्मण बन सबको ज्ञान अमृत पिलाना है। ज्ञान चिता पर बिठाना है।

2) शरीर निर्वाह अर्थ धन्धा आदि सब कुछ करते पतित से पावन बनने के लिए बाप की याद में रहना है और सबको बाप की याद दिलाना है।

वरदान:-निरन्तर याद और सेवा के बैलेन्स से बचपन के नाज़ नखरे समाप्त करने वाले वानप्रस्थी भव
छोटी-छोटी बातों में संगम के अमूल्य समय को गंवाना बचपन के नाज़ नखरे हैं। अब यह नाज़ नखरे शोभते नहीं, वानप्रस्थ में सिर्फ एक ही कार्य रह जाता है – बाप की याद और सेवा। इसके सिवाए और कोई भी याद न आये, उठो तो भी याद और सेवा, सोओ तो भी याद और सेवा – निरन्तर यह बैलेन्स बना रहे। त्रिकालदर्शी बनकर बचपन की बातें वा बचपन के संस्कारों का समाप्ति समारोह मनाओ, तब कहेंगे वानप्रस्थी।
स्लोगन:-सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न आत्मा की निशानी है सन्तुष्टता, सन्तुष्ट रहो और सन्तुष्ट करो।

TODAY MURLI 8 AUGUST 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 8 August 2020

08/08/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence:Sweet children, just as the Father is the Guide, so you must become guides in the same way and show everyone the way home. Become sticks for the blind.
Question:What secret of this eternal, predestined drama do only you children know?
Answer:No actor in the eternal, predestined drama can be added or removed. No one receives eternal liberation. Some say: We don’t want to enter this cycle of coming and going. Baba says: Yes, this is possible for some of the time but no one can be completely freed from playing his part. Only you children know the secret of this drama.

Om shanti. You sweetest children know who is called Bholanath (Innocent Lord). Only you confluence-aged children know Him. Iron-age people don’t know Him even slightly. Only the one Father is the Ocean of Knowledge. He is the One who gives the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world. He gives His own introduction. You children now understand this. Previously, you didn’t know anything. The Father says: I come and make Bharat into heaven; I give you your unlimited inheritance, which you are now claiming. You know that you are now claiming your unlimited inheritance of happiness from the unlimited Father. This drama is predestined; not a single actor can be added or removed. Each one has received his own part. No one can attain eternal liberation. Whatever religion someone belongs to, he will go into that religion again. Although Buddhists and Christians, etc. might desire to go to heaven, they cannot go there. Their parts only begin when the founder of their religion comes. This is in the intellects of you children. At this time, all human beings of the world are atheists; that is, they do not know the unlimited Father. It is only human beings who have to know this, is it not? This is a theatre of human beings. Each soul comes from the land of Nirvana (beyond sound) to play his part. Then, each one makes effort to go back to the land of Nirvana. They say that Buddha went to Nirvana. However, it isn’t the body of Buddha that goes there; it is the soul that goes. The Father explains: No one can go there yet; no one can leave the drama; they cannot attain eternal liberation. This drama is predestined. Some people believe that they can receive eternal liberation, so they continue to make effort; just like the Jains, they continue to make effort. They have their own customs and systems and they have their own guru in whom they believe. However, no one receives eternal liberation. You know that you are all actors in this drama. No one knows when they came or how they will return. Animals would not know this. Human beings say: We are actors who are playing our parts. This is the field of action where souls live. That (soul world) cannot be called the field of action. That is the incorporeal world. There are no fun and games there; there are no acts performed there. You come down from the incorporeal world into the corporeal world to play your parts, which continue to repeat. Annihilation never takes place. The Mahabharat War is portrayed in the scriptures. It is written that the Yadavas and the Kauravas died and that only the five Pandavas remained. Then, even they melted away and died on the mountain and nothing remained. This is the reason they believe that annihilation took place. They sat and made up all of those things. Then they show how a baby came sucking his big toe on a pipal leaf in the sea. Now, how could the world be created through him? Whatever human beings hear, they continue to say: True, true. You children now know that all kinds of things have been written in the scriptures! All of those scriptures belong to the path of devotion. There is only one God, the Father, who gives the fruit of devotion to the devotees. Some have liberation whereas others go into liberation in life. When it is time for the part of each soul (actor) to begin, they will then come down again. No one, except you children, understands the secrets of the drama. It is said: We neither know the Creator nor creation. If those who are the actors in this drama do not know the beginning, middle or end of the drama or its duration etc., they are said to be senseless. Even when you explain to them they don’t understand. Because they believe in 8.4 million births they say that the duration of the cycle is millions of years. You now understand that we come to Baba, cycle after cycle, in order to claim the kingdom of the world. You say: We also met You 5000 years ago to claim our unlimited inheritance. Everyone, kings and queens, as well as the subjects, all become the masters of the world. The subjects also say: We are the masters of the world. The moon-dynasty kingdom doesn’t exist when you become masters of the world. You children know the whole cycle from the beginning, through the middle to the end of the drama. Human beings don’t even know the ones they worship on the path of devotion. They ought to know the biography of those whom they worship. You children have now come to know everyone’s biography from the Father. You now belong to the Father. You know the Father’s biography. The Father is the Purifier, Liberator and Guide. You are called Pandavas. You become guides for everyone. You become sticks for the blind to show everyone the path. Just as the Father is the Guide, so you too have to become the same; you have to show everyone the path. You are souls and He is the Supreme Soul. You receive an unlimited inheritance from Him. There was the unlimited kingdom in Bharat, but it no longer exists. You children know that you claim your inheritance of unlimited happiness from the unlimited Father, that is, you become deities from ordinary human beings. We were deities and then, having taken 84 births, we became shudras. The Father has come to change us from shudras to Brahmins. Brahmins (priests) are definitely needed for a sacrificial fire. This is the sacrificial fire of knowledge. In Bharat they create many sacrificial fires. In this, it is especially the Arya Samajis’ community who create many sacrificial fires. This is the sacrificial fire of Rudra in which the whole of the old world is to be sacrificed. You now have to use your intellects for this. There are many human beings in the iron age. It is such a big, old world and it will all be destroyed. Nothing will be of any use. In the golden age everything will be new. Here, there is so much dirt. Human beings remain very dirty. The wealthy live in very nice palaces. The poor live in filthy conditions, in huts. Those huts are now being destroyed. They are being given other places in which to live, and they (the Government) continue to sell that land. When they don’t leave, they are forced out. The poor suffer a great deal, and those who are happy don’t have permanent happiness. If they did have that happiness, why is it said that happiness is like the droppings of a crow? God Shiva speaks: I am opening the gates to heaven through these mothers. The urn of knowledge is placed on the heads of the mothers. They then distribute the nectar of knowledge to everyone. However, yours is the family path. You are true Brahmins, so you enable everyone to sit on the pyre of knowledge. You are now becoming part of the deity community. The impure community means the kingdom of Ravan. Gandhi used to say that there should be the kingdom of Rama. Although they call out, “O Purifier, come!”, they do not consider themselves to be impure. The Father has awakened you children. From extreme darkness, you have come into total light. Human beings think that they will become pure by bathing in the Ganges. All the waste of Haridwar is dropped into the Ganges. In some places all of that waste is taken to farmland. That does not happen in the golden age. There, there is plenty of grain; there is no need to spend money. Baba is experienced. Previously, grain used to be so cheap. In the golden age, there are very few people and everything is cheap. Therefore, the Father says: Sweet children, you now have to change from impure to pure. He shows you a very easy way: Consider yourselves to be souls and remember the Father. Because alloy was mixed into souls they how become tarnished. Those who had divine intellects have now become ones with stone intellects. You children have now come to the Father to change from lords of stone into lords of divinity. The unlimited Father is making you into the masters of the world and that too of the golden-aged world. This is the iron-aged world. The Father sits here and makes you children into the masters of the divine world. You know that all of the palaces etc. here will be of no use; all of them will be destroyed. What is there here anyway? America has so much gold. Even the little gold here that the mothers have will be taken away because gold has to be used to clear debts. There, you have only gold and more gold. Here, there are shells whereas there, there will be diamonds. This is called the iron age. Bharat is the imperishable land; it is never destroyed. Bharat is the most elevated land of all. You mothers uplift the whole world. A new world is definitely needed for you. The old world has to be destroyed. These matters have to be understood. You also have to work for the livelihood of your bodies. You don’t have to renounce anything. Baba says: While doing everything, continue to remember Me. Even on the path of devotion you used to remember Me, the Beloved. You said: Come and make us beautiful from ugly. He is called the Traveller. You are all travellers, are you not? Your home is there, where all souls reside. You enable everyone to sit on the pyre of knowledge. Having finished all your accounts all of you will return home. You will then come again and start anew. The more you stay in remembrance, the more pure you will become and claim an elevated status. The mothers have time. The intellects of males keep spinning around their business etc. This is why the Father has placed the urn on the heads of the mothers. Here, a wife is told that her husband is her god, her guru, her everything and that she is his servant. The Father now makes you mothers so elevated. It is you women who uplift Bharat. Some ask Baba if it is possible to be freed from this coming and going. Baba says: Yes, for some of the time. However, you children play all-round parts from the beginning to the end. Everyone else stay in the land of liberation. They only have small parts to play; they will not go to heaven. Liberation from the coming and going is only said of those who just come at the end and return straightaway; they cannot listen to knowledge etc. It is those who play their parts from the beginning to the end who listen to this knowledge. Some souls say that they only like it there, that they just want to stay up there. How can that be possible? It is fixed in the drama that, after going there, they definitely come at the end. For the rest of the time, they stay in the land of peace. This drama is unlimited. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost, now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Be a true Brahmin and distribute the nectar of knowledge to everyone. Enable everyone to be seated on the pyre of knowledge.
  2. While doing everything and carrying on with your business etc. for your livelihood, stay in remembrance of the Father in order to change from impure to pure and remind everyone of the Father.
Blessing:May you finish all mischievous games of childhood by constantly keeping a balance of remembrance and service and be in the stage of retirement.
To waste the invaluable time of the confluence age over trivial matters is like playing mischievous games of childhood. Those mischievous games no longer suits you. In the stage of retirement, the only things that remain are remembrance of the Father and service. Apart from these, let nothing else be remembered. When you wake up, there is only remembrance and service and when you go to sleep, there is only remembrance and service. Always keep this balance. Become trikaldarshi and celebrate the completion ceremony of childish matters and sanskars of childhood and you will then be called one in the stage of retirement.
Slogan:The sign of a soul who is full of all attainments is contentment. Remain content and make others content.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 7 AUGUST 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 7 August 2020

07/08/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence:Sweet children, follow shrimat and show everyone the way to attain liberation and liberation-in-life. Continue to do this business throughout the day.
Question:What subtle things has the Father told you which you have to understand very clearly?
Answer:1) The golden age is the land of immortality. There, a soul leaves one costume and takes another. However, there is no mention of death, and this is why that is not called the land of death. 2) Shiv Baba’s creation is unlimited, whereas only you Brahmins are the creation of Brahma at this time. One can say “Trimurti Shiva” but not “Trimurti Brahma”. The Father has explained all of these subtle things to you. Think about all of these things and prepare your own food for your intellect.

Om shanti. Trimurti God Shiva speaks. Those people speak of Trimurti Brahma. The Father says: Trimurti God Shiva speaks. It is not said: Trimurti God Brahma speaks. You can say: Trimurti God Shiva speaks. Those people have mixed Shiva and Shankar together. This is very clear. It is not Trimurti Brahma, but Trimurti God Shiva who speaks. People say that when Shankar opens his eye, destruction takes place. All of that has to be understood with the intellect. Only the three have a main part. Brahma and Vishnu have a big part of 84 births. You have understood the meaning of Vishnu and Prajapita Brahma. Only these three have parts. The name “Brahma” has also been remembered as Adi Dev and Adam. There is a temple to Prajapita. This is the final and 84th birth of Vishnu, that is, of Krishna, who is now named Brahma. Brahma and Vishnu have to be clarified. Brahma is said to have been adopted. Both of them are children of Shiva. Actually, there is only one child. If you look at it, Brahma is the child of Shiva. They are Bap and Dada. There is no mention of Vishnu. Shiv Baba is carrying out establishment through Prajapita Brahma, not through Vishnu. Shiv Baba has children and Brahma Baba also has children, but you cannot say that Vishnu has children, nor can Lakshmi and Narayan have many children. This is food for the intellect. You have to prepare your own food. The longest part can be said to be Vishnu’s. The variety-form image of 84 births that they show belongs to Vishnu, not Brahma. The variety-form image that is created is of Vishnu. Although they mention Prajapita Brahma’s name first, he only has a short part. This is why the variety-form image that is shown is Vishnu’s. Even the four-armed image they have created is of Vishnu. In fact, those ornaments belong to you. These matters have to be understood. No human beings can explain this. The Father continues to explain to you in many new ways. The Father says: To say “Trimurti God Shiva speaks” is right, is it not? Vishnu, Brahma and Shiva: in this, only Prajapita Brahma is the child. Vishnu would not be called the child. Although they speak of creation, the creation would be of Brahma, would it not? The creation then takes in different names and forms. That One’s part is the main one. Brahma’s part at this time is very small. For how long does Vishnu’s kingdom continue? Shiv Baba is the Seed of the whole tree. His creation are called saligrams. Brahma’s creation are called Brahmins. Brahma’s creation isn’t as large as Shiva’s. Shiva’s creation is very large; all souls are His children. Only you Brahmins are Brahma’s creation. You become limited, do you not? Shiv Baba’s creation is of all souls; it is unlimited. He benefits an unlimited number of souls. He establishes heaven through Brahma. You Brahmins then go and reside in heaven. No one else can be called residents of heaven. Everyone else becomes a resident of Nirvana or the land of peace. The highest service is Shiv Baba’s: He takes all souls back with Him. Each one’s part is separate. Shiv Baba says: My part too is separate. I enable all of you to settle your accounts; I make you pure from impure and take you back home. You are making effort here in order to become pure. All others will settle their accounts at the time of settlement and return home. They will remain seated in the land of liberation. The world cycle has to continue to turn. You children become Brahmins through Brahma and then become deities. You Brahmins are doing service by following shrimat. You simply show human beings the path by saying: If you want to attain liberation and liberation-in-life, you can do that in this way. You have the key to both in your hands. You also know who will go into liberation and who will go into liberation-in-life. Just do this business throughout the day. When someone is running a grocery store, he has that in his intellect throughout the day. Your business is to know the beginning, the middle and the end of creation and to show others the way to liberation and liberation-in-life. Those who belong to this religion will emerge. There are many of other religions who don’t change their own religion. Some would take up the Buddhist religion because the deity religion has disappeared. Not a single person now says that he belongs to the original eternal deity religion. The pictures of the deities are very useful. Souls are imperishable; they never die. A soul sheds a body and takes another and continues to play his part. That world cannot be called the land of death. That is the land of immortality. Souls just change their costumes. These are very subtle matters and have to be understood. These are not gross things. When people marry, some receive everything retail and others receive things wholesale. Some give everything openly and others give everything locked in a suitcase. There are all types of people. You all receive a wholesale inheritance because all of you are brides. The Father is the Bridegroom. He decorates you children and gives you the wholesale sovereignty of the world. You become the masters of the world. The main thing is remembrance. Knowledge is very easy. When you think about it, it is just a question of remembering Alpha, but it is remembrance that instantly slips away. Generally, many say that they forget Baba. Whenever you explain to others, always use the word “remembrance”. The word “yoga” is wrong. A teacher remembers his students. The Father is the Supreme Soul. You souls are not supreme; you are impure. Now remember the Father! The teacher, the father and the guru are remembered. Gurus sit and relate scriptures and give mantras. Baba only has one mantra: Manmanabhav! What happens then? Madhyajibhav! You will then go to the land of Vishnu. Not all of you will become kings or queens. There are the king, the queen and the subjects. The main thing is the Trimurti. After Shiv Baba, there is Brahma who creates the human world; he creates Brahmins. He sits here and teaches Brahmins. This is something new, is it not? You Brahmins are brothers and sisters. Elderly people also say: We are brothers and sisters. This is something to be understood internally and not just to be said unnecessarily. God created the world through Prajapita Brahma and, since you are all children of Prajapita Brahma, all of you have become brothers and sisters. These things have to be understood. You children should have a lot of happiness about who it is that is teaching you. Shiv Baba, Trimurti Shiva. Brahma’s part lasts for a very short time. Vishnu’s part lasts for eight births in the golden-aged kingdom. Brahma has a part for just one birth. Therefore, Vishnu’s part is said to be longer. Trimurti Shiva is the main One. Then there is the part of Brahma who makes you children into the masters of the land of Vishnu. You Brahmins are created through Brahma. You then become deities. Therefore, this one is your spiritual father. This father in whom you now believe only exists for a short time. He is called Adi Dev, Adam and Eve. How could the world be created without him? There are Adi Dev and Adi Devi. The part of Brahma only exists at the confluence age. The deities’ parts last a lot longer. The deities are said to exist in only the golden age. In the silver age they are called warriors. These points you receive are very deep. You can’t speak about all of them at the same time. They speak of Trimurti Brahma; they have removed Shiva. We speak of Trimurti Shiva. All of those pictures etc. belong to the path of devotion. People are created through Brahma. You are becoming deities. At the time of destruction there are natural calamities. Destruction has to take place; after the iron age there will be the golden age. All of these bodies are going to be destroyed. Everything has to happen in a practical way. It doesn’t happen just by him opening his eye. At the time that heaven disappears, there are also earthquakes etc. Is it that Shankar blinks his eye at that time? It is remembered that Dwaraka and Lanka went beneath the water. The Father now explains: I have come to change those with stone intellects into those with divine intellects. People call out: O Purifier, come! Come and purify the world. However, they don’t understand that it is now the iron age and that the golden age will come after that. You children should dance in happiness. When a barrister passes his exams, he has thoughts inside such as: Now I will earn money and build a house. I will do this. You are now earning a true income. In heaven everything you receive is new. Just think about what the Somnath Temple would be like! There wouldn’t be just one temple. The temple is now 2500 years old. It would have taken time to build it. They would have worshipped in that temple, and it would then have been lootedIt wouldn’t have been looted as soon as it was built. There would have been many temples. They built temples in order to perform worship. You know that, by remembering the Father, you will go to the golden age. You souls will become pure. You do have to make effort. Nothing works without effort being made. “Liberation-in-life in a second” has been remembered. However, one cannot receive it just like that; it is understood that if you become a child, you definitely do receive it. You are now making effort to go to the land of liberation. You have to stay in remembrance of the Father. Day by day, the Father is refining the intellects of you children. The Father says: I tell you very deep things. Earlier, you were not told that souls are points and that the Supreme Soul is also a point. You might ask why you were not told that earlier. It was not in the drama. If that had been told to you in the beginning, you wouldn’t have understood anything. Everything is explained to you gradually. This is the kingdom of Ravan. Everyone becomes body conscious in the kingdom of Ravan. Everyone in the golden age is soul conscious: they know themselves to be souls. When their bodies become fully mature, they understand that they have to renounce them and take other small ones. A soul first has a small body which then grows. Everyone here is a different age. Some experience untimely death. Some live to the age of 125. So the Father explains: You should have a lot of happiness about receiving your inheritance from the Father. To have a pure marriage is not something to be happy about; it is in fact a weakness. If a girl says that she wants to remain pure, no one can force her. However, when she has little knowledge, she would be afraid. If a young girl is beaten badly, she can report it to the police who would then deal with the case. When people kill animals, a case is brought against them and they are punished. No one can beat you children. No one can beat kumars either. They can earn their own money; they can earn their own livelihood. The stomach doesn’t need a lot. One person’s stomach only needs four to five rupees whereas someone else’s needs 400 to 500 rupees. When some people have a lot of money they become greedy. The poor don’t even have money, so they are not greedy. They are happy with the dry chappatis they have. You children should not give too much importance to food. You shouldn’t be too interested in eating good things. You know that there is nothing you will not receive there. You receive an unlimited kingdom and unlimited happiness. There are no illnesses etc. there. You have healthwealth and happiness; you have everything there. You remain very well there even in old age. You have great happiness; there is no type of difficulty. The subjects too are like that. However, don’t think that it is fine if you just become a subject. In that case, it would be like the natives here. If you want to become the sun-dynasty Lakshmi and Narayan, you also have to make that much effort. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. We, the new creation of Brahma, are brothers and sisters; this has to be understood internally. There is no need to speak about it to others. Always maintain the happiness that Shiv Baba is teaching you.
  2. Don’t give too much importance to food and drink. Renounce greed and remember the happiness of the unlimited sovereignty.
Blessing:May you become a conqueror of Maya and a conqueror of attachment by divorcing yourself from all relationships with Maya and making a deal of having all relationships with the Father.
Now, cancel any old deals in your awareness and become single. You may remain co-operative with one another, but not as companions. Make the One your Companion and divorceMaya and all her relationships. You will then remain a victorious conqueror of Maya and a conqueror of attachment. If there is the slightest attachment to anyone, then, instead of becoming an intense effort-maker, you will just become an effort-maker. Therefore, no matter what happens, continue to dance in happiness. “Death to the prey and happiness for the hunter”. This is known as being a destroyer of attachment. Those who are such destroyers of attachment become beads in the rosary of victory.
Slogan:Increase the sparkle of the diamond with the speciality of truth.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 7 AUGUST 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 7 August 2020

Murli Pdf for Print : – 

07-08-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – श्रीमत पर चल सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति पाने का रास्ता बताओ, सारा दिन यही धन्धा करते रहो”
प्रश्नः-बाप ने कौन-सी सूक्ष्म बातें सुनाई हैं जो बहुत समझने की हैं?
उत्तर:-सतयुग अमरलोक है, वहाँ आत्मा एक चोला बदल दूसरा लेती है लेकिन मृत्यु का नाम नहीं इसलिए उसे मृत्युलोक नहीं कहा जाता। 2. शिवबाबा की बेहद रचना है, ब्रह्मा की रचना इस समय सिर्फ तुम ब्राह्मण हो। त्रिमूर्ति शिव कहेंगे, त्रिमूर्ति ब्रह्मा नहीं। यह सब बहुत सूक्ष्म बातें बाप ने सुनाई हैं। ऐसी-ऐसी बातों पर विचार कर बुद्धि के लिए स्वयं ही भोजन तैयार करना है।

ओम् शान्ति। त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। अब वो लोग त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। बाप कहते हैं – त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। त्रिमूर्ति ब्रह्मा भगवानुवाच नहीं कहते। तुम त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच कह सकते हो। वो लोग तो शिव-शंकर कह मिला देते हैं। यह तो सीधा है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा के बदले त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच। मनुष्य तो कह देते – शंकर आंख खोलते हैं तो विनाश हो जाता है। यह सब बुद्धि से काम लिया जाता है। तीन का ही मुख्य पार्ट है। ब्रह्मा और विष्णु का तो बड़ा पार्ट है 84 जन्मों का। विष्णु का और प्रजापिता ब्रह्मा का अर्थ भी समझा है, पार्ट है इन तीन का। ब्रह्मा का तो नाम गाया हुआ है आदि देव, एडम। प्रजापिता का मन्दिर भी है। यह है विष्णु का अथवा कृष्ण का अन्तिम 84 वां जन्म, जिसका नाम ब्रह्मा रखा है। सिद्ध तो करना ही है – ब्रह्मा और विष्णु। अब ब्रह्मा को तो एडाप्टेड कहेंगे। यह दोनों बच्चे हैं शिव के। वास्तव में बच्चा एक है। हिसाब करेंगे तो ब्रह्मा है शिव का बच्चा। बाप और दादा। विष्णु का नाम ही नहीं आता। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा स्थापना कर रहे हैं। विष्णु द्वारा स्थापना नहीं कराते। शिव के भी बच्चे हैं, ब्रह्मा के भी बच्चे हैं। विष्णु के बच्चे नहीं कह सकते। न लक्ष्मी-नारायण को ही बहुत बच्चे हो सकते हैं। यह है बुद्धि के लिए भोजन। आपेही भोजन बनाना चाहिए। सबसे जास्ती पार्ट कहेंगे विष्णु का। 84 जन्मों का विराट रूप भी विष्णु का दिखाते हैं, न कि ब्रह्मा का। विराट रूप विष्णु का ही बनाते हैं क्योंकि पहले-पहले प्रजापिता ब्रह्मा का नाम धरते हैं। ब्रह्मा का तो बहुत थोड़ा पार्ट है इसलिए विराट रूप विष्णु का दिखाते हैं। चतुर्भुज भी विष्णु का बना देते। वास्तव में यह अलंकार तो तुम्हारे हैं। यह भी बड़ी समझने की बातें हैं। कोई मनुष्य समझा न सके। बाप नये-नये तरीके से समझाते रहते हैं। बाप कहते हैं त्रिमूर्ति शिव भगवानुवाच राइट है ना। विष्णु, ब्रह्मा और शिव। इसमें भी प्रजापिता ब्रह्मा ही बच्चा है। विष्णु को बच्चा नहीं कहेंगे। भल क्रियेशन कहते हैं परन्तु रचना तो ब्रह्मा की होगी ना। जो फिर भिन्न नाम रूप लेती है। मुख्य पार्ट तो उनका है। ब्रह्मा का पार्ट भी बहुत थोड़ा है इस समय का। विष्णु का कितना समय राज्य है! सारे झाड़ का बीज रूप है शिवबाबा। उनकी रचना को सालिग्राम कहेंगे। ब्रह्मा की रचना को ब्राह्मण-ब्राह्मणियां कहेंगे। अब जितनी शिव की रचना है उतनी ब्रह्मा की नहीं। शिव की रचना तो बहुत है। सभी आत्मायें उनकी औलाद हैं। ब्रह्मा की रचना तो सिर्फ तुम ब्राह्मण ही बनते हो। हद में आ गये ना। शिवबाबा की है बेहद की रचना – सभी आत्मायें। बेहद की आत्माओं का कल्याण करते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्वर्ग की स्थापना करते हैं। तुम ब्राह्मण ही जाकर स्वर्गवासी बनेंगे। और तो कोई को स्वर्गवासी नहीं कहेंगे, निर्वाणवासी अथवा शान्तिधाम वासी तो सब बनते हैं। सबसे ऊंच सर्विस शिवबाबा की होती है। सभी आत्माओं को ले जाते हैं। सभी का पार्ट अलग-अलग है। शिवबाबा भी कहते हैं मेरा पार्ट अलग है। सबका हिसाब-किताब चुक्तू कराए तुमको पतित से पावन बनाए ले जाता हूँ। तुम यहाँ मेहनत कर रहे हो पावन बनने के लिए। दूसरे सब कयामत के समय हिसाब-किताब चुक्तू कर जायेंगे। फिर मुक्तिधाम में बैठे रहेंगे। सृष्टि का चक्र तो फिरना है।

तुम बच्चे ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण बन फिर देवता बन जाते हो। तुम ब्राह्मण श्रीमत पर सेवा करते हो। सिर्फ मनुष्यों को रास्ता बताते हो – मुक्ति और जीवनमुक्ति को पाना है तो ऐसे पा सकते हो। दोनों चाबी हाथ में हैं। यह भी जानते हो कौन-कौन मुक्ति में, कौन-कौन जीवनमुक्ति में जायेंगे। तुम्हारा सारा दिन यही धंधा है। कोई अनाज आदि का धन्धा करते हैं तो बुद्धि में सारा दिन वही रहता है। तुम्हारा धन्धा है रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानना और किसको मुक्ति-जीवनमुक्ति का रास्ता बताना। जो इस धर्म के होंगे वह निकल आयेंगे। ऐसे बहुत धर्म के हैं जो बदल नहीं सकते। ऐसे नहीं कि फीचर्स बदल जाते हैं। सिर्फ धर्म को मान लेते हैं। कई बौद्ध धर्म को मानते हैं क्योंकि देवी-देवता धर्म तो प्राय: लोप है ना। एक भी ऐसा नहीं जो कहे हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। देवताओं के चित्र काम में आते हैं, आत्मा तो अविनाशी है, वह कभी मरती नहीं। एक शरीर छोड़ फिर दूसरा लेकर पार्ट बजाती है। उनको मृत्युलोक नहीं कहा जाता। वह है ही अमरलोक। चोला सिर्फ बदलती है। यह बातें बड़ी सूक्ष्म समझने की हैं। मुट्टा (थोक अथवा सारा) नहीं है। जैसे शादी होती है तो किनको रेज़गारी, किनको मुट्टा देते हैं। कोई सब दिखाकर देते हैं, कोई बन्द पेटी ही देते हैं। किस्म-किस्म के होते हैं। तुमको तो वर्सा मिलता है मुट्टा, क्योंकि तुम सब ब्राइड्स हो। बाप है ब्राइडग्रुम। तुम बच्चों को श्रृंगार कर विश्व की बादशाही मुट्टे में देते हैं। विश्व का मालिक तुम बनते हो।

मुख्य बात है याद की। ज्ञान तो बहुत सहज है। भल है तो सिर्फ अल्फ को याद करना। परन्तु विचार किया जाता है याद ही झट खिसक जाती है। बहुत करके कहते हैं बाबा याद भूल जाती है। तुम किसको भी समझाओ तो हमेशा याद अक्षर बोलो। योग अक्षर रांग है। टीचर को स्टूडेन्ट की याद रहती है। फादर है सुप्रीम सोल। तुम आत्मा सुप्रीम नहीं हो। तुम हो पतित। अब बाप को याद करो। टीचर को, बाप को, गुरू को याद किया जाता है। गुरू लोग बैठ शास्त्र सुनायेंगे, मंत्र देंगे। बाबा का मंत्र एक ही है – मनमनाभव। फिर क्या होगा? मध्याजी भव। तुम विष्णुपुरी में चले जायेंगे। तुम सब तो राजा-रानी नहीं बनेंगे। राजा-रानी और प्रजा होती है। तो मुख्य है त्रिमूर्ति। शिवबाबा के बाद है ब्रह्मा जो फिर मनुष्य सृष्टि अर्थात् ब्राह्मण रचते हैं। ब्राह्मणों को बैठ फिर पढ़ाते हैं। यह नई बात है ना। तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ बहन-भाई ठहरे। बुढ़े भी कहेंगे हम भाई-बहन हैं। यह अन्दर में समझना है। किसको फालतू ऐसे कहना नहीं है। भगवान ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रची तो भाई-बहन हुए ना। जबकि एक प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हैं, यह समझने की बातें हैं। तुम बच्चों को तो बड़ी खुशी होनी चाहिए – हमको पढ़ाते कौन हैं? शिवबाबा। त्रिमूर्ति शिव। ब्रह्मा का भी बहुत थोड़ा समय पार्ट है। विष्णु का सतयुगी राजधानी में 8 जन्म पार्ट चलता है। ब्रह्मा का तो एक ही जन्म का पार्ट है। विष्णु का पार्ट बड़ा कहेंगे। त्रिमूर्ति शिव है मुख्य। फिर आता है ब्रह्मा का पार्ट जो तुम बच्चों को विष्णुपुरी का मालिक बनाते हैं। ब्रह्मा से ब्राह्मण सो फिर देवता बनते हैं। तो यह हो गया अलौकिक फादर। थोड़ा समय यह फादर है जिसको अब मानते हैं। आदि देव, आदम और बीबी। इनके बिगर सृष्टि कैसे रचेंगे। आदि देव और आदि देवी है ना। ब्रह्मा का पार्ट भी सिर्फ संगम समय का है। देवताओं का पार्ट तो फिर भी बहुत चलता है। देवतायें भी सिर्फ सतयुग में कहेंगे। त्रेता में क्षत्रिय कहा जाता। यह बड़ी गुह्य-गुह्य प्वाइंट्स मिलती हैं। सब तो एक ही समय वर्णन नहीं कर सकते। वह त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। शिव को उड़ा दिया है। हम फिर त्रिमूर्ति शिव कहते हैं। यह चित्र आदि सब हैं भक्ति मार्ग के। प्रजा रचते हैं ब्रह्मा द्वारा फिर तुम देवता बनते हो। विनाश के समय नैचुरल कैलेमिटीज भी आती है। विनाश तो होना ही है, कलियुग के बाद फिर सतयुग होगा। इतने सब शरीरों का विनाश तो होना ही है। सब कुछ प्रैक्टिकल में चाहिए ना। सिर्फ आंख खोलने से थोड़ेही हो सकता। जब स्वर्ग गुम होता है तो उस समय भी अर्थक्वेक आदि होती हैं। तो क्या उस समय भी शंकर आंख ऐसे मीचते हैं। गाते हैं ना द्वारिका अथवा लंका पानी के नीचे चली गई।

अब बाप समझाते हैं – मैं आया हूँ पत्थरबुद्धियों को पारसबुद्धि बनाने। मनुष्य पुकारते हैं – हे पतित-पावन आओ, आकर पावन दुनिया बनाओ। परन्तु यह नहीं समझते हैं कि अभी कलियुग है इसके बाद सतयुग आयेगा। तुम बच्चों को खुशी में नाचना चाहिए। बैरिस्टर आदि इम्तहान पास करते हैं तो अन्दर में ख्याल करते हैं ना – हम पैसे कमायेंगे, फिर मकान बनायेंगे। यह करेंगे। तो तुम अभी सच्ची कमाई कर रहे हो। स्वर्ग में तुमको सब कुछ नया माल मिलेगा। ख्याल करो सोमनाथ का मन्दिर क्या था! एक मन्दिर तो नहीं होगा। उस मन्दिर को 2500 वर्ष हुआ। बनाने में टाइम तो लगा होगा। पूजा की होगी उसके बाद फिर वह लूटकर ले गये। फौरन तो नहीं आये होंगे। बहुत मन्दिर होंगे। पूजा के लिए बैठ मन्दिर बनाये हैं। अभी तुम जानते हो बाप को याद करते-करते हम गोल्डन एज में चले जायेंगे। आत्मा पवित्र बन जायेगी। मेहनत करनी पड़ती है। मेहनत बिगर काम नहीं चलेगा। गाया भी जाता है – सेकेण्ड में जीवनमुक्ति। परन्तु ऐसे थोड़ेही मिल जाती है, यह समझा जाता है – बच्चे बनेंगे तो मिलेगी जरूर। तुम अभी मेहनत कर रहे हो मुक्तिधाम में जाने के लिए। बाप की याद में रहना पड़ता है। दिन-प्रतिदिन बाप तुम बच्चों को रिफाइन बुद्धि बनाते हैं। बाप कहते हैं तुमको बहुत-बहुत गुह्य बातें सुनाता हूँ। आगे थोड़ेही यह सुनाया था कि आत्मा भी बिन्दी है, परमात्मा भी बिन्दी है। कहेंगे पहले क्यों नहीं यह बताया। ड्रामा में नहीं था। पहले ही तुमको यह सुनायें तो तुम समझ न सको। धीरे-धीरे समझाते रहते हैं। यह है रावण राज्य। रावण राज्य में सब देह-अभिमानी बन जाते हैं। सतयुग में होते हैं आत्म-अभिमानी। अपने को आत्मा जानते हैं। हमारा शरीर बड़ा हुआ है, अब यह छोड़कर फिर छोटा लेना है। आत्मा का शरीर पहले छोटा होता है फिर बड़ा होता है। यहाँ तो कोई की कितनी आयु, कोई की कितनी। कोई की अकाले मृत्यु हो जाती है। कोई-कोई की 125 वर्ष की भी आयु होती है। तो बाप समझाते हैं तुमको खुशी बहुत होनी चाहिए – बाप से वर्सा लेने की। गन्धर्वी विवाह किया यह कोई खुशी की बात नहीं, यह तो कमज़ोरी है। कुमारी अगर कहे हम पवित्र रहना चाहते हैं तो कोई मार थोड़ेही सकते हैं। ज्ञान कम है तो डरते हैं। छोटी कुमारी को भी अगर कोई मारे, खून आदि निकले तो पुलिस में रिपोर्ट करे तो उसकी भी सज़ा मिल सकती है। जानवर को भी अगर कोई मारते हैं तो उन पर केस होता है, दण्ड पड़ता है। तुम बच्चों को भी मार नहीं सकते। कुमार को भी मार नहीं सकते। वह तो अपना कमा सकते हैं। शरीर निर्वाह कर सकते हैं। पेट कोई जास्ती नहीं खाता है – एक मनुष्य का पेट 4-5 रूपया, एक मनुष्य का पेट 400-500 रूपया। पैसा बहुत है तो हबच हो जाती है। गरीबों को पैसे ही नहीं तो हबच भी नहीं। वह सूखी रोटी में ही खुश होते हैं। बच्चों को जास्ती खान-पान के हंगामें में भी नहीं जाना चाहिए। खाने का शौक नहीं रहना चाहिए।

तुम जानते हो वहाँ हमें क्या नहीं मिलेगा! बेहद की बादशाही, बेहद का सुख मिलता है। वहाँ कोई बीमारी आदि होती नहीं। हेल्थ वेल्थ हैप्पीनेस सब रहता है। बुढ़ापा भी वहाँ बहुत अच्छा रहता। खुशी रहती है। कोई प्रकार की तकलीफ नहीं रहती है। प्रजा भी ऐसी बनती है। परन्तु ऐसे भी नहीं – अच्छा, प्रजा तो प्रजा ही सही। फिर तो ऐसे होंगे जैसे यहाँ के भील। सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण बनना है तो फिर इतना पुरूषार्थ करना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) हम ब्रह्मा की नई रचना आपस में भाई-बहन हैं, यह अन्दर समझना है किसी को कहने की दरकार नहीं। सदा इसी खुशी में रहना है कि हमें शिवबाबा पढ़ाते हैं।

2) खान-पान के हंगामें में जास्ती नहीं जाना है। हबच (लालच) छोड़ बेहद बादशाही के सुखों को याद करना है।

वरदान:-माया के सम्बन्धों को डायवोर्स दे बाप के सम्बन्ध से सौदा करने वाले मायाजीत, मोहजीत भव
अब स्मृति से पुराना सौदा कैन्सिल कर सिंगल बनो। आपस में एक दो के सहयोगी भल रहो लेकिन कम्पेनियन नहीं। कम्पेनियन एक को बनाओ तो माया के सम्बन्धों से डायवोर्स हो जायेगा। मायाजीत, मोहजीत विजयी रहेंगे। अगर जरा भी किसी में मोह होगा तो तीव्र पुरूषार्थी के बजाए पुरूषार्थी बन जायेंगे इसलिए क्या भी हो, कुछ भी हो खुशी में नाचते रहो, मिरूआ मौत मलूका शिकार – इसको कहते हैं नष्टोमोहा। ऐसा नष्टोमोहा रहने वाले ही विजय माला के दाने बनते हैं।
स्लोगन:-सत्यता की विशेषता से डायमण्ड की चमक को बढ़ाओ।

TODAY MURLI 6 AUGUST 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 6 August 2020

06/08/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence:Sweet children, wake up early in the morning and think about how such a tiny soul makes such a huge body function. I, a soul, have an imperishable part recorded in me.
Question:What practice does Shiv Baba have and what practice does He not have?
Answer:Shiv Baba has the practice of decorating souls with jewels of knowledge, but He doesn’t have the practice of decorating a body, because He says: I do not have a body of My own. Although I take this one’s body on loan, it is that soul that decorates his own body. I don’t do that. I am always bodiless.
Song:Even though the world may change, we will not change or turn away.

Om shanti. You children heard this song. Who heard it? You souls heard it with the ears of your bodies. You children now understand how tiny a soul is. When there is not a soul in a body, the body is of no use. Such a huge body functions with the support of such a tiny soul! No one in the world knows the soul that is present in this chariot. This is the throne of the soul, the immortal image. You children receive this knowledge. It is so entertaining and also meaningful. When you hear something meaningful, you continually think about it. You children also continue to think about how such a tiny soul is in such a big body. A part of 84 births is recorded in this soul. The body perishes and the soul remains. This is something to think about. Wake up in the morning and think about these things. You children have now remembered that a soul is so tiny and has received an eternal part. I, the soul, am so wonderful! This is new knowledge and no one in the world knows about it. Only the Father comes and tells you this. You have to keep thinking about how such a tiny soul plays his part. A body is made of the five elements. Baba doesn’t know how Shiv Baba’s soul comes and goes. It isn’t that He constantly stays in this body. Therefore, you should think about these things. No one else can receive such knowledge as this which the Father gives to you children. You know that this soul (Brahma Baba’s) truly did not have this knowledge before. No one at other spiritual gatherings ever thinks about these things. No one has the slightest knowledge of souls or the Supreme Soul. None of the sannyasis or holy men knows that it is a soul that gives mantras to others through his body. Souls study the scriptures with their bodies. Not a single human being is soul conscious. No one has the knowledge of souls. Therefore, how could anyone have the knowledge of the Father? You children know that it is to you souls that the Father says: Sweetest children, you are becoming so sensible! There isn’t a single human being who understands that the Supreme Father, the Supreme Soul, sits here and teaches the soul that is in this body. These matters have to be clearly understood. However, when you become busy with your business etc., you forget. First of all, the Father gives you knowledge of souls. No human being has this knowledge. It is remembered that souls remained separated from the Supreme Soul for a long time. There is an account of this. You children know that it is a soul that speaks through a body. Each soul performs good or bad acts through a body. The Father comes and makes you souls so beautiful. First of all, the Father says: When you wake up in the morning, practise thinking about what the soul, who listens through your body, is. The Father of souls is the Supreme Father, the Supreme Soul, who is also called the Purifier and the Ocean of Knowledge. Therefore, how could any human being be called an ocean of happiness or an ocean of peace, as they say? Would you say that Lakshmi and Narayan are always oceans of purity? No! Only the one Father is constantly the Ocean of Purity. Human beings simply sit and speak about the scriptures of the path of devotion. They don’t have any practical experience. They don’t understand that it is souls that praise the Father through their bodies. He is our very sweet Baba. He alone is the Bestower of Happiness. The Father says: O souls, now follow My directions! You imperishable souls receive eternal directions from the eternal Father. Those perishable bodily beings receive directions from perishable bodily beings. In the golden age, you receive the reward you earn here. There, no one receives wrong directions. The shrimat you are given now is eternal; it lasts for half the cycle. This is new knowledge. One needs to have such an intellect that one is able to grasp this and then act upon it. Only those who have done devotion from the beginning will be able to imbibe this very well. You should understand that if your intellect is unable to imbibe this well, you definitely have not done devotion from the beginning. The Father says: If you don’t understand anything, then ask the Father because He is the eternal Surgeon. He is also called the Supreme Soul. When souls become pure, they are praised. When there is praise of souls, there is also praise of their bodies. When a soul is tamopradhan, even his body isn’t praised. At this time, you children receive very deep intellects. It is you souls that receive them. You souls have to become very sweet and give happiness to everyone. Baba is so sweet! He also makes souls very sweet. Practise: We souls should not perform any unrighteous actions. Check: Am I doing anything unrighteous? Would Shiv Baba do anything unrighteous? No! He comes to carry out the most elevated, benevolent task of all. He grants salvation to everyone. Therefore, you children have to perform the same task that the Father carries out. You have been told that those who have done a lot of devotion from the beginning will be able to retain this knowledge. Even now, there are many devotees of the deities. They are even ready to cut off their own heads. Those who have done little devotion continue to hang around the ones who have done a lot of devotion; they sing praise of them. Everything of theirs is physically visible. Here, you are incognito. Your intellects have the whole knowledge of the beginning, the middle and the end of the world. You children also know that the Father has come to teach us and that we are now to go back home. The place where all souls reside is our home. Since there are no bodies there, how could there be any sound? Without a soul, a body becomes non-living. Human beings have so much attachment to their bodies. When a soul leaves his body, only the five elements remain and yet human beings still have so much love for that. A wife is ready to climb onto her husband’s funeral pyre; there is so much attachment to that body. You now understand that you have to destroy all your attachment to the whole world. This body is going to be destroyed so all attachment has to be removed from it. However, there is a lot of attachment. On the day of remembrance of a departed soul, a brahmin priest is offered food (they indirectly offer food to the departed spirit). That soul cannot eat anything. You children now have to separate yourselves from those things. Each one plays his own part in the drama. At this time, you have the knowledge that you have to become destroyers of attachment. There is the story of the king who conquered attachment. There was not really a king who had conquered attachment. They just made up many stories. There is no untimely death there. Therefore, there is no question of asking about anything. It is at this time that you are made into conquerors of attachment. In the golden age, there are the kings who conquered attachment. As are the king and queen, so their subjects. In fact, that whole kingdom is of those who conquered attachment. It is in Ravan’s kingdom that there is attachment. There is no vice there, because Ravan’s kingdom is not there; Ravan’s kingdom disappears. No one knows anything about what happens in the kingdom of Rama. No one, but the Father, can tell you these things. Although the Father is in this body, He still remains soul conscious. Even when a house is taken on loan or rented, there is still attachment to that house. People furnish their houses very well. That One doesn’t need to furnish anything because the Father is bodiless. He doesn’t have any practice of decorating a body. He only has the practice of decorating the children with the imperishable jewels of knowledge. He explains to you the secrets of the beginning, the middle and the end of the world. This body is impure, but when he receives his next body, that will be pure. At this time, this world is old and has to be destroyed. No one in the world knows this. They will gradually come to know about it. It is only the Father’s task to establish the new world and destroy the old world. The Father comes and creates creation through Brahma in order to establish the new world. Are you in the new world? No; the new world is being established. Therefore, the topknot of Brahmins is the highest. Baba has explained that when you come face to face with Baba, first of all, remember that you are coming directly in front of God, the Father. Shiv Baba is incorporeal. How can you go face to face in front of Him? Therefore, remember that Father, and then come in front of this father. You know that He is sitting in this one. This body is impure. When you do something without being in remembrance of Shiv Baba, sin is accumulated. We are going to Shiv Baba. Then, in our next births, we will have different relatives. There, we will go into the laps of deities. Only once do we receive this lap of God. You say: Baba, I now belong to You. There are many who have never even seen Him. They live outside and they write to Shiv Baba: Baba, I have become Your adopted child. There is knowledge in the intellect. The soul says: I now belong to Shiv Baba. Before this, we were in the laps of impure ones. In the future, we will go into the laps of the pure deities. This birth is invaluable. You become as valuable as a diamond at the confluence age. The confluence age is not the meeting of the rivers of water with an ocean. There is the difference of night and day. The Brahmaputra River is the biggest river. It meets an ocean. Rivers flow into oceans. You are the rivers of knowledge who have emerged from the Ocean. Shiv Baba is the Ocean of Knowledge. The biggest river of all is the Brahmaputra River. This one’s name is Brahma. He is so similar to the Ocean. You know from where rivers emerge. They emerge from an ocean and then merge back into an ocean. Sweet water is drawn from an ocean. You children of the Ocean come and then merge into the Ocean. You have emerged from the Ocean of Knowledge and all of you will then go back with Him to where He resides. You souls also stay there. The Ocean of Knowledge comes and makes you sweet and pure. He makes the souls that have become salty sweet again. The salty rubbish of the five vices is removed from you and you become satopradhan from tamopradhan. The Father inspires you to make a lot of effort. You were so satopradhan when you lived in heaven. You have now become completely dirty. Look what Ravan has made you become! Only in Bharat is it remembered: A birth as invaluable as a diamond. Baba continues to ask you: Why do you distress yourself chasing after shells? In any case, you don’t need many shells. The poor understand very quickly. The wealthy believe that it is heaven here for them now. You children know that the birth of all human beings at this time is as worthless as a shell. We too were like that. Look what Baba is now making us become. You have the aim and objective of changing from a human being into Narayan. Bharat is now poverty-stricken and worth a shell. The people of Bharat themselves don’t know this. Here, you are very ordinary, weak and innocent mothers. Important people do not feel like sitting here. Instead, they go to big gatherings where there are great sannyasis and gurus etc. The Father says: I am the Lord of the Poor. It is said that God protects the poor. You now know how wealthy you used to be. You are now once again becoming that. Baba writes that you are going to become multimillionaires. There is no fighting or battling there. Here, there is so much fighting over money. There is also so much bribery. Human beings need money. You children know that Baba is filling your treasure-stores. Take as much wealth as you want for half the cycle. However, you do have to make full effort. Don’t become careless. It is said: “Follow the father”. By following the father, this is what you will become: Lakshmi or Narayan from an ordinary man or woman. This is an important examination. Don’t be even slightly careless in this. The Father is giving you shrimat. Therefore, you should follow it. Don’t disobey the rules and regulations. You become elevated by following shrimat. The destination is very high. Keep a daily account as to whether there was a profit or a loss, how much you remembered the Father and to how many you showed the path. You are sticks for the blind. Each of you receives a third eye of knowledge. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Become just as sweet as the Father and give everyone happiness. Don’t perform any unrighteous acts. Perform the most elevated task of benevolence.
  2. Don’t distress yourself chasing after shells. Make effort and make your life as valuable as a diamond. Don’t be careless.
Blessing:May you keep yourself safe from sin by your challenge and your practical life being equal and become a world server.
Let there be equality in the challenge you children issue and your practical lives. Otherwise, instead of becoming a charitable soul, you will become a burdened soul. Understand the philosophy of sin and charity and keep yourself safe because any type of weakness, even in your thoughts, wasteful words, wasteful intentions or feelings of dislike or jealousy increase your account of sin. Therefore, with the blessing of, “May you be a charitable soul”, keep yourself safe and become a world server. Give the experience of one direction collectively and a stable stage.
Slogan:When you light the flame of purity everywhere they will easily be able to see the Father.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 6 AUGUST 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 6 August 2020

Murli Pdf for Print : – 

06-08-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – सवेरे-सवेरे उठ यही चिंतन करो कि मैं इतनी छोटी-सी आत्मा कितने बड़े शरीर को चला रही हूँ, मुझ आत्मा में अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है”
प्रश्नः-शिवबाबा को कौन-सी प्रैक्टिस है, कौन-सी नहीं?
उत्तर:-आत्मा का ज्ञान रत्नों से श्रृंगार करने की प्रैक्टिस शिवबाबा को है, बाकी शरीर का श्रृंगार करने की प्रैक्टिस उन्हें नहीं क्योंकि बाबा कहते मुझे तो अपना शरीर है नहीं। मैं इनका शरीर भल किराये पर लेता हूँ लेकिन इस शरीर का श्रृंगार यह आत्मा स्वयं करती, मैं नहीं करता। मैं तो सदा अशरीरी हूँ।
गीत:-बदल जाए दुनिया न बदलेंगे हम …….. Audio Player

ओम् शान्ति। बच्चों ने यह गीत सुना। किसने सुना? आत्मा ने इन शरीर के कानों द्वारा सुना। बच्चों को भी यह मालूम पड़ा कि आत्मा कितनी छोटी है। वह आत्मा इस शरीर में नहीं है तो शरीर कोई काम का नहीं रहता। कितनी छोटी आत्मा के आधार पर यह कितना बड़ा शरीर चलता है। दुनिया में किसको भी पता नहीं है कि आत्मा क्या चीज़ है जो इस रथ पर विराजमान होती है। अकालमूर्त आत्मा का यह तख्त है। बच्चों को भी यह ज्ञान मिलता है। कितना रमणीक, रहस्य युक्त है। जब कोई ऐसी रहस्ययुक्त बात सुनी जाती है तो चिन्तन चलता है। तुम बच्चों का भी यही चिन्तन चलता है – इतनी छोटी सी आत्मा है इतने बड़े शरीर में। आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट नूँधा हुआ है। शरीर तो विनाश हो जाता है। बाकी आत्मा रहती है। यह बड़ी विचार की बाते हैं। सवेरे उठकर यह ख्याल करना चाहिए। बच्चों को स्मृति आई है आत्मा कितनी छोटी है, उनको अविनाशी पार्ट मिला हुआ है। मैं आत्मा कितनी वन्डरफुल हूँ। यह नया ज्ञान है। जो दुनिया में किसको भी नहीं है। बाप ही आकर बतलाते हैं, जो सिमरण करना होता है। हम कितनी छोटी सी आत्मा कैसे पार्ट बजाती है। शरीर 5 तत्वों का बनता है। बाबा को थोड़ेही मालूम पड़ता है। शिवबाबा की आत्मा कैसे आती-जाती है। ऐसे भी नहीं, सदैव इसमें रहती है। तो यही चिंतन करना है। तुम बच्चों को बाप ऐसा ज्ञान देते हैं जो कभी कोई को मिल न सके। तुम जानते हो बरोबर यह ज्ञान इनकी आत्मा में नहीं था। और सतसंगों में ऐसी-ऐसी बातों पर कोई का ख्याल नहीं रहता है। आत्मा और परमात्मा का रिंचक भी ज्ञान नहीं है। कोई भी साधू-संन्यासी आदि यह थोड़ेही समझते कि हम आत्मा शरीर द्वारा इनको मंत्र देती है। आत्मा शरीर द्वारा शास्त्र पढ़ती है। एक भी मनुष्य मात्र आत्म-अभिमानी नहीं है। आत्मा का ज्ञान कोई को है नहीं, तो फिर बाप का ज्ञान कैसे होगा।

तुम बच्चे जानते हो हम आत्माओं को बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों! तुम कितना समझदार बन रहे हो। ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो समझे कि इस शरीर में जो आत्मा है, उनको परमपिता परमात्मा बैठ पढ़ाते हैं। कितनी समझने की बातें हैं। परन्तु फिर भी धन्धे आदि में जाने से भूल जाते हैं। पहले तो बाप आत्मा का ज्ञान देते हैं जो कोई भी मनुष्य मात्र को नहीं है। गायन भी है ना – आत्मायें-परमात्मा अलग रहे बहुकाल… हिसाब है ना। तुम बच्चे जानते हो आत्मा ही बोलती है शरीर द्वारा। आत्मा ही शरीर द्वारा अच्छे वा बुरे काम करती है। बाप आकर आत्माओं को कितना गुल-गुल बनाते हैं। पहले-पहले तो बाप कहते हैं सवेरे-सवेरे उठकर यही प्रैक्टिस वा ख्याल करो कि आत्मा क्या है? जो इस शरीर द्वारा सुनती है। आत्मा का बाप परमपिता परमात्मा है, जिसको पतित-पावन, ज्ञान का सागर कहते हैं। फिर कोई मनुष्य को सुख का सागर, शान्ति का सागर कैसे कह सकते। क्या लक्ष्मी-नारायण को कहेंगे सदैव पवित्रता का सागर? नहीं। एक बाप ही सदैव पवित्रता का सागर है। मनुष्य तो सिर्फ भक्ति मार्ग के शास्त्रों का बैठ वर्णन करते हैं। प्रैक्टिकल अनुभव नहीं है। ऐसे नहीं समझेंगे हम आत्मा इस शरीर से बाप की महिमा करते हैं। वह हमारा बहुत मीठा बाबा है। वही सुख देने वाला है। बाप कहते हैं – हे आत्मायें, अब मेरी मत पर चलो। यह अविनाशी आत्मा को अविनाशी बाप द्वारा अविनाशी मत मिलती है। वह विनाशी शरीरधारियों को विनाशी शरीरधारियों की ही मत मिलती है। सतयुग में तो तुम यहाँ की प्रालब्ध पाते हो। वहाँ कभी उल्टी मत मिलती ही नहीं। अभी की श्रीमत ही अविनाशी बन जाती है, जो आधाकल्प चलती है। यह नया ज्ञान है, कितनी बुद्धि चाहिए इसको ग्रहण करने की। और एक्ट में आना चाहिए। जिन्हों ने शुरू से बहुत भक्ति की होगी वही अच्छी रीति धारण कर सकेंगे। यह समझना चाहिए – अगर हमारी बुद्धि में ठीक रीति धारणा नहीं होती है, तो जरूर शुरू से हमने भक्ति नहीं की है। बाप कहते हैं कुछ भी नहीं समझते हो तो बाप से पूछो क्योंकि बाप है अविनाशी सर्जन। उनको सुप्रीम सोल भी कहा जाता है। आत्मा पवित्र बनती है तो उनकी महिमा होती है। आत्मा की महिमा है तो शरीर की भी महिमा होती है। आत्मा तमोप्रधान है तो शरीर की भी महिमा नहीं। इस समय तुम बच्चों को बहुत गुह्य बुद्धि मिलती है। आत्मा को ही मिलती है। आत्मा को कितना मीठा बनना चाहिए। सबको सुख देना चाहिए। बाबा कितना मीठा है। आत्माओं को भी बहुत मीठा बनाते हैं। आत्मा कोई भी अकर्तव्य कार्य न करे – यह प्रैक्टिस करनी है। चेक करना है कि मेरे से कोई अकर्तव्य तो नहीं होता है? शिवबाबा कभी अकर्तव्य कार्य करेंगे? नहीं। वह आते ही हैं उत्तम से उत्तम कल्याणकारी कार्य करने। सबको सद्गति देते हैं। तो जो बाप कर्तव्य करते हैं, बच्चों को भी ऐसा कर्तव्य करना चाहिए। यह भी समझाया है, जिसने शुरू से लेकर बहुत भक्ति की है, उनकी बुद्धि में ही यह ज्ञान ठहरेगा। अभी भी देवताओं के ढेर भक्त हैं। अपना सिर देने के लिए भी तैयार रहते हैं। बहुत भक्ति करने वालों के पिछाड़ी, कम भक्ति करने वाले लटकते रहते। उनकी महिमा गाते हैं। उनका तो स्थूल में सब देखने में आता है। यहाँ तुम हो गुप्त। तुम्हारी बुद्धि में सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का सारा ज्ञान है। यह भी बच्चों को मालूम है – बाबा हमको पढ़ाने आये हैं। अब फिर हम घर जायेंगे। जहाँ सब आत्मायें आती हैं, वह हमारा घर है। वहाँ शरीर ही नहीं तो आवाज़ कैसे हो। आत्मा के बिना शरीर जड़ बन जाता है। मनुष्यों का शरीर में कितना मोह रहता है! आत्मा शरीर से निकल गई तो बाकी 5 तत्व, उन पर भी कितना लव रहता है। स्त्री पति की चिता पर चढ़ने लिए तैयार हो जाती है। कितना मोह रहता है शरीर में। अभी तुम समझते हो नष्टोमोहा होना है, सारी दुनिया से। यह शरीर तो खत्म होना है। तो उनसे मोह निकल जाना चाहिए ना। परन्तु बहुत मोह रहता है। ब्राह्मणों को खिलाते हैं। याद करते हैं ना – फलाने का श्राध है। अब वह थोड़ेही खा सकते हैं। तुम बच्चों को तो अब इन बातों से अलग हो जाना चाहिए। ड्रामा में हर एक अपना पार्ट बजाते हैं। इस समय तुमको ज्ञान है, हमको नष्टोमोहा बनना है। मोहजीत राजा की भी कहानी है ना और कोई मोह जीत राजा होता नहीं। यह तो कथायें बहुत बनाई हैं ना। वहाँ अकाले मृत्यु होती नहीं। तो पूछने की भी बात नहीं रहती। इस समय तुमको मोहजीत बनाते हैं। स्वर्ग में मोह जीत राजायें थे, यथा राजा रानी तथा प्रजा ऐसे हैं। वह है ही नष्टोमोहा की राजधानी। रावण राज्य में मोह होता है। वहाँ तो विकार होता नहीं, रावण राज्य ही नहीं। रावण की राजाई चली जाती है। राम राज्य में क्या होता है, कुछ भी पता नहीं। सिवाए बाप के और कोई यह बातें बता न सके। बाप इस शरीर में होते भी देही-अभिमानी है। लोन अथवा किराये पर मकान लेते हैं तो उसमें भी मोह रहता है। मकान को अच्छी रीति फर्निश करते हैं, इनको तो फर्निश करना नहीं है क्योंकि बाप तो अशरीरी है ना। इनको कोई भी श्रृंगार आदि करने की प्रैक्टिस ही नहीं है। इनको तो अविनाशी ज्ञान रत्नों से बच्चों को श्रृंगारने की ही प्रैक्टिस है। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। शरीर तो अपवित्र ही है, इनको जब दूसरा नया शरीर मिलेगा तो पवित्र होंगे। इस समय तो यह पुरानी दुनिया है, यह खत्म हो जानी है। यह भी दुनिया में किसको पता ही नहीं है। धीरे-धीरे मालूम पड़ेगा। नई दुनिया की स्थापना और पुरानी दुनिया का विनाश – यह तो बाप का ही काम है। बाप ही आकर ब्रह्मा द्वारा प्रजा रच नई दुनिया की स्थापना कर रहे हैं। तुम नई दुनिया में हो? नहीं, नई दुनिया स्थापन होती है। तो ब्राह्मणों की चोटी भी ऊंच है। बाबा ने समझाया है, बाबा के सम्मुख आते हो तो पहले यह याद करना है कि हम ईश्वर बाप के सम्मुख जाते हैं। शिवबाबा तो निराकार है। उनके सम्मुख हम कैसे जायें। तो उस बाप को याद कर फिर बाप के सम्मुख आना है। तुम जानते हो वह इसमें बैठा हुआ है। यह शरीर तो पतित है। शिवबाबा की याद में न रह कोई काम करते हो तो पाप लग जाता है। हम शिवबाबा के पास जाते हैं। फिर दूसरे जन्म में दूसरे सम्बन्धी होंगे। वहाँ देवताओं की गोद में जायेंगे। यह ईश्वरीय गोद एक ही बार मिलती है। मुख से कहते हैं बाबा हम आपका हो चुका। बहुत हैं जिन्होंने कभी देखा भी नहीं है। बाहर में रहते हैं, लिखते हैं शिवबाबा हम आपकी गोद के बच्चे हो चुके हैं। बुद्धि में ज्ञान है। आत्मा कहती है-हम शिवबाबा के बन चुके। इनके पहले हम पतित की गोद के थे। भविष्य में पवित्र देवता की गोद में जायेंगे। यह जन्म दुर्लभ है। हीरे जैसा तुम यहाँ संगमयुग पर बनते हो। संगमयुग कोई उस पानी के सागर और नदियों को नहीं कहा जाता। रात दिन का फ़र्क है। ब्रह्मपुत्रा बड़े ते बड़ी नदी है, जो सागर में मिलती है। नदियां जाकर सागर में पड़ती हैं। तुम भी सागर से निकली हुई ज्ञान नदी हो। ज्ञान सागर शिवबाबा है। बड़े ते बड़े नदी है ब्रह्मपुत्रा। इनका नाम ब्रह्मा है। सागर से इनका कितना मेल है। तुमको मालूम है नदियां कहाँ से निकलती हैं। सागर से ही निकलती हैं, फिर सागर में पड़ती हैं। सागर से मीठा पानी खींचते हैं। सागर के बच्चे फिर सागर में जाकर मिलते हैं। तुम भी ज्ञान सागर से निकली हो फिर सब वहाँ चली जायेंगी, जहाँ वह रहते हैं, वहाँ तुम आत्मायें भी रहती हो। ज्ञान सागर आकर तुमको पवित्र मीठा बनाते हैं। आत्मा जो खारी बन गई है उनको मीठा बनाते हैं। 5 विकारों रूपी छी-छी नमकीन तुमसे निकल जाती है, तो तुम तमोप्रधान से सतो-प्रधान बन जाते हो। बाप पुरूषार्थ बहुत कराते हैं। तुम कितने सतोप्रधान थे, स्वर्ग में रहते थे। तुम बिल्कुल छी-छी बन गये हो। रावण ने तुमको क्या बनाया है। भारत में ही गाया जाता है हीरे जैसा जन्म अमोलक।

बाबा कहते रहते हैं तुम कौड़ियों पिछाड़ी क्यों हैरान होते हो। कौड़ियां भी जास्ती थोड़ेही चाहिए। गरीब झट समझ जाते हैं। साहूकार तो कहते हैं अभी हमारे लिए यहाँ ही स्वर्ग है। तुम बच्चे जानते हो – जो भी मनुष्यमात्र हैं सबका इस समय कौड़ी जैसा जन्म है। हम भी ऐसे थे। अभी बाबा हमको क्या बनाते हैं। एम-ऑब्जेक्ट तो है ना। हम नर से नारायण बनते हैं। भारत अब कौड़ी जैसा कंगाल है ना। भारतवासी खुद थोड़ेही जानते। यहाँ तुम कितने साधारण अबलायें हो। कोई बड़ा आदमी होगा तो उनको यहाँ बैठने की दिल नहीं होगी। जहाँ बड़े-बड़े आदमी संन्यासी गुरू आदि लोग होंगे वहाँ की बड़ी-बड़ी सभाओं में जायेंगे। बाप भी कहते हैं मैं गरीब निवाज हूँ। कहते हैं भगवान गरीबों की रक्षा करते हैं। अभी तुम जानते हो – हम कितने साहूकार थे। अभी फिर बनते हैं। बाबा लिखते भी हैं तुम पदमापदमपति बनते हो। वहाँ पर मारा-मारी नहीं होती है। यहाँ तो देखो पैसे के पीछे कितनी मारामारी है। रिश्वत कितनी मिलती है। पैसे तो मनुष्यों को चाहिए ना। तुम बच्चे जानते हो बाबा हमारा खजाना भरपूर कर देते हैं। आधाकल्प के लिए जितना चाहिए उतना धन लो, परन्तु पुरूषार्थ पूरा करो। गफलत नहीं करो। कहा जाता है ना फालो फादर। फादर को फालो करो तो यह जाकर बनेंगे। नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी, बड़ा भारी इम्तहान है। इसमें जरा भी ग़फलत नहीं करनी चाहिए। बाप श्रीमत देते हैं तो फिर उस पर चलना है। कायदे कानून का उल्लंघन नहीं करना है। श्रीमत से ही तुम श्री बनते हो। मंजिल बहुत बड़ी है। अपना रोज़ का खाता रखो। कमाई की या नुकसान किया? बाप को कितना याद किया? कितने को रास्ता बताया? अन्धों की लाठी तुम हो ना। तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जैसे बाप मीठा है, ऐसे मीठा बन सबको सुख देना है। कोई भी अकर्तव्य कार्य नहीं करना है। उत्तम से उत्तम कल्याण का ही कार्य करना है।

2) कौड़ियों के पिछाड़ी हैरान नहीं होना है। पुरूषार्थ कर अपनी जीवन हीरे जैसी बनानी है। गफलत नहीं करनी है।

वरदान:-चैलेन्ज और प्रैक्टिकल की समानता द्वारा स्वयं को पापों से सेफ रखने वाले विश्व सेवाधारी भव
आप बच्चे जो चैलेन्ज करते हो उस चैलेन्ज और प्रैक्टिकल जीवन में समानता हो, नहीं तो पुण्य आत्मा के बजाए बोझ वाली आत्मा बन जायेंगे। इस पाप और पुण्य की गति को जानकर स्वयं को सेफ रखो क्योंकि संकल्प में भी किसी भी विकार की कमजोरी, व्यर्थ बोल, व्यर्थ भावना, घृणा वा ईर्ष्या की भावना पाप के खाते को बढ़ाती है इसलिए पुण्य आत्मा भव के वरदान द्वारा स्वयं को सेफ रख विश्व सेवाधारी बनो। संगठित रूप में एकमत, एकरस स्थिति का अनुभव कराओ।
स्लोगन:-पवित्रता की शमा चारों ओर जलाओ तो बाप को सहज देख सकेंगे।
Font Resize